One response to “दलित विमर्श : गंदगी की जातिगत व्यवस्था”

  1. dr.dayaram aalok

    हिन्दु वर्ण व्यवस्था दलित समाज के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाली ,इस समाज की उन्नति में बाधक प्राकृत न्याय के सिद्धांत के विरूद्ध व्यवस्था है। चारों वर्णों में कभी समरसता नहीं रही। इसी वर्ण व्यवस्था के चलते भारत सैंकडों वर्षों तक विदेशी सत्ता के अधीन रहा।बडे-बडे हिन्दू संत और प्रवचन कर्ता भी इस नफ़रत वाली व्यवस्था के खिलाफ़ कुछ भी खुलकर नहीं बोलते हैं क्यों कि उनकी दान पेटियों मे डलने वाला पैसा उच्च वर्ण से ही होता है। दलित वर्ण की सामर्थ्य ही कहां कि वह दान पेटियों को भर सके।जब एक दलित अपने प्रति नफ़रत से आहत होकर अपना धर्म परिवर्तन कर मुसलमान या ईसाई बन जाता है तब उच्च वर्णीय हिदू उन्हें सम्मान देने लगते हैं। सवर्ण आरक्षण के खिलाफ़ संघर्ष लड रहे हैं और पूछते हैं कि यह कब तक चलेगा? मेरा मानना है कि जब एक मेहतर खाने-पीने की दूकान लगाएगा और सभी वर्ण के हिंदुओं की सहभागिता से वह होटल या भोजनालय चल निकलेगा , बस वह दिन आने पर आरक्षण समेट लेने का उपयुक्त समय होगा।

Leave a Reply