अलविदा वीरेन दा!

श्रद्धांजलि

सुबह-सुबह खबर मिली कि हम लोगों के अग्रज, साथी और प्रिय कवि वीरेन डंगवाल (5 अगस्त 1947 – 28 सितंबर 2015)नहीं रहे। अजेय आत्मा वाले कवि के शरीर को एक लंबे कठिन संघर्ष के बाद कैंसर ने अंततोगत्वा पराजित कर दिया।

पारदर्शी साफगोई, अकुंठ वैचारिक प्रतिबद्धता, निर्मल-निश्छल सहजता – वीरेन दा के व्यक्तित्व और कृतित्व के बुनियादी गुण थे। उनसे हर मुलाकात सृजन और संघर्ष के लिए नई ऊर्जा से आप्लावित कर देती थी। विचारों में उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया और निजी जीवन में हमेशा अजातशत्रु रहे। कैंसर के विरुद्ध वीरेन दा का लंबा संघर्ष भी वैसा ही था जैसा तमाम मानवद्रोही और मृत्युधर्मी प्रवृत्तियों के विरुद्ध उनकी कविता का अनथक विद्रोह।

अपने समवयस्क कवियों की तुलना में वीरेन दा ने कम लिखा, लेकिन उनकी कविताओं की चिंताओं और सरोकारों का दायरा व्यापक था – अपने समय की बड़ी-बड़ी दुश्चिंताओं और मनुष्यता के सामने उपस्थित ऐतिहासिक संकटों एवं चुनौतियों से लेकर छोटी-छोटी चीजों के जीवन को सहेजने से जुड़ी व्यग्रता, भूमंडलीय दुश्चक्र से लेकर हमारे रोजमर्रा के जीवन से सहृदयता और मनुष्यता के विलोप की चिंता, टूटते हुए स्वप्नों और विसर्जित मुक्ति-परियोजनाओं की चिंता – और इन सभी चिंताओं पर भारी पड़ता जीवन-राग, जिजीविषा और युयुत्सा के स्वर, वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि से हासिल “उजले दिनोंÓ के फिर से आने की उद्दाम आशा।

वीरेन दा अपने अलग चमकते रास्ते वाले कवि थे, जो रास्ता लगता तो सहज था लेकिन वास्तव में बीहड़ था।
एक कवि और कर भी क्या सकता है/ सही बने रहने की कोशिश के सिवा – वीरेन दा का यह कहना एक विनम्र वक्तव्य है। वीरेन दा online casino के सही बने रहने की कोशिश में चीजों को सही रूप में देखने की एक उद्दाम आकांक्षा थी, उन्हें सही किए जाने की कोशिश का एक गहरा आग्रह था और ऐसा होने के प्रति एक अविकल आशा थी। सही बने रहने की कोशिश के जरिए वह क्षुद्रता, दुनियादारी और समझौतापरस्ती के विरुद्ध अनवरत एक युद्ध लड़ते रहे। उदात्ता हमारे समय की एक विलुप्तप्राय चीज है। इसे वीरेन दा के व्यक्तित्व और कृतित्व में सहज ही पाया जा सकता था। महानगरों की बेरहमी, तिकड़मों और क्षुद्रताओं को उनकी सूक्ष्मग्राही दृष्टि सहज ही ताड़ लेती थी, लेकिन अपने पंखों में यह पंक उन्होंने कभी नहीं लगने दिया।

बीमारी से पहले वह तल्लीन होकर, खूब तबीयत से, अपने प्रिय कवि नाजिम हिकमत की कविताओं का अनुवाद कर रहे थे (उनमें से कुछ “पहल-पुस्तिकाÓ के रूप में प्रकाशित हुई थीं)। मैं अक्सर उनसे अनुवादाधीन कविताओं की सूची कुछ और बड़ी करने का और काम में कुछ तेजी लाने का आग्रह करती रहती थी। फिर कैंसर के हमले के बाद यह सारा सिलसिला स्थगित हो गया।
वीरेन दा की कविता स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक पीड़ादाई और जटिल संक्रमण के दशकों के जीवन, संघर्ष, आशाओं और स्वप्नों की इंदराजी करने वाली ऐतिहासिक दस्तावेज सदृश हैं।

वीरेन दा, आपकी कविता हमें, हमारी पीढ़ी और उत्तरवर्ती पीढिय़ों को बेफिक्र-बेलौस अंदाज में जीना और रचना सिखाती रहेगी, आसपास की, रोज बरती और देखी जाने वाली चीजों में नए सौंदर्य और नई अर्थवत्ता का संधान करना सिखाती रहेगी।वीरेन दा, आपकी कविता हमारी जिजीविषा, युयुत्सा और भविष्य के प्रति हमारे विश्वास को हमेशा शक्ति देती रहेगी।

हम आपको कभी नहीं भूलेंगे वीरेन दा! कभी नहीं। हम हमेशा आपकी स्मृति से प्रेरणा लेते रहेंगे और हमेशा आपसे सीखते रहेंगे।
आपकी स्मृति को समर्पित आपकी ही यह प्रसिद्ध कविता –  इससे आगे के पेजों को देखने  लियेक्लिककरें NotNul.com

 

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