अपराधी कौन थे?

समयान्तर, अप्रैल, 2015

समयान्तर, अप्रैल, 2015

संपादकीय

काफ्का के उपन्यास ‘मुकदमा’ (ट्रायल) और ‘कायांतरण’ (मैटामॉर्फोसिस) सहित अन्य रचनाओं में जो व्यवस्थागत और सामाजिक तटस्थता, संवेदनहीनता, ठंठापन तथा अमानवीयता देखने को मिलती है, संभवत: भारतीय प्रशासन और न्याय व्यवस्था ने अपनी संवेदनहीनता और निर्ममता में, उसे पीछे छोड़ दिया है।

वह दुनिया, जिसका चेक लेखक फ्रेंज काफ्का वर्णन करते हैं, दूसरे महायुद्ध के पूर्व के योरोप में फासीवाद के बढ़ते साये के दौर की दुनिया है। हमारे यहां जो हो रहा है, क्या सवाल पूछा जा सकता है, यह किस बात का संकेत है? यह समाज किस ओर बढ़ रहा है? शायद हममें यह सोच पाने तक का अब माद्दा नहीं रहा है। हम किसी चीज से कुछ नहीं सीखना चाहते – न दुनिया के इतिहास से और न ही विभाजन के अपने अनुभवों से। यह यथार्थ – अल्पसंख्यक के रूप में जीने का – काफ्का की रचनाओं की दुनिया से कहीं अधिक बर्बर और अमानवीय है। वहां वह सिर्फ मानसिक पीड़ा और संत्रास के सीमित दायरे में अभिव्यक्त हुआ है पर यहां उसे अपने व्यवहारिक रूप में घटित होते देखना आतंककारी है। इसलिए एक गहरे अवसाद से गुजरना है।

आज से ठीक 27 साल 10 महीने पहले 22 मई 1987 को सांप्रदायिक दंगाग्रस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश (उ.प्र.)के शहर मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से राज्य की बदनाम पीएसी (प्रोविंसिय आर्म्ड कांस्टेबुलरी) ने 48 मुस्लिम युवाओं को ट्रक में भरा और आधों को दिल्ली जाने वाली सड़क पर मेरठ से 34 किलो मीटर दूर मुरादनगर कस्बे के बगल से गुजरनेवाली गंगनहर में तथा शेष को अगले 20 किमी आगे दिल्ली की ओर हिंडन से यमुना को जोड़ने वाली नहर में गोली मारकर डाल दिया। संयोग से स्थितियां ऐसी बनीं कि गाजियाबाद में नियुक्त सरकारी अधिकारी अपनी संवैधानिक और मानवीय जिम्मेदारियों के प्रति सजग थे।

उन्होंने मौके की नाजुकी को देखते हुए जो कुछ संभव था किया यानी उस ट्रक को खेाजा जो पीएसी की 41वीं बटालियन का था, जिसका नंबर यूआरयू 1493 था और जो दिल्ली की सीमा के निकट स्थित पीएसी के कैंप में गया था। वहां उन्होंने इस ताजे धुले ट्रक को देखा था जिस में से खून मिला पानी तब भी टपक रहा था। चूंकि पीएसी ने मुस्लिम युवाओं को ट्रक के अंदर भी गोली मारी थी इसलिए उसमें भी गोलियों के निशान थे।

इस नृशंष हत्याकांड में छह आदमी बचे थे जिनको सौभाग्य से गोलियां ऐसी जगह लगीं जो घातक साबित नहीं हुईं। इस टॉयल के दौरान तीन पीड़ित/गवाहों और तीन आरोपियों का भी देहांत हो गया।

आगे बढ़ने से पहले सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर कोई पुलिस बल तब तक इतना उद्दंड और सांप्रदायिक कैसे हो सकता है जब तक कि उसे राजनीतिक शह न मिली हो? पूर्व आईपीए अधिकारी और लेखक विभूति नारायण राय द्वारा कही इस बात के संदर्भ में (देखें:इसी अंक में प्रकाशित साक्षात्कार)कि यह पलटन अपनी स्थापना के कई दशक बाद तक किसी भी अन्य अर्द्धसैनिक दल की तरह अनुशासित थी, यह सवाल और भी जरूरी हो जाता है।

सीबी-सीआइडी ने सात साल बाद 1994 में अपनी रिपोर्ट दी जो कभी सार्वजनिक नहीं की गई। घटना के नौ साल बाद 1996 में वहां लगाए गए पीएसी के 66 में से सिर्फ 19 जवानों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई। अगले चार साल तक न्यायालय ने 23 वारंट जारी किए पर किसी ने कोई तवज्जो नहीं दी। यह तब था जब कि ये सब के सब सरकारी कर्मचारी थे और अधिसंख्य सिपाही जैसे छोटे-मोटे ओहदों वाले थे।

किसी भी आरोपी को न तो सस्पेंड किया गया न ही कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई उल्टा कई को पदोन्नति मिली। सन् 2000 में अंतत: आरोपियों ने न्यायालय के सामने समर्पण किया। मारे गए युवाओं के संबंधियों के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर मुकदमा 2002 में दिल्ली स्थानांतरित हुआ। यहां अगले तीन वर्ष तक सरकारी वकील ही नियुक्त नहीं हो पाया। किसी तरह अगले वर्ष आरोप निर्धारित हुए और नौ साल बाद इस वर्ष 21 मार्च को जो फैसल आया उसमें बचे हुए 16 आरोपियों को शंका का लाभ देते हुए छोड़ दिया गया।

सवाल है अगर कोई आपराधिक मामला, वह भी ऐसा जिसे स्वतंत्र भारत के इतिहास में हिरासत में हुई हत्याओं का सबसे बड़ा मामला माना जा रहा हो, जिसमें उन सरकारी कर्मचारियों पर हत्या का मुकदमा हो जिनकी जिम्मेदारी आम नागरिक की सुरक्षा करना है, अगर 28 वर्ष तक सिर्फ निचली अदालत में ही लटका दिया गया हो और जांच एजेंसियां अपराधियों की खुले तौर पर मदद करती रही हों तो ऐसे में जो भी प्रमाण थे, फिर चाहे वे परिस्थिति गत (सरकमस्टांशियल) ही क्यों न हों उन्हें अंतिम प्रमाण के तौर पर आखिर क्यों नहीं लिया गया?

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस घटना के दौरान उत्तर प्रदेश में ही नहीं केंद्र में भी कांग्रेस सरकार थी। अल्पसंख्यकों की खैरख्वाह कहलानेवाली, जिस पर लगातार अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण (एपीजमेंट) का आरोप लगता रहा है। उसके बाद अगले लगभग तीन दशकों में उ.प्र. में समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारें आईं और गईं।

केंद्र में भी इस बीच सपा और बसपा का दबदबा रहा। अगर भाजपा को छोड़ दें तो भी ‘मौलाना’ मुलाय सिंह और मुस्लिम समर्थन से जीतनेवाली मायावती क्या करती रहीं? सबसे मानीखेज प्रदेश की वर्तमान समाजवादी सरकार की चुप्पी है।

साफ है कि यह संसदीय राजनीति के दबाव थे और हैं कि कोई भी दल बहुसंख्यकों को किसी भी कीमत पर नाराज करना न चाहता था न ही चाहता है। ये सब तथाकथित गैरसांप्रदायिक दल 80 के दशक में हिंदूवादी संगठनों की नियोजित तरीके से बढ़ाई जा रही सांप्रदायिकता का सामना करने की जगह उसका लाभ उठाने की जुगत में लगे थे और किसी चुनौती का सामना करने की जगह अपना कार्यकाल पूरा करने। नतीजा सामने है। अंतत: 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और कथित सेक्यूलर पार्टियों को मुंह छिपाने की जगह नहीं मिली। पर यह अलग किस्सा है।

असल में इससे भी ज्यादा गंभीर यह है कि 80 के दशक ने पुलिस ही नहीं बल्कि सेना का भी सांप्रदायिकीकरण कर दिया। स्वयं हाशिमपुरा मामले में सेना के अधिकारियों की जो भूमिका रही आश्चर्य है कि उसकी जांच नहीं हुई।

विशेष कर इसलिए क्योंकि यह1984 में सिख बटैलियन की बगावत से सिर्फ तीन साल बात की घटना थी। मेजर पुरोहित (समझौता एक्सप्रेस कांड)जैसे बाद के उदाहरणों को अगर ध्यान में रखा जाए तो इस जांच की अनिवार्यता आज भी जरूरी है क्योंकि यह ऐसा उदाहरण है जिसके अंतत: पूरे लोकतंत्र के लिए खतरा बनने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

जो हुआ है वह अत्यंत निराशाजनक है। यह अपराध अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है बल्कि मानवीयता और उससे भी बड़ी बात लोकतंत्र के खिलाफ है। इस अपराध में सिर्फ नौकरशाही ही नहीं, न्याय व्यवस्था, राजनीतिक नेतृत्व और काफी हद तक स्वयं प्रेस भी बेदाग नहीं बचा है। जो कुछ सामने आ पाया है वह भी मात्र एक व्यक्ति की निजी ईमानदारी का प्रमाण है।

पर कोई व्यवस्था मात्र कुछ एक व्यक्तियों की निजी ईमानदारी के बल पर नहीं चलती। यह खतरे का समय है। क्या हमारा राजनीतिक नेतृत्व और न्यायपालिका अब भी उस ध्वस्त हो चुके विश्वास को पुन: स्थापित करने की कोशिश करेगा जिस पर इस देश के करोड़ों लोगों का भविष्य निर्भर है। और हां, जिसे खत्म करने में सबसे बड़ी भूमिका स्वयं उसी नेतृत्व की है।  इससे आगे के  पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com 

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