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समयांतर मई 2020

प्रिय पाठक व लेखक,

वैश्विक महामारी के प्रकोप के कारण  21 वर्ष के इतिहास में यह ऐसा दौर है जब मई का समयांतर भी मुद्रित होने की स्थिति में नहीं है। इसका बड़ा कारण यह है कि हमारी सरकारें (केंद्र और राज्यों की) स्थितियों का सामना करने में जिस तरह की अकल्पनाशीलता और असमंज का प्रदर्शन कर रही हैं उसके कारण स्थितियों को सामान्य होने में, कहा नहीं जा सकता कितना और समय लगे। उदाहरण के लिए दिल्ली की सरकार ने उद्योग-धंधों को  काम करने की इजाजत तो दी है पर सार्वजनिक यातायात शुरू नहीं किया है। इस महानगर में बिना यातायात के, काम के लिए ढील देने का कोई खास अर्थ नहीं है। यह मान लेना कि छोटे उद्योगों में काम करनेवालों के पास स्कूटर या कार होगी ही, किस हद तक यथार्थ से कटा होना है, बताने की जरूरत नहीं है।  हुआ यह है कि प्रेस तो खुल गया है पर कर्मचारी नहीं हैं।  परिणाम स्वरूप मई के अंक को भी मुद्रित कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा वितरण की समस्या भी बरकरार है। अंतत: पीडीएफ का ही विकल्प बचा है।

 हम पुन: अपने लेखकों के आभारी हैं, और रेखांकित करना चाहते हैं कि यह अंक भी उनके अक्षुण सहयोग और अडिग विश्वास का प्रमाण है।

सूचनार्थ हम ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं कि ये दोनों अंक, जो अब तक सिर्फ इलैक्ट्रानिक रूप में ही प्रकाशित हो पाए हैं, अंतत: मुद्रित हो पाएं। जो पाठक इन अंकों को चाहेंगे वे संपर्क कर सकते हैं। यद्यपि इसका मूल्य और डाक खर्च अतिरिक्त होगा।

शुभकामनाओं के साथ,

पंकज बिष्ट

निवेदन:

जिन पाठकों को मई 2020 अंक की पीडीएफ प्रति न मिली हो, कृपया अपना व्हाट्स अप नंबर या ईमेल आईडी भेजें।

नये पाठक कृपया नोट करें कि समयांतर की  प्राण वायु उस के पाठक हैं। इसलिए निवेदन है कि कृपया वार्षिक ग्राहक बनें। आप का यह समर्थन हमें स्थायित्व प्रदान करेगा।

– टी पी चौबे,

प्रबंधक 

मई का अंक

‘ग्रुप योरूम’ के शहीद

तुर्की की 28 वर्षीय क्रातिकारी गायिका  हेलिन बोलेक की पिछले महीने 3 अप्रैल को 288 दिन की भूख हड़ताल के बाद इस्तांबुल में मृत्यु हो गई थी। उनका लोकप्रिय संगीत-समूह ‘ग्रुप योरूम’ अन्याय, उन्माद और धर्म-नस्ल के नाम पर घृणा फैलाने वालों के प्रतिरोध में विवेक के गीतों का गायक  है । समयांतर के मई अंक के आवरण में हेलिना की तस्वीर है और उनके जज्बे को सलाम करता राजेंद्र भट्ट का लेख चुकाना होगा जिंदगी का जो कर्ज है तुम्हें प्रकाशित हुआ है।

लेकिन समयांतर मई अंक को तैयार हुए अभी पांच दिन ही हुए थे कि समाचार आया है कि इसी योरूम समूह के गिटार वादक इब्राहिम गोशेक का भी 323 दिन की भूख हड़ताल के बाद देहांत हो गया है। गोशेक ने अपने अंतिम पत्र में लिखा है, ”मैं अपनी खिड़की से बाहर नजर डालता हूं और मुझे इस्तंबुल के गरीबों की बस्तियां दिखाई देती हैं। मैं इतना कमजोर हो चुका हूं कि बाहर नहीं जा सकता, मेरा वजन घटकर 40 किलो रह गया है। लेकिन मैं कल्पना करता हूं कि मैं अपने गिटार के साथ मंच पर हूं और देखता हूं  कि हजारों तुर्क लोग आसमान में मुट्ठियां लहराते हुए ‘बेला चाओ’  गा रहे हैं।”

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान फ़ासिस्टों से लडऩे वाले इतालवी छापामारों का बेला चाओ प्रिय गीत था जो अब दुनिया भर में कुछ संशोधनों के साथ प्रतिरोध का गीत बन चुका है। इसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:

और अगर मैं मरूं प्रतिबद्ध गुरिल्ला

(और मरूं पहाड़ों पर)

बहुत खूब विदाई होगी, बहुत खूब विदाई होगी, क्या खूब विदाई होगी,

अलविदा

और अगर मैं मरूं प्रतिबद्ध गुरिल्ला

(और मरूं पहाड़ों पर)

तो मुझे दफ्ना देना

दफ्ना देना मुझे वहीं पहाड़ों पर

सन 1985 में स्थापना के बाद से ही योरूम सत्ता के दमन और दुष्प्रचार को झेलता रहा है। तुर्की की दमनात्मक सत्ता उन्हें खतरा मानती रही है और टोली को गाने से रोकने में लगी है। चिंताजनक यह है कि दल के कुछ और भी कुछ सदस्य लंबी भूख हड़तालों पर हैं तथा जिंदगी व मौत के बीच झूल रहे हैं। लगता नहीं कि तुर्की की निर्मम तानाशाह सरकार इन दो शहादतों के बावजूद टस से मस हुई हो। अपने विरोध को लंबा चलाने के लिए ये आंदोलनकारी तरल पीकर खींचते हैं।  हेलिन और इब्राहिम लंबे समय तक भूख हड़ताल पर इसीलिए रह पाए। ग्रुप योरूम के सदस्यों का यह प्रतिरोध समकालीन दौर में असामान्य है और उतना ही असामान्य वहां के तानाशाह की निर्ममता और दमन हैं।