सांसदों की नजरों में गांव

पत्र

खेमकरण साहनी सोनम, नेनीताल

भारत में गांव पिछड़ेपन की निशानी माने जाते रहे हैं। गांव में जाकर लगता है कि हम आधुनिक चकाचौंध यानी जिंदगी को मिलने वाली जरूरी सुविधाओं से जैसे कट गए हैं। प्राथमिक समझ भी यही है कि वहां सुविधा के नाम पर कुछ भी तो नहीं है। इसी कारण गांव में विकास करने की जगह गांव वाले शहरों में पलायन करते रहे हैं और फिर वहीं के बाशिंदे होकर रह जाते हैं। हर कोई शहरों की तरक्की और गांव के खस्ताहाल से पूर्ण परिचित है।

गांव शुरू से ही सरकार की नजरों में हैं क्योंकि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा यहां रहता है। गांव के विकास और गरीबी खत्म करने के नाम पर ही नेता विधानसभा और संसद में पहुंचते रहे हैं। इस तरह अपने समय के विधायक और सांसद तो अपनी तरक्की/विकास करते गए लेकिन गांव और गरीबी की स्थिति वही जस की तस रही। हैरानी की बात है कि हर बार विधानसभा या लोकसभा चुनाव के वक्त इन नेताओं-मंत्रियों के मुद्दे गरीब-गरीबी ही होते हैं और ये जीत भी जाते हैं। फिर हम चुनाव में इनकी गंदी कारस्तानी यानी पैसे के दम पर किसी को खरीद लेना अच्छी तरह जानते हैं। जनता भी बिक जाती है। तो! तरक्की वो चाहे गांव की हो या शहर की, कैसी हो और कैसे हो? ये आम जनता को अभी सोचना है।
सन् 2014 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों उदास हैं कि पिछले वर्ष उनके द्वारा यानी ग्यारह अक्टूबर को, जेपी जयंती के अवसर पर सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत प्रत्येक सांसद को एक गांव गोद लेकर उसे विकसित करना था। लेकिन हमारे सांसद नरेंद्र मोदी की इस योजना को थोड़ी भी हवा नहीं दे रहे हैं और इतने उदासीन हैं कि आठ महीने गुजरने के बाद भी इन्होंने अभी तक अपने गांव का चयन नहीं किया है। ऐसे सांसदों में विपक्ष के अतिरिक्त भाजपा के भी सांसद सहित कुल एक सौ आठ सांसद हैं।
गांव के विकास हेतु इस तरह की योजना सर्वप्रथम 2009-10 में भी चलाई गई थी लेकिन तब इसकी जिम्मेदारी सरकार के ऊपर थी और इस योजना के तहत वही गांव चुने जा सकते थे जहां की कुल आबादी में एसटी (अनुसूचित जाति) की आबादी पचास प्रतिशत हो। सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना में फेरबदल कर इसे लचीला बनाने का काम किया। प्रधानमंत्री के ये भी स्पष्ट निर्देश थे कि सांसद उस गांव का चुनाव नहीं कर सकते, जहां उनके परिवार, या संगे संबंधी रहते हैं। लगता है कि प्रधानमंत्री की यह बात या सांसद पचा नहीं पाए। बस तभी से वे गांव की तरफ देखते तक नहीं हैं।
हालांकि गांव की उपेक्षा का यह मामला नया नहीं है। जरूरत है कि विधायक और सांसद को यह समझने की कि जनता से कुछ वादे करके ही वे विधानसभा और संसद में पहुंचे हैं। अत: जितने भी सकारात्मक कार्य हो सकते हैं, सब करने चाहिए। लेकिन प्राय: ही यह देखा गया है कि विधायकों की विधायक निधि और सांसदों की सांसद निधि के तहत आवंटित धनराशि ज्यों की त्यों हैं। अब बताइए! क्षेत्रीय विकास कैसे हो! आवश्यकता है शहरी विकास के साथ-साथ समग्र ग्रामीण विकास पर बात हो, परंतु जो सांसद एक गांव को गोद लेने से कतरा रहे हैं वो गांव का समग्र विकास कैसे करेंगे?
– खेमकरण साहनी सोमन, नैनीताल, इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

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