यह धुआं कहा से उठता है!

संपादकीय सत्ताधारी वर्ग किस तरह से अपने और सामाजिक संकटों का सामना करता है, या कहना चाहिए बच निकलता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण इधर दिल्ली में देखने को मिल रहा है। संकट है प्रदूषण का, जिससे इस महानगर का कोई भी हिस्सा चाहे, कालोनी कितनी भी पॉश हो या झुग्गी-झोपड़ी वाली , बचा नहीं [Read the Rest…]

असहिष्णुता से असहमति

छ घटनाएं सारी सीमाओं के बावजूद ऐसी चिंगारी का काम कर डालती हैं जो लपटों में बदल अंतत: सारे संदर्भ को नया ही आयाम दे देती हैं। केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या पर अकादेमी द्वारा चुप्पी लगा देने की प्रतिक्रिया स्वरूप शुरू हुए सामान्य से विरोध ने जिस [Read the Rest…]

निजीकरण के फल

सितंबर की दिल्ली की इन घटनाओं का सिलसिला देखिए। 12 तारीख का समाचार है कि डेंगू से पीडि़त अपने सात वर्ष के बेटे को न बचा पाने के गम में युवा माता-पिता ने आत्महत्या कर ली। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार पीडि़त बच्चे को एक के बाद एक प्राइवेट अस्पताल ने दाखिल करने से मना [Read the Rest…]

दमन और प्रतिशोध का दौर

संपादकीय न 2002 के गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगों को सही ठहराने के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भौतिकी के गति संबंधी सूत्र का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि हर ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ होती है। तब शायद उन्हें पता नहीं होगा कि प्रतिक्रिया की भी प्रतिक्रिया हो सकती है और इस [Read the Rest…]

बौद्धिक दरिद्रता के वारिस

संपादकीय से विडंबना कहा जाए या त्रासदी कि वर्तमान सरकार उन बौद्धिक संस्थाओं के लिए, जिन्हें लेकर उसका राजनीतिक और बौद्धिक संगठन जरूरत से ज्यादा संवेदनशील है, ऐसे व्यक्तियों को भी नहीं ढूंढ पा रहा है जो इन संस्थाओं का पद संभालने के लिए उपयुक्त हों। यह कैसी विडंबना है कि वह सत्ताधारी दल जिसने [Read the Rest…]

मौन का गहराता मौसम

संपादकीय एक साल पूरा होते न होते नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार जिस तरह से औचित्य और मर्यादा के संकट में फंस गई है वह कोई आश्चर्य की बात नहीं मानी जा सकती। असल में यह सरकार, अपने सांप्रदायिक एजेंडे के अलावा, किसी भी रूप में कांग्रेस से अलग नहीं है। हां, नेतृत्व [Read the Rest…]

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