यह जो तस्वीर उभर रही है…

संपादकीय

घटनाएं छोटी-छोटी हैं पर हो जगह-जगह हो रहीं हैं – तेलंगाना, कर्नाटक, गोवा, गुजरात, दिल्ली और जम्मू। किसी चित्र के आधार बिंदुओं की तरह जो अंतत: जुड़कर संपूर्ण चित्र बनाती हैं। बिंदुओं के पीछे जिस तरह की मंशा होगी, जैसी परिकल्पना या सपना होगा वैसा ही अंतत: आकार बनेगा।

शुरुआत सानिया मिर्जा से की जा सकती है जिसे भाजपा के एक विधायक ने पाकिस्तान की बहू कह कर संबोधित किया था। मंशा इस तरह उन्हें घटिया सिद्ध करने की थी। पर अगर आप इसके वृहत्तर संदर्भों को देखें तो वे किस हद तक खतरनाक हैं समझा जा सकता है। सबसे पहली बात यह है कि यह महिला विरोधी मानसिकता का उदाहरण है। अगर कोई पुरुष किसी विदेशी महिला से विवाह कर लेता, विशेषकर पाकिस्तानी से, तो क्या इस तरह का विशेषण उसके साथ भी लगाया जाता? बहुत संभव है तब इसे प्रशंसा से देखा जाता। दूसरी बात यह है कि यह किसी व्यक्ति के अपने जीवन और जीवन साथी के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार को चुनौती देना और उसका हनन है। यह अलोकतांत्रिक और रुढि़वादी सोच का उदाहरण है।

पाकिस्तान को भारत के जन मानस में एक शत्रु राष्ट्र के रूप में बैठाया गया है। और चूंकि उसकी छवि एक ‘शत्रु राष्ट्र’ के रूप में गढ़ दी गई है इसलिए उसका हर नागरिक शत्रु से कुछ कम नहीं है। यह मानसिकता कुल मिलाकर अमानवीय और सतत् युद्ध कामी है। विशेषकर एक ऐसे देश को लेकर जो अभी छह दशक पहले तक हमारा ही हिस्सा था। इस शत्रुता का एक बड़ा कारण उसका एक विशेष धर्म को मानना रहा है और याद रखने की बात यह है कि देश का एक राजनीतिक दल जो संयोग से आज शासक दल है, इस धर्म के प्रति हिंसा, घृणा और वैमनस्य की खुले आम राजनीति करता रहा है। पाकिस्तान को एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना मूलत: इस्लाम और भारत में उसके मानने वालों के खिलाफ सतत् अभियान को जारी रखना है। यानी उस राजनीति के लिए यह सबसे ज्यादा आसान है जो कि धर्मिक बहुसंख्यकवाद के दर्शन पर टिकी है।

इसी मानसिकता, सोच और राजनीति की अन्य अभिव्यक्तियां गोवा के भाजपा मंत्री और विधायक के बयानों में झलकती हैं जो कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और यहां के सभी लोग फिर चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों हिंदू ही हैं। मैं हिंदू ईसाई हूं।

इस बयान के पीछे किसी तरह की धार्मिक उदारता नहीं देखी जानी चाहिए बल्कि इसे आप राजनीतिक अवसरवाद कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में जिस तरह की राजनीति सत्ताधारी वर्ग करेगा उसकी अभिव्यक्ति आप को समाज के विभिन्न स्तरों पर विभिन्न तरीकों से देखने को मिलेगी।

पर इसकी सबसे गंभीर अभिव्यक्ति दीनानाथ बत्रा की गतिविधियों और व्यक्तव्यों में देखी जा सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े बत्रा दिल्ली से शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास चलाते हैं। इस संस्थान का मुख्य काम अब तक मूलत: उन किताबों के खिलाफ कानूनी अभियान चलाना रहा है जो हिंदू धर्म और संस्कृति का वस्तुपरक मूल्यांकन और विश्लेषण करने की कोशिश करती हैं। वेंडी डोनिगर की पुस्तक द हिंदू के साथ जो हुआ वह इसका उदाहरण है। इसी संस्थान ने मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ भी अभियान चलाया था और उनका जीना दूभर कर दिया था। वह शिक्षा संस्कृति को पूरी तरह से आरएसएस जैसी मानसिकता और समझ में ढालना चाहते हैं और भारतीय समाज को मध्यकालीन दौर में पहुंचाने में लगे हुए हैं। उनका मानना है कि आज जो पुस्तकें छात्रों को पढ़ाई जा रही हैं वो पूरी तरह से कूड़ा हैं। वे विशेषकर एनसीईआरटी की किताबों के पीछे पड़े हैं जो अपनी वस्तुनिष्ठता, वैज्ञानिकता, विश्लेषण और तार्किकता के लिए बहुचर्चित हैं। इसलिए उनका मानना है कि ये किताबें छात्रों का चरित्र निर्माण नहीं करतीं बल्कि उन्हें पथभ्रष्ट करती हैं। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में अनुसंधान, विश्लेषण, वस्तुनिष्ठता और विवेक पैदा करना नहीं है बल्कि तथाकथित धार्मिक-पौराणिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को छात्रों द्वारा बिना कोई प्रश्न उठाए स्वीकार करना है, यह सोच अपने आधारभूत अवधारणा में प्रगतिविरोधी ही नहीं बल्कि मानव विरोधी भी है। इसके लिए न्यास ने एक आयोग का गठन किया है। यह अपनी तरह का ऐसा आयोग है जो गैरसरकारी तौर पर एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा गठित किया गया है। पर यहां ध्यान देने की बात यह है कि इसके पीछे आरएसएस है जो सरकार पर इस संस्था के जरिए दबाव बनाना चाहता है जिससे कि शिक्षा के क्षेत्र में भगवाकरण जितना जल्दी हो सके हो जाए। देखने की बात यह है कि इस 21 सदस्यीय आयोग में कई ऐसे लोग हैं जो शिक्षा क्षेत्र के विभिन्न संस्थानों से जुड़े थे और निदेशक, कुलपति, प्रोफेसर जैसे उच्च पदों काम कर चुके हैं। यहां याद रखना जरूरी है कि पिछली बार एनडीए के दौर में सीबीएससी ने 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए हिंदी पाठ्यक्रम में लगे उपन्यास निर्मला को निकाल कर भाजपा की एक ऐसी लेखिका का उपन्यास लगा दिया था जिसका साहित्य में कोई स्थान नहीं है। असल में सरकार में और सरकारी संस्थानों विशेषकर शिक्षा, संस्कृति और सूचना माध्यमों में आरएसएस के लोगों की घुसपैठ शुरू हो गई थी जो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान चरम पर पहुंच गई। उसी दौर में पत्रकारिता विशेषकर हिंदी पत्रकारिता में भी यह घुसपैठ शुरू हुई जिसका लाभ भाजपा को इस चुनाव के दौरान मिला। शिक्षा के निजीकरण ने भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिशु शिक्षा कन्द्रों के माध्यम से अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी थी और लगभग पूरे देश में एक जाल बिछा दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और यूपीए सरकार के दौरान आरएसएस का भगवाकरण का एजेंडा रुका नहीं बल्कि समानांतर चलता रहा। इधर भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् (इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च या आइसीएचआर) में सरकार ने जिस तरह से परिषद् का अध्यक्ष एक ऐसे अनजान से रूढि़वादी वाई. सुदर्शन राव को नियुक्त किया है वह सरकार की मंशा पर किसी तरह की शंका की गुंजाइश नहीं छोड़ता। राव का मानना है कि महाभारत और रामायण इतिहास हैं, न कि महाकाव्य।

पर इस आयोग के संदर्भ में, जिस पर आरएसएस का वरदहस्त है, महत्त्वपूर्ण यह है कि वर्तमान प्रधानमंत्री आरएसएस की देन हैं और कर्मठ प्रचारक रह चुके हैं। यानी खतरा आसन्न है। इधर खबर है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी 29 जुलाई को नागपुर में संघ परिवार द्वारा आयोजित विज्ञान भारती आयोजन में उपस्थित थीं। वहां उन्होंने मोहन भागवत सहित आरएसएस के कई नेताओं से बातचीत की। नौसिखिया ईरानी को इस महत्त्वपूर्ण मंत्रालय का जिम्मा देने के पीछे लोगों का मानना है कि मोदी सरकार की यह मंशा है कि मंत्रालय को परोक्ष तौर पर मन-मर्जी (यानी आरएसएस के एजेंडे के अनुरूप) चलाया जा सके।

इधर समाचार आ रहे हैं कि गुजरात सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में दीनानाथ बत्रा की किताबें अनुवाद कर सहायक पुस्तकों के रूप में लगा दी हैं। इन किताबों में क्या है इस पर इधर विस्तार से प्रकाशित हो रहा है। विस्तार में न जाकर इतना कहा जा सकता है कि ये पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी और हिंदू धार्मिक मान्यताओं से भरी हैं जो अंधविश्वास, स्त्री-पुरुष असमानता, नस्लवाद का प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में समर्थन करती हैं। कुल मिलाकर ये हर तरह के भेदभाव और असहिष्णुता को बढ़ावा देती हैं।

बत्रा किस तरह के दुराग्रही हैं इसका सबसे अच्छा उदाहरण यह है कि वह हिंदी को एक ऐसी असहज और जड़ भाषा बना देना चाहते हैं कि वह दूसरी संस्कृत में बदल जाए। एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा बचाओ आंदोलन ने एनसीईआरटी की हिंदी पुस्तकों को लेकर एक पुस्तिका छापी है और उसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजा है। इसमें कई तरह की आपत्तियां हैं। पर भाषा को लेकर जो आपत्तियां हैं वे ज्यादा मजेदार हैं। वह अंग्रेजी शब्दों जैसे के वाइस चांसलर, वर्कर, बिजनेस, सेमिनार, फ्रॉक और थैंक्यू जैसे शब्दों के खिलाफ तो हैं ही वह उर्दू के भी कम खिलाफ नहीं हैं। वह नहीं चाहते कि हम मुश्किल, गुस्सा, शरारत, खबरदार, मोहल्ला और मौका जैसे शब्दों का प्रयोग करें।

एक और रिपोर्ट के अनुसार कई संस्थाओं ने उनके सुझावों को माना ही नहीं है बल्कि उन पर अमल भी शुरू कर दिया है। ये संस्थान हैं जालंधर की पंजाब टैक्निकल यूनिवर्सिटी जहां वैदिक गणित जैसे विषय पढ़ाए जाने लगे हैं। यह काम वैसे एनडीए-एक के दौरान भी हुआ था जब तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने वैदिक गणित के अलावा फलित ज्योतिष भी पढ़ाना शुरू कर दिया था।

यह कहने का कोई अर्थ नहीं है कि इसका तत्काल और हर हालत में विरोध किया जाना चाहिए पर इससे भी बड़ी बात यह है कि उन प्रगतिशील ताकतों को जो वस्तुनिष्ठता, तार्किकता और वैज्ञानिकता में विश्वास रखती हैं उन्हें इस संगठनों से सीखना चाहिए कि किस तरह से उन बातों का विरोध किया जाए जिनसे हम सहमत नहीं हैं और कैसे उन बातों को जनता तक पहुंचाया जाए। ऐसा लगता है जैसे वाम झुकाव वाले बुद्धिजीवियों ने तुलनात्मक रूप से उदार कांग्रेसी और उसके नेतृत्ववाली सरकारों की सत्ता से जुड़कर अपने स्तर की हर तरह की पहल और सक्रियता खो दी है। हम जिस दौर में प्रवेश कर चुके हैं उसके रहते ऐसा नहीं लगता कि अब वह समय लौट पाएगा जब कि प्रगतिशील चिंतक, इतिहासकार, समाजविज्ञानी और रचनाकार पहली जैसी सुरक्षा और सुविधाओं के साथ अपने काम और विचारों को आगे बढ़ा सकेंगे। इसलिए जरूरी है कि प्रगतिशील ताकतें जल्दी से जल्दी अपने मंच बनाएं और उनके माध्यम से अपने कामों को आगे बढ़ाएं। इससे भी बड़ी बात यह है कि हमें अपनी बातों को जनता के सामने ले जाने के रास्ते भी खोजने होंगे।

जैसा कि हमने शुरू में कहा था, बिंदुओं के पीछे जिस तरह की मंशा होगी, जैसी परिकल्पना या सपना होगा, वैसा ही अंतत: चित्र बनेगा। स्पष्ट है कि जो चित्र उभर रहा है वह डरावना है। इसके खतरों का अनुमान कोई बहुत कठिन भी नहीं है। सब कुछ अपने बर्बर रूप में सामने आ रहा है।

यह समय चुप बैठने का नहीं है।

गति और दुर्गति

गोली-गाड़ी से छुकछुक गाड़ी तक लेखक- पंकज बिष्ट पश्चिम के उन कई देशों ने जिन्होंने बुलट ट्रेनों की दिशा में सबसे पहले काम करना शुरू किया था, जैसे की फ्रांस, ने तीव्रगति ट्रेनों का विस्तार करने पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया है। इसके कई कारण हैं। जैसे कि 300 किमी से अधिक की गति [Read the Rest...]

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हासिये की आवाज लेखक-आनंद तेलतुम्बड़े नरेंद्र दामोदरदास मोदी 26 मई 2014 को तब भारतीय लोकतंत्र की असाधारण क्षमता के प्रतीक बने, जब उन्होंने दिखाया कि कैसे एक मामूली पृष्ठभूमि से आने वाला साधारण-सा आदमी एक ऊंचे उठते देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। हालांकि उन्हें इस ऊंचाई पर उठाने की पूरी कवायद दुनिया की ऐसी [Read the Rest...]

गैस की गर्मी सत्ता का जोश

एक संवाददाता देश की सबसे ताकतवर कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल), जिसे भारत में सरकार से भी ज्यादा ताकतवर समझा जाता है, प्राकृतिक गैस की कीमतों के मामले में वह जैसा चाह रही है फिलहाल वैसा हो नहीं हो पा रहा है। दरअसल, गैस की कीमतों का मुद्दा आम चुनाव के पहले से ही भारतीय [Read the Rest...]

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लेखक-विजय प्रसाद इसराइली और हमास के बीच आठ जुलाई से चल रहे संघर्ष में इस अंक के प्रेस जाने तक 12 सौ के करीब फिलिस्तीनी मारे जा चुके थे। इसकी तुलना में इसराइलियों को बहुत कम जान-माल की हानि हुई थी। सच यह हैकि इसराइली हमले ने गजा में घिरे लोगों के लिए निकलने का [Read the Rest...]

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