आप की जीत पर वाम के लिए सबक

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समयान्तर मार्च, 2015

संपादकीय

आम आदमी पार्टी (आप) की विजय का अगर कोई सबक है तो वह सबसे पहले वामपंथ के लिए है। पहले आप की सफलता के कारणों पर बात की जाए। इस पार्टी, जिसका नेतृत्व पूरी तरह से नौसिखिया है, पर जिसने दिल्ली की जनता के बारे में अद्भुत समझदारी दिखलाई है, की जीत के पीछे मोटे तौर पर उदारीकरण के बाद जन्मे दो वर्गों का समर्थन मुख्य है। ये दोनों वर्ग वैश्वीकरण के बाद बड़े पैमाने पर कृषि की उपेक्षा और नीति- निर्माताओं के औद्योगिकीकरण के प्रति अंधे पक्षपात के कारण लगातार शहरों में केंद्रित हो रहे हैं। इन वर्गों में पहला है, पिछले 25 वर्षों में सबसे ज्यादा तेजी से फैल रहे दिल्ली महानगर के हाशिये पर जी रहे ग्रामीण क्षेत्रों से विस्थापित तबके का और दूसरा है युवाओं का, जो देश भर में फैले हैं।

देखने की बात यह है कि इन दोनों तबकों के हित कम से कम ऊपरी तौर पर एक दूसरे के विरोधाभासी नजर आते हैं। जहां तक हाशिये के लोगों के हितों का सवाल है वे बहुत ही प्राथमिक किस्म के हैं यानी पानी, बिजली, शौचालय आदि। यानी इस वर्ग की मांग मूलत: समाज में शालीनता और सम्मान से रहने की आधारभूत सुविधाओं की मांग है।दूसरी ओर हैं पढ़े-लिखे नौकरीपेशा नौजवान – मुख्यत: प्रोफेशनल – और वे कमोबेश मध्य व उच्च मध्य वर्ग से संबंध रखते हैं, उनकी अपेक्षाएं एक बेहतर जीवन और सुरक्षित व्यवसायों की तलाश की है। उन्हें लगता है कि एक ईमानदार प्रशासन यह कर सकता है। यह वर्ग समाज-व्यवस्था में किसी आधारभूत परिवर्तन का हिमायती नहीं है, बस उसे बेहतर बनाना चाहता है। फिलहाल जो भी हो इस वर्ग के पास वे सारी सुविधाएं, जो हाशिये का वर्ग मांग रहा है, पहले से ही उपलब्ध हैं।

यहां एक बात ध्यान देने की यह है कि हाशिये के लोगों की मुख्य मांगों में नौकरी की मांग शामिल नहीं है, इसके बावजूद कि ये इस मामले में पूरी तरह असुरक्षित हैं। ये लोग किसी न किसी तरीके से अपने लिए रोजगार तलाश लेते हैं जिसे योजना आयोग की रिपोर्ट में तथाकथित ‘स्वरोजगार’ माना गया है। अगर इनकी इस संदर्भ में कोई मांग है, तो सिर्फ यह है कि उन्हें अपने छोटे-मोटे धंधों को बिना प्रताड़ित हुए करने दिया जाए। दिल्ली में, देश के दूसरे शहरों में भी, खोमचेवालों, पटरीवालों, फेरीवालों, रिक्शेवालों, घरों में काम करने वालों और दिहाड़ी मजदूरों की तादात में बड़ी संख्या में वृद्धि होना इस बात का संकेत है कि गांवों से उजड़कर शहर की ओर आने वाले अधिसंख्य लोगों के लिए संगठित क्षेत्र में कोई जगह नहीं बनी है – फिर चाहे वह सरकारी हो या निजी। यह इस बात का भी बड़ा प्रमाण है कि गांवों की स्थिति स्लमों में परिवर्तित होते महानगरों से कई गुना खराब हो चुकी है।

असल में मध्यवर्ग के वे युवा जो मुख्यत: आईटी और सेवा क्षेत्र में काम करते हैं, का इतने बड़े पैमाने पर आप का समर्थन करने के पीछे इनकी अपनी ही समस्याएं हैं। इन्हें पैसा जरूर मिलता है पर इनके व्यवसायों में न तो स्थिरता है और न ही सुरक्षा। इनके काम के घंटों की भी कोई सीमा नहीं है। इनकी नौकरियां न तो स्थायी हैं, न इन्हें पेंशन की सुविधा है, न स्वास्थ्य की और न ही आवास की। इनमें से अधिकांश अपने समाज से उखड़कर दूर-दराज के शहरों में रहते हैं और इस तरह ये सामाजिक और मानसिक तौर पर भी लगातार असुरक्षित महसूस करते हैं।

अगर हम इन दोनों छोरों को मिलाने की जरा भी कोशिश करें तो स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों ही स्थितियां मूलत: पिछले ढाई दशक में अपनाई गई आर्थिक नीतियों का परिणाम हैं। इस दौर में चाहे एनडीए हो या यूपीए दोनों ने ही नियोजित तरीके से सरकारी नौकरियां खत्म कीं। जो नौकरियां थीं उन्हें अस्थायी या अनुबंधित किया गया और सार्वजनिक क्षेत्र को जितना संभव है बर्बाद किया गया। इतना ही नहीं इस दौर में श्रमिक कानूनों में मालिकों के पक्ष में बदलाव किया गया और मजदूर संघों का हर संभव तरीके से दमन हुआ। मारुति उद्योग में श्रम असंतोष, जो मुख्यत: स्वतंत्र मजदूर संघ बनाने की कोशिश के दमन के कारण पैदा हुआ, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पिछले लगभग तीन वर्षों से 140 मजदूरों को झूठे मुकदमों में फंसा कर जेलों में बंद किया हुआ है। बड़ी मुश्किल से अब सर्वोच्च न्यायालयन ने सिर्फ दो व्यक्तियों को जमानत दी है। इधर खबर आई है कि हरियाणा की तत्कालीन कांग्रेसी हुड्डा सरकार इस मुकदमे को लड़ने के लिए,जो कि अभी जिला अदालत में ही है, राज्य सभा के कांग्रेसी सदस्य और वकील केटीएस तुलसी को साढ़े पांच करोड़ रुपए दे चुकी थी। इन मजदूरों को दंडित करने के पीछे ऐसा उदाहरण पेश करना है जिससे कि भविष्य में कोई मजदूर किसी भी तरह से, विशेष कर विदेशी मालिकों को, चुनौती देने की हिम्मत न कर सके।

कृषि के क्षेत्र में इस कहानी का कुछ और ही रूप है। कृषि के महत्त्व को कम करने की हर चंद कोशिश की जा रही है। कृषि को पूरी तरह अलाभकारी बना दिए जाने की प्रक्रिया पिछले ढाई दशक में अपने चरम पर पहुंच गई है। यही कारण है कि कृषि, जो अब तक रोजगार का सबसे बड़ा माध्यम थी, आज आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। पिछले एक दशक से कृषि पर बजट का सिर्फ दो प्रतिशत की निवेश किया जाता रहा है, जबकि देश की 65 प्रतिशत जनता आज भी इसी से अपना जीवन यापन करती है। अफसोसक की बात यह है कि नये बजट में कृषि के लिए बजटरी आंवटन में 14.3 प्रतिशत की कटौती कर दी गई है। यानी 2015-2016 के बजट में यह कटौती कुल 5,648 करोड़ रुपये की है। जबकि बजट में उद्योग और वाणिज्य के लिए पलक पांवड़े बिझाए गए हैं। इसके पीछे मंशा यह है कि कृषि करोड़ों किसानों के हाथों से निकल कर कॉरपोरेट क्षेत्र के कब्जे में चली जाए और किसान सस्ते श्रमिक में बदल दुनिया में धक्के खाता भटके। पहले यूपीए और अब भाजपा सरकार द्वारा लाया जा रहा भूमि अधिग्रहण कानून इसका प्रमाण है। बजट पुस्तुत करने से पहले ही 26 फरवरी को राज्यसभा में वित्तमंत्री का वक्तव्य रही-सही कसर पूरी कर देता है। भाजपा के मंत्री इस कानून के पक्ष में तर्क कर रहे हैं कि गांवों में आखिर नहर आदि का निर्माण कैसे होगा? इससे बड़ी हास्यास्पद बात क्या हो सकती है कि किसान अपना हित ही नहीं जानता? दूसरी बात यह है कि आखिर सरकारें क्यों मान बैठी हैं कि कृषि में रोजगार नहीं पैदा हो सकता है। देश में करोड़ ों की संख्या में भूमिहीन किसान हैं आखिर उन्हें क्यों जमीन नहीं दी जा सकती? दूसरी ओर पिछले दो दशक में सरकार पूंजीपतियों को छह हजार करोड़ की करों की छूट दे चुकी है। महानगरों में जो मलिन बस्तियां अंधाधुंध फैली हैं उनका सीधा संबंध गांवों के इसी सुनियोजित विनाश की नीतियों से है।

कुल मिलाकर तात्पर्य यह है कि आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की विश्वसनीयता के खत्म होने का ही लाभ नहीं उठाया बल्कि भाजपा की पूंजी की पक्षधर और सांप्रदायिक नीतियों को भी तहस-नहस कर दिया है। हो सकता है भाजपा का वोट आधार पिछली विधान सभा के स्तर पर बना हुआ हो पर वह जून के लोकसभा चुनावों के स्तर से 13 प्रतिशत गिरा है। बीते लोकसभा चुनावों में भाजपा ने दिल्ली की 70 में से 60 विधान सभा क्षेत्रों में विजय पाई थी। इस बार वह इनमें से 57 में हार गई। भाजपा की हार का एक बड़ा कारण उसकी सांप्रदायिकता है। पर भाजपा उस त्रिलोकपुरी सीट को भी जीत नहीं पाई जहां उसने दंगे करवाए थे। इसके अलावा गिरजाघरों पर भी इस दौरान हमले किए गए। यह इस बात का संकेत है कि दिल्ली की मलिन बस्तियों में रहने वाला आदमी शांति चाहता है। वह सांप्रदायिक नीतियों का मोहरा नहीं बनना चाहता। अचानक नहीं है कि सारा अल्पसंख्यक वोट संगठित रूप से भाजपा के खिलाफ गया। आप के नेताओं ने इन विरोधाभासों को समझने और उनको मुद्दा बनाने का क्रांतिकारी काम किया। अगर उनकी जीत हुई है तो उसके पीछे चुनावी रणनीति उतना बड़ा घटक नहीं है जितना कि इन दो असंतुष्ट और परेशान वर्ग को समझने और उसे साथ लेने की नीति है।

आप की दिल्ली की जीत असल में कई और भी सबक लिए हुए है। जैसे कि नरेंद्र मोदी की जीत का आधार उतना व्यापक नहीं है जितना समझा जा रहा था। दूसरा, अब कोई भी राजनीतिक दल महानगरों के इन वर्गों की उपेक्षा नहीं कर सकता। अगर आप को बाकी देश में सफलता मिलेगी तो वह समाज के इन्हीं दो छोरों को साथ लेकर ही संभव होगी। पर इस परिघटना के छोर न तो दिल्ली तक सीमित हैं और न ही देश के अन्य महानगरों तक सीमित रहने वाले हैं। असल में इसके अंतरराष्ट्रीय आयाम हैं, क्योंकि इसके कारण भी अंतरराष्ट्रीय हैं। वे वेनेजुएला, बोलीविया, ब्राजील तथा स्पेन और अब ग्रीस में हो रही उथल-पुथल से भी उतने ही जुड़े हैं जितने दिल्ली या भारत से।

असली बात यह है कि इन सारे सवालों का सीधा संबंध वामपंथ से है। तब प्रश्न पैदा होता है कि आखिर वामपंथी नेतृत्व को हो क्या गया है? इन नेताओं को ये बातें क्यों समझ में नहीं आईं कि नवउदारवाद और वैश्वीकरण ने किस बड़े पैमाने पर उथल-पुथल मचाई हुई है और समाजों के स्वरूप को कहां तक बदल दिया है? पुराने कारखाने और मिलें अब नहीं रहीं हैं इसलिए मजदूर संघों की पुरानी रणनीति ने काम नहीं करना है। जरूरत मिलों और कारखानों के बाहर भी लोगों – रिक्शावालों, टैक्सीवालों, खोमचेवालों, दिहाड़ी मजदूर, घरेलू नौकर, सफाईवालों आदि के साथ ही साथ अनुबंध पर काम कर रहे सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्र के श्रमिकों – को संगठित करने की है। वे क्यों इन मुद्दों को लेकर जनता का नेतृत्व नहीं कर पाए? दूसरी ओर वे स्वास्थ्य, शिक्षा और यातायात को लेकर क्यों कोई आंदोलन नहीं कर रहे हैं? निजीकरण ने इन क्षेत्रों को जिस तरह से आम आदमी की सीमा से बाहर कर दिया है क्या यह किसी से छिपा है? नये बजट में जिस तरह से शिक्षा और स्वास्थ्य को नजरंदाज किया गया है उसका सीधा-सा अर्थ है इन क्षेत्रों को पूरी तरह से निजी क्षेत्र को सौंपना।

इसी तरह आखिर वामपंथियों की क्यों समझ नहीं आ रहा है कि पर्यावरण भी ऐसा मुद्दा है जिस पर तत्काल बात की जानी चाहिए? आखिर क्यों भूमिअधिग्रहण विरोधी आंदोलन की बागडोर वामपंथियों के हाथ में नहीं है? जनता की बात करनेवाला कोई भी दल मात्र संसदीय राजनीति और मीडिया के माध्यम से जीवित नहीं रह सकता।

जिस हद तक यह आंदोलन आज जनता से कट गया है वह स्तब्धकारी है। इसमें शंका नहीं है कि भारतीय वामपंथी नेतृत्व अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुका है। इसके नेतृत्व ने वामपंथी आंदोलन को ही अप्रासंगिक बना दिया है। इस पर भी ऐसा भी नहीं है कि उसके पास अब कोई मौका ही न रहा हो। अवसर सदा रहते हैं सिर्फ उन्हें पहचानने की समझ, दृष्टि और क्रियान्वयन का जज्बा होना चाहिए। इससे आगे के  पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com 

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