हार के निहितार्थ

लोकसभा चुनाव में भारी पराजय का सामना करने वाली कांग्रेस ने उत्तराखण्ड उपचुनाव में तीन विधानसभा उपचुनावों में जीत हासिल कर ली। दो महीने पहले लोकसभा की पांचों सीटों को बड़े अंतर से हारने वाली कांग्रेस के लिए यह जीत संजीवनी से कम नहीं है। इन तीन सीटों में से दो डोईवाला और सोमेश्वर में भाजपा लोकसभा में काफी अंतर से आगे थी। इसे कांग्रेस की बेहतर रणनीति कहा जाए या दो  महीने में ही नरेंद्र मोदी का जादू उतरना। जैसा कि धारचूला सीट पर अपनी विजय के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने भाजपा के लिए जो नया मतदाता वर्ग तैयार किया था, वह दो महीने काम को देखते हुए गायब हो गया है। यह कहना भले ही उत्तराखण्ड के तीन उपचुनावों के संबंध में हो। यहां स्थानीय मुद्दे और व्यक्तित्व ही हावी रहे, लेकिन कहीं ये राष्ट्रीय स्तर पर उभर रहे असंतोष के लक्षण तो नहीं हैं। वैसे स्थानीय स्तर पर देखें, तो यह एकजुट और आक्रामक कांग्रेस के सामने बिखरी और बचाव की मुद्रा में दिख रही भाजपा के बीच मुकाबला था। ये कांग्रेस की जीत से ज्यादा भाजपा की हार है। लोकसभा चुनाव की जीत से मंत्रमुग्ध भाजपा ने इन तीन उपचुनावों के लिए कोई रणनीति ही नहीं बनाई। उसे लगा जैसे मोदी लहर में लोकसभा चुनाव जीत गए, वैसे ही ये उपचुनाव भी जीत जाएंगे।

देखा जाए तो भाजपा ने इन चुनावों को काफी हलके तरीके से लिया। दूसरी ओर कांग्रेस और विशेषकर हरीश रावत ने बहुत गंभीरता से। उनका पूरा राजनीतिक जीवन ही दांव पर लगा हुआ था। लोकसभा चुनाव से पहले राज्य में सत्ता परिवर्तन होने के बाद वे एक भी सीट कांग्रेस को नहीं जीता सके। इससे कांग्रेस के बहुगुणा को हटाने का दांव बेकार हो गया। कांग्रेस की पूरे देश में जो हालत हुई, उसके कारण हरीश रावत पर आलाकमान का ज्यादा दबाव नहीं पड़ा, लेकिन राज्य के अंदर उन पर पार्टी के बाहर और भीतर से हमले शुरू हो गए। इस स्थिति में उपचुनावों में कमजोरी रावत को भारी पड़ सकती थी। हरीश रावत ने इस स्थिति को देखते हुए रणनीति तैयार की। सबसे पहले उन्होंने अपने पसंदीदा व्यक्ति किशोर उपाध्याय को उत्तराखंड कांग्रेस का अध्यक्ष बनवाया। इसके बाद पर्वतीय मतदाताओं की भावनाओं को देखते हुए गैरसैंण में विधानसभा का सत्र आयोजित किया। केवल दो विधायकों पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और सुबोध उनियाल के अलावा सभी कांग्रेसी और समर्थन दे रहे विधायकों को लालबत्ती देकर संतुष्ट करने का प्रयास किया। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल होने वाले सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत को मंत्रिमंडल से हटाकर निर्दलीय दिनेश धनै को मंत्री बनाकर हरीश रावत ने अपनी स्थिति मजबूत कर दी। इसके बाद उन्होंने अपने लिए सुरक्षित सीट की तलाश शुरू की। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस केवल सात विधानसभा सीटों पर आगे रही। इनमें कुमाऊं में धारचूला और जागेश्वर सीट थीं। रावत ने अपने लिए धारचूला सीट चुनी।

धारचूला सीट से कांग्रेस के विधायक हरीश धामी थे। उन्होंने इस्तीफा देकर हरीश रावत के लिए सीट खाली कर दी। इस क्षेत्र में कांग्रेस विधायक हरीश धामी ने दो काफी पुरानी मांगें पूरी करवा दी थीं। पहला, धारचूला और मुनस्यारी क्षेत्र की 117 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया। दूसरा 34 गांवों को अस्कोट अभ्यारण्य से बाहर कर दिया गया। मुख्यमंत्री के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद भाजपा का कोई भी नेता चुनाव मैदान में उतरने का इच्छुक नहीं दिखाई दे रहा था। भाजपा ने यहां से जिन बीडी जोशी को मैदान में उतारा, वे उपचुनाव की घोषणा से पहले कांग्रेस में थे। बीडी जोशी पन्द्रह वर्ष तक धारचूला के ब्लॉक प्रमुख रहे। वे इस बार भी ब्लॉक प्रमुख के दावेदार थे, लेकिन उनके नामांकन को खारिज कर दिया गया। बीडी जोशी ने विधायक हरीश धामी पर आरोप लगाया कि उन्होंने प्रशासन पर दबाव डालकर उनका नामांकन रद्द करवाया है। इसके बाद बीडी जोशी कांग्रेस से खिन्न हो गए। जब उपचुनाव के लिए नामांकन का मौका आया, तो जोशी ने भाजपा की सदस्यता के साथ चुनाव का टिकट भी पा लिया। अब स्थिति यह थी कि भाजपा वाले जोशी को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे और कांग्रेस उन्होंने छोड़ दी थी। पूरा चुनाव उन्होंने अपने बलबूते ही लड़ा।

धारचूला विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड क्रांति दल के ऐरी गुट ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया। काशी सिंह ऐरी क्षेत्र में कांग्रेस के प्रचार में जुटे थे। बसपा ने अपना प्रत्याशी ही नहीं उतारा। सबसे आश्चर्य तो यह कि भाकपा माले ने भी चुनाव से किनारा ही किया। इस संगठन का धारचूला और मुनस्यारी के इलाके में कामकाज है और यहां की जन समस्याओं को लेकर यह लगातार सघर्ष करता रहा है। पिछले चुनाव में भी माले को यहां लगभग 2500 मत मिले थे। माले की अनुपस्थिति का नतीजा यह रहा कि पूरे चुनाव में जनता के मुद्दे उठे ही नहीं। केवल व्यक्तित्वों पर ही चुनाव प्रचार होता रहा। चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री आ ही नहीं सके। एक दुर्घटना में उनकी गर्दन में चोट आ गई और वे एम्स में इलाज करवा रहे थे। वे तो नामांकन में भी नहीं आ सके। चुनाव प्रचार की कमान हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत ने संभाली। वैसे कांग्रेस के सभी छोटे-बड़े नेता प्रचार में मुंहदिखाई को धारचूला जरूर गए।

सोमेश्वर विधानसभा सीट अजय टम्टा के लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद खाली हुई थी और यहां की स्थिति कुछ ज्यादा भिन्न नहीं थी। यहां से कांग्रेस ने जिस रेखा आर्या को टिकट दिया, वे लोकसभा चुनाव में भाजपा में थीं। वे अल्मोड़ा लोकसभा से भाजपा का टिकट भी मांग रही थीं, लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते वे कांग्रेस की हो गईं। सोमेश्वर में वे सांसद अजय टम्टा के विरोधी खेमे की मानी जाती थीं। 2012 के विधानसभा चुनाव तक रेखा आर्या कांग्रेस में थीं और सोमेश्वर से टिकट मांग रही थीं। उन्हें कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने निर्दलीय ही चुनाव लड़ा और लगभग 12 हजार मत पाए। इसके बाद वे भाजपा में चली गईं, लेकिन जब भाजपा से उपचुनाव में टिकट न मिलता देखा तो उन्होंने फिर से कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसके विपरीत भाजपा ने पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन राम को टिकट दिया। वे एक कमजोर प्रत्याशी थे और जिला पंचायत अध्यक्ष रहते हुए उनके खिलाफ एक माहौल भी था। फिर कांग्रेस के संसाधनों के सामने वे कहीं नहीं ठहरते थे। भाजपा के कुछ नेता आखिरी समय में यहां प्रचार के लिए आए भी तो केवल रस्म अदायगी के लिए।

डोईवाला सीट रमेश पोखरियाल निशंक के लोकसभा के लिए चुने जाने के कारण खाली हुई थी। यहां से भाजपा के टिकट के लिए कई दावेदार थे। निशंक इस सीट पर रुचि भट्ट को टिकट दिलाना चाहते थे। आखिर में टिकट त्रिवेंद्र सिंह रावत को मिला। दूसरी ओर कांग्रेस ने हीरा सिंह बिष्ट को टिकट दिया, वे विधानसभा चुनाव में इस सीट पर निशंक से हार गए थे। यहां से भाजपा लोकसभा चुनाव में 22 हजार मतों से आगे रही थी, लेकिन इस उपचुनाव में भाजपा छह हजार मतों से हार गई। भाजपा उन इलाकों में भी हार गई, जो उसके गढ़ माने जाते थे। भाजपा के प्रत्याशी त्रिवेंद्र रावत कहते हैं कि उन्हें भितरधात की सूचना मिली है। अब हार की समीक्षा होगी, तो बातें खुलकर सामने आ जाएंगी।

उपचुनावों में भाजपा के पराजय के कारणों को देखा जाए तो लगता है कि उसका नेतृत्व चुनाव में लड़ने का इच्छुक ही नहीं था। भाजपा के तीन बड़े नेता जो पूर्व मुख्यमंत्री भी रहे थे, बीसी खण्डूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक और भगत सिंह कोश्यारी लोकसभा के लिए चुने जा चुके थे। उनकी राज्य की राजनीति में तत्काल लौटने की संभावना नहीं थी। अभी तक केंद्र में नरेंद्र मोदी ने जो मंत्रिमंडल बनाया है, उसमें उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व नहीं है। इस स्थिति में यह उम्मीद तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को है कि उनको केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है और ये तीनों इसी के लिए प्रयासरत हैं।

इस चुनाव परिणाम के बाद अगर कांग्रेस की स्थिति कमजोर भी होती और उसकी सरकार गिरती भी तो इनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना कहीं भी नहीं थी। इसलिए ये तीनों ज्यादा सक्रिय नहीं दिखाई दिए। इसके बाद की जो दूसरी पंक्ति थी, उसके पास ज्यादा करने को कुछ नहीं था। इस पंक्ति में कोई भी नेता ऐसा नहीं था, जिसकी अपील अपने विधानसभा क्षेत्र से बाहर हो। एक अन्य सतपाल महाराज कांग्रेस के लिए खतरा हो सकते थे, लेकिन लगता है कि भाजपा हाईकमान ने उनको अभी तक इस तरह की हरी झंडी नहीं दी है। सतपाल महाराज अभी भी भाजपा में उत्तराखण्ड के नेतृत्व के लिए सर्वस्वीकार्य नहीं हैं। वैसे भाजपा में कई नेता हैं, जो हरीश रावत की सरकार को अस्थिर करने के इच्छुक नहीं थे। वे सतपाल महाराज से बेहतर हरीश रावत को ही समझते हैं।

इन उपचुनावों में विजय के बाद हरीश रावत की सरकार पर तो स्थिरता आ ही गई है, वे व्यक्तिगत रूप से भी मजबूत हुए हैं। प्रदेश सरकार ने अपने बलबूते पूरा बहुमत पा लिया है। उत्तराखण्ड की विधानसभा की 70 सीटों में कांग्रेस को 35 सीटें मिल गई हैं और एक मनोनीत सदस्य के साथ प्रभावी संख्या 71 सदस्यों में से 36 है। इसका सीधा प्रभाव यह होगा कि निर्दलीय और पीडीएफ  के सदस्यों का अतिरिक्त दबाव नहीं झेलना होगा। सरकार अपने स्तर पर बिना परेशानी के फैसले कर सकेगी। तीनों उपचुनाव के बाद हाईकमान में भी रावत का कद बढ़ गया है। उन्हें अब जनाधार वाला नेता माना जाएगा, जो कांग्रेस को उत्तराखण्ड में दोबारा स्थापित कर सकता है। हाईकमान लोकसभा की पराजय को पूरे देश में केंद्र के खिलाफ जनादेश मानकर उसे भूलने का प्रयास करेगा, लेकिन इसके साथ लोगों की अपेक्षाएं भी अब कांग्रेस सरकार से ज्यादा हो गई हैं। उसे बिना किंतु-परंतु के काम करके दिखाना होगा।

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