भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तमाम ऐसे चैनल हैं जो दिन-रात खबरें, मनोरंजन, और सनसनी परोसने और टीआरपी बटोरने की होड़ में लगे रहते हैं। इस सब के दौरान भारतीय जन और जनतंत्र किस तरह हाशिए की चीज बनता जा रहा है इसका ख्याल व्यवसायिकता की दौड़ में तल्लीन इन तमाम निजी चैनलों को नहीं है। मुनाफे को ही अपना अभीष्ट मानने वालों को यह तक नहीं पता कि उस जन और जनतंत्र की वास्तविक रुचि किन चीजों के प्रति है और क्या उसकी जरूरत है। इसकी परवाह किए बगैर उसे वही दिखाया जाता है जो इनकी नजर में बिकाऊ है। ऊपर से तुर्रा यह कि जनता इन्हीं चीजों को पसंद करती है। सीधे कहें तो जनता की पसंद-नापसंद का फैसला चंद निजी चैनलों के हवाले हो चुका है, जो दिन-रात सनसनी, अंधविश्वास, ढोंग आदि को जनता की पसंद के नाम पर उन पर थोप रहे हैं।
इन्हीं के बरक्स सरकार द्वारा नियंत्रित चैनल भी अपना काम कर रहे हैं जिन्हें जनता से ज्यादा सत्ताधारियों के प्रति अपनी जवाबदेही का डर सताता रहता है। वहां स्वतंत्र रूप से आलोचना या पक्षधरता की उम्मीद बेमानी होगी। इसी कारण सरकार नियंत्रित चैनलों के प्रति लोगों का रुझान घटता गया है।
प्राइवेट चैनलों और सरकारी चैनलों के बीच संसदीय चैनलों का उदय एक नई शुरुआत है। जिसमें लोकसभा टीवी तथा राज्य सभा टीवी एक-दूसरे के पूरक बने हुए अपने-अपने तरीके से काम कर रहे हैं। लोकसभा टेलीविजन की शुरुआत पहले हुई है। लोकसभा की कार्यवाहियां, टॉकशो आदि के द्वारा इसने अपनी जगह बनाई।
राज्यसभा चैनल 26 अगस्त 2011 से प्रयोगात्मक शुरुआत करते हुए संसद के इसी सत्र के साथ ही पूरी तरह से अस्तित्व में आया। राज्यसभा टेलीविजन के कार्यक्रमों को देखते हुए यह नहीं लगता कि यह चैनल सरकारी सोच को व्यक्त करने अथवा किसी दबाव में काम करने के लिए अभिशप्त है। इसके कार्यक्रमों में जनपक्षधरता का पुट दिखलाई पड़ता है। इस चैनल के कार्यक्रमों तथा समाचार विश्लेषण में संसदीय भावना का ख्याल यह दर्शाता है कि चैनल की जवाबदेही संसद के प्रति है। इसीलिए यह विभिन्न मुद्दों पर सरकार की आलोचना, प्रशंसा, निंदा तथा समीक्षा करने हेतु स्वतंत्र है। यह इसकी कार्यशैली से भी जाहिर होता है। अन्य चैनलों की तरह खबरों को नौटंकी की तरह प्रस्तुत करने के बजाय विषय की गंभीरता प्रासंगिकता एवं प्रामाणिकता का ख्याल रखते हुए सादगी एवं संप्रेषणीयता पर इसका विशेष बल होता है।
चैनल के प्रमुख कार्यक्रमों में मीडिया मंथन, देश-देशांतर, सिलसिला, शख्शियत, गुफ्तगू, यादों के साये, उनकी नजर उनका शहर, विमर्श, टू द प्वाइंट, बिग पिक्चर, पॉलिसी वॉच, वल्र्ड पैनोरमा, तर्कश एवं इट्स माई लाइफ आदि हैं। तरह-तरह के ज्ञान एवं सूचनाओं से भरपूर सामग्री के साथ समाचारों के लिए भी इस संसदीय चैनल के पास पर्याप्त स्थान है। चैनल समाचारों का प्रसारण भी करता है तथा खबरों के विश्लेषण के लिए पैनल के माध्यम से चर्चा-परिचर्चा का आयोजन भी करता है, जिसमें अपने क्षेत्रों के विशिष्ट लोगों को बुलाकर बहसों का भी आयोजन करता है। इसके कार्यक्रमों में विविधता देखी जा सकती है। इसके द्वारा आयोजित चर्चाओं में सांसद, मंत्री, प्रतिपक्ष के नेता, पत्रकार एवं बुद्धिजीवी देखे जा सकते हैं। बहुचर्चित अण्णा हजारे आंदोलन के समापन पर अनशन तुड़वाने हेतु दलित एवं मुस्लिम बालिकाओं के रूप में पहचान उजागर करने संबंधी कृत्य पर अरविंद केजरीवाल द्वारा क्षमा याचना, क्रास मीडिया होल्डिंग का मसला या विभिन्न चैनलों एवं अखबारों में भविष्य फल और ज्योतिष को महिमामंडित करने के मुद्दे पर तीन-चार संपादकों के पैनल की विचारोत्तेजक बहस आयोजित करवाकर राज्यसभा टेलीविजन ने सराहनीय पहल की है। युवा मामलों पर पैनी दृष्टि रखने के लिए युवा संसद, जो आडियन्स आधारित पेशकश है तथा इसी तरह जन संसद, जो कि आमजन से साबका रखती है, भी इसके कार्यक्रमों में शुमार है। इसका गोष्ठी नामक कार्यक्रम कम्युनिटी रेडियो पर आधारित है।
चैनल पर प्रसारित प्रमुख कार्यक्रमों में ‘मीडिया मंथन’ है जिसे चैनल के प्रधान संपादक उर्मिलेश जी स्वयं देखते हैं, जिसमें मीडिया के ज्वलंत एवं समसामयिक मुद्दों पर विशेषज्ञों के पैनल द्वारा बहस का आयोजन होता है। इस कार्यक्रम की मांग व विषय की गंभीरता को देखते हुए इसका प्रसारण दो-तीन बार होता है। इसी तरह ‘देश-देशांतर’ को आरफा खानम, ‘शख्शियत’ में किसी कला हस्ती से बातचीत तथा ‘सिलसिला’ में साप्ताहिक रिपोर्ट रिपोर्ताज के रूप में समीना अली प्रस्तुत करती हैं। सैय्यद मो. इरफान ‘गुफ्तगू’ में किसी फिल्मकार, कलाकार अथवा रचनाकार के साथ बातचीत लेकर हाजिर होते हैं तथा ‘यादों के साये’ में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से फिल्मों एवं कला के बारे में बातचीत करते हैं। ‘उनकी नजर उनका शहर’ नामक कार्यक्रम के साथ राजेश बादल हमें रूबरू कराते हैं साहित्यकारों, कलाकारों एवं विभिन्न हस्तियों के शहरों से, जिसमें गोपालदास नीरज, रश्किन बॉण्ड और साहिर लुधियानवी आदि के शहर की सैर चैनल की यात्रा में हम कर चुके हैं।
संसद के सत्र के दौरान राज्यसभा की कार्यवाही प्रसारित करना तथा ‘संसद में आज’ शीर्षक के तहत सुबह एवं ‘संसद समाचार’ शाम को प्रसारित किया जाता है। विभिन्न प्रमुख हस्तियों से बातचीत के सिलसिले में कई सारे ज्वलंत मुद्दों पर आयोजित बहसों में देश-विदेश के कई जाने-माने चेहरे शामिल हो चुके हैं जिनमें पाकिस्तान से आसमा जहांगीर, इंग्लैंड से तारिक अली आदि। इसी तरह अर्थव्यवस्था पर ‘स्टेट ऑफ इकोनॉमी’ कार्यक्रम के तहत सी. रंगराजन; ‘गुफ्तगू’ में अमोल पालेकर, जावेद अख्तर, मल्लिका साराभाई, इरफान खान; ‘यादों के साये’ में डॉ. कर्ण सिंह अपने डोगरी गीत-संगीत के प्रति लगाव एवं फिल्मों के बारे में अपनी जानकारी साझा कर चुके हैं। ‘इट्स माई लाइफ’ कार्यक्रम राजनीतिज्ञों की निजी जिंदगी पर केंद्रित होता है जिसमें प्रकाश जावड़ेकर, रेणुका चौधरी, चंदन मित्रा आदि से उनके राजनैतिक जीवन से इतर जीवन पर बात की गई है।
प्राइवेट चैनलों के दुष्चक्र के बीच इन संसदीय चैनलों को अपनी जगह बनाने में कठिनाई तो है ही, इसके लिए सरकारी नियम बने थे जिसके तहत केबल वालों को इन चैनलों को दिखाना आवश्यक है अन्यथा उनके खिलाफ कार्यवाही की बात की गई थी। परंतु अभी भी कई सारे केबल वाले इन नियमों की अनदेखी करते हैं।
Recent Comments