अरुण प्रकाश [22 फरवरी, 1948 - 18 जून, 2012 ]
अरुण प्रकाश का जन्म बेगूसराय जिले के निपनियां गांव में हुआ। उनके पिता रुद्र नारायण झा प्रसिद्ध समाजवादी नेता थे और सांसद चुने गए थे।
कहने को अरुण प्रकाश सांसद पिता के पुत्र थे, लेकिन उनका बचपन अभाव में बीता। जब वह सात साल के थे उनकी शिक्षिका मां गुजर गईं। जब किशोरावस्था में पहुंचे तभी राजनीतिक ईष्र्या के कारण उनके पिता को कार से कुचलकर मार डाला गया। बाईस वर्ष की अवस्था में उन पर छोटे भाइयों सहित पूरे परिवार का बोझ आ गया था।
तमाम जद्दोजहद के साथ एक संघर्ष भरी जिंदगी जीते हुए अरुण प्रकाश ने लगातार लिखा। जैसी जिंदगी चाही वैसी बनाई। जमी जमाई सरकारी नौकरी छोड़ पत्रकारिता में आए। पहले दैनिक जागरण फिर राष्ट्रीय सहारा और कई पत्र-पत्रिकाओं से होते हुए वर्षों फ्रीलांसिंग की। फिर साहित्य अकादेमी की पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य में आए तो वहां भी अपनी छाप छोड़ी। अब एक तरह से उनकी इत्मीनान से लिखने की उम्र और स्थिति बनी थी। इधर लगातार लिखने में सक्रिय भी थे। विद्यापति के जीवन पर पूर्व-राग उपन्यास और कई नए विषय उठा रहे थे। गद्य-आलोचना में अछूते विषयों-क्षेत्रों पर खूब सक्रिय थे कि सांस की पुरानी बीमारी धीरे-धीरे गंभीर हो गई। अंतिम चार-पांच साल गंभीर रूप से बीमार रहे और अक्सर अस्पताल में दाखिल होते रहे।
अरुण प्रकाश गहरे अर्थों में भारतीय लोक-मानस के चितेरे कथाकार हैं। उनकी कहानियों में विषयों की जितनी विविधता है उतनी अन्यत्र दुर्लभ है। इस बाबत उनका मानना था कि जहां एक तरफ हमारे समाज में विविधता प्रचुर है, वहीं उनकी समस्याओं का कोई अंत नहीं इसलिए लेखक को चाहिए कि दुहराव से बचते हुए अधिकाधिक जनता की अधिकाधिक चिंताओं को रचना में प्रभावी ढंग से उठाए। इस प्रसंग में वे भीष्म जी को आदर्श मानते थे। उनकी तरह ही अरुण प्रकाश ने न केवल नए-नए विषयों को छुआ बल्कि बार-बार शिल्प को भी तोड़ा-तराशा। ‘बेला एक्का लौट रही हैं’, ‘भैया एक्सप्रेस’, ‘जल-प्रांतर’, ‘तुम्हारा सपना नहीं’, ‘विषम राग’, ‘हिचक’, ‘आखिरी रात का दु:ख’, ‘गज पुराण’ आदि हर एक से दूसरी कहानी के बीच विषय से भूगोल तक का जो बदलाव उन्होंने संभव किया है, ऐसा हिंदी कहानी में पिछले चार दशकों में शायद ही कहीं और मिले।
अरुण प्रकाश ने कविताएं और व्यंग्य भी लिखे। रक्त के बारे में कविता-संग्रह 1978 में छपा था। कोंपल कथा उनका चर्चित उपन्यास है। विद्यापति पर पूर्व राग उपन्यास अपूर्ण रह गया। सात कहानी-संग्रहों और आठ अनूदित पुस्तकों के बाद वह आलोचना की तरफ मुड़े भी तो पूरी तैयारी से और ऐसा विषय लेकर जिस पर हिंदी में सबसे कम काम हुआ है। कथेतर गद्यों की आलोचना के बहाने उन्होंने फार्म और जेनर को लेकर गद्य की पहचान जैसी पुस्तक हिंदी को दी, जो इसी वर्ष छपी है। अभी उनकी दो और आलोचना पुस्तकें आनी हैं। असंकलित कहानियों-व्यंग्यों-लेखों की भी लगभग चार-पांच और किताबें बनेंगी।
- गौरीनाथ
मेहदी हसन [18 जुलाई 1927- 13 जून 2012]
मेहदी हसन का जाना संगीत की दुनिया से एक ऐसे सितारे का जाना है जो सदियों में एक बार पैदा होता है। जैसा कि लता मंगेशकर ने कहा कि उनकी आवाज में भगवान का वास था। मेहदी हसन ऐसे कलाकार थे जिनकी गजलों के प्रति न केवल भारतीयों और पाकिस्तानियों में अपितु सभी मुल्कों में, यहां तक कि उर्दू न बोलने व समझने वालों में भी एक जैसा जुनून और प्रेम है। उनकी आवाज सरहदों के बंधन को तोड़ते हुए दुनिया भर के संगीत व गजल प्रेमियों के दिलों तक ही नहीं पहुंची बल्कि अपनी अमिट छाप छोड़ गई है। उन्होंने भारत की कई पीढिय़ों के गजल गायकों को प्रेरित किया। मेहदी हसन का निधन कराची के आगा खां अस्पताल में हुआ। वह लंबे समय से बीमार थे।
मेहदी हसन का जन्म राजस्थान के झुंझनू जिले के लूणा गांव में हुआ था। उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा इस्माइल खान ध्रुपद गायक थे। उन्हें दोनों से संगीत की तालीम मिली। भारत विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। वह समय उनके और उनके परिवार के लिए बहुत ही मुफलिसी का था। उन्होंने साइकिल की दुकान पर काम किया और बाद में मोटर मैकेनिक का काम किया। लेकिन संगीत और वह एक दूसरे के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि दोनों का संबंध संघर्ष के इस दौर में भी अटूट रहा। जल्दी ही उनके संगीत के इस हुनर की ओर लोगों का ध्यान गया। सन 1952 में उन्होंने रेडियो पाकिस्तान पर गाया और इसके बाद कभी मुड़कर नहीं देखा। रेडियो पाकिस्तान के लिए वह पांच दशकों तक अप्रतिम फनकार बने रहे। उनकी गजलों, ठुमरी और फिल्मी गीतों ने लोगों के दिलों पर राज किया। पचास साल की अपनी गायकी में शहंशाह-ए-गजल ने 25 हजार से अधिक गाने और गजलें गाईं।
कहा जाता है कि मेहदी हसन ने संगीत की अपनी पहली पेशकश बड़ौदा के महाराजा के दरबार में उस समय प्रस्तुत की थी जब वह मात्र आठ साल के थे। मेहदी हसन साहब कलावंत घराने की 16वीं पीढ़ी के नुमाइंदे थे। उनकी गायकी की शुरुआत ध्रुपद और ठुमरी से हुई और बाद में गजल की दुनिया के बेताज बादशाह बने। उन्होंने गाने के लिए कभी भी बहुत सारे साजों का इस्तेमाल नहीं किया। वह मात्र एक हारमोनियम और तबले पर गाते थे। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत भारत के विभाजन से पहले से है और यह इस उपमहाद्वीप की आत्मा से निकलता है। इसी साझे अतीत से मेहदी हसन का नाता था। उनकी आवाज, गायकी का उनका अंदाज, उनका संगीत सब कुछ ऐसा था, जो सीधे दिलों की गहराइयों तक उतरता है। उनके बारे में कहा जाता है कि जब शास्त्रीय, लोक और लोकप्रिय के बीच की रेखाएं धूमिल होकर संगीत का एक ऐसा रूप बनाती हैं, जो कि शुद्ध संगीत है, वही मेहदी हसन साहब का संगीत है। मेहदी हसन ने गजल गायकी की परंपरागत शैली में बदलाव किया और इसमें शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ राजस्थानी और पंजाबी लोक संगीत का मिश्रण करके गजल गायकी को एक नई शैली और ऊंचाई प्रदान की। अपनी गजल गायकी में रागों का उन्होंने बहुत ही सधे हुए तरीके से इस्तेमाल किया।
राजस्थान, फैला हुआ रेगिस्तान और उसका लोक संगीत उनके दिल में हमेशा बना रहा। पाकिस्तानी लेखक राजा रूमी ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए अपने लेख में लिखा- ”मेहदी हसन की असीमित महारत का दूसरा क्षेत्र था लोकशैली, विशेषकर ‘केसरिया बालम’ एक अमर राजस्थानी लोकगीत और पंजाबी का ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन’ दो ऐसी अद्वितीय कृतियां हैं समय के साथ जिनका आकर्षण समाप्त नहीं हो सकता।” मेहदी हसन का परिवार राजस्थान से था, बेशक उन्होंने पाकिस्तान को अपना घर बनाया, लेकिन राजस्थान सदैव उनके हृदय में रहा। और उन्होंने इसे कभी छिपाया भी नहीं। उनके संगीत सम्मेलनों में सदैव ‘केसरिया बालम’ रहा, जो कि राजस्थान के विशाल रेगिस्तान को एक ऐसा समर्पित गीत है जिसे काल और समय के बंधन में बांधा नहीं जा सकता। और उनकी आवाज, विशेषकर उनकी उत्कृष्ट गजल रंजिश ही सही… में सहरा में एक साथी के छूट जाने के अकेलेपन को दर्शाता है। वह जब भी हिंदुस्तान आए उस खोई हुई दोस्ती को ढूंढते रहे। वह शास्त्रीय संगीत के दिग्गज गायक पंडित मनिप्रसाद के बहुत अच्छे मित्र थे, जिनके शिष्य जितेंद्र सिंह जमवाल ने द हिंदू को बताया कि दोनों सदैव राजस्थानी में ही बात करते थे।
उनके बारे में कहा जाता है कि उनके संगीत, गायकी और अंदाज में ऐसा जादू था कि जिसको भी उन्होंने छुआ वह स्वर्णिम हो गया, चाहे वह उर्दू कविता हो या रोमांटिक फिल्मी गाने। साठ के दशक में मशहूर शायर फैज अहमद फैज की शायरी और मेहदी हसन साहब के बीच विशेष रिश्ता बना। फैज की कविता गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नो बहार चले को जब मेहदी हसन ने गाया तो इस गजल ने पूरे दक्षिण एशिया में धूम मचा दी। इसके अलावा हाफिज होशियारपुरी की रचना मोहब्बत करने वाले कम न होंगे… और रजी तिरमिजी की भूली बिसरी चंद उम्मीदें… मेहदी साहब के संगीत, अंदाज और गायकी की अद्भुत मिसाल हैं। उनकी गजल गायकी की बात हो तो उनकी गायी रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, आ फिर मुझे छोड़ के जाने के लिए आ…(अहमद फराज की रचना) गजल का जिक्र न हो, ऐसा हो नहीं सकता। यह इतनी प्रसिद्ध हुई कि इसने पीढिय़ों की सारी दीवारें ढहा दीं। इसके अलावा मीर तकी मीर की- पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है…; कतील शिफई की – जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर के भी मेरी जान तुझे चाहूंगा…; अहमद फराज की अब के हम बिछड़े…, ये सभी मेहदी हसन की गजल गायकी के बेमिसाल उदाहरण हैं और इनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है।
मेहदी हसन भारतीय उपमहाद्वीप की साझा संस्कृति की एक ऐसी अप्रतिम मिसाल थे जिनका संगीत, गाने और गजलें भारत-पाकिस्तान के रंजिश भरे माहौल में भी एक उम्मीद और प्रेम की तरह आती हैं। कहते हैं कि कलाकार का कोई देश और मजहब नहीं होता, मानवता और उसकी भलाई ही उसका सब कुछ होता है। मेहदी हसन की कला भी उस मानव प्रेम को समर्पित थी जो हिंसा, रंजिश और नफरत के बजाय प्रेम के सागर और रेगिस्तान में खो जाना चाहता है।
- कृष्ण सिंह
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