विरोध का विस्तार

दिल्ली मेल

पर हम बात कर रहे थे राष्ट्रीय संस्कृति की। उसका ताना-बाना जहां जाकर जुड़ रहा था वह महत्वपूर्ण है। जब से लेखकों व अन्य बुद्धिजीवियों द्वारा बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कारों की वापसी होने लगी है तब से लगातार तर्क दिया जाता रहा है कि साहित्य अकादेमी ‘स्वायत्त’ है। असल में किसी ने, यहां तक कि उन लेखकों तक ने जो पुरस्कार लौटा रहे थे, यह जांचने की कभी जहमत नहीं उठाई कि आखिर यह स्वायत्तता है तो कहां है और कितनी और किस प्रकार की है। समयांतर अकादेमी की इस छद्म स्वायत्तता पर बार-बार सवाल उठाता रहा है। पर किसी माई के लाल ने अब तक इस पर एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा है।

इधर फिर से समयांतर ने नवंबर अंक में प्रकाशित एक छोटी टिप्पणी ‘विरोध और आगे का रास्ताÓ के माध्यम से अकादेमी की स्वायत्तता पर सवाल उठाया गया था। इससे पहले कि मुद्दे पर आया जाए, उसमें कुछ और बातें जोड़ी जा सकती हैं जो साहित्य अकादेमी की इस स्वायत्तता की कुछ और पोल खोल देती है। जैसे कि आठ वर्ष पहले जब गोपीचंद नारंग परंपरा (नियम नहीं) को तोड़कर दूसरी बार अकादेमी के अध्यक्ष बनने को उतारू थे तो उन्हें संस्कृति मंत्रालय के उन अधिकारियों ने ही रोका था जिन्हें इसी काम के लिए भेजा गया था। सुना जाता है कि तब नारंग से कहा गया था कि अगर आपने अपना नामांकन वापस नहीं लिया तो आपके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच होगी। यह बाजू मरोडऩे से कम नहीं था क्यों कि ऐसा कोई नियम अकादेमी के संविधान में नहीं है कि कोई व्यक्ति अध्यक्ष दोबारा नहीं बना सकता। यह सिर्फ एक परंपरा थी और सज्जन लोग इसका निर्वाह करते रहे थे। और नारंग को हथियार डालने में मिनट नहीं लगा था। इस तरह सुनील गंगोपाध्याय के हाथ अध्यक्ष पद लग पाया था।

इसी तरह का एक और प्रसंग हाल ही का है। यानी अक्टूबर 2015 का। राष्ट्रव्यापी हंगामे के बाद जब अकादेमी ने कलबुर्गी की बर्बर हत्या का विरोध करते हुए बयान जारी किया, अखबारों के अनुसार (देखिये द हिंदू , 24 अक्टूबर) वह वक्तव्य जिसे अकादेमी के अध्यक्ष ने पढ़ा और जारी किया, संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों की नजर से गुजरा हुआ था।

अब आईये ‘राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव’ पर।
6 नवंबर को साहित्य अकादेमी ने संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से ‘अखिल भारतीय काव्योत्सवÓ का आयोजन किया। स्पष्टत: यह उसी महोत्सव का हिस्सा था जिसका आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने किया था। इसके विज्ञापन से लेकर निमंत्रण पत्र तक में मंत्रालय और महोत्सव का लोगो था। आखिर अकादेमी की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसे काव्योत्सव करना पड़ा हो? क्या इस तरह से अकादेमी मंत्रालय के किसी विभाग की तरह काम नहीं कर रही थी?

यहां याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि बनारस में नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने के बाद पहली बार जाने के उपलक्ष में सारी राष्ट्रीय अकादेमियां वहां उपस्थित हुई थीं – सारे तामझाम के मय अध्यक्ष। ये लक्षण क्या किसी स्वायत्त अकादेमी के हो सकते हैं?
इसलिए विशेष कर पुरस्कार वापसी के इतने हंगामे के तत्काल बाद फिर से ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ के महोत्सव के सिलसिले में काव्योत्सव करवाना किस तरह की स्वायत्तता की ओर इशारा करता है?

इस काव्योत्सव में भाग लेनेवालों में पद्मा सचदेव, सुकृता पॉल कुमार, लीलाधर जगूड़ी, गंगाप्रसाद विमल, वर्षा दास, देव शंकर नवीन आदि के साथ विभिन्न भाषाओं के कवि गण शामिल थे। इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

स्वायत्तता की ‘संस्कृति’

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वामपंथ के लिए ‘सबक’

वामपंथ के लिए ‘सबक त्रैमासिक कथा क्रम के अक्टूबर-दिसंबर अंक में मैत्रेयी पुष्पा का लंबा साक्षात्कार धूमधाम से प्रकाशित हुआ है जिसमें उनके आम आदमी पार्टी, उसके नेता कुमार विश्वास और उनके दिल्ली की हिंदी अकादेमी की उपाध्यक्षा हो जाने आदि पर कई बातें हैं। पर इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने जनवादी लेखक संघ के संदर्भ [Read the Rest…]

विरोध का विस्तार

इधर इलाहाबाद से खबर है। 25 नवंबर को होनेवाले मीरा स्मृति सम्मान समारोह का प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जनसंस्कृति लेखक मंच ने बहिष्कार कर दिया। कारण था इसकी अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कर रहे थे। बहिष्कार करनेवाले संगठनों ने यह कदम तिवारी के उन लेखकों के प्रति जो [Read the Rest…]

प्रभाव और रहस्य

इस वर्ष अप्रैल में ब्रितानवी पत्रकार लेंस प्राइस की लिखी एक किताब प्रकाशित हुई है जिसका नाम है द मोदी इफैक्ट। यह किताब नरेंद्र मोदी के भारत को बदलने के सपने को हासिल करने के लिए लड़े गए 2014 के चुनावों की अंदर की कथा बतलाई जाती है। इस में बतलाया गया है कि मोदी [Read the Rest…]

असहिष्णुता से असहमति

छ घटनाएं सारी सीमाओं के बावजूद ऐसी चिंगारी का काम कर डालती हैं जो लपटों में बदल अंतत: सारे संदर्भ को नया ही आयाम दे देती हैं। केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या पर अकादेमी द्वारा चुप्पी लगा देने की प्रतिक्रिया स्वरूप शुरू हुए सामान्य से विरोध ने जिस [Read the Rest…]

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