अनवार रिज़वी

श्रृद्धांजलि   

(27 मार्च 1941-11 नवंबर 2014)

अनवार रिजवी से मेेरी मित्रता कॉफी हाउस के दौरान ही, अस्सी के दशक से शुरू में हुई थी। तब तक कॉफी हाउस से काफी हद तक लेखकों और अदीबों का पलायन शुरू हो चुका था। हिंदी के गिनती के साहित्यकार हर रोज देखे जा सकते थे, पर हां शनिवार को जरूर जमावड़ा बड़ा रहता था। सिर्फ विष्णु प्रभाकर ऐसे थे जो हर दिन आया करते थे। हम दो-तीन और जन उन्हीं के आसपास बैठने लगे थे। कॉफी हाउस त्याग का यह सिलसिला सिर्फ हिंदी तक सीमित नहीं था। उर्दू साहित्य भी कोई अपवाद नहीं था। वे लोग भी शनिवार को ही आया करते थे। पर हां, अनवार रिजवी और रामलाल धूरिया को आप वहां बेनागा हर रोज देख सकते थे। असल में ये दोनों उर्दू वालों के ही साथ बैठा करते थे। रिजवी तो उर्दू के लेखक थे ही पर धूरिया का उर्दू से बचपन से जो नाता था वह कभी नहीं टूटा। उर्दू के साथ एक और त्रासद तथ्य यह भी था कि उसके लिखने वाले और पढ़ने वाले दिन पर दिन कम होते जा रहे थे। हिंदी में तो यदाकदा ही सही कुछ नए लेखक-पत्रकार नजर आ जाते थे पर उर्दू में ऐसा नहीं था। लगभग सभी लेखक 65-70 पार के थे। अनवार साहब कई बार कहते भी थे, यह दौर उर्दू लेखकों के घटते चले जाने का है। और वह गलत भी नहीं थे। कॉफी हाउस आने वाले कई लेखक देखते-देखते नहीं रहे। कुछ के तो मैं नाम भी गिना सकता हूं: चानन गोविंद पुरी नादां, मनमोहन कृष्ण, देवेंद्र इस्सर आदि-आदि। गोकि इनमें से सभी नाम उन लोगों के हैं जो हिंदू थे और विभाजन से पूर्व के पंजाब से आए थे। इन सभी ने बचपन में उर्दू के माध्यम से शिक्षा पाई थी पर इन लोगों के साथ कई मुसलमान लेखक भी हुआ करते थे जैसे कि महमूद हाशमी, ख्वाजा अब्दुल खालिद, मख्मूर सईदी और याकूब आमिर आदि। पर हिंदी-उर्दू वालों में एक अंतर था। उर्दू के लिखने वालों के साथ ही पढ़नेवाले भी कम हो रहे थे, जबकि हिंदी में कई युवा लेखक आ रहे थे। हिंदी की संस्कृति बदल रही थी और उर्दू के लिए परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं थीं।

कह नहीं सकता ऐसे में हिंदी-उर्दूवाले कब एक हो गए और बचे-खुचे एक ही टेबल पर बैठने लगे। पर यह भी सच था कि उर्दू के नाम पर तब तक नियमित कॉफी हाउस आने वालों में सिर्फ अनवार रिजवी रह गए थे। सन् 98 तक,जब तक नौकरी पर रहा, मैं नियमित कॉफी हाउस जाया करता था। बीच-बीच में अर्चना त्रिपाठी, प्रताप सिंह, कांति मोहन और शनिवार को आनंद प्रकाश तथा हरदयाल भी आ जाया करते थे। सन् 2000 में विष्णु जी अजमेरी गेट से पश्चिमी दिल्ली के अपने मकान में चले गए जहां से उनका आना संभव नहीं रहा। उसके बाद तो कॉफी हाउस की धुरी ही रामलाल धूरिया हो गए और अनवार रिजवी उनके साथी। वैसे यह भी सच है कि वे दोनों लगभग 40 वर्ष पुराने मित्र थे।

इस बीच समयांतर का प्रकाशन शुरू हो गया और अब मैं भी रोज कॉफी हाउस आने की स्थिति में नहीं रहा। इस बीच हमारे साथ सुलतान त्यागी भी जुड़ गए। हम लोगों ने तय किया कि रोज न आकर अब सप्ताह में दो दिन ही मिला करेंगे। बीच-बीच में मैंने कोशिश की कि कुछ युवा लोग इसमें शामिल हों और कॉफी हाउस संस्कृति आगे बढ़े, पर ऐसा हो नहीं सका। संस्कृतियां सिर्फ चाहने से नहीं चलतीं बल्कि वे भौतिक स्थितियों से नियंत्रित होती हैं, यह कटु सत्य मुझे धीरे-धीरे समझ में आ गया।

इस दशक के शुरू से स्थितियां बिगड़ने लगीं। पहले रामलाल धूरिया का स्वास्थ्य गड़बड़ाया। देहांत से दो वर्ष पहले ही वह कॉफी हाउस आने की स्थिति से बाहर हो गए थे। पर अनवार रिजवी और मैंने यह सिलसिला जारी रखा। साल भर में ही गुर्दों की परेशानी ने विकट रूप धारण कर लिया और उन्हें हर दूसरे दिन डायलिसिस के लिए जाना पड़ने लगा। इसके बावजूद उनका अगले एक वर्ष तक कॉफी हाउस आना, रुक-रुक कर ही सही जारी रहा। पर पिछले लगभग एक वर्ष में वह भी धीरे-धीरे बंद हो गया था।
इस बीच उनसे मिलने खालिद अशरफ, मैं और सुल्तान त्यागी बीच-बीच में उनके घर जाते रहे। दो महीने पहले जब हम उनसे मिले वह बेहद हताशा की स्थिति में थे। बोले, पिछले दिनों मैं इतना निराश था कि इच्छा हो रही थी कि अगर जहर मिल जाए तो खा लूं। असल में पिछले एक साल से उन्हें सप्ताह में तीन बार डायलिसिस करवाना पड़ता था। यह कोई बहुत आसान काम नहीं है। अक्टूबर के शुरू में ईद से कुछ ही दिन पहले मैं और खालिद जब उनसे मिलने पहुंचे तो उन्हें देख कर काफी देर तक बात करना ही मुश्किल हो गया। चक्कर आने से वह मेज पर गिरे थे और उससे उन्हें ऐसी चोट लगी कि हाथ की हड्डी ही टूट गई थी। वह बिना सहारे के उठ भी नहीं पा रहे थे। अक्टूबर के मध्य में उनकी हालत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। उनकी पत्नी ने बतलाया कि जब उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी की जा रही थी तो वह बोले अब मैं 72 साल का हो चुका हूं। मुझे क्यों अस्पताल में भर्ती कर रहे हो। वह जल्दी ही बेहोशी में चले गए और फिर कभी होश में नहीं आए। लगभग 25 दिन अस्पताल में रहे। अंत के दिनों में उन्हें वेंटिलेटर पर देखना अत्यंत पीड़ाजनक था।

उन्होंने समयांतर के लिए कई महत्त्वपूर्ण लेख लिखे। उर्दू में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उन्हीं से मिलती थी। साहित्य अकादेमी के तत्काली अध्यक्ष गोपीचंद नारंग की संरचनावाद पर किताब साख़्ितयात, पस-साख़्ितयात और मशरीकी शेरियात किताब में कहां-कहां से सामग्री उड़ाई गई है इस संबंध में शाहिद इमरान भिंडर के लेख को उन्हीं ने समयांतर के लिए प्रस्तुत किया था। इससे पहले उन्होंने उर्दू की प्रसिद्ध पत्रिका शब्खून के बंद होने के समय उस के महत्त्व पर लिखा। सन् 2002 में हुए दंगों के दूसरे दिन अहमदाबाद पुलिस मुख्यालय के ठीक बाहर स्थिति उर्दू कविता के जनक वली दकनी की मजार को दंगाइयों ने योजनाबद्ध तरीके से नेस्तनाबूद कर दिया था। बाद में उस जगह पर सड़क बना दी गई थी। वली के महत्त्व और उनकी कुछ चुनींदा गजलों व शेरों को हिंदी में सबसे पहले अनवार रिजवी के कारण ही समयांतर में छापा जा सका था। समयांतर में उनकी अंतिम रचना इसी वर्ष अप्रैल में हिंदी-उर्दू गीतों पर छपी थी। असल में उन्होंने इससे पहले ही हिंदी में लिखना शुरू कर दिया था और मेरे आजकल के संपादन के दौरान ही कुछ लेख लिखे थे। जब हमने आजकल का

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