स्मरण : एक पत्र

0
175

गत वर्ष जून में स्वामी नित्यानंद सरस्वती अचानक परिदृश्य से गायब हो गए थे। चूंकि हमारे पास यह मानने के अलावा कि उनका देहावसान हो गया है कोई विकल्प नहीं है, उनकी पुण्य तिथि पर पंकज बिष्ट के नाम लिखा उनका एक पुराना (जून, 2009) पत्र प्रस्तुत है।

प्रिय पंकज,

कुशल हूं और आपसे भी यही कामना है। पिछला पत्र भेजने के बाद यों तो सपने प्राय:, दिन में नींद आने पर भी, आते रहे जो अब विस्मृत हैं। मगर एक सपना अभी तक स्मरण में है। शायद 4 या 5 तारीख का स्वप्न है। देखा कि मैं घने उबड़-खाबड़ जंगल में एक युवती के साथ कार में बैठकर कहीं जा रहा हूं। कार युवती चला रही है और बगल में मैं बैठा हूं। अकस्मात युवती और कार दोनों गायब हो जाते हैं। फिर देखता हूं कि मैं और एक डॉक्टर, जिसका चेहरा न स्वप्न में दिखा न अब याद है, दोनों एक सोने की पालकी ढोकर जंगल में से गुजर रहे हैं। पालकी ढोते-ढोते मैं हलकान होता एक जिनालय, जैनों का धर्मस्थल, में पहुंचता हूं। वहां एक वृद्ध जैन मुनी नजर आते हैं। उनसे पूछता हूं। यह पालकी कहां रखूं? वे मेरी पीठ पीछे इशारा करते हैं। देखता हूं कि वहां बुद्ध की मूर्ति रखी है। पालकी उनके चरणों में रख देता हूं। फिर देखता हूं कि डॉक्टर लोप हो गया है। जंगल में वही अनजान युवती पैदल आ रही है। वह मुझे देखकर पूछती है, तुम किसकी पालकी ढो रहे थे? मुझे कुछ जवाब नहीं सुझता है और वह खिल-खिलाकर हंस पड़ती है। हड़बड़ाहट में नींद खुल जाती है। 5.35 पर।

सन्यास लेने के बाद भी मुझे सपने आते थे मगर उनमें स्त्री नहीं होती थीं। सपने में वीर्य स्खलन भोजन की मादकता से कभी-कभी हो जाया करता था, बिना संभोग के। सपनों में तब संत-महात्मा ही आया करते थे। मुझे याद है एक बार सपने में स्वर्ग भी देखा था। खैर, लेकिन जबसे नियमित, 1992 से, पढऩा (साहित्य) शुरू किया तब से स्त्रियां बिन बुलाए सपनों में चली आती हैं वो भी अनजान। मैं ये नहीं कहता कि इसके लिए साहित्य दोषी है। पर हां इसे साहित्य का साईड इफेक्ट जरूर कहा जा सकता है। गनीमत है कि वास्तविक जीवन में नहीं आतीं वरना वार्धक्य खराब हो सकता है। फिर न शक्ल है न सेहत। न मैं कोई सेलेब्रिटी हूं, न बनना चाहता हूं। जीवन जो शेष है, वही रंगीन सपनों से होता गुजर जाए तो काफी है। सपने पूरे होने में वो मजा नहीं है, जो देखने में है। 9.6.09

इधर दस-बारह दिनों में सपने तो आए मगर याद एक भी नहीं है। इतना याद है कि आए थे। इधर भाजपा की उठा-पटक टीवी व अखबारों में प्रतिदिन देखने में आ रही है। ये दुख की बात We will have a guide to each State’s affordable-health.info exchange up by September. है। हालांकि भाजपा की विचारधारा से मैं सहमत नहीं हूं पर इस विचार से सहमत हूं कि एक लोकतांत्रिक देश में सशक्त विपक्ष होना चाहिए। अफसोस भाजपा अपने कार्यकाल में सही भूमिका नहीं निभा सकी। आगे भी कम ही आशा है। मेरा मानना है कि भाजपा आरएसएस और उसके अनुषंगिक संगठनों से पिंड छुड़ाकर अपनी अलग राह पकड़े तो मजबूत विकल्प हो सकती है। मगर भाजपा की मजबूरी भी समझने लायक है। 21.6.09

कल जो सपना आया उसे पढ़कर तुम भी हंसोगे। क्या शाहरुख खान जैसा फिल्म स्टार अपने जीवन में ऐसे गर्दिश के दिन भी देखेगा कि उसे किसी दूसरे अभिनेता के ड्रायव्हर (ड्राइवर के मारठी हिज्जे) की नौकरी करनी पड़े। खुदा खैर करे! मगर सपने में मैंने देखा कि एक कार जा रही है। एक जगह कार रुक गई। पास खड़े मैंने देखा कि ड्रायव्हर की वर्दी पहने शाहरुख खान कार से उतरा और पीछे बैठे जेकी श्राफ को सलाम कर चलता बना। मैं हतप्रभ होकर सोचता रहा और नींद खुल गई, 5.35 22.6.09

दिनांक 30.4.09 को दिल्ली से आया था। तब से लेकर अब तक करीब 150 सौ से ज्यादा फिल्में देख चुका हूं। इनमें हिंदी, इंगलिश दोनों हैं। कला फिल्में, एक्शन, सामाजिक सभी तरह की देखता हूं। 70 से लेकर अब तक बनी सभी कला या समांतर फिल्में देखी हैं, अब भी आती हैं तो देखता हूं। हालांकि देखी फिल्मों का कोई विवरण मैं दर्ज नहीं करता हूं।

perfume-posterजून माह में देखी इंगलिश फिल्म परफ्यूम (सुगंधी, इत्र) अब तक स्मृति पटल पर छाई है। एक गुलाम बालक, जिसमें कुछ विलक्षणता भी थी, एक सुंदर महिला से बदसलूकी पर अपने मालिक से बुरी तरह पिटता है। फिर वहां से भाग जाता है और पैदल चलते-चलते फ्रांस के शहर (शायद पेरिस) पहुंचता है। वहां एक मशहूर परफ्यूमर के यहां नौकरी करता है। तरह-तरह के रसायनों को मिलाकर अद्भुत तरीके से इत्र बनाने की कला विकसित कर वह बालक (अब युवक) अपने मालिक को चमत्कृत कर देता है।

फिल्म में खतरनाक मोड़ तब आता है जब उस युवक के मन में यह धारणा बैठ जाती है कि सुंदर स्त्रियों का शरीर सुगंध से भरपूर होता है। फलस्वरूप वह सुंदर युवतियों का अपहरण कर अपनी प्रयोगशाला में लाता है। उन्हें गला घोटकर मार देने के पश्चात उनके वस्त्र उतारकर पूरे शरीर पर सफेद रसायनिक पदार्थ लगाता है। फिर उस रसायनिक पदार्थ को चाकू से खुरचकर शीशीयों में भरता है। तत्पश्चात उनसे अति सुगंधित इत्र तैयार करता है। मरी युवती को प्रयोगशाला के आंगन में गड्ढे में दफना देता है। इस तरह एक तरफ तो वह नायाब परफ्यूमर के तौर पर प्रसिद्ध होता जाता है तो दूसरी तरफ शहर से सुंदर युवतियां गायब होने के सिलसिले से खौफ छा जाता है। दहशत फैल जाती है। अंत में वह पकड़ लिया जाता है। मगर फिल्म का अंत हैरतनाक है।

उस परफ्यूमर को बुरी तरह जंजीरों में जकड़कर जनता के सामने फांसी पर लटकाने के लिए लाया जाता है। जल्लाद फांसी की तैयारी करता है और उसकी जंजीरें खोलता है। अचानक जल्लाद उस परफ्यूमर की आंखों में झांकता है और अपने दोनों हाथ बांधकर उसके सामने झुक जाता है क्योंकि उसमें उसे किसी मसीहा के दर्शन होते हैं। विशाल भीड़ जो यह दृश्य देख रही होती है सजदा करने वाली भीड़ में तब्दील हो झुक जाती है। फिल्म का यह अंत देख मैं भी हैरान रह जाता हूं। एक खूँखार हत्यारा सरेआम मसीहा में तब्दील हो गया। पता नहीं ये फेंटेसी है या इतिहास। मगर रोमांचक और रोंगटे खड़े कर देने वाली है। दुबारा यह फिल्म आई तो और ध्यान से देखूंगा।

जून 23, 2009

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here