कविता

कविता : कहने का यह ढंग भी देखें…

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

लेखकः फहमीदा रियाज तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छुपे थे भाई? वह मूरखता, वह घामड़पन जिसमें हमने सदी गंवाई आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे अरे बधाई, बहुत बधाई भूत धरम का नाच रहा है कायम हिंदू राज करोगे? सारे उल्टे काज करोगे? अपना चमन नाराज करोगे? तुम भी बैठे करोगे सोचा, पूरी है [Read the Rest…]

सपनों के सरोकार

कविता-संग्रह और ज्यादा सपने: वेणु गोपाल; दखल प्रकाशन; पृष्ठ: 144; मूल्य: 150  ISBN 978-93-84159-2-22 किसी भी रचना या रचनाकार के सामने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जो दो सवाल हमेशा मौजूद होते हैं वे हैं क्यों, और किसके लिए? नक्सलबाड़ी आंदोलन ने न केवल भारतीय राजनीति में इन सवालों को जगह दिलाई बल्कि भारतीय कला, [Read the Rest…]

जो कहा जाना चाहिए

जर्मन कविता लेखक : गुंटर ग्रास चुप हूं क्यों मैं, छुपाये बहुत समय से, स्पष्ट है और अनुरूपित अभ्यासों में जो,अंत में जिसके हम जो बच पाएंगे बहुत हुआ तो पाद टिप्पणी रह जाएंगे। वार करने का वह कथित अधिकार पहला मिटा देगा धरती से अस्तित्व जो ईरानी जनता का – राज करता है उन [Read the Rest…]

फलस्तीनी  चार कावताए कविता

लेखक : अल-कासिम राफाह के बच्चे उसके लिए जो लाखों के जख्मों से होकर गुजरता है उसके लिए जिसकी तोपों ने बागीचे के सारे गुलाब रौंद डाले हैं जो रात में तोड़ता है खिड़कियों के शीशे जिसने जला डाले हैं बागीचे और अजायब घर और जो गाता है आजादी के नगमे जिसने पीस डाला है [Read the Rest…]

कपास के फूल

केदारनाथ सिंह वे देवता को पसंद नहीं लेकिन आश्चर्य इस पर नहीं आश्चर्य तो ये है कि कविगण भी लिखते नहीं कविता कपास के फूल पर प्रेमीजन भेंट में देते नहीं उसे कभी एक-दूसरे को जबकि वह है कि नंगा होने से बचाता है सब को और सुतर गया मौसम तो भूख और प्यास से [Read the Rest…]

ओ पृथ्वी तुम्हारा घर कहां है

दो कवितायें  केदारनाथ सिंह जीने के अथाह खनिजों से लदी और प्रजनन की अपार इच्छाओं से भरी हुई ओ पृथ्वी ओ किसी पहले आदमी की पहली गोल लिट्टी कहीं अपने ही भीतर के कंडे पर पकती हुई ओ अग्निगर्भा ओ भूख ओ प्यास ओ हल्दी ओ घास ओ एक रंगारंग भव्य नश्वरता जिसकी हर आवृत्ति [Read the Rest…]

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