सआदत हसन मंटो यदि जीवित होते तो इस साल सौ के हो जाते, उस हिंदुस्तान से 35 साल ज्यादा बुजुर्ग जिसे वह शिद्दत से प्यार करते थे और जिसे छोड़कर वह पाकिस्तान नाम की एक अनजान-सी जगह नहीं जाना चाहते थे, पर जहां त्रासद स्थितियों में अंतत: उन्हें जाना पड़ा। उनके करीबी दोस्त अहमद राही ने अप्रैल, 1990 में लाहौर में मंटो के कुछ अन्य मित्रों के संग बातचीत के दौरान सही कहा था, ”मेरे खयाल से मंटो की मौत उसी दिन शुरू हो गई जिस दिन उन्होंने पाकिस्तान की धरती पर कदम रखा।”
कौन मंटो? ये सवाल शायद किसी भी अच्छे-खासे पढ़े-लिखे इंसान से दो दशक पहले पूछ लिया गया होता तो उसकी यही प्रतिक्रिया होती। अब ऐसा नहीं है। आजकल तो शराब और सिगरेट के धुएं से लबरेज किसी भी साहित्यिक शाम में उनका नाम लेना फैशन हो चला है।
यही सही, लेकिन पेंगुइन का हमें तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने मंटो की कहानियों के कई संकलन प्रकाशित कर रुचिवान पाठकों को एक ऐसे लेखक से परिचित करवाया जिसने तैंतालीस बरस की उथल-पुथल भरी छोटी-सी जिंदगी में अपना नाम आधुनिक उर्दू कथा-साहित्य के कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई और राजिंदर सिंह बेदी जैसे स्तम्भों के साथ स्थापित कर दिया।
सआदत हसन मंटो 11 मई, 1912 को पंजाब के लुधियाना जिले के समराला गांव में पैदा हुए थे। वह मूल रूप से कश्मीरी थे, जिसके चलते उन्होंने एक बार एक मजाकिया खत जवाहरलाल नेहरू को उन्हें ‘हमवतन’ और खुद को भारत के पहले प्रधानमंत्री की तरह ‘पंडित’ संबोधित करते हुए लिखा था। कुल लगभग दो दशक के अपने साहित्यिक सफर में मंटो ने दो सौ से ज्यादा कहानियां लिखीं। नाटकों और निबंधों में भी उन्होंने हाथ आजमाया, लेकिन एक साहित्यकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा कहानियों और अपने त्रासद दौर की पीडि़त चेतना पर टिकी है।
हमारे जैसे देश में जहां खुद के बारे में बढ़-चढ़ कर फिर चाहे कोई कितना ही योग्य क्यों न हो प्रशंसा करने की परंपरा नहीं रही है, वहां यह कहना काफी है जैसा कि पिछले कुछ समय से साहित्य के कई जानकार कह रहे हैं कि मंटो की कई कहानियां ऐसी हैं जो दुनिया के किसी भी उत्कृष्ट कहानी संग्रहों में शामिल होने लायक हैं। विभाजन पर उनकी कई मास्टरपीस कहानियों में से टोबा टेक सिंह, ठंडा गोश्त और खोल दो ऐसी रचनाएं हैं जो लाखों लोगों को एक मनोवैज्ञानिक नो मैन्स लैंड में जमा हुआ छोड़ देती हैं। ये उस विभाजन पर हैं जिसने भले ही दोनों ओर कुछ लोगों की किस्मत बुलंद करने में मदद की हो।
कुछ समय तक मंटो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चुनिंदा तबकों में ही जाने जाते थे, लेकिन अब वह दिन आ गया है जब उनकी प्रतिष्ठा निश्चय ही धरती के चारों कोनों में फैलेगी। मंटो की मौत तैतालीसवीं सालगिरह से कुछ माह पहले 18 जनवरी, 1955 को लाहौर में हुई! उनकी देह टूट चुकी थी, लेकिन उनकी आत्मा डिगी नहीं थी। धरती के हतभागियों के प्रति उनका प्यार और उनकी समझ बेहद गहरी थी, जिसमें सबसे पहला वे खुद को मानते थे।
सलमान रुश्दी मंटो को ”आधुनिक भारतीय कथा का निर्विवाद बादशाह” मानते हैं। (हो सकता है कि रुश्दी मानिक बंदोपाध्याय या मलयाली कहानीकार वाइकोम मोहम्मद बशीर को न जानते हों)। लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि मंटो और रुश्दी दोनों को ही गोकि अलग-अलग तरीकों से और अलग-अलग हालातों में समाजी और मजहबी खयालात के मामले में खुद के प्रति ईमानदार रहने की कीमत चुकानी पड़ी, दंड भुगतना पड़ा और सामाजिक घेरेबंदी का शिकार होना पड़ा।
मंटो ने मुंबई की तलछट में रहने वाले पात्रों के बारे में क्रूर और हौलनाक यथार्थता से लिखा। वहां वह हिंदी फिल्मों से जुड़े थे और कहानियां और संवाद लिखा करते थे। उनके कई पात्र विभाजन के दुर्भाग्य के शिकार थे और उन तथाकथित खुदा के बंदों के भी, जिनमें मंटो को जरा भी खुदाई नजर नहीं आती थी। मानिक बंदोपाध्याय की ही तरह मंटो के भीतर भी सेक्स, मजहब और हिंसा के बीच के अक्सर अजीबोगरीब और क्रूर रिश्तों को बेपर्द कर देने की एक तड़प थी।
इस प्रक्रिया में मंटो को मजहबी आधार पर बने पाकिस्तान में सत्ता और मुल्लाओं दोनों के ही कोप का शिकार बनना पड़ा। उनके लिखे को कुफ्र, अश्लील और राष्ट्रविरोधी करार दिया गया। मुल्ला और उनके चेले तथा मुस्लिम लीग में अपनी किस्मत तलाशनेवालों ने मंटो की कहानियों के ऐसे अर्थ निकाले जो उनको रास आते थे पर जो कभी भी मंटो की मंशा नहीं थी। उनके लिखे को जान-बूझ कर तोड़ा-मरोड़ा गया, उसे विकृत किया गया, उनके लेखन को कलंकित और बदनाम किया गया। लेकिन वे किसी भी तरीके से न तो मंटो को खुद की नजर में और न ही उनके वास्तविक पाठकों की नजर में गिरा पाए। गरीबी की मारी अपनी छोटी-सी जिंदगी के अंत तक मंटो बिना डरे और डिगे वही लिखते रहे जिसमें उनका भरोसा था।
इस मोड़ पर संभवत: एक हलका-सा विषयांतर जरूरी है। इस उपमहाद्वीप में रहने वाले हमारे जैसे वे सभी लोग जो मोपासां, बाल्जॉक, गोगोल, चेखव या एडगर एलेन पो के उचित ही प्रशंसक हैं, उन्हें अपनी मिट्टी में जन्मे इस जीनियस कथाकार के लिए, जिसे अब तक नजरअंदाज किया गया है, थोड़ा वक्त निकालना चाहिए। ठीक ही कहा है: दुनिया को स्थानीयता में देखो। यदि हम अपनी चौखट पर मौजूद जिंदगी और इसके प्राणियों को उनकी विविधता और जटिलताओं में समझने में असमर्थ हैं तो फिर उनकी अनंत छटाओं को इतनी बड़ी दुनिया में कैसे देख पाएंगे?
मंटो को हमारे वक्त और हमारी ऊर्जा की दरकार है क्योंकि वह आधुनिक उर्दू साहित्य के सही अर्थों में मौलिक लेखक हैं। सौभाग्य से उनकी रचनाएं कुछ अच्छे अंग्रेजी अनुवादों के कारण अखिल भारतीय पाठक वर्ग को उपलब्ध हैं। इसके अलावा हिंदी और बांग्ला समेत कई भाषाओं में वह पहले ही उपलब्ध हैं। मंटो के बेहतरीन अनुवादक खालिद हसन कहते हैं, ”सआदत हसन मंटो, जिनकी रचनाओं को भारत और पाकिस्तान के बाहर कम ही जाना जाता है, किसी भी पैमाने पर दुनिया के महानतम कथाकारों में हैं।”
मंटो का स्वयं पर इस बात को लेकर अदम्य विश्वास था कि वह एक रचनाकार के तौर पर पीडि़त अकेले लोगों को स्थिरता या विभ्रम की स्थिति में किसी भविष्य द्रष्टा की तरह अभिव्यक्त कर सकते हैं। यह बात अलग है कि समाज से उन्हें किसी तरह का कोई प्रोत्साहन नहीं मिला, मंटो को शायद इस बात का संतोष रहा कि वे अपने पीछे जो इतना सारा लिखा छोड़े जा रहे हैं वह वक्त के इम्तिहान में और साहित्य के सर्वोच्च मानदंडों पर खरा उतरेगा। उनके द्वारा अपनी असामयिक और दर्दनाक मौत के एक साल पहले उन्होंने खुद अपनी कब्र के लिए कतबा लिख डाला था जिसे अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीकों से व्याख्यायित करते रहे हैं और करते हैं। उनके विदाई के शब्द हैं: ‘यहां सआदत हसन मंटो दफ्न है। उसके सीने में फनो अफसानानिगारी के सारे असरारो रूकूज दफ्न हैं। वह अपनी मनों मिट्टी के नीचे सोच रहा है कि वह बड़ा अफसाना निगार है या खुदा!’ (18 अगस्त, 1954) खालिद हसन ने लिखा है कि ”उनकी कब्र पर यह मर्सिया नहीं लिखा गया क्योंकि उनके परिवार को डर था कि इससे रुढि़वादी और मौलवी नाराज हो जाएंगे।”
हम यह भी नहीं जानते कि मंटो ने जो व्यंग्यात्मक इबादत लिखी थी, उसे स्वयं लेखक ने या अन्य किसी ने कभी कहीं पढ़ा हो। खुदाई को हलके-फुलके में लेने वाला कोई भी यह बात समझ सकता है कि यह इबादत मजाक में लिखी गई थी। मंटो को कई बार मजेदार ढंग से इस बात का अहसास हुआ था कि खुदा या उसके खुदमुख्तार ठेकेदारों का मजाक उड़ाना कितना खतरनाक हो सकता है। यह छोटी-सी इबादत मजाकिया और याद रखने लायक है: ”या खुदा, इस कायनात के मालिक, रहमदिल और दरियादिल: हम जो बुराई में डूबे हुए लोग हैं, तुम्हारे सामने घुटने टेक कर अर्ज करते हैं कि इस दुनिया से सआदत हसन मंटो, वल्द गुलाम हसन मंटो को उठा लो, जो खुदा का नेक बंदा है। उसे उठा ले या खुदा, क्योंकि वह खुशबुओं से दूर गंदगी के पीछे भागता है। उसे सूरज की रोशनी से चिढ़ है, उसे अंधेरी गलियां रास आती हैं। वह शालीनता से चिढ़ता है पर नंगी और बेशर्म चीजों से आकर्षित होता है। मिठास उसे पसंद नहीं पर कड़वे फल चखने के लिए वह जान तक दे सकता है। घरेलू औरतों की ओर वह देखता तक नहीं, रंडियों की संगत में वह सातवें आसमान पर पहुंचा जाता है। बहते पानी से दूर रहता है, पर गंदगी में लोटना उसे पसंद है। दूसरे रोते हैं तो वह हंसता है। लोग हंसते हैं तो वह रोता है। बुराई की कालिख पुते चेहरों को वह बड़े प्यार से धोता है ताकि उनका असली चेहरा सामने आ सके।” इबादत का अंत ठीक वैसे ही होता है जैसा कि सिर्फ मंटो कर सकते थे: ”वह तुम्हारे बारे में कभी नहीं सोचता, पर हर जगह शैतान के पीछे लगा रहता है, उसी पतित देवदूत के पीछे जिसने कभी आपसे बदअदबी की थी।”
जाहिर है, विभाजन के वक्त स्वयं को दूसरी ओर जाने के लिए मजबूर करने से पहले हिंदुस्तान और फिर पाकिस्तान में उसे जितने पत्थर मारे गए और विषबाण चलाए गए, वे इस महान कलाकार से उसके मजाकिया मिजाज को अलग नहीं कर पाए। उनमें एक ऐसी भाषा में खुद का मजाक उड़ाने की काबिलियत है जिस की गहराई में जा पाना अक्सर आसान नहीं होता, इस में कभी निरा खिलंदड़ापन है तो कभी शब्दों के खेल; और है उनका शाश्वत मानवीय मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाने के लिए असंगतियों (एब्सर्ड ) से प्रेम। नए-नए बने ‘पाक स्तान’ (पवित्र स्थान) के न तो मौलवी, न ही राजनीतिक ठग उनसे अपने समय और दौर के इंसानों की दास्तानों को कलमबद्ध करने और उन पर टिप्पणी करने की क्षमता के विश्वास को छीन पाए।
लेकिन कुछेक पल ऐसे भी आते थे जब मंटो खुद को अकेला महसूस करने पर मजबूर हो जाते थे, मसलन जब उनके खिलाफ अश्लील लेखन के आरोप में मुकदमों का अंबार लगता जा रहा था। आजादी से पहले मंटो पर अश्लील कहानियां लिखने के लिए तीन बार मुकदमा चला था और पाकिस्तान बनने के बाद भी तीन बार। सभी छह मुकदमों में वह अंतत: बरी हुए, लेकिन इस से पहले हर मुकदमे के दौरान उन्हें नरक भोगने को मजबूर होना पड़ा। अगर उस दौर के कुछ उदार बुद्धिजीवी उनकी मदद को न आए होते, तो तय है कि लेखक का अकेलापन और गहरा होता।
हालांकि इस बारे में कुछ विस्तार से कहा जाना जरूरी है। मंटो खुद को जिस अकेलेपन में अक्सर पाते थे, उसकी कई वजहें थीं। एक थी दारू की लत जिसने उनके दुबले-पतले शरीर को ही छलनी नहीं कर दिया बल्कि जो कुछ वह लिखने से कमाते थे, वह अपने समय के हिसाब से कम नहीं था, वह भी बोतल की भेंट चढ़ जाता था। दूसरे, उस वक्त के रुढि़वादी समाज के ताकतवर वर्गों द्वारा उनकी लिखी कहानियों व अन्य लेखन का विरोध; और अंतिम कारण था उनका किसी भी औपचारिक कलाकार या लेखक संगठन का सदस्य बनने से इनकार करना।
मंटो की पत्नी साफिया, जो ”अच्छे और बुरे हर दौर में उनके साथ बनी रहीं” की कही बात यहां ध्यान देने लायक है। उन्होंने 6 अप्रैल, 1968 को मंटो के एक भारतीय जीवनीकार को लिखा, ”(मंटो) के साथ किसी ने भी न्याय नहीं किया। सच्चाई यही है कि हिंदुस्तान छोडऩे का उनका मन नहीं था, लेकिन विभाजन के कुछ माह पहले फिल्मिस्तान (बंबई की फिल्म निर्माण कंपनी, जहां वह नौकरी करते थे) ने उनकी सेवाएं खत्म करने का नोटिस थमा दिया और मेरी बात पर यकीन कीजिए, इससे उनका दिल टूट गया। लंबे समय तक उन्होंने इसे मुझसे छुपाए रखा क्योंकि उन्हें मि. मुखर्जी (कंपनी के मालिक) और अशोक कुमार (अभिनेता) से अपनी दोस्ती पर काफी नाज था। ऐसे में कैसे बताते कि उन्हें नोटिस दे दिया गया है। इसके बाद ही उन्होंने खूब पीना शुरू किया जिसने अंतत: उनकी जान ले ली। मैं पहले इधर आ गई थी, वह 1948 में आए। बंबई में अकेले रहते हुए पीने की उनकी कोई सीमा ही नहीं रही। यहां उनकी जिंदगी दिक्कतों से भरी थी। आप खुद कल्पना कर सकते हैं कि वह किस स्थिति में थे और क्या वह किसी भी लिहाज से रहने लायक था। उनकी सेहत भी बिगड़ती चली गई। लेकिन एक काम वे करते रहे। वह रोज, जब तक कि उनका इंतकाल नहीं हो गया, आश्चर्यजनक रूप से हर रोज एक कहानी लिखते थे । बस मैं यही जानती हूं।”
यह सही है कि शराबखोरी ने मंटो को शरीर और जेब दोनों के गम दिए, उनकी मौत को करीब ला दिया, लेकिन विडंबना यह है कि इसी ने उन्हें इस हद तक जीवंत किरदार और विश्वसनीय स्थितियां उपलब्ध करवाईं जो नाकाबिले बरदाश्त हैं। इसे उन्होंने अपनी कहानियों में जिस उस्तादी से बुना वह बिरले ही लोगों के पास होती है। उनकी कहानियों में पीना अक्सर एक रूपक की तरह आता है। यह उस दमघोंटू सामाजिक व्यवस्था से आजादी का संकेत है जो हर उस शख्स का जीना मुहाल कर देता है जो उसके बनाए पैमानों को मानने से इंकार कर देता है। मंटो के विरोधी लगातार यह कहते हुए कि वह दारू पीता है और अश्लील कहानियां लिखता है सामान्य लोगों में यह विश्वास पैदा करने में कामयाब हो गए कि वह बदजात और बदफैल किस्म का आदमी है, जो राष्ट्रवादी और देशभक्तों के बिल्कुल विपरीत है। कोर्ट से बरी होने के बाद भी यह समस्या बनी रही कि उनके कट्टर आलोचकों को मंटो की पिटाई के अपने प्रिय शगल से किस तरह से रोका जाए। बड़ी आसानी से आलोचकों ने लेखक की जनता के प्रति विकट ईमानदारी, उसकी उदारता और उसका यह विश्वास कि मानवता की विजय तभी संभव है जब इंसान अंधविश्वासों और गरीबों व अशिक्षितों पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ लड़ेंगे और इन्हें हराएंगे।
एकबारगी यह ध्यान आ सकता है कि मंटो जैसा बराबरी में विश्वास रखने वाला मजलूमों का हमदर्द वामपंथी लेखकों और बुद्धिजीवियों के किसी एक संगठन की, जिनकी चालीस के दशक में मुंबई में खूब चलती थी, स्वाभाविक रूप से आजीवन सदस्यता ले सकता था। पर ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि मंटो मर्जी का मालिक था। लेबलों, सैद्धांतिक कट्टरताओं और राजनीतिक विचारधाराओं के प्रति उनमें जन्मजात अविश्वास था। इसी ने उन्हें तथाकथित प्रगतिशील लेखकों-कलाकारों से दूर रखा। बदले में मॉस्को की तरफ स्पष्ट झुकाववाले बुद्धिजीवियों से भरे इन संगठनों ने मंटो जैसे मुक्त चिंतकों से सुरक्षित दूरी बनाए रखी। मंटो के दौर के कई लेखकों ने लिखा भी है कि कैसे वह अपनी मर्जी के मालिक बने रहे, भले ही कई वामपंथियों से उनके सौहार्दयपूर्ण संबंध थे, लेकिन सुपरिचित राजनीतिक जीवों से वह सजग रूप से और जानबूझ कर खुद को दूर रखते थे। हालांकि, आज मुड़कर देखने पर यह बात सही लगती है कि तरक्कीपसंदों के साथ उनकी सक्रिय कामरेडशिप उस अकेलेपन को कम कर सकती थी जिसमें मंटो को लगातार धकेला जा रहा था। अंतत: केवल एक असामान्य इच्छाशक्ति और जादुई प्रतिभा के बल पर वह उस पीड़क अलगाव को भी पार करने में कामयाब हो गए।
मंटो के इस पहलू पर दिल्ली की लेखिका तरन्नुम रियाज ने लिखा है, ”मंटो के लिखे में कुछ ऐसी विशिष्टताएं हैं जो उन्हें अलग पहचान और अलग रंग देते हैं। कभी-कभार उनका लिखा विरोधाभासों का ढेर जान पड़ता है। हालांकि ध्यान से पढऩे पर उनके लेखन में एक दार्शनिक निरंतरता नजर आती है। मंटो समाजवाद से काफी प्रभावित नजर आते हैं, लेकिन वह इसे हिंदुस्तान की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के उपचार के रूप में नहीं देखते। वे किसी खास विचारधारा को भी नहीं मानते। इस पर भी उनमें सजग राजनीतिक और सामाजिक चेतना है जो उन्हें ‘उदार’ बनाती है…। मंटो नारेबाजी नहीं करते, न ही वह साहित्य के नाम पर राजनीति की तिजारत करते हैं…। भारत में उर्दू साहित्य के इतिहास पर यह एक अफ सोसनाक टिप्पणी है कि मंटो को वह जगह नहीं मिली जिसके वह हकदार थे, सिर्फ इसलिए कि कुछ बड़े प्रगतिशील लेखकों ने उन्हें प्रतिक्रियावादी कह कर खारिज कर दिया था।”
मंटो की जिंदगी और विरासत की इकलौती सबसे अहम बात किसी की प्रभुसत्ता के विचार के प्रति उनका विरोध था, चाहे वह जहां से भी पैदा होती हो – राज्यसत्ता, सामाजिक-धार्मिक सत्ता, राजनीतिक विचारधारा, पार्टियां या फिर बौद्धिक समाज की सत्ता। वह दुनिया की हर चीज पर खुले दिमाग से सोचते; उनका हृदय भी विशाल था जिसके मुख्य दुश्मन टुच्चई और पीठ पीछे छुरा घोंपना थे; और ऐसी खुली जबान थी, जो सदा सार्वजनिक तौर पर ही बहुत सचेत नहीं होती थी और उनके व पवित्र स्थलों में जो होता है उसे लोगों तक पहुंचाती जरूर थी। प्रतिक्रियावादी कहे जाने पर मंटो का जवाब भी मंटोई ही था, न कोई खेद, न रहम: ”मुझे तथाकथित कम्युनिस्ट जबरदस्त नापसंद हैं। मैं उन लोगों का सम्मान नहीं कर सकता जो आरामकुर्सी में धंस कर ‘हंसिए-हथौड़े’ की बात करते हैं। कॉमरेड सज्जाद जहीर जो चांदी के कप में दूध पीते थे, इसीलिए मेरी नजर में हमेशा विदूषक रहे। मेहनतकश मजदूरों के पसीने में उनका सच्चा मन महकता है। हो सकता है कि इस पसीने का इस्तेमाल कर के पैसा बनाने वाले और इसे स्याही बनाकर लंबे मैनिफेस्टो लिखने वाले ईमानदार लोग हों। आप मुझे माफ करेंगे, लेकिन मैं उन्हें ठग मानता हूं।”
अगर मंटो के लिए ये ”नीम-हकीम किसी काम के नहीं थे, जो क्रेमलिन के नुस्खे का इस्तेमाल कर के साहित्य और राजनीति का घोल बना रहे थे”, तो उनके भीतर गहरे बैठा मानवतावादी नवजात पाकिस्तान के समाज और राजनीति में धीरे-धीरे पैठते अमेरिकी असर को लेकर बेचैन था। जबरदस्त व्यंग्य और अंतरदृष्टि के साथ चचा सैम को लिखे अपने नौ में से एक खत में मंटो कहते हैं, ”हमारी बसें अमेरिकी औजारों से लैस होंगी। हमारे इस्लामिक पायजामे अमेरिकी मशीनों से सिले जाएंगे। हमारा मिट्टी का ढेला अमेरिकी मिट्टी से बना होगा जिसे ‘हाथ से किसी ने नहीं छुआ होगा’। कुरान को रखने वाले फोल्डिंग स्टैंड अमेरिकी होंगे और नमाज पढऩे की चटाइयां भी अमेरिकी होंगी। देखते जाओ चचा, सब तुम्हारी शान में कसीदे पढ़ेंगे।”
प्रगतिशीलों ने जिसे राजनीतिक स्तर पर नासमझ माना था, उस मंटो को मॉस्को और वॉशिंगटन के खेल बहुत पहले ही समझ आ गए थे। शीत युद्ध का दौर था और नये-नये आजाद हुए दो देश इस राजनीतिक खेल में काफी उपजाऊ साबित हो सकते थे। हो सकता है मंटो जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर कभी भी राजनीति में न गए हों, लेकिन सर्वज्ञाता होने का दावा करने वाले उनके आलोचकों की यह बात बिल्कुल बेतुकी है कि वह राजनीतिक जमीनी हकीकत से अनजान थे। एक अर्थ में इसी समझ ने उन्हें कुछ ही समय बाद सपाट और अरचनात्मक होने से बचाए रखा – जबकि उनके कई समकालीनों का यही हश्र हुआ।
मंटो के चाहने वाले दलील देते हैं कि वह जिस तरह के शख्स बने रहे, उसके पीछे फिल्म जगत के साथ उनका जुड़ाव बड़ी वजह था। मुफलिसी, अंदाजे बयां की तलाश, रचनात्मकता के इजहार की बेचैनी, खयालों की अजीबोगरीब उड़ान, आत्मा को कंपा देने वाली असुरक्षा, ये सब चीजें सामान्य तौर पर फिल्म जगत से जुड़ी हुई हैं, इन सब ने मिल कर मंटो नाम की प्रतिभा को धीरे-धीरे पर निश्चित रूप से गढ़ा और उनकी सामाजिक चेतना को आकार दिया। इसीलिए मंटो की मौत के कई साल बाद जब मृणाल सेन ने उनकी एक कहानी पर फिल्म बनाना तय किया, तो वह दरअसल ऐसा कर के अनावश्यक रूप से कलंकित की गई एक ऐसी प्रतिभा को श्रद्धांजलि देना चाह रहे थे जो शब्दों की दुनिया में भी उतना ही रमा था जितना चलती-फि रती छवियों की दुनिया में। बहरहाल, अंतरीन नाम की यह फिल्म बुरी तरह असफल हुई, वह अलग ही कहानी है।
अगर मंटो की मर्जी चल पाती, तो वह मुंबई छोड़ कर नहीं जाते। अगर वह कुछ और जी पाते, तो कुछ साल बाद आई फिल्म सीआईडी के उस मशहूर गाने और उसमें जाहिर अहसास का तहे दिल से स्वागत करते जिसकी पंक्तियां हैं: ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां/जरा हटके जरा बचके ये है बॉम्बे मेरी जां…
अनु.: अभिषेक श्रीवास्तव
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