टाटा का सच

‘विनोद’ और प्रहसन’ शीर्षक से प्रकाशित लेख (समयांतर अप्रैल २०१५) में पंकज बिष्ट ने सही लिखा है कि राडिया टेपों ने टाटा संस्थान की वास्तविकता को दुनिया के सामने उघाड़ कर रख दिया और इसका खामियाजा विनोद मेहता को भी भुगतना पड़ा।

आपको याद होगा कि टाटा संस्थान की वास्तविकता इससे पूर्व भी उजागर हो चुकी है जब उसने अपने व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए उत्तर-पूर्व के एक उग्रवादी समूह से संपर्क साधा था। यह उद्घाटन भी उच्चस्तरीय व्यक्तियों की बातचीत में हुआ था। यह बातचीत शब्दश: एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई थी।

एक सूचना आपके पाठकों को दूं कि टाटा स्टील ने यह श्रेय १९८० के बाद लिया था कि वह सोशल ऑडिट रिपोर्ट जारी करता है। जिस वर्ष टिस्को की प्लेटिनम जुबली मनाई जा रही थी, उस वर्ष भी यह रिपोर्ट जारी हुई थी। उस रिपोर्ट की खामियों और अंतर्विरोधों पर जमशेदपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता जवाहरलाल शर्मा ने अनेक सवाल उठाए थे। जाहिर है कि टाटा घराने के दबदबे के कारण प्रिंट मीडिया ने उसे तवज्जो नहीं दी थी। किसी तरह उस रिपोर्ट पर विश्लेषण की पहली किस्त साप्ताहिक समाचार पत्र ब्लिट्ज में छपी थी, लेकिन दूसरी कड़ियां बिना किसी सूचना के ब्लिट्ज से गायब हो गईं। क्या आर.के. करंजिया दबाव में आ गए थे?

कोई भी मीडियाकर्मी या एक्टिविस्ट सजग होकर जमशेदपुर में कुछ दिन रह ले तो टाटा घराने की हकीकतों से कुछ न कुछ परिचित हो ही जाएगा।
– प्रकाश चंद्र, नागपुर

हाशिमपुरा कांड और मीडिया का चेहरा

हाशिमपुरा हत्याकांड पर 28 वर्ष बाद आए अदालती फैसले की विभिन्न कोणों से परख करके समयांतर ने (अप्रैल 2015) एक बार फिर सांप्रदायिकता जैसे मसले पर अपनी सकारात्मक प्रतिबद्धता प्रकट की है। शायद ही किसी अन्य पत्रिका ने इस तरह का गहन और विस्तृत विश्लेषण किया हो। असल में 21 मार्च को जब मीडिया ने [Read the Rest…]

विवेक और वैज्ञानिकता के ‘बुरे दिन’

समयान्तर, जून, 2015

गोकि इसकी सच्चाई विवादास्पद है पर यह किस्सा मानव सभ्यता के इतिहास के उन दौरों को, जब रूढ़िवादिता तार्किकता को पीछे धकेल देती है, रूपक में समझने के लिए अच्छी कथा है। इसलिए भी कि इस कथा के निष्कर्षों का संबंध अंतत: राजनीतिक परिस्थितियों और नेतृत्व से है। कथा कुछ यूं है, जब खलीफा उमर [Read the Rest…]

इंसाफ कहां है

हाशिये की आवाज   ”यह अदालत बड़े अपराधियों के लिए सुरक्षित स्वर्ग बन गई है।” सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान और न्यायमूर्ति एस.ए. बोडबे की पीठ।1 भारत के संविधान की प्रस्तावना में बाकी चीजों के साथ ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इंसाफÓ शामिल है जो यकीनन आम जनता को दिया गया सबसे अहम आश्वासन है। [Read the Rest…]

इस विवाद का अंत कहां है ?

भारत-बांग्लादेश लेखक : मो. जाहिदुल दीवान: जेएनयू में शोध छात्र एक लंबे अर्से से विवाद का विषय बना रहा भारत-बांग्लादेश भूमि विधेयक का पिछले संसदीय सत्र में पारित होने के साथ ही अंत हो गया है। कुछ लोगों का मानना है कि इस प्रकार भूमि आदान-प्रदान से भारतीय भूखंड का एक बहुत बड़ा हिस्सा बांग्लादेश [Read the Rest…]

हिंदू समय में दिनकर कार्ड

भारत की राजनीति महाभारत के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में गांधी, पटेल और अंाबेडकर के बाद राष्ट्रकवि दिनकर को राजनीति के शतरंजी खेल में शामिल करना मोदी, भाजपा और आरएसएस का सुनियोजित एवं दूरगामी एजेंडा है। राजनीति के जो पंडित इसे सिर्फ मोदी छवि या लोक लुभावन राजनीति समझते और बताते हैं [Read the Rest…]

Page 1 of 14212345...102030...Last »
%d bloggers like this: