भारत का अंधेरा
लाल खान [भारत में बिजली ग्रिड फेल होने के बाद यह लेख दस अगस्त 2012 को लिखा गया। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट के परिदृश्य में यह भारत की नवीनतम स्थितियों का मार्क्सवादी दृष्टिकोण से बहुत ही जीवंत विश्लेषण करता है। ] बिजली ग्रिड फेल ने, जिसने लगभग आधे भारत को अंधेरे में डूबो दिया और जनजीवन [Read the Rest...]
ऊंची विकास दर का मिथक
चंद्रभूषण किसी युद्ध का बुनियादी विभ्रम जब अपना जलवा खो दे तो उस युद्ध को समाप्त मान लिया जाना चाहिए – आर्थर मिलर (1915-2005), प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार, डेथ ऑफ अ सेल्समैन के लेखक जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद राहुल गांधी ने अपने भाव विह्वल वक्तव्य [Read the Rest...]
पूंजी का संकट और समाजवादी प्रयोग
गोपाल प्रधान चर्चित हंगारी मार्क्सवादी चिंतक इस्तवान मेजारोस समाजवादी आक्रामकता के दौर की राजनीतिक कार्यवाही के लिहाज से कहते हैं कि ‘अर्थतंत्र की पुनर्संरचना‘ तक अपने आपको सीमित रखने की रणनीति पर दोबारा सोचना चाहिए और उसकी जगह वर्तमान संदर्भ में ‘राजनीति के क्रांतिकारी पुनर्गठन‘ के कार्यभार पर बल देना चाहिए। असल में राजनीति में [Read the Rest...]
क्या विकास पूरा हो चुका है?
लूई प्रोयेक्ट पूंजीवाद के संकट का सवाल विश्व के प्रमुख औद्योगिक राष्ट्रों के सम्मुख जिस तरह खड़ा है वैसा 1930 के दशक के बाद कभी नहीं हुआ था। जहां एक ओर बहुत से लोग मानते हैं कि मंदी की विकटता अपने चरम पर है, वहीं यह मानने वाली प्रवृत्ति भी चली आई है कि पूंजीवाद [Read the Rest...]
पूंजीवाद के अंतरविरोध और मौजूदा संकट
अरुण फरेरा हाल ही में लालच को लेकर दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया में लेखों की एक शृंखला प्रकाशित हुई। सप्ताह में दो दिन छपने वाले इन लेखों की परिणति आखिरकार दिसंबर, 2012 के मुंबई के साहित्योत्सव में हुई। इस तरह की विषय- वस्तु (थीम) के चुनाव की तार्किकता का कारण आयोजकों ने रजत गुप्ता और [Read the Rest...]
किताब के बहाने: अमेरिका में सराबोर भारत
गिरीश मिश्र पिछली सदी के आखिरी दो दशकों से नवउदारवाद की आंधी चल रही है। इसके साथ ही यह दावा जोर-शोर से किया जा रहा है कि देर-सबेर सारी दुनिया अमेरिकी रंग में सराबोर हो जाएगी। दूसरे शब्दों में विश्व के सब देशों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। यह दावा 12 अक्टूबर 1999 को पूर्व अमेरिकी [Read the Rest...]
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