खराब कविता बनाम बड़ा सरोकार: एक टिप्पणी
जर्मन कथाकार, कवि, मूर्तिकार और लेखक गुंटर ग्रास की कविता ‘जो कहा जाना चाहिए’ मात्र लेखक की सामाजिक भूमिका के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी नहीं है बल्कि लेखकों, रचनाकारों और कलाकारों को एक आह्वान भी है कि जब चीजें सर से गुजर जाएं तो चुप नहीं रहना चाहिए। यह कविता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि गुंटर ग्रास 84 वर्ष के हैं और वह मानव सभ्यता का भीषणतम युद्ध और उससे हुई बर्बादी देख चुके हैं। वह समकालीन योरोपीय ही नहीं बल्कि दुनिया के शीर्षस्थ लेखकों में हैं।
दूसरे महायुद्ध के दौरान उन्हें जबरन भर्ती के तहत हिटलर की सेना में सहायक के रूप में काम करना पड़ा था। इस तथ्य को वह एक अर्से तक छिपाए रहे। कुछ वर्ष पहले प्रकाशित अपनी जीवनी पीलिंग द अॅनयन (प्याज के छिलके) में पहली बार उन्होंने इसका खुलासा किया और इसको लेकर खासा हंगामा भी खड़ा किया गया, विशेष कर यहूदी लॉबी ने जो योरोप और खास कर अमेरिका में बहुत सक्रिय और प्रभावशाली है। यहां तक मांग की गई कि उनको दिए नोबेल पुरस्कार को वापस ले लिया जाए। तर्क दिया गया कि यह तो ठीक है कि उन दिनों जर्मन सेना में जबरन भर्ती होती थी पर ग्रास ने इस तथ्य को छह दशक तक क्यों छिपाये रखा।
पर यह महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि अगर वह चाहते तो कम से कम उनके जीवनकाल में यह किसी को पता नहीं चलता। लेकिन उन्होंने अंतत: यह बतला ही दिया। यहां उनका चुप रहना महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह मान लेना महत्त्वपूर्ण है कि वह हिटलर की सेना एसएस में काम करते थे। इस संदर्भ में यह नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद के दौरान जर्मन में जो हुआ उसे लेकर पूरा जर्मन समाज भयावह अपराध बोध से त्रस्त रहा है और आज भी है। यह असंभव नहीं कि वही अपराधबोध और शर्म निजी तौर पर लेखक को परेशान करते रहे होंगे। याद किया जा सकता है कि उनके लेखन को जर्मनी के उस कला आंदोलन का हिस्सा माना जाता है जिसे मोटे तौर पर ‘विगत से तालमेल बैठाना’ के रूप में जाना जाता है। यह तालमेल क्या उस अपराध बोध से मुक्त होने की कोशिश के अलावा भी कुछ है? उनके उपन्यास टिन ड्रम, कैट एंड माउस और डॉग इयर, जो दानजिग ट्रिलॉजी कहलाते हैं, नात्सीवाद के उदय और युद्ध के अनुभवों की अभिव्यक्ति हैं। ये दानजिग शहर की मिश्रित जनसंख्या और विशिष्ट संस्कृति की पृष्ठभूमि पर लिखे गए हैं। दानजिग अब पोलैंड में है और गंदास्क कहलाता है। सन 1945 में ग्रास का परिवार शरणार्थी के तौर पर जर्मनी आया और पश्चिम जर्मन में बस गया।
गुंटर ग्रास का क्या महत्त्व है वह इसी बात से समझा जा सकता है कि उनकी एक कविता मात्र ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोहराम मचा दिया है। यही नहीं कि गुंटर ग्रास जर्मनी के सबसे बड़े जीवित लेखकों में हैं बल्कि उन्हें जर्मन का ‘कांसेंशकीपर’भी माना जाता है। यानी उनका हर मामले में स्टैंड नैतिक होता है, जो औरों को प्रेरणा देता है। सन 1989-90 के दौरान उन्होंने जर्मनी के एकीकरण का विरोध किया था। उनका मानना था कि एकीकृत हो जाने के बाद जर्मनी अनावश्यक रूप से आक्रामक तेवर अपनाने लगेगा। (फिर वही अपराधबोध?) वह देश की उदार समाजवादी राजनीति से जुड़े रहे हैं।
पर इसका दूसरा पक्ष भी है, जो कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। वह है,इजरायल की आक्रामकता, विशेष कर उसके द्वारा किया जा रहा फिलिस्तीनियों का दमन, उसका विस्तारवाद और पश्चिमी देशों द्वारा उसे लगातार शस्त्रों से लैस किया जाना। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि इजरायल के पास नाभिकीय बम हैं और उसकी जो प्रवृत्ति रही है उसके चलते यह असंभव नहीं है कि वह उनका प्रयोग करने में न झिझके। मात्र ग्रास ही इस बात को नहीं समझ रहे हैं बल्कि इस को लेकर पूरे योरोप में बेचैनी है और इजरायल को लेकर अपने शासकों से असहमति का माहौल भी है। इसलिए ग्रास की यह कविता ‘वास गेजाख्त वेर्डेन मुस’ 4 अप्रैल को मात्र जर्मन दैनिक सुदएत्शे ज़ायतुंग में ही नहीं बल्कि योरोप की विभिन्न भाषाओं के कई अखबारों में एक साथ छपी।
यह सही है कि फासीवाद के दौरान अकेले जर्मनी में 60 लाख यहूदियों को मारा गया था, जो आज भी जर्मनी के गहरे अपराधबोध का कारण बना हुआ है। देश में जियोनवाद विरोधी (यहूदी विरोधी) होना दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से खराब गाली और अपराध माना जाता रहा है। इस दबाव के चलते वहां का कोई भी राजनीतिक दल इजरायल के विरुद्ध बोलने की हिम्मत नहीं करता। इसके अलावा चूंकि अमेरिका की ताकतवर यहूदी लॉबी सरकार की विदेश नीतियों को प्रभावित करती है इसलिए भी जर्मनी या कोई और योरोपीय देश पश्चिम एशिया में इजरायल जो कर रहा है उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाता।
इसलिए जैसा कि होना था इजरायली प्रधानमंत्री ने तत्काल ग्रास पर आरोप लगाया कि वह यहूदी विरोधी हैं और उनका संबंध नाजी सेना से रहा है। इतना ही नहीं इजरायल ने ग्रास को अवांछित व्यक्ति (पर्सोना नॉन ग्राटा) घोषित कर उनके अपने देश में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यहां तक कि पश्चिमी मीडिया ने भी ग्रास पर हमला किया। पर वह इससे विचलित नहीं हैं। उल्टा यह सब इजरायल की असहिष्णुता और आक्रामकता को ही दर्शाता है। इजरायल हर बार अपने अस्तित्व के सवाल को तो उठाता है पर वह कभी दूसरों के अस्तित्व के सवाल का सम्मान करने को तैयार नहीं है। पिछले सात दशकों का इतिहास यह है कि वह लगातार आक्रामक रहा है और उसने पड़ोसी देशों पर हमले किए हैं।
इसलिए ग्रास ने जो कविता लिखी है वह बहुत सोच-समझ कर लिखी है और ऐसा भी नहीं है कि वह इसके खतरे से अनभिज्ञ थे। स्वयं कविता की एक पंक्ति में उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि सच कहने पर उन्हें तत्काल यहूदी विरोधी कहा जाएगा।
ऐसा भी नहीं है कि दुनिया इजरायल के कारनामों से परिचित न हो है पर योरोपीय सरकारें लगातार इसे अनदेखा करती रही हैं। असल में जो पाप योरोप ने यहूदियों के साथ किया, उसके बदले में योरोपीय राष्ट्र इजरायलियों के हाथों फिलिस्तीनों की बलि चढ़वा रहे हैं। पिछली एक सदी से पश्चिमी एशिया में लगातार उथल-पुथल है जिसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार पश्चिमी खेमा है। सच यह है कि इजरायल अमेरिकी साम्राज्यवाद और विश्व के पूंजीवाद की पश्चिमी एशिया में चौकी है और वह उनके हितों की देखभाल करता है।
ईरान पर हमले के लिए इजरायल लगातार ‘एजेंट प्रोवोकेटियर’ (भड़कानेवाले) का काम कर रहा है। यह निश्चित लग रहा है कि अगर ईरान पर हमला हुआ तो उसमें इजरायल बड़ी भूमिका निभाएगा। अमेरिका ईरान पर हमले का बहाना ढूंढ रहा है और यह उसके पश्चिम एशिया पर नियंत्रण के वृहत्तर मंसूबों का ही हिस्सा है, जो कुल मिला कर वहां के प्राकृतिक संसाधनों यानी तेल के लिए है। बल्कि लगता है अगर ईरान पर हमला होता है तो वह इजरायल के बहाने ही होगा। यह हमला इराक, लेबनान, अफगानिस्तान आदि देशों के मुकाबले कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकता है। इसमें परमाणु हथियारों का दो तरफा इस्तेमाल होने की पूरी संभावना है। ईरान में इस समय जो शासक हैं वे स्वयं इतने आततायी हैं कि जनता उनके कारनामों से पहले से ही त्रस्त है। यह युद्ध ईरानी शासकों को कितना नुकसान पहुंचाएगा, कहा नहीं जा सकता पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इसका सारा नुकसान वहां की मासूम जनता को तो भोगना ही होगा आसपास के देशों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।
ऐसे में ग्रास की चिंता मुख्यत: शांति को लेकर है। वह योरोपीय देशों द्वारा इजरायल को हथियार देकर उसकी मानवविरोधी गतिविधियों में शामिल होने से भी सहमत नहीं हैं। वह नहीं चाहते कि उनका देश इजरायल को ऐसी घातक पनडुब्बियां दे जो किसी भी तरह के हथियार ले जा सकती हैं और उनसे मार कर सकती हैं। यह चिंता एक मानवीय चिंता है और एक बड़े लेखक की मानव समाज के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। दुनिया के लोगों के विरोध और असहमति के प्रति इजरायल का जो रवैया है वह बतलाता है कि यह देश कभी भी किसी की परवाह नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय जनमत को ठेंगे पर रख कर इजरायली सरकार ने जिस तरह से उसके घेरे में भूखे मर रहे फिलिस्तीनियों के लिए ले जाई जा रही सहायता सामग्री के जहाजी बेड़े पर हमला किया और जिस तरह से इसी महीने के मध्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए इजरायल आनेवाले प्रदर्शनकारियों को रोका, वे बतलाते हैं कि इस देश का तौर-तरीका कितना अलोकतांत्रिक और अमानवीय है।
‘जो कहा जाना चाहिए’ शीर्षक यह कविता एक लेखक के सामाजिक सरोकारों और प्रतिबद्धता बनाम रूप और सौंदर्य को लेकर भी कुछ बातें कहती है। जर्मनी में इजरायल के राजदूत ने ग्रास पर आक्रमण करते हुए कहा था कि यह कविता नहीं बल्कि प्रचार है। इसमें शक भी नहीं है। पर सवाल यह है कि जब आदमी मारे जा रहे हों और दुनिया युद्ध के कगार पर हो, उसका पूरा भविष्य ही खतरे में हो, कलात्मकता का क्या औचित्य रह जाता है! असली बात यह है कि कविता जो कहना चाहती थी उसने वह कह दिया है। यह कविता अपने काव्य सौंदर्य के कारण नहीं बल्कि अपने सरोकारों के लिए याद की जाएगी।
जो कहा जाना चाहिए : गुंटर ग्रास
चुप हूं क्यों मैं, छुपाये बहुत समय से,
स्पष्ट है और अनुरूपित
अभ्यासों में जो,अंत में जिसके हम जो बच पाएंगे
बहुत हुआ तो पाद टिप्पणी रह जाएंगे।
वार करने का वह कथित अधिकार पहला
मिटा देगा धरती से अस्तित्व जो ईरानी जनता का
- राज करता है उन पर एक बड़बोला और
निर्देश है उन्हें मिलकर विजय मनाने का -
क्यों कि, माना जा सकता है
परमाणु बम बनाने से जुड़ा है अवसर यह।
खिन्न हूं कि रोके क्यों हूं स्वयं को
नाम लेने से दूसरे देश का,
जहां वर्षों से – गोकि छिपी है – विकसित होती आणविक क्षमता,
पर बिना किसी नियंत्रण के , क्योंकि परे है यह किसी भी जांच से?
एक सर्वव्याप्त चुप्पी इस पर, जिसमें मेरी चुप्पी भी हाथ बांधे खड़ी है,
वह झूठ और बेजा दबाव की तरह सीने पर महसूस होती हैऔर/ जिससे जुड़ा है दंड
जो जल्दी ही मिलेगा अगर यह न माना गया तो;
फैसला तैयार है ”यहूदीविरोधी” का।
पर अब चूंकि मेरा देश
अपने ही तरह के विशिष्ट अपराधों का सानी नहीं है जिनका /
सामना कर रहा है
और किया जा रहा है जिनके लिए जवाब-तलब बार-बार उससे,
एक सामान्य-सी बात की तरह बस तैयार है, बनिये -सा मेरा देश बेचने को
इजरायल को एक और पनडुब्बी, विशेषता है जिसकी
हर तरह के संहारक हथियारों को चलाने की,
यद्यपि दबी जबान से कहता है प्रायश्चित के तौर पर,
सिद्ध नहीं है वहां एक भी परमाणु बम का अस्तित्व ,
”सिद्ध” है सिर्फ डर की ताकत से,
मैं कह रहा हूं वह जो कहा जाना चाहिए हर हाल में ।
पर क्यों रहा चुप अब तक ?
क्योंकि मानता था जहां से हूं मैं,
उस पर धब्बा है ऐसा मिटेगा नहीं कभी दाग जिसका,
रोका था दो टूक बात करने से मुझे उस इजरायल पर
जिससे जुड़ा हूं और जुड़ा रहना चाहता हूं, पर इस बेबाकी से /
कहे कड़ुवे तथ्य के साथ।
मैं अब क्यों बोल रहा हूं, इस उम्र में जब मेरे हिस्से में थोड़ी-सी/
स्याही बची है :
खतरा है अणुशक्ति सन्नद्ध इजरायल विश्व शांति के लिए ,
शांति जो सदा से ही खतरे में रही है?
लेकिन यह हर हाल में कह दिया जाना चाहिए,
कल तो हो जाएगी बहुत देर ;
इसलिए भी कि हम – जर्मनवासी पहले ही कई बोझों से दबे हैं-
बन जाएंगे एक और अपराध के सहभागी,आ रहा है नजर ,
और क्यों कि स्पष्ट है अपराध की इस हमारी/
भागीदारी को
नहीं किया जा सकेगा कम चालताऊ बचावों से।
मैं खुल कर कहता हूं: अब नहीं रहूंगा चुप,
थक चुका हूं पश्चिम के पाखंड से;
पर उम्मीद है,
अनगिनत लोग स्वयं को खामोशी के बंधन से मुक्त करेंगे,
मांग करेंगे नजर आ रहे इस खतरे के जनकों से
हर तरह की हिंसा का त्याग और साथ ही आग्रह करेंगे कि
इजरायली परमाणु क्षमता और ईरानी परमाणु संस्थानों पर
अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा बेरोक-टोक और स्थायी नियंत्रण की/ इजाजत दोनों देशों की सरकारें दें।
सिर्फ यही रास्ता है कि हर कोई , इजरायली या फिलिस्तीनी,
यहां तक कि सब मानव प्राणी, जो पागलपन से
ग्रस्त इस क्षेत्र में एक-दूसरे के आसपास दुश्मन की तरह रहते हैं/की
मदद की जा सकेगी – यानी हम सब की।
अनु: समयांतर
Guardian में 4 अप्रैल को प्रकाशित। यह अनुवाद साभार द गार्डियन में प्रकाशित नॉर्बर्ट जोस्त के अंग्रेजी अनुवाद से किया गया है।
इसी कविता को देखिये भी…..
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