जवरीमल्ल पारख
(1 फरवरी, 1917 -26 अगस्त, 2012)
अवतार किशन हंगल (हिंदी सिनेमा के दर्शक ए. के. हंगल के नाम से जानते हैं, ) अपनी उम्र के 95 साल पूरे कर चुके थे। कुछ सालों से उन का फिल्मों में काम करना बंद हो चुका था, लेकिन लगभग 225 फिल्मों में उन्होंने छोटी-मोटी इतनी भूमिकाएं की थीं कि दर्शकों को कभी एहसास नहीं हुआ कि वह फिल्मों से अलविदा हो चुके हैं। वह अपनी फिल्मों के द्वारा दर्शकों के बीच सदैव मौजूद थे और उनके द्वारा की गयी छोटी से छोटी भूमिका को भूल पाना असंभव था। मुझे गोविंद निहलानी की फिल्म तक्षक (1999) का वह आरंभिक दृश्य अब भी याद है जिसमे वह एक स्वतंत्रता सेनानी और रिटायर अध्यापक की छोटी-सी भूमिका में थे। उन्हीं आदर्शों को याद करते हुए वे पथभ्रष्ट युवा सन्नी (राहुल बोस) को ललकारने का साहस करते हैं, तो उन्हें गोलीमार दी जाती है। गरीब या निम्नमध्यवर्गीय लेकिन आदर्शवादी और संघर्षशील चरित्र ही उन्होंने अधिक निभाये। फिल्म चाहे कितनी ही अयथार्थवादी क्यों न हो, उनका चरित्र तो वास्तविक और जीवंत होता था। शोले के अंधे रहीम चाचा की भूमिका इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। प्रतिशोध की इस हिंसा-बहुल कहानी में रहीम चाचा की करुणा से भरी आवाज हिंसा की व्यर्थता को उजागर करती थी। रहीम चाचा के चरित्र में न तो अनावश्यक नाटकीयता थी और न ही ऐसी ‘लाउडनैस’ जो इस फिल्म के सभी मुख्य चरित्रों में देखी जा सकती है। बावर्ची (1972) का क्लर्क, नमकहराम (1973) का मजदूर यूनियन नेता, अर्जुन (1985) का आदर्शवादी अध्यापक, चितचोर (1976) का मध्यवर्गीय पिता, परिचय (1972) का मामा और लगान (2001) का बुजुर्ग शंभुका का इसी तरह की बहुत-सी भूमिकाओं ने उन्हें दर्शकों के बीच एक खास तरह की पहचान दी थी। फिल्मों में संवेदनशील और आदर्शवादी पिता, चाचा, मामा, दादा, अध्यापक, मजदूर, घरेलू नौकर, क्लर्क की भूमिकाओं के लिए उनको बार-बार याद किया जाना इस बात को आश्वस्त करता था कि हिंदी का लोकप्रिय सिनेमा अपनी सारी कमजोरियों के बावजूद कुछ हद तक यथार्थ से अपने को जोड़े हुए था। अभी सात साल पहले तक वह फिल्मों में काम करते रहे। शाहरुख खान की फिल्म पहेली (2005) उनकी आखिरी फिल्म थी। इधर हाल में वह धारावाहिक ‘मधुबाला: एक इश्क, एक जुनून’ के एक दृश्य में कैमरे के सामने आये थे।
ए. के. हंगल का जन्म पंजाब के सियालकोट में एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। स्याल कोट से उनका परिवार कराची आ गया था। किशोर वय में ही वे आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये थे। 1947 में उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और 1949 तक वह जेल में बंद रहे थे। जेल से छूटने के बाद वह बंबई (अब मुंबई) आ गये। उस समय उनकी जेब में सिर्फ 20 रुपये थे। जीवनयापन के लिए उन्होंने दर्जी का काम भी किया था। राजनीतिक गतिविधियों ने उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी से जोड़ा, तो नाटक और रंगमंच ने इप्टा से। इन दोनों से वह जीवनपर्यंत जुड़े रहे। मृत्यु के समय भी वे इप्टा के अध्यक्ष थे और इसी वर्ष उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की अपनी सदस्यता का नवीकरण करवाया था।
मुंबई में वह नाटकों में लगभग दो दशकों तक सक्रिय रहे। उस समय इप्टा से ख्वाजा अहमद अब्बास, बलराज साहनी, कैफी आजमी आदि कई लेखक और कलाकार जुड़े हुए थे जो फिल्मों में भी उतने ही सक्रिय थे। लेकिन ए. के. हंगल 1966 तक नाटक ही करते रहे। रंगमंच के कुशल और प्रतिष्ठित अभिनेता के रूप में वह जाने जाते थे। पहली बार उन्हें फिल्म में काम करने का अवसर शैलेंद्र की तीसरी कसम (1966) में मिला था जिसमें उन्होंने राजकपूर के बड़े भाई की भूमिका निभायी थी। उस समय उनकी उम्र पचास वर्ष थी। उसी समय उन्होंने हास्य फिल्म शागिर्द में भी काम किया था। ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म बंबई रात की बाहों में (1967) भी उनकी शुरुआती फिल्म थी। इसकेबाद तो फिल्मों में काम करने का सिलसिला चल पड़ा और वह लगातार चार दशकों तक फिल्मों में अभिनय करते रहे।
फिल्मों में काम करते हुए भी ग्लैमर की उस दुनिया में वह अपने को एक ‘आउट साइडर’ की तरह ही देखते थे। हालांकि वह प्राय: विवादों से दूर ही रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी भी कम्युनिस्ट पार्टी या इप्टा के साथ अपने जुड़ाव को नहीं छिपाया। उनकी लंबे अर्से से इच्छा थी कि वह एक बार पाकिस्तान की यात्रा कर अपने जन्म स्थान स्यालकोट की यात्रा करें। 1993 में मुंबई में पाकिस्तान के कौंसूल जनरल के कार्यालय में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्हें आमंत्रित किया गया। वे हमेशा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच दोस्ती औरअमन के पक्षधर रहे थे और इसी भावना ने उन्हें उस अवसर पर वहां जाने के लिए प्रेरित किया था। लेकिन शिवसेना, उसके नेता बाल ठाकरे और दूसरे सांप्रदायिक तत्वों को यह कैसे सहन हो सकता था। हंगल साहब की सार्वजनिक निंदा की गयी, उन्हें देशद्रोही तक कहा गया और उनके बहिष्कार का आह्वान किया गया। एक ऐसे अभिनेता को जो खुद विभाजन की पीड़ा झेल चुका था, उसे पाकिस्तानी कहकर अपमानित किया गया। बहिष्कार के कारण लगभग दो साल तक उन्हें किसी भी फिल्म में काम नहीं मिला। लेकिन वह इन सांप्रदायिक ताकतों के सामने झुके नहीं। यह बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने और मुंबई सहित कई शहरों में मुस्लिम विरोधी दंगों का दौर था। शिवसेना की इन सब में सक्रिय भूमिका थी। मुंबई का फिल्मी संसार भी इन सांप्रदायिक ताकतों के गहरे दबाव में था। ए. के. हंगल इसी का शिकार बने थे।
अपने जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों को लेकर उन्होंने अपनी आत्मकथा लाइफ एंड टाइम्स ऑफ ए. के. हंगल (1999) भी लिखी थी। छोटी-बड़ी चरित्र भूमिकाएं निभाते रहने ने उन्हें व्यापक पहचान ही नहीं दी बल्कि लोकप्रियता भी दिलवाई। उन्हें पुरस्कार भी मिले और सम्मान भी। 2006 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। लेकिन इन सबने उन्हें ऐसी संपन्नता नहीं दी कि अपना बुढ़ापा वह सकून से गुजार सकें। सिनेमा की दुनिया में काम करने वाले कलाकारों के पारिश्रमिक में इतना अधिक अंतर होता है कि नायक की भूमिका निभानेवाले बड़े सितारों और छोटी-बड़ी चरित्र भूमिकाएं निभानेवाले कलाकारों के पारिश्रमिक की तुलना ही नहीं की जा सकती। यही वजह है कि कुछ साल पहले जब वह बीमार पड़े तो उनके पुत्र विजय को आर्थिक मदद की गुहार लगानी पड़ी। पारिश्रमिक का यह अंतर फिल्मी कलाकारों के व्यवहार में भी दिखायी देता है। यही कारण है कि राजेश खन्ना की अंतिम यात्रा के समय पूरी फिल्मी दुनिया उमड़ पड़ती है लेकिन ए. के. हंगल को अंतिम विदाई देने के लिए किसी भी बड़े अभिनेता और निर्माता निर्देशक के पास समय नहीं था।
ए. के. हंगल जैसे अभिनेता इस बात का विश्वास पैदा करते हैं कि फिल्मों की व्यावसायिक दुनिया में भी अपने आदर्शों और विचारों से समझौता किये बिना सम्मान के साथ काम किया जा सकता है।
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