विशेष : पुस्तकों पर केंद्रित छमाही आयोजन : परिच्छेद :समीक्षा ’ साक्षात्कार ’ लेख ’ कविता: जून, 2012
प्रेमपाल शर्मा
मेरी विज्ञान डायरी: पृष्ठ: 232, मूल्य : रु. 350, मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं: पृष्ठ: 244, मूल्य: रु. 325 रुपए दोनों के लेखक : देवेंद्र मेवाड़ी; आधार प्रकाशन
ISBN 978 – 81 – 7675 -341 – 82 , ISBN 978 – 81 – 7675 -380 – 1
देवेंद्र मेवाड़ी हिंदी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं जिन्होंने हिंदी में विज्ञान कथाओं और लेखन की कमी को पूरा करने की भरसक कोशिश की है। गुणाकर मुले, जयंत नर्लीकर मराठी हैं, तो सुबोध मेहंती बांग्लो भाषी। हिंदी क्षेत्र में दुर्भाग्य से न वैज्ञानिक चेतना बढ़ी, न वैज्ञानिक लेखन। देवेंद्र मेवाड़ी की हाल ही में आई दोनों किताबों से हिंदी समाज सबक लेकर आगे बढ़ सकता है।
विज्ञान क्या है? इसकी सबसे सरलतम व्याख्या यह भी है कि आसपास के जीवन की घटनाओं को देखते-परखते हुए सहज-सरल निष्कर्षों की तरफ बढऩा। इसे जीवन के सबक भी कहा जा सकता है। इन्हीं सब निष्कर्षों के बूते न्यूटन गिरते सेब की घटना से गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की तरफ बढ़ते हैं तो बैंजामिन पतंग उड़ाते-उड़ाते विद्युत की खोज कर डालते हैं और एलेक्जेंडर फ्लेमिंग घावों की अचूक दवा पेंसलिन की। दरअसल जिन सुख-सुविधाओं के बूते दुनिया भर का समाज आज यहां पहुंचा है वह सब ऐसे ही निरीक्षण- परीक्षण और वैज्ञानिक उपलब्धियों के बूते। याद कीजिए क्या महान प्रकृति वैज्ञानिक चाल्र्स डार्विन ने दक्षिण अमेरिका के द्वीपों के आस-पास वर्षों घूमते हुए अपने निरीक्षण-परीक्षणों को ऐसी ही विज्ञान डायरी में दर्ज नहीं किया होगा?
प्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की ‘विज्ञान डायरी’ से पहले यह बात कभी मेरे दिमाग में नहीं आई कि दुनिया भर की खबरों, घटनाओं, दुर्घटनाओं या वैज्ञानिक उपलब्धियों के बहाने विज्ञान और समाज का इतना प्रामाणिक सिलसिलेवार वृत्तांत बुना जा सकता है और इतने दिलचस्प ढंग से कि कहीं से भी पुस्तक खोलो उसके बाद आप बंद करना नहीं चाहेंगे।
कहने को तो इस विज्ञान डायरी में मात्र तीन वर्ष 2008, 2009 और 2010 दर्ज हैं लेकिन इन तीन वर्षों के बहाने दुनिया भर की और सदियों के वैज्ञानिक काम का लेखा-जोखा पाठक पढ़ सकते हैं। वर्ष 2008 का पहला दिन-पहली जनवरी से किताब की शुरुआत होती है। लेखक पुस्तक मेले में है। एक लेखक मित्र की बातचीत से शुरू होती है एक उत्सुकता कि यह फैसला कब हुआ होगा कि यह महीना जनवरी है और दिन मंगलवार। बस लेखक का दिमाग जुट जाता है दुनिया भर के कैलेंडरों की खोजबीन में। छह हजार वर्ष पहले मिश्र के निवासियों ने तीन सौ पैंसठ दिन का अनुमान नील नदी में हर वर्ष आती बाढ़ से निर्धारित किया। रात में उगते चांद तारों के बीच एक नियमित क्रम के आधार पर। ऐसा ही एक कैलेंडर रोम साम्राज्य में बनाया गया और महीनों के नाम जोड़े गए। हिंदुस्तान में भी पांच हजार वर्ष पहले वैदिक काल में तिथि, नक्षत्र, वार बनाये गए और यह भी कि भारत के राष्ट्री य कैलेंडर को बनाने में मेघनाथ साहा ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
ऐसी डायरी का खूबसूरत पक्ष यह है कि बात कहीं से शुरू करके कहीं भी जोड़ी जा सकती है लेकिन एक उद्देश्य के साथ। इससे रोचकता भी बनी रहती है—तथ्यों का मनमर्जी इस्तेमाल करते हुए। डायरी में स्टेम कोशिकाओं संबंधी खोज, दक्षिण अफ्रीका में मिली एक मानव खोपड़ी के जीवाश्म तथा डार्विन के उन पक्षों पर रोशनी डाली गई है जो किसी वैज्ञानिक को महामानव के रूप में देखने के बजाय एक सामान्य मनुष्य की तरह देखते हैं।
डार्विन अपनी डायरी में लिखते हैं ‘बचपन में उन्होंने बहुत मन लगा कर पौधों का नामकरण करने की कोशिश की और सीपियों, मोहरों, सिक्कों का संग्रह किया। उन्होंने उन्हें एक लड़के से ‘वंडर्स ऑफ द वल्र्ड’ पुस्तक पढऩे को मिली। उसके बारे में वे लिखते हैं, ‘मेरे विचार से सबसे पहले इसी किताब ने मुझमें सुदूर क्षेत्रों के भ्रमण की इच्छा पैदा की जो अंततोगत्वा बीगल की यात्रा से पूरी हुई…। ‘ (पृष्ठ-29)
कौन थे मेरे पूर्वज? जैसे प्रश्न पर मेवाड़ी डायरी में बार-बार लौटते हैं। यह किसी मोक्ष या स्वर्ग की तलाश का चिंतन नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक की उत्सुकता है कि हमारे परदादा कहां से आए? और हम इस पहाड़ी क्षेत्र में कब से हैं? ‘जिन खोजा तिन पाइंया’ की इसी तलाश में लेखक को एक परियोजना का पता चलता है ‘द जीनोग्राफिक प्रोजेक्ट’। पूर्वजों के बहाने लेखक अभी तक इस दिशा में किए गए प्रयासों, गुणसूत्र आदि से गुजरते हुए मनुष्य की पूरी यात्रा को चंद पन्नों में पाठकों के सामने रख देता है।
डायरी के कुछ हिस्से तो इतने रोचक और रोमांचक हैं कि उसे और पढऩे को जी ललचाने लगे। प्रसिद्ध अंग्रेज शिकारी जिम कार्बेट का नाम किसने नहीं सुना होगा?
मात्र दो पृष्ठों में जिम कार्बेट के साहसिक कारनामे ही दर्ज नहीं हैं उनकी मानवता भी दर्ज हैं। रानीखेत और पहाड़ का पूरा भूगोल तो इसमें है ही। केवल वैज्ञानिक ही नहीं विज्ञान लेखकों और हिंदी के लेखक मनोहर श्याम जोशी को भी बड़े सम्मान से डायरी में याद किया है। जूल्स वर्न और एच जी वेल्स को साइंस फिक्शन का जनक माना जाता है। जूल्स वर्न फ्रांस के रहने वाले थे और उनके पिता चाहते थे कि उनका पुत्र वकालत करे। लेकिन वे बने लेखक। जूल्स वर्न के प्रमुख उपन्यानस हैं अराउंड द वल्र्ड इन एटी डेज, द डेमन आफ कानपुर (पृष्ठ-99) आदि। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मनोहर श्याम जोशी ने हिंदी विज्ञान लेखन को साहित्यिक सरसता के साथ आगे बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है। साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक के रूप में उन्होंने उस दौर के अनेकों लेखकों को पठनीय विज्ञान लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। डायरी में बहुत विस्तार से लेखक ने मनोहर श्याम जोशी के साथ-साथ उस दौर के दूसरे लेखकों गुणाकर मुले, रमेश दत्त शर्मा आदि को भी याद किया है।
आठ दिसंबर 2010 की डायरी में धान की एक किस्म के जनक इंद्रासन किसान को याद किया है। पहाड़ के इस किसान के नाम पर ही धान की एक किस्म का नाम इंद्रासन रखा गया है। इस किसान ने कैसे धान की किस्म खोजी इसका जिक्र डायरी में दर्ज है। अन्य मोटे धानों की अपेक्षा यह नया धान अति उत्तम है। तराई में किच्छा तथा रुद्रपुर क्षेत्र (जिला-नैनीताल) में यह धान आजकल खूब लोकप्रिय हो गया है।
ऐसी डायरी या पुस्तकों को हमारे विश्वविद्यालय के हर विद्यार्थी के पास होना चाहिए। विज्ञान के छात्रों के पास तो इसलिए कि इन पृष्ठों से गुजरते हुए वे भी ऐसे निरीक्षण-परीक्षण के लिए प्रेरित होंगे। केवल प्रेरित ही नहीं उनकी विज्ञान के बारे में एक ऐसी मुकम्मल चेतना या समझ विकसित होगी जो गणित, भौतिकी या रसायन शास्त्र के स्नातक, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के बाद भी नहीं बन पा रही। और साहित्य, कला, इतिहास के विद्यार्थियों को यह डायरी एक पूरक पुस्ती के रूप में इसलिए पढ़ाई जानी चाहिए कि बिना ऐसी वैज्ञानिक समझ के शिक्षा का कोई अर्थ नहीं। डायरी का महत्त्वपूर्ण पक्ष है बहुत छोटी सी घटना के बहाने लेखक ने पूरे समाज की भी छान बीन कर डाली है। उन परंपराओं की भी वे चाहे भूत का किस्सा हों (डायरी 21/12/2010) या छबीला उर्फ लाइकेन की कहानी। दरअसल ऐसा लेखन तभी संभव होता है जब लेखक अपने को किसी खाने विशेष में रखकर न लिखता, न जिंदगी को देखता और इसीलिए मेरी विज्ञान डायरी जैसी पुस्तक को पढ़ते वक्त आपको कथा, कहानी से लेकर विज्ञान सभी का आनंद होता है। भाषा ऐसी पारदर्शी कि आप भूल जाएं कि वह हिंदी में है या किसी और भाषा में। इस पुस्तक को अंग्रेजी सहित दूसरी भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराना चाहिए।
मेवाड़ी की इतनी ही महत्त्वपूर्ण दूसरी पुस्तक है मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में साहित्य की तरह ही विज्ञान कथाओं की विशिष्ट भूमिका है और देवेंद्र मेवाड़ी पिछले चार दशकों से इस काम में जुटे हैं। बकौल भूमिका ‘विज्ञान गल्प या विज्ञान कथाएं वर्तमान तथा भावी समाज का दर्पण हैं। ये विज्ञान के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली संभावनाओं को कल्पना से उतारकर असलियत के आईने में दिखाती हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ आने वाली सच्चाइयों और आसन्न संकटों की भी जानकारी देती ये कथाएं वैज्ञानिक प्रगति से पैदा होते सामाजिक दबावों, बदलते मानव संबंधों, नैतिक मूल्यों के बदलाव और आसन्न संकटों की तार्किक पूर्व सूचना देती हैं। विज्ञान कथा विधा को बढ़ावा देने से नि:संदेह हिंदी कथा साहित्य समृद्ध होगा। ‘
इस पुस्तक में मेवाड़ी जी के कथा संसार से चुनिंदा 13 कथाएं शामिल हैं। ‘भविष्य ‘ कहानी अपनी फैंटेसी में 2030 में कैंसर पर विजय के साथ-साथ भारतीय संदर्भों में मानवीय संबंधों का बड़ा आत्मीय चित्रण करती है। दिल्ली मेरी दिल्ली में 1925 में लिखे जाने वाले महज तीन पृष्ठों के तीन पत्रों के जरिए दिल्ली में घुटते जीवन की बानगी प्रस्तुत की गई। ‘आपने जिन पुस्तकों को पढऩे के लिए लिखा था, मैंने वे पढ़ ली हैं। उन्हें पढ़कर मैं सोच में पड़ गया हूं। कहां गई वह हरियाली? कहां गए वे सड़कों के किनारे लगे हरे-भरे पेड़? दादा जी, पेड़ अब सिर्फ इन किताबों में रह गए हैं। (पृष्ठ -224)
इस पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसमें शामिल विज्ञान कथा साहित्य का संक्षिप्त परिचय है। पौराणिक आख्यानों, रहस्य रोमांच, तिलिस्मी साहित्य की छानबीन करते हुए मौजूदा विज्ञान कल्प तक की यात्रा। मेवाड़ी आधुनिक विज्ञान कथाओं की शुरुआत मेरी शैली (1797-1851) के उपन्यास से मानते हैं जिसे एडगर एलन पो (1809-1849), जूल्स वर्न (1828-1905), एच जी वैल्स (1866-1946) ने मुकम्मल पहचान दिलाई। फ्रांसीसी कथाकार जूल्स वर्न कथाकार ऐलेन पो से प्रभावित थे और उन्होंने विज्ञान और कल्पना के मेल से अद्भुत कहानियां लिखीं। इस विस्तृत भूमिका को पढ़ते वक्त विज्ञान के विद्यार्थियों को यह समझते देर नहीं लगती कि जिस दौर में ये कथाएं लिखी जा रही थीं वह दौर भी योरोप-अमेरिका में वैज्ञानिक खोजों, आविष्कारों का स्वर्णकाल था। कहीं वायुपोत बनाया जा रहा है तो कहीं हवाई-जहाज या एटम-बम। जूल्स वर्न ने अपने उपन्यास में लिखा कि चांद पर न हवा है, न जीवन। वहां चट्टानें और गड्ढे हैं। वैज्ञानिकों ने भी यही पता लगाया था और जब नील आर्मस्ट्रांग ने 21 जुलाई 1969 को चांद पर कदम रखे तो वहां यही कुछ देखा। भविष्य को इतनी गहराई और निकटता से जूल्स वर्न ने महसूस कर लिया था।
उसने ‘अराउंड द वल्र्ड इन एटी डेज’ (1873), ’20, 000 लीग्स अंडर द सी’ (1873), ‘द मिस्टीरियस आइलैंड’ (1875) आदि रोमांचक यात्राओं पर आधारित उपन्यास लिखे और इन यात्राओं के भविष्य के चित्र खींचे।
प्रसिद्ध विज्ञान लेखक जेम्स ग्राह्म बलार्ड ने अपनी विज्ञान-कथा ‘बिलेनियम’ (1961) में संभावना व्यक्त की है कि भीड़ बढ़ते- बढ़ते हर व्यक्ति के लिए सिर्फ 4 वर्ग मीटर जगह रह जाती है। बाद में वह भी घटकर केवल 3 वर्ग मीटर रह जाती है। गर्ज यह कि जफर के शब्दों में, ‘दो गज जमीन मिली कूए यार में। ‘ एक और विज्ञान लेखक राबर्ट सिल्वीरबर्ग ने ‘द वल्र्ड इनसाइड’ (1972) में कल्पना की है कि कल हजार-हजार मंजिला इमारतें होंगी और ऐसी एक-एक इमारत में एक-एक लाख लोग रहेंगे। बिल्कुल इसी तर्ज पर परखनली शिशु (1978) या क्लोन (1996) की मिलती-जुलती भविष्यवाणी कथाकार आल्ड स हक्संसे के उपन्यास ‘द ब्रेव न्यू- वल्र्ड’ (1932) और गोईन रेट्रे टेलर की पुस्तक ‘बायोलॉजिकल टाइम बम’(1968) में मिलती है। (पृष्ठ-18)
अंग्रेजी समेत योरोपीय भाषाओं में विज्ञान कथा/यात्रा के साथ-साथ बांग्ली, मराठी, तमिल, कन्नड और पंजाबी भाषा में उपलब्ध, विज्ञान कथा और लेखकों के बारे में भी परिचयात्मक जानकारी दी गई है। हिंदी में विज्ञान गल्पों के बारे में लेखक की बात बिल्कुल ठीक है। हिंदी में विज्ञान-कथा विधा को यद्यपि एक शताब्दी से भी अधिक समय हो चुका है लेकिन साहित्य के क्षेत्र में अब भी इसकी मुकम्मल पहचान बाकी है। क्या पूरी शताब्दी में ऐसी कोई भी विज्ञान-कथा हिंदी में नहीं लिखी गई जो समालोचकों और हिंदी कहानी का इतिहास लिखने वाले विद्वानों का ध्यान आकर्षित करती?
मेवाड़ी जी ने इस यात्रा में कई विद्वानों के योगदान पर भी रोशनी डाली है। रोचकता के साथ-साथ ऐसी कहानियां हमारे पूरे समाज, प्रशासन के लिए चेतावनियां भी हैं कि यदि वक्त रहते कदम न उठाए तो महज 15-20 वर्षों बाद ही जीवन दूभर हो जाएगा। समाज की ये चिंताएं इतने ही रोचक अंदाज में सभ्यता की खोज, चूहे, पिता, गुडबाय मिस्ट र खन्ना और अलौकिक प्रेम जैसी कहानियों में भी झलकती हैं। इन विज्ञान कथाओं से गुजरते हुए लगता है कि ऐसा साहित्य पूरी दुनिया को वक्त से पहले आसन्न खतरों से आगाह कर सकता है। समय रहते कुछ करने, कदम उठाने के लिए। क्या अच्छेसाहित्य, विज्ञान हो या गल्प, का उद्देश्य समाज की भलाई, सुख समृद्धि में ही निहित नहीं होता?
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