हिंदू फासीवाद के दौर में वामपंथ

अनेक मुखौटों वाले मोदी अपने संघ परिवार की खतरनाक बहुआयामी रणनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह रणनीति हमारे संविधान में निहित लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी विचारों के लिए गंभीर चुनौती है। आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय के लिए जनता के संघर्षों को कमजोर करने की इन नवफासीवादी साजिशों से मुकाबले के लिए जनआंदोलनों को तुरंत संगठित करने की जरूरत है। इस काम में वामपंथ को महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है। वामपंथी ताकतों को एक वैकल्पिक बहुस्तरीय योजना तैयार करनी होगी। उन्हें निचले स्तर पर जनआंदोलनों के जरिए अपने आधार को फिर से तैयार करना होगा ताकि संघर्षरत दलित तबकों से नए खांटी नेता तैयार किए जा सकें। वामपंथ को औद्योगिक सर्वहारा और खेतिहर मजदूरों के अपने परंपरागत आधार से आगे बढ़कर विकास के नवउदारवादी आर्थिक मॉडल से बेसहारा हो रहे नए गरीबों को भी अपनाना होगा। 

हिं दूवादी ताकतों का उदय भारतीय राजनीति के इतिहास के एक खतरनाक दौर की शुरुआत है। इस उदय का आरंभ 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ हुआ था। इन ताकतों ने तब से लगातार खुद को मजबूत करते हुए 2014 में केंद्र की सत्ता पर कब्जा कर लिया। इससे बुर्जुआ लोकतांत्रिक प्रणाली के उन मूल्यों और सिद्धांतों को खतरा पैदा हो गया है जिनका पालन भारतीय शासन 1947 से करता आ रहा था। बेशक इस प्रणाली की अपनी खामियां हैं। यह चारों तरफ फैली गरीबी को मिटाने, दलितों और आदिवासियों की हालत सुधारने तथा कश्मीर और पूर्वोत्तर की अवाम का दिल जीतने में नाकाम रही है। वास्तव में इसने ही कश्मीर और पूर्वोत्तर की जनता के विरोधों को सेना के जरिए कुचल कर उसे अलगाव में पहुंचा दिया है। लेकिन इन गंभीर सीमाओं और गड़बड़ियों के बावजूद इस प्रणाली के तहत चलने वाले कांग्रेस शासन तथा जनता और संयुक्त मोर्चा जैसी फौरी गठबंधन सरकारों ने संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का कम-से-कम कुछ हद तक पालन किया है। इसके विपरीत मौजूदा भारतीय जनता पार्टी सरकार के मंत्री धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र की स्थापना का लक्ष्य रखने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से अपने संबंधों का खुल्लमखुल्ला ढोल पीट रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद भी आरएसएस कार्यकर्ता के रूप में अपने गर्व का इजहार कई दफा कर चुके हैं। आरएसएस के दुष्प्रचार और नैतिक पहरेदारी से धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलावा बहुसंख्यक समुदाय के उन सदस्यों को भी खतरा है जो उससे असहमति रखते हुए अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं। इन बहुसंख्यकों में धार्मिक अंधविश्वासों को चुनौती देने वाले और जनता में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के प्रयास में लगे तर्कवादी तथा महिला अधिकारों के लिए संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। केंद्र सरकार की एक मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने इन सब को ‘हरामजादा’ तक करार दिया है। भाजपा सरकार तथा संघ परिवार के उसके संरक्षक और प्यादे, भारतीय राष्ट्र को हिंदुत्व के साथ जोड़ कर देखने के अपने इस सिद्धांत के आधार पर जनमानस को धार्मिक राष्ट्रवादी शक्ल देने में लगे हैं। वे अपनी इस कोशिश में देश में लोकतांत्रिक असंतोष की गुंजाइश को जबरन खत्म कर रहे हैं।

सुमंत बनर्जी वरिष्ठ राजनीति टिप्पणीकार हैं। उनकी किताब ‘इन द वेक ऑफ नक्सलबाड़ी: अ हिस्ट्री ऑफ नक्सलाइल मूवमेंट इन इंडिया’ चर्चित रही है। इससे आगे के  पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com 

हिंदी प्रदेश का सामाजिक संकट

हिंदी प्रदेश भारत का ह्दयप्रदेश है। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से लेकर आज तक यह हिंदू धर्म और राजनीति का केंद्र भी रहा है। उन्नीसवीं सदी के अंत में ही गौरक्षिणी सभा तथा अन्य कुछ सभाओं-संस्थाओं के जरिए हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा था। औपनिवेशिक उत्तर भारत में सांप्रदायिकता के निर्माण [Read the Rest…]

कोली और न्याय व्यवस्था से जुड़े सवाल

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निठारी कांड के अभियुक्त सुरेंद्र कोली की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदलना एक सकारात्मक निर्णय है। चूंकि निठारी कांड से जुड़े अभी एक दर्जन से ज्यादा मुकदमों में निर्णय होना बाकी है और इन सभी में कोली सह अभियुक्त है, इसलिए आशा की जानी चाहिए कि वे (मुकदमे) [Read the Rest…]

इग्नूः जांच का मतलब

शिक्षा लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत के साथ ही यह साफ हो गया था कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनने वाली नई सरकार की प्राथमिकताओं में से एक शिक्षा का भगवाकरण भी शामिल होगा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार ने भी शिक्षा के भगवाकरण की कोशिश की थी [Read the Rest…]

ईश्वर के अनुरूप काल्पनिक विज्ञान का सृजन

मुं बई में इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसि-एशन का 102वां अधिवेशन 3-7 जनवरी को संपन्न हुआ। इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन की स्थापना 1914 में विज्ञान के विकास के लिए की गई थी। तब से प्रतिवर्ष इंडियन साइंस कांग्रेस का आयोजन होता आ रहा है। समाज की मुख्यधारा की विज्ञान से अरुचि के कारण मीडिया में उसके [Read the Rest…]

सरकारी विज्ञापनों के जरिए राजनीति

इधर केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों की ओर से थोक भाव में विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं। भाजपा शासित राज्य भी इसमें पीछे नहीं हैं। इन विज्ञापनों के जरिए कुछ इस तरह का विकास दिखाया जा रहा है कि मानो देखते ही देखते हिंदुस्तान का कायापलट हो गया हो या बस होने ही वाला हो। [Read the Rest…]

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