कविता : व्यवस्था विरोधी और लोकतांत्रिक स्वर
कौशल किशोर वे फिर आये हैं: वंदना मिश्र, वाणी प्रकाशन पृष्ठ-126, मूल्य: 200 ISBN 978-93-5000-814-0 वंदना मिश्र पत्रकार व प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनके पास समय, समाज व परिवेश को पकडऩे की सूक्ष्म दृष्टि है, साथ ही कवयित्री का कोमल एवं संवेदनशील हृदय है। उनके कविता संग्रह ‘वे फिर आए हैं’ के माध्यम से जो [Read the Rest...]
कितना बचा है वह शब्द?
प्रमीला के.पी. लगभग अनामंत्रित: अशोक कुमार पाण्डेय, शिल्पायन, पृष्ठ-136, मूल्य: 175 ISBN 81-89918-91-0 कवियों के मेलों व कविताओं के’ ट्रैफिक जाम’ में अशोक कुमार पांडेय की कविताओं की अलग पहचान की जानी चाहिए। क्यों कि पहचान हो जाना और पहचान किए जाने में अंतर है। प्रायोजित साहित्यिक हरकतों में सच मिलना कठिन होता है और [Read the Rest...]
काव्य नाटक : ब्लैकहोल खलनायक है संपूर्ण सृष्टि का
नंदकिशोर नौटियाल ब्लैकहोल : उद्भ्रांत, स्वराज प्रकाशन, पृ.सं.: 184, मूल्य: रु. 350 ISBN : 978-93-81582-30-5 कि सी भी कथानक में और विशेषत: नाटक में एक अदद नायक-नायिका और एक खलनायक तो होना ही चाहिए। इस अपेक्षा का जवाब देते हुए ‘ब्लैकहोल’ के लेखक ने अपने ‘लेखकीय संवाद-वन’ में कहा है कि ”कोई नायक-नायिका या खलनायक [Read the Rest...]
नायपाल की दृष्टि में भारत
तरसेम गुजराल इंडिया ए मिलियन म्यूटिनीस नाउ : वी.एस. नायपॉल, अनु.-शुचिता मीतल, पेंगुइन बुक्स, पृ. सं.: 438, मूल्य: 299 रुपए वी.एस. नायपाल की पुस्तक इंडिया ए मिलियन म्यूटिनीस (लाखों हवेलियों की कहानी) एक दिलचस्प भारत यात्रा है, जिसमें निराशा की दीवार फलांग कर भारत बेचैनी से भविष्य के मार्ग पर अग्रसर है। भारत को पहचानने [Read the Rest...]
जिंदगी के रंग
सुभाष सेतिया कफन वाले माधव जी (व्यंग्य संग्रह): प्रदीप पंत, इंडियन पब्लिशिंग हाऊस, जयपुर पृ. सं.: 125, मूल्य: 200 रुपए साहित्यालोचना में व्यंग्य विधा भले ही उपयुक्त सम्मान व प्रतिष्ठा से वंचित रही हो किंतु पत्रकारिता यानी समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में व्यंग्य रचनाओं का पाठक और संपादक दोनों स्वागत करते हैं। असल में व्यंग्य कल्पना [Read the Rest...]
जानी-पहचानी स्थितियां
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जिजीविषा और अन्य कहानियां : कमर मेवाड़ी, शिल्पायन, पृ.स. : 208, मूल्य: रु.350 हिंदी के बहुत सारे रचनाकारों के साथ यह हुआ है कि उनके संपादन कर्म ने उनके रचना कर्म को लगभग अदृश्य कर दिया. कमर मेवाड़ी 1966 से संबोधन पत्रिका का संपादन कर रहे हैं और संपादक शब्द उनके नाम के [Read the Rest...]
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