मूल्यांकन क दृष्टि की सीमा

इतिहास

लेखक : महेन्द्र मिश्र

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी को एक ‘गंभीर काम’ अलग से सौंपा गया है। जिसके तहत उसे देश में एक विशिष्ट लैब स्थापित करनी है। लैब में वैज्ञानिकों के साथ मिलकर संस्कृत के विद्वान इस विषय पर शोध करेंगे कि यज्ञ और हवन के जरिये कैसे बारिश कराई जा सकती है? जैसा कि वेदों में बताया गया है। हवन पर शोध कराने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मैसूर सम्राट टीपू सुल्तान के राकेट की खोज से परहेज है। उसको ब्रिटेन हड़पने की कोशिश कर रहा है। इससे उसका कोई लेना-देना नहीं है। इस विरासत को बचाने और उसे आगे बढ़ाने की बात तो दूर वह उल्टे टीपू के ही घेरेबंदी में जुट गई है। लेकिन टीपू किसी के रहमोकरम का मोहताज नहीं था। संयोग देखिए टीपू का 265वां जन्मदिवस दिवाली के पहले दिन ही पड़ा और इस बहाने पूरा देश उसके राकेट की खोज का जश्न मनाया। हालांकि कर्नाटक सरकार ने टीपू जयंती को धूम-धाम से मनाने का फैसला किया था। लेकिन यही बात बीजेपी को नागवार गुजरी। कर्नाटक के दरवाजे से दक्षिण की राजनीति के आंगन में घुसने का सपना देख रही भाजपा के लिए भला इससे बड़ा मौका और क्या हो सकता था। उसके लिए तो बस किसी का मुसलमान होना ही काफी है। यहां तो बाकायदा एक शासक था। फिर क्या था उन्हें टीपू में एक आतततायी राजा दिखने लगा। जो निरंकुश था और उसने हिंदुओं और इसाईयों का जबरन धर्म परिवर्तित करवाया। इस कथित क्रूर शासक के खिलाफ उसने पूरे सूबे में अभियान छेड़ दिया। जयंती से पहले विरोध-प्रदर्शन के दौरान एक हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई।
किसी भी शासक और उसके शासन काल के विश्लेषण का आधार क्या होना चाहिए? यह सबसे अहम सवाल है। उसको पूरी समग्रता में देखा जाए या फिर उसके किसी एक या दो पक्ष को गलत या सही तरीके से सामने रख कर पूरा नतीजा निकाल लिया जाए? टीपू सुल्तान के मामले में (भाजपा) और संघ दूसरे नजरिये के शिकार हैं। जबकि विश्लेषण का सही तरीका पहला है।
दरअसल संघ का टीपू के शासन और व्यक्तित्व का न तो समग्रता में मूल्यांकन करने का कोई इरादा है और न ही ऐसा करना उसके हित में होगा। लिहाजा वह टीपू से जुड़े एक छोटे पक्ष को उसके पूरे शासन और शख्सियत के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। इसके जरिये वह अपनी सोच को पूरे समाज पर थोप देना चाहता है। इस मामले में अंग्रेजों द्वारा लिखा गया इतिहास उनकी पूरी मदद कर रहा है। भारत पर कब्जे की राह में हैदर अली और टीपू उनके सबसे बड़े रोड़े थे। चार युद्धों के जरिये उन्होंने उनके दांत खट्टे कर दिए थे। अंग्रेजों ने इस पीड़ा की कसर इतिहास लेखन में निकाली। और टीपू के खिलाफ जमकर जहर उगला। ऐसे में संघ के एक हाथ में अंग्रेज लिखित इतिहास आ गया है। दूसरे में झूठ और अफवाहों का अपना हथियार। मानसिक घृणा और नफरत उनके जेहन के स्थाई हिस्से हैं। इन सबके साथ पूरा भगवा गिरोह मैसूर के मैदान में कूद पड़ा।
इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो टीपू 1761 से अपनी मौत यानी 1799 ई. तक मैसूर राज्य का शासक रहा। टीपू के कैशोर्य की शुरुआत ही 17 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई से हुई। और इस तरह तीन युद्धों में उसने अंग्रेजी हुकूमत से सीधा लोहा लिया। आखिरी युद्ध में वह मैदान में ही लड़ते हुए मारा गया। अंगेजों के दक्षिण में बढऩे की राह में टीपू उसी तरह से रोड़ा था जिस तरह बक्सर के युद्ध को जीते बगैर उनका दिल्ली पहुंचना नामुमकिन था। इन दोनों विजयों के बाद अंग्रेजों का देश पर निष्कंटक राज हो गया। लेकिन टीपू का अंग्रेजों के खिलाफ इस संघर्ष को संघ कोई तवज्जो नहीं देता है। उसे कोई योगदान नहीं मानता है। उसका कहना है कि टीपू ने अपनी सत्ता बचाने के लिए ऐसा किया। इस तर्क के हिसाब से तो फिर 1857 में सभी राजे-राजवाड़े अपना-अपना राज बचाने के लिए ही उसमें हिस्सा लिए थे। लिहाजा उनका भी कोई महत्व नहीं होना चाहिए। फिर तो अपनी झांसी नहीं दूंगी कहने वाली लक्ष्मीबाई की अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई भी व्यर्थ थी। अंग्रेजों के पुराने दस्तावेज में भी उन्हें सबसे कठिन चुनौती देने वाले शासकों में टीपू सुल्तान और रानी लक्ष्मी बाई के नाम सबसे ऊपर हैं। दरअसल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के मूल्य को वह नहीं समझ सकता जिसका उससे कोई सरोकार ही न हो। उसको सिंधिया जैसे लोग अपने ज्यादा करीब दिखते हैं। जिन्होंने देश से गद्दारी की और अंग्रेजों का साथ दिया। इस नजरिये से तो फिर राणा प्रताप भी अपनी निजी सत्ता की चाहत के लिए ही घास की रोटी खाए। फिर भाजपा को उनमें क्या महानता दिखती है।
भाजपा को इस बात से भी कुछ नहीं लेना-देना कि टीपू ने अपने शासन के दौरान जनता के लिए क्या कुछ किया। पानी के लिए नदियों पर बांध बनवाने से लेकर राजस्व वसूली की नयी व्यवस्था का सवाल हो या फिर पहली बार भूमिहीनों और गरीब दलितों-पिछड़ों के बीच जमीनों का बंटवारा उसे किसी चीज से मतलब नहीं। बाबर के बाद टीपू पहला शासक था जिसने आधुनिक दुनिया के लिहाज से कई क्षेत्रों में नई-नई पहलें की। राकेट का आविष्कार किया जिसे अंग्रेजों ने टीपू से सीखा। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में सहयोग के लिए फ्रांस से लेकर कई देशों में अपने दूत भेजे। हालांकि उसमें उसे नाकामी हाथ लगी। स्वतंत्रता के मूल्यों के प्रति सम्मान का ही नतीजा था कि उसने अपने महल में लिबर्टी का पेड़ लगवाया। आधुनिक राष्ट्र और उसके मूल्य टीपू के जेहन के हिस्से बन गए थे। शायद इसी वजह से उसने खुद को मैसूर का नागरिक घोषित किया।
जहां तक दूसरे धर्मों के प्रति नजरिये की बात है तो किसी और शासक से ज्यादा टीपू सहिष्णु था। राम नाम की खुदी अंगूठी पहनकर युद्ध करने की बात की पुष्टि हो चुकी है। दक्षिण की काशी कहे जाने वाले श्रीकंटेश्वर मंदिर में लगी शिव की मूर्ति टीपू की दी गई है। टीपू के सेनापति ब्राह्मण थे तो सेना में हिंदुओं की संख्या भी बहुतायत थी। हिंदू धर्म के प्रति सम्मान का ही नतीजा था कि सैकड़ों मंदिरों को नियमित तौर पर शासन से सहायता राशि जाती थी। मराठों ने जब श्रृंगेरी की पीठ को हमले में तहस-नहस कर डाला और पुजारियों से लेकर उनके सैकड़ों सेवकों की हत्या कर दी। तब शंकराचार्य ने टीपू को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई। और फिर टीपू के आदेश से पीठ का पुनरुद्धार हुआ। इस सिलसिले में शंकराचार्य और टीपू के बीच खतो-किताबत के 30 खत आज भी मैसूर के संग्रहालय में मौजूद हैं। एक खत में टीपू ने कहा था कि ‘ऐसे लोगों को कभी नहीं माफ किया जा सकता है और उन्हें उसकी सजा मिलकर रहेगीÓ। इस कड़ी में उसने संस्कृत का एक श्लोक भी उद्धृत किया था।
जहां तक रहा ज्यादती और धर्म परिवर्तन का मामला। ये भी शोध का विषय है। जैसा कि किसी भी शासक का चरित्र होता है। अपने शासन की जरूरतों के हिसाब से वह काम करता है। इस मामले में जिक्र कूर्ग, मालाबार और कोझिकोड इलाके का किया जा रहा है। टीपू के पिता हैदर अली ने अपने जमाने में ही इन इलाकों को जीता था। बाद में टीपू के दौर में यहां के मनसबदारों ने विद्रोह कर दिया। और फिर उसी को दबाने की कड़ी में ये सब बातें सामने आ रही हैं। जिसमें जनता पर तबाही करने और हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन कराने की बात भी शामिल है। लेकिन यह भी कितना सच है कहना मुश्किल है। क्योंकि टीपू के केंद्रीय इलाके में इस तरह की कोई नजीर नहीं मिलती। और अगर जेहनी तौर पर टीपू ऐसा था या फिर यह सब उसके शासन की नीति का हिस्सा था तो ये चीज पूरे शासन काल में और हर इलाके में दिखनी चाहिए थी। बावजूद इसके एकबारगी मान भी लें कि ऐसा कुछ हुआ था तो क्या ऐसा करने वाले देश के दूसरे शासकों को भी उसी श्रेणी में रखा जाएगा। फिर महान अशोक को कहां रखेंगे? क्या उनकी महानता पर फिर से विचार किया जाएगा? कलिंगा के युद्ध में हजारों हजार लोगों की हत्या करने के बाद उसने न खुद दूसरा धर्म अपनाया बल्कि पूरे इलाके को ही उस धर्म के अधीन कर दिया। मरने वाले सब क्या हिंदू नहीं थे? या फिर लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था? फिर क्या उसे भी आतततायी कहा जाएगा? बौद्ध धर्मावलंबियों का नरसंहार कराने वाले पुष्यमित्र शुंग को कहां रखा जाएगा? कृष्णदेव राय भी इसी कतार के हिस्से हैं।
संघ पोषित संगठन टीपू पर कन्नड़ के प्रति दोयम दर्जे का रवैया अपनाने और फारसी को बढ़ाने का आरोप लगाते हैं। लेकिन सच यही है कि सल्तनत काल और मुगलों के दौर से ही फारसी शासन की भाषा हो गई थी। लिहाजा अकेले टीपू ही नहीं बल्कि हिंदू मराठे भी मराठी की जगह उसी भाषा का इस्तेमाल करते थे।
और हां, यहां एक और मामले का जिक्र करना उचित रहेगा। कुछ लोग संघ के इस हमले से आत्मरक्षात्मक रुख अपना ले रहे हैं। कोई कह रहा है कि जयंती मनाने की जरूरत क्या थी? रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार भी इससे नहीं बच सके। पहली बात तो कोई भी देश और समाज अपने इतिहास से कट कर नहीं रह सकता है। वह अपने इतिहास का मूल्यांकन करता है। उसकी गल्तियों से सीखता है और अच्छाइयों को अपनाने के साथ उसे आगे बढ़ाता है। जरूरत पडऩे पर तथ्यों की किसी नई रोशनी में उसकी गहन जांच-पड़ताल करता है। इसके लिए वह बार-बार इतिहास की गहराई में उतरता है और उसकी छानबीन करता है। लेकिन शर्त इसकी एक होती है। मूल्यांकन समग्रता में करता है। अगर टीपू को छोडऩे की बात की जा रही है तो फिर अशोक और शिवाजी को क्यों विरासत का हिस्सा बनाया जाएगा? अकबर और पोरस का नाम क्यों लिया जाएगा? लेकिन इन सारी कवायदों में इतिहास के गड़े मुर्दो को कब्र से निकालकर उन्हें फिर से जिंदा नहीं किया जाएगा। जिससे पूरा देश और समाज के सामने नई मुसीबत खड़ी हो जाए। उसे के वल विचार-विमर्श तक सीमित कर इतिहासबोध का हिस्सा बना लिया जाएगा।
हर शासक की अपनी कुछ खूबियां होती हैं तो कुछ खामियां भी। टीपू सुल्तान को ‘मैसूर का टाइगरÓ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। शायद टीपू अपने खिलाफ किसी तरह का विद्रोह बर्दाश्त नहीं कर पाता था। कुछ ज्यादतियां दबाने के क्रम में हुईं होंगी। ऐसा न मानने के पीछे कोई वजह नहीं है। सामंतों और राजे-रजवाड़ों के दौर में यह कोई अपवाद भी नहीं था। साथ ही इतिहास में किसी शासक का मूल्यांकन आज के नजरिये से नहीं हो सकता है। उसे उसके समकालीन दौर के मूल्यों और मान्यताओं के खाचें में डालकर ही देखना होगा। उस कसौटी पर टीपू अपने दौर के तमाम शासकों से बहुत ज्यादा आगे खड़ा है। मराठे और निजाम जब भारत में पैर जमाने में अंग्रेजों की मदद कर रहे थे तब टीपू उनके खिलाफ खूनी जंग लड़ रहा था। ऐसे में मराठों की जगह टीपू को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकती है। यह काम कोई अंग्रेजों का पिछलग्गू ही कर सकता है या फिर उसका इसके पीछे अपना कोई निहित स्वार्थ है। नहीं तो भाजपा को जरूर देश को बताना चाहिए कि वो कहीं मराठों को भी गलत पाती है या नहीं?
अगर सही मायने में जनता के किसी इतिहास को सामने लाना है तो हमें शासकों के आधार पर इतिहास के मूल्यांकन की परंपरा को खारिज करना होगा। लेकिन यह काम चयनित तरीके से नहीं होना चाहिए। इसके लिए एक साथ सारे राजाओं को खारिज करना होगा। शोध पर आधारित वह ऐसा दस्तावेज होगा जिसमें जनता का स्थान प्राथमिक और राजे-रजवाड़ों का दर्जा दोयम हो जाएगा। और फिर इन सब फसादों से निजात पाने के लिए फ्रांसीसी विचारक और दर्शनशास्त्री दिदेरो का कथन बेहद प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने कहा था कि ‘जब तक अंतिम राजा को अंतिम पादरी की अंतडिय़ों से फांसी नहीं चढ़ाएंगे तब तक धरती पर शांति नहीं होगीÓ। राजा को तो हमने मार दिया है लेकिन धर्म सत्ता के तौर पर पादरी अभी भी जिंदा है। इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

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