भाषा सिंह
सफाई का नरक: के.एस. तूफान, लता साहित्य सदन, पृष्ठ-202, मूल्य: 395 रुपये
आजादी के छह दशक से ज्यादा बीतने के बाद भी देश भर में सफाई का नरक मौजूद है और इसका सारा बोझ जातिव्यवस्था की निचली पायदान पर ढकेले गए लोगों पर है जिनके तमाम पहलुओं को छूने की कोशिश के.एस. तूफान ने अपनी किताब -सफाई का नरक-में की है। हिंदूवादी जातिगत दंश के शिकार वाल्मीकि समाज के अनछुए दर्द, उसके राजनीतिक-सामाजिक कारणों की तलाश उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में जन्मे इस लेखक ने अपने अलग अंदाज में की है।
इस किताब में अपने 24 लेखों के जरिए के.एस. तूफान मल-मूत्र ढोते भारत की अंतरकथा और सामाजिक-राजनीतिक परेशानियों को पाठक-समाज के साथ रखने की कोशिश करते हैं। तूफान का इस समुदाय के साथ जीवंत जुड़ाव कई अध्यायों में दिखाई देता है। उनमें से एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है, नाम में सब कुछ रखा है—(अध्याय 5)। इसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि किस तरह से भारत की हिंदूवादी-मनुवादी जातिव्यवस्था वाल्मीकि समाज के पूरे जीवन को हिकारत के नरक में ढकेलती है। तूफान ने बहुत गहन अध्ययन के साथ बताया कि किस तरह से सोची-समझी रणनीति के तरह दलितों को सुंदर, आकर्षक और सार्थक नामों से वंचित किया गया। सुंदर नाम रखने पर दलितों पर विधिवत प्रतिबंध लगाया गया है। इस अध्याय में वह विष्णु स्मृति (27-6-9) से उद्धृत करते हैं, जिसके अनुसार -ब्राह्मण का नाम मंगलकारी रखना चाहिए, क्षत्रिय का वलशाली, वैश्य का धनशाली और शूद्र का घृणा व्यंजक नाम रखना चाहिए। इसी के चलते दलितों-वाल्मीकियों के नाम दिनों, महीनों, त्योहारों, जूतों, चरणों, कौडियों, कम मूल्य के सिक्कों, काले रंग आदि पर रखने का प्रावधान सवर्णों ने किया। सवर्णों के धूर्ततापूर्ण षड्यंत्रों के कारण दलितों के ऐसे-ऐसे नाम मिलेंगे, जिनका अर्थ शब्दकोश में भी खोजने से नहीं मिलेगा। (पृष्ठ संख्या 41) इसके बाद उन्होंने विस्तार से बताया है कि किस तरह से सोमवार को जन्म लेने वाले दलित बच्चे को सुमेरा, सुमरा, सुमरू आदि रखा जाता है तो मंगलवार को पैदा होने वाले को मंगल, मंगलू, मंगलिया आदि रखा जाता है। सात पृष्ठों वाले इस अध्याय में तूफान ने जातिगत घृणा के उस तार को खोजा है जिसके तहत दलितों का नाम भुलवा, भुक्कड़, भिखारी, गरीबा, नत्थू, भद्दे आदि रखा जाता है और ये दलित पूरी उम्र इन्हीं घृणास्पद संबोधन के साथ गुजार देते हैं। नाम का जाति से यह रिश्ता तमाम धर्मों में एक समान मौजूद है—ईसाई, मुस्लिम, सिख आदि धर्मों में दलितों के इस तरह के नामों का ब्यौरा दिया गया है। इसी में अंत में यह भी बताया है कि जहां-जहां दलितों में चेतना आई है, वहां उनके बच्चों के नाम नेताओं के नामों पर, प्रकृति के नाम पर रखने का चलन शुरू हुआ है। इसमें सबसे पसंदीदा नाम इंदिरा है-क्योंकि इंदिरा गांधी को शक्ति के केंद्र के रूप में देखते हैं।
इन जमीनी सच्चाइयों का उल्लेख करने के साथ-साथ तूफान वर्ग और वर्ण के बीच के रिश्तों की चर्चा करते हैं।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)-माकपा से लंबे समय तक संबद्ध रहे के.एस तूफान ने बहुत पीड़ा के साथ वाम नेतृत्व द्वारा इस मुद्दे की अनदेखी और जाति की जकडऩ को तोडऩे की दिशा में ठोस कदम न उठाए जाने का जिक्र भी किताब में किया है। अपने परिचय में भी खुद ही तूफान ने लिखा है-अनेक वर्षों तक कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सक्रिय/पूर्णकालिक सदस्य रहे। बाद में नंदीग्राम आदि घटनाओं से मोहभंग। इस परिचय के जरिए उन्होंने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और पूरी राजनीतिक छटपटाहट को दर्ज कराया है। किताब में भी सफाईकर्मियों की स्थिति का मूल्यांकन करते हुए जाति व्यवस्था, हिंदू धर्म पुराणों के प्रति उनकी तीखी नफरत महसूस होती है। सिर पर मैला ढोता समाज अध्याय में जहां तूफान ने इस बर्बर प्रथा के जारी रहने के कारणों की पड़ताल की है और पूछा है कि आखिर सरकार इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए देश भर में सीवर व्यवस्था क्यों नहीं लागू कर सकती। इसके बाद के अध्याय लगातार राजनीतिक प्रश्नों से बावस्ता हैं तमाम अध्याय-स्वतंत्र भारत में परतंत्र वाल्मीकि समाज, वाल्मीकि समाज समरसता से वंचित क्यों, झाड़ू नहीं कलम चाहिए, यह आरक्षण कब खत्म होगा, जातिभेद से लडऩा क्यों नहीं चाहते, वाल्मीकि युवक व्यवस्था परिवर्तन की सोचें, वाल्मीकि समाज का कायाकल्प…। इन तमाम अध्यायों के शीर्षक से ही उनकी धार साफ है। कोई भी धर्म दलितों के पक्ष में नहीं, वे उनके उत्पीडऩ का औजार बनते हैं। राजनीतिक प्रहार तूफान सभी पार्टियों पर करते हैं, हिंदुत्ववादी ताकतों पर ज्यादा है। उनके भाजपा फिर बैताल डाल पर लटका, रामलल्ला की नहीं राम लाल की फिक्र करो, में इस मुद्दे पर गहन विचार हैं। राजनीति में पश्चिम बंगाल में चले नंदीग्राम से लेकर छत्रधर महतो तक का जिक्र है और विषमताएं मिटाने की बात की है तूफान ने। किताब चूंकि पहले ही लिखी हुई है, इसलिए इसमें तभी तक के राजनीतिक घटनाक्रमों का जिक्र है।
किताब से गुजरते हुए लगता है कि तूफान को शेरो-शायरी से विशेष प्रेम है और इसका भरपूर इस्तेमाल उन्होंने किताब के हर अध्याय में किया है। इस किताब की खासियत यह है कि वह उपेक्षित समुदाय के भीतर बाहर के सवालों से जूझती है। हालांकि अगर तूफान इस समुदाय के भीतर से उठ रही परिवर्तन की छटपटाहट-आंदोलनों को भी कलमबद्ध करते तो शायद मुकमल्ल तस्वीर उभरती।
हिन्दु वर्ण व्यवस्था दलित समाज के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाली ,इस समाज की उन्नति में बाधक प्राकृत न्याय के सिद्धांत के विरूद्ध व्यवस्था है। चारों वर्णों में कभी समरसता नहीं रही। इसी वर्ण व्यवस्था के चलते भारत सैंकडों वर्षों तक विदेशी सत्ता के अधीन रहा।बडे-बडे हिन्दू संत और प्रवचन कर्ता भी इस नफ़रत वाली व्यवस्था के खिलाफ़ कुछ भी खुलकर नहीं बोलते हैं क्यों कि उनकी दान पेटियों मे डलने वाला पैसा उच्च वर्ण से ही होता है। दलित वर्ण की सामर्थ्य ही कहां कि वह दान पेटियों को भर सके।जब एक दलित अपने प्रति नफ़रत से आहत होकर अपना धर्म परिवर्तन कर मुसलमान या ईसाई बन जाता है तब उच्च वर्णीय हिदू उन्हें सम्मान देने लगते हैं। सवर्ण आरक्षण के खिलाफ़ संघर्ष लड रहे हैं और पूछते हैं कि यह कब तक चलेगा? मेरा मानना है कि जब एक मेहतर खाने-पीने की दूकान लगाएगा और सभी वर्ण के हिंदुओं की सहभागिता से वह होटल या भोजनालय चल निकलेगा , बस वह दिन आने पर आरक्षण समेट लेने का उपयुक्त समय होगा।