संस्मरण : असहमति के सहयात्री

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राजेंद्र यादव को याद करते हुए

rajendra-yadav-samyantar-coverऐसा जीवंत व्यक्ति हिंदी में शायद ही दूसरा कोई हो। राजेंद्र जी अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो पिछले दो दशकों से हिंदी की प्राणहीन, रसहीन और आत्मकेंद्रित होती जा रही दुनिया को जीवंत बनाए रखने की हरचंद कोशिश करते रहे और काफी हद तक सफल भी हुए। आप, हमारे जैसे छिद्रान्वेषी लोगों की तरह, उनके तौर-तरीकों से असहमत हो सकते थे पर उन की मंशाओं से असहमत होना मुश्किल था। हिंदी जगत को समझने में देर नहीं लगेगी कि उसने किस तरह के आदमी को खो दिया है।

दिल्ली में क्या नहीं है! साहित्य अकादेमी, हिंदी अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ, बिड़़ला फाउंडेशन, इंदिरा गांधी कलाकेंद्र पर हंस के वार्षिकोत्सव में जितने लोग और जिस उत्साह से इकट्ठा होने लगे थे वैसे इन में से किसी के भी समारोह में शायद ही होते हों। यह दिल्ली के अकेले उत्सवों में से था जिसका लोगों को साल भर इंतजार रहता था। हंस, या कहना चाहिए यादव जी के प्रशंसक देश के न जाने किस-किस शहर से इस अवसर पर इकट्ठे होते थे। जरूरी नहीं था हर एक को निमंत्रण भेजा ही जाता हो या पहुंचता ही हो। आगरा, ग्वालियर, शिवपुरी या लखनऊ, पटना मुंबई की कौन बात करे एक सज्जन तो कहीं पश्चिमी एशिया से बिना नागा पिछले कुछ वर्षों से आया करते हैं। अगर ठीक से हिसाब लगाया जाए तो इन सब सरकारी अर्ध सरकारी संस्थाओं के समारोहों में साल भर में कुल जितने श्रोता/दर्शक इकट्ठे होते होंगे, उनसे ज्यादा लोग पिछले कुछ वर्षों से हंस के इस अकेले समारोह में शामिल होने लगे थे। सात सौ से हजार तक। ये वे संस्थाएं हैं जो साधन संपन्न हैं। पर दिक्कत यह है कि ये अपनी नौकरशाही से इतनी ग्रस्त हैं कि इनके कर्मचारी डायरेक्टर, सेक्रेटरी आदि स्वयं को भारत सरकार के तदनाम अधिकारियों से कम नहीं समझते।

इधर कुछ वर्षों से हंस के समारोहों में भी सरकारी समारोहों की तरह फोल्डर, बैग और पिछली बार तो एक बहुरंगी पुस्तक भी श्रोताओं को बांटी गई थी। वैसे जोरदार चाय-नाश्ता तो सदा रहता ही था। एक आध बार तो बढिय़ा भोजन भी मिला। इसके लिए उन्हें हर बार अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ते थे और यह संसाधन कोई बहुत सम्मानजनक स्रोतों से तो क्या ही आते होंगे। पर मेरा लगातार कहना था, यह सब जरूरी नहीं है। न कोई लेखक उनके बैग के लिए अपना सारा काम छोड़ कर हंस की गोष्ठी में आता था और न ही वहां की चाय-पानी के लिए। ये सब गैर महत्वपूर्ण बातें थीं। असली मुद्दा रहता था राजेंद्र यादव का आयोजन जिसमें हिंदुस्तान से लेकर पाकिस्तान तक, एक से एक वक्ता आया करते थे। यह एक मामले में हिंदी लेखकों के वार्षिक कुंभ में बदल गया था। लेकिन न जाने राजेंद्र जी का उत्सव प्रेमी मन इसे क्यों मानता ही नहीं था।

rajendra-yadav-with-ten-headsपर उनकी उपस्थिति हंस के वार्षिक समारोह तक ही सीमित नहीं रहती थी। वह हर जगह, जहां भी जो कोई भी उन्हें बुलाता था पहुंच जाते थे। विश्व पुस्तक मेले में दो वर्ष पहले तक हिंदी की पुस्तकों के विमोचन में आधी से ज्यादा किताबें उनके द्वारा विमोचित होती थीं। यही नहीं वही पहले आदमी थे जिसने अपने ड्राइवर से अपनी किताब का विमोचन करवा दिया था। विभिन्न सरकारी गैर सरकारी गोष्ठियों को भी वही जीवंत बनाते थे चाहे अपने वक्तव्यों से हो या अपनी किताबों से। काफी हाउस की दूसरी मंजिल पर भी वह होली के समारोह में भाग लेने पहुंच जाते थे। उनका जन्म दिन तो एक विशेष आयोजन होता ही था। उनका एक प्रेमी रमेश सक्सेना कब क्या कर दे कहा नहीं जा सकता था। कभी वह उन्हें बादशाही फर्सी भेंट कर देता था तो कभी दस सिर वाला रावण का मुखौटा पहना देता था। वह बिना हील हुज्जत के पहन लिया करते थे और सब के साथ मिल कर मजा लेते थे। उनका वह दस सिरधारी फोटो तहलका में कई बार छपा है।

कथाकार की कविताएं

दिल्ली में रहते हुए और साहित्य (हिंदी) का प्रेमी होने के बावजूद कोई राजेंद्र यादव को कैसे नजरअंदाज कर सकता था। जहां तक मुझे याद पड़ता है मेरा उनकी कहानियों से परिचय पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से 65-66 के आसपास हो ही गया होगा। बल्कि एक मामले में इसका श्रेय मेरे उन दिनों के मित्र मोहम्मद बसी को जाता है जो साहित्य का गजब का प्रेमी था पर पढऩे-लिखने या कहना चाहिए परंपरागत शिक्षा का दुश्मन। वह मुझ से छोटा था पर मेरा यार जासूसी दुनिया से लेकर हिंद पाकेट बुक्स की नई से नई किताब तक के बारे में मेरा ज्ञानवर्धन किया करता था। उर्दू के कई लेखकों और शायरों से तो मेरा परिचय उसी ने करवाया था। विशेष कर मंटो से। हम उन दिनों दिलशाद गार्डन में जहां रहते थे उसी के निकट जीटी रोड पर हिंद पाकेट बुक्स का बड़ा सा सुंदर प्रकाशन गृह था, कई एकड़ में फैला। मैं और बसी उसी रोड की जिस चाय की दुकान पर कभी समय काटने तो कभी क्रिकेट की कमेंट्री सुनने बैठा करते थे, उसी से हिंद पाकेट बुक्स के उस दूसरे मकान में भी चाय जाती थी जिसमें सुदर्शन चोपड़ा (शायद प्रकाश पंडित भी) आदि बैठा करते थे। यह दुकान ऐन ऐसी जगह थी जहां से वह फैक्ट्री, जिसमें बसी के पिताजी काम करते थे, कुछ कदम पर थी। बसी फैक्ट्री के अंदर ही रहता था। उसके पास एक साइकिल थी जो लगभग उसके शरीर का हिस्सा बन चुकी थी। वह उसे सर्कस के किसी कलाकार की तरह जैसे चाहे, जिधर को मोड़ सकता था और उसका लाभ उठाता हुआ वह अक्सर दुकान के लड़कों की जगह हिंद पाकेट बुक्स के दफ्तर स्वयं चाय देने चला जाया करता था और बदले में किताबें लाकर मुझे चकित किया करता था।

खैर, राजेंद्र जी की जो पहली किताब मैंने पढ़ी मुझे याद है वह सारा आकाश या जहां लक्ष्मी कैद है नहीं बल्कि आवाज तेरी है थी। उसे बसी नहीं लाया था बल्कि स्वयं मैंने दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की शाहदरा शाखा से चुना था जहां हम बेनागा जाया करते थे। जहां तक मुझे याद है उसे भारतीय ज्ञानपीठ ने छापा था। संभवत: जिस बात ने मुझे आकर्षित किया होगा, वह एक जाने-माने कथाकार के कविता में हाथ आजमाने के कारण हुआ होगा। तब तक मैंने कहानी लिखने की गंभीर कोशिश नहीं की थी। ईमानदारी की बात यह है कि मैंने शुरुआत कविताओं से की लेकिन वहां ज्यादा देर टिका नहीं।

एक गर्मजोश आदमी

लगभग 1970 से प्रकाशन विभाग की साहित्यिक पत्रिका आजकल से जुड़ जाने के कारण हिंदी साहित्यकारों से मेरा मिलना-जुलना और साहित्यिक गोष्ठियों में आना-जाना शुरू हो गया था। इस पर भी यह कहना आज थोड़ा मुश्किल है कि मैं उनसे पहली बार कब मिल पाया, क्योंकि ज्यादातर मैं अपनी पीढ़ी के युवा लोगों के बीच रहता था और उनकी संख्या कोई कम नहीं थी- इब्बार रब्बी, इब्राहिम शरीफ, मंगलेश डबराल, गिरधर राठी, रामशरण जोशी, असगर वजाहत, आनंद स्वरूप वर्मा, असद जैदी, पंकज सिंह, रमेश बिष्ट, श्याम बिहारी राय, गौरीशंकर कपूर आदि। हमारी दुनिया कमोबेश काफी हाउस तक सीमित थी। पर ऐसा भी नहीं है कि मैं राजेंद्र जी की गतिविधियों से अपरिचित था या कहना चाहिए अपरिचित रह ही नहीं सकता था।। वह अक्षर प्रकाशन चला रहे थे और कुछ बहुत चर्चित किताबें उन्होंने इस बीच निकाली थीं। इन में से दो मुझे याद हैं – पहली अज्ञेय की कविताओं का संग्रह – आंगन के पार द्वार, जिसमें उनके अपने खींचे पूरे-पूरे पृष्ठों के छाया चित्र थे और दूसरी थी, विभिन्न रचनाकारों की कहानियों का संग्रह। इसमें यादव जी की लंबी भूमिका थी और शीर्षक था – एक दुनिया समानांतर। पर इस दौरान, यानी कि 80 के दशक के शुरू तक, मैं शायद ही कभी अक्षर प्रकाशन के अंसारी रोड, दरियागंज स्थित कार्यालय गया होऊंगा।

उनसे मेरी मुलाकात चाहे जब भी हुई हो जो बात मुझे याद रहती है वह है उनसे हाथ मिलाने की। वह बहुत गर्मजोशी से मिलते थे फिर आप चाहे उनसे उम्र में या प्रतिष्ठा में, कितने भी छोटे और सामान्य आदमी क्यों न हों। उनके पंजे बड़े और भरे हुए यानी गद्दीदार थे। किसी का भी हाथ उनके हाथ में समा जाता था। उसकी ऊष्मा देर तक आपके साथ रहती थी और एक तरह से धीरे-धीरे आप में रच बस जाती थी, खूबसूरत स्मृतियों की तरह। वह लंबी-चौड़ी कद काठी के भव्य व्यक्तित्ववाले आदमी थे जिसकी वजनदार आवाज आपको प्रभावित किए बिना नहीं रहती थी। मुझे लगता है उनकी यही गर्मजोशी और भव्यता अक्सर लोगों को बांध लिया करती थी। उनकी शारीरिक सीमाएं, विशेषकर उनके दायें पैर पर कृत्रिम पैर का लगा होना और उनका छड़ी लेकर चलना उन्हें उन दिनों किसी भी रूप में सहारे का मोहताज नहीं बनाता था।

मुझे याद आ रहा है कि एक बार जरूरत पडऩे पर मैंने उन्हें अपनी मोटर साइकिल पर बैठाकर मंडी हाउस में कहीं छोड़ा था। यह बात 87 या 88 की होनी चाहिए। उन दिनों मेरे पास एक यज़्दी हुआ करती थी। दूसरे शब्दों में तब वह अपने पैर के कारण किसी भी रूप में असहाय या असमर्थ नजर नहीं आते थे। संभव, मैं फिर दोहराना चाहता हूं, बहुत संभव है, कि महिलाओं को यह सारे घटक आकर्षक लगते हों। असंभव नहीं कि उनकी बौद्धिकता और वाक् पटुता जिसमें घातक आसव का काम करती हो। सबसे बड़ी बात थी उनका अनुनयन का गुण। वैसे भी सामान्यत: माना जाता है कि महिलाओं के मामले में वही सफल भी होते हैं जो हार नहीं मानते। अपने इसी व्यसन के चलते उन्होंने कई औरतों को – घर से बाहर तक – लेखिका बनाया या बनाने की कोशिश की।

अपने लगभग चार दशक के संपर्क काल में मैंने उनसे कभी नहीं पूछा कि आप के पैर को क्या हुआ? एक मामले में मुझे एक लेखक से यह पूछना जरूरी भी नहीं लगा था। यह उसकी निजी दुनिया थी और मैं एक पाठक या बहुत हुआ तो एक कनिष्ठ लेखक था जिसे उनकी रचनाओं को समझना, उनका आनंद लेना और जहां तक हो सके उनसे सीखना था। गोकि पहले मैं सोचा करता था वह जन्म से ही ऐसा पैर लेकर पैदा हुए होंगे या फिर पोलियो का शिकार हो गए होंगे। पर अन्य प्रसंगों से मुझे यह बात पता चल गई थी कि उनका पैर हाकी की मारा-मारी में टूटा और फिर, घर में डाक्टर होने के बावजूद, कभी ठीक नहीं हो पाया। उन्होंने किसी को ठीक से बतलाया ही नहीं कि उनके साथ वास्तव में हुआ क्या था?

काले बालों का कमाल

अपने शरीर को लेकर वह अत्यधिक सचेत रहते थे। उनके बाल सदा करीने से कढ़े ही नहीं होते थे बल्कि अंतिम दिन तक बाकायदा डाई किए हुए थे। उनकी दाढ़ी बहुत सलीके से बनी होती थी। इसके लिए कस्टम के एक अधिकारी मित्र से बढिय़ा विदेशी ब्लेडें जुटाया करते थे। उनके साथ कई जगह जाना हुआ। यात्राओं में भी वह सबसे पहले दाढ़ी बनाना नहीं भूलते थे। इस संदर्भ में एक वाकया याद आ रहा है।

पांच-छह साल पुरानी बात है। एक दिन सुबह दस बजे के आसपास हम किसी कार्यक्रम में जा रहे था। जैसा कि होता है, प्रगति मैदान के निकट पुराने किले के पीछे बहुत भीड़ थी। अचानक पीछेवाली गाड़ी ने हमारी गाड़ी में टक्कर मार दी। किशन गाड़ी चला रहा था। ऐसी कोई जोर की टक्कर नहीं थी। पिछले बंपर पर दायीं ओर थोड़ा लग गई थी। दोनों ड्राइवर उतरे। दूसरा ड्राइवर नया-सा लड़का था। काफी हद तक अनाड़ी। दूसरी गाड़ी का मालिक उतरा तो मुझे भी उतरना पड़ा। थोड़ी देर झकझक हुई पर मामला तैय हो गया। पर इस बीच एक मजेदार बात हो चुकी थी। मैं गाड़ी में बैठा तो यादव जी ने हंसते हुए पूछा, तुमने सुना, वह साहब मुझ से क्या कह रहे थे?

क्या, मैं ने पूछा। असल में मैं ड्राइवरों में ही इतना उलझ गया था कि कुछ सुन ही नहीं पाया। बोले, वह कह रहे थे अरे आप अजीब आदमी हैं! इतने बुजुर्ग को आपने उतार दिया है और खुद जमे हुए हैं। आप उतरिये न।

सफेद बालों और दाढ़ी के कारण उन सज्जन ने मुझे यादव जी का बुजुर्ग मान लिया था। हम तीनों जन खूब हंसे। पर यादव जी ने यह वाकया कई दिनों तक याद रखा और कई लोगों को मेरे सामने सुनाया। उन्हें इसे सुनाने में बड़ा मजा आता था। एक मामले में यह प्रसंग मेरे लिए उनके युवतर दिखने की कामना का प्रमाण-सा बन गया था। जैसा कि मैंने कहा है, उन्हें अपने शरीर से विशेष लगाव था। पिछले ही वर्ष उन्होंने एक दिन पूछा, तुम्हारी उम्र क्या है? मैंने बतलाया 66 वर्ष। बोले अभी तुम्हारे पास कम से कम दो दशक और हैं।

मैंने कहा, हिंदी साहित्य की छाती पर मूंग दलने के लिए? बोले, नहीं काम करने के लिए। फिर हंस कर कहा था, वैसे तुम जो समझो। उनकी हंसी में कहीं गहरे एक अफसोस था, जिसकी कंपन मैं देर तक महसूस करता रहा। पर यही हमारी नियति है, बदलाव। मुझ यह स्वीकार करने में कभी, अफसोस नहीं रहा है।

लेकिन इस का अर्थ यह भी नहीं है कि मैं ही सही हूं। एक अर्थ में राजेंद्र जी जाते हुए समय को पकड़ लेना चाहते थे। उसके हर पल का आनंद लेना चाहते थे। वह आदमी की सीमा को – फिर चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक – न तो मानना चाहते थे न समझना। यह अपने आप में किसी निजी व्यक्ति या समाज के लिए दार्शनिक और आध्यात्मिक संतुष्टि का कारण हो सकता हैपर अखिल मानवीय स्तर पर शारीरिक सीमा अपने आप में आदमी ने कभी स्वीकार नहीं की है और न ही करेगा। इसलिए राजेंद्र जी की जीवित रहने की बेचैनी मूलत: आधुनिक मानव की जिजीविषा कही जा सकती है। उसकी सीमाएं हो सकती हैं, पर यही उसकी जीवनी शक्ति है। उसकी वास्तविक ‘ड्राइविंग फोर्स’।

मैं अक्सर सोचता हूं कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? अपने पांव की चोट के बारे में सही-सही क्यों नहीं बतलाया होगा? क्या उन्हें अपने घरवालों पर यकीन नहीं था? क्या उनके पिता बीसवीं सदी के आततायी सामंती पिताओं में थे, जिससे संवाद ही संभव नहीं हुआ करती थी? जो भी हो, इससे एक बात, और यह बहुत महत्वपूर्ण है, तो समझ में आती ही है कि वह अपने निजी संकटों में कम ही लोगों भागीदार बनाते थे। उनकी निजी दुनिया में शायद ही किसी को प्रवेश का अधिकार था। यह उनकी असुरक्षा और अविश्वास से भी जुड़ा हो सकता है। और उनके अति आत्मविश्वास या अहं से भी इसका संबंध हो सकता है। इसलिए अक्सर ये संकट जब सुलझते नहीं थे तो ज्यादा जटिल हो जाते थे। उनकी जो तथाकथित जीवनियां या उसके टुकड़े मिलते हैं वे उनके बचपन और परिवार के बारे में विस्तार से कुछ नहीं कहते। इनमें से अधिकांश में उनके वयस्क जीवन के वे किस्से हैं जो मूलत: साहित्य और प्रेम संबंधों से जुड़े हैं। नतीजा यह है कि उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में हम बहुत कम जान पाते हैं। कुछ संदर्भ अगर आए भी हैं तो बहुत ही उड़ते-उड़ते। एक मामले में वह काफी कुछ छिपा रहे से प्रतीत होते हैं।

उनकी किशोरावस्था की इस चूक ने, जिसके कारण उन्हें अपनी टांग गंवानी पड़ी, उनके शरीर को आखरी दौर में जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया। कुछ वर्ष पहले उन्होंने अपने सही पैर के घुटने का ऑपरेशन भी करवाया था। साफ था कि उस पर जरूरत से ज्यादा भार पड़ता था। वह सुबह एक्सरसाइकिल पर व्यायाम भी करते थे। पर एक पैर की कमी को ये सब बातें पूरा नहीं कर पाईं। अगर उनके दोनों पैर सही होते तो कहा नहीं जा सकता कि हिंदी साहित्य में उनकी भूमिका क्या रही होती। पर यह जरूर कहा जा सकता है कि वह अभी कम से कम दस वर्ष और जीवित रहते। अंत के दिनों में वह कई बीमारियों से ग्रस्त थे, जो बुढ़ापे से जुड़ी होती हैं पर जिन्हें व्यायाम आदि की छोटी-मोटी सावधानियों से नियंत्रित किया जा सकता है।

टकराव की शुरुआत

अजीब विडंबना है कि मेरा उनसे जो पहला वास्तविक संपर्क हुआ वह लगभग टकराव के साथ हुआ। संभवत: यही हमारी नियति थी। गो कि कई वर्ष, संभवत: दो दशक, पहले की बात है। एक बार उन्होंने अपने घर में एक छोटी-सी बैठक के दौरान ऐसा कुछ अनजाने कह भी दिया था और जिसे मैं भूला नहीं। हुआ यह था कि किसी बात पर उन्होंने और मैंने लगभग एक साथ ही और एक-सी राय रखी। इस पर मैंने मजाक किया, ”ग्रेट मैन थिंक ए लाइक।’’

वे भी चुप नहीं रहे। उन्होंने तत्काल कुछ ऐसा कहा था जिसका अर्थ था, कि बेवकूफ ही सदा एकमत रहते हैं (‘एंड ओनली फूल्स ऑलवेज एग्री’, जैसा कुछ)।

सन् 1982 की बात है। लेकिन दरवाजा विचारार्थ राधाकृष्ण प्रकाशन के पास था। एक दिन अरविंद कुमार (तब वही उस प्रकाशन के मालिक थे) का फोन आया कि वह उपन्यास के संदर्भ में कुछ बात करना चाहते हैं। मैं शाम को उनके दफ्तर दरियागंज पहुंचा। वह बोले, आपके उपन्यास में बारे में कहा गया है कि उस पर मोहन राकेश के उपन्यास अंधेरे बंद कमरे की छाया है। मैं अभी कुछ समझ पाता कि अरविंद कुमार बोले, देखिये उपन्यास तो हम छाप रहे हैं, पर अगर इससे बचा जा सकता है, तो बेहतर होगा। मैंने उनसे एक सप्ताह की मोहलत मांगी और किसी तरह ढूंढकर अंधेरे बंद कमरे पढ़ा। असल में मैंने तब तक वह उपन्यास पढ़ा ही नहीं था, इसलिए उसकी छाया का होना अपने आप में नामुमकिन था। पर लोग यह तो तब भी कहते थे और अब भी कहते हैं कि कई बार नकल न होने के बावजूद समकालीन लेखक, एक-सी घटनाओं की रचना कर देते हैं। खैर, मैं तीन दिन बाद प्रकाशक के यहां पहुंचा और अरविंद कुमार से छूटते ही कहा, जिस आदमी ने आप से यह कहा है कि मेरे उपन्यास में अंधेरे बंद कमरे की छाया है उसने न तो मेरा उपन्यास पढ़ा है और न ही अंधेरे बंद कमरे। मुझे यह बात बेइंतिहा नागवार गुजरी थी। मेरे उपन्यास में पहले के उपन्यासकारों का प्रभाव नहीं होगा, ऐसा नहीं था, पर उसमें नकल जैसी कोई चीज हो सकती है, यह मैं मानने को तैयार नहीं था। वैसे भी नकल एक मायने में मेरी निष्ठा पर अंगुली उठाना और मेरी नैतिकता को चुनौती देना था।

अरविंद कुमार ने हंसते हुए कहा, अरे बाप रे! निश्चय ही वह मेरे उत्तर से प्रसन्न थे। पर प्रत्यक्षत: बोले, सोच लीजिए आप क्या कह रहे हैं।

मैंरा उत्तर था, जो भी कह रहा हूं सोच कर ही कह रहा हूं।

इस पर उन्होंने अपनी मेज की दराज खोली और उसमें से एक पत्र निकाल कर मेरे हाथ में थमा दिया। टाइप किया हुआ वह पत्र मूलत: मेरे उपन्यास के बारे में विशेषज्ञ की राय थी जिसमें लिखा हुआ था कि उपन्यास पठनीय है, छापा जा सकता है पर इसमें अंधेरे बंद कमरे की छाया है, जिससे बचा जा सकता, तो बेहतर होता।

संस्तुति करनेवाला और कोई नहीं राजेंद्र यादव थे। अरविंद कुमार ने मुस्कराते हुए पूछा, अब आप क्या कहेंगे?

मैंने बिना एक क्षण लगाए कहा, आप मेरी बात को दोहरा दीजिएगा।

यह बात, मई या जून की होनी चाहिए। अक्टूबर में लेकिन दरवाजा छप गया था। मेरे और अरविंद कुमार के बीच जो बातचीत हुई वह भी मैं भूल चुका था। उपन्यास का स्वागत हुआ था यही मेरे लिए काफी था और मैं उसी में मगन था।

एक महत्त्वपूर्ण पत्र

मई 83 की बात है। मुझे एक पत्र घर के पते पर मिला। यह पत्र राजेंद्र जी का था। मैंने अपने जीवन में बहुत कम पत्रों को संजोया हुआ है। उनमें से यह सबसे पुराना और विरल पत्र है। जो इस प्रकार है:

राजेंद्र यादव

दिनांक: 18.5.83

प्रिय बिष्ट,

सबसे पहले तो मुझे स्वीकार करना चाहिए कि तुम्हारे उपन्यास लेकिन दरवाजा पर मेरी धारणा गलत थी, लेकिन उसके लिए सिर्फ मैं ही जिम्मेदार नहीं हूं। उपन्यास अभी अभी मैंने दोबारा पढ़ा है। जो पहले पढ़ा था उसमें काफी कुछ संशोधन-संपादन किया गया है। यानी अब यह सचमुच एक विशिष्ट रचना है।

मुझे कतई विश्वास नहीं था कि तुम महानगर के बौद्धिक विघटन को इतनी खूबसूरती और बारीकी से चित्रित कर सकोगे। इस उपन्यास को पढऩा बहुत ही समृद्ध अनुभव से गुजरना है और हर अच्छी रचना की तरह पढ़ते हुए यही सवाल मन में पैदा होता रहा है: यह आदमी अपने को जिस खुले ढंग से लुटा रहा है, वह अगली रचनाओं में क्या करेगा? मुझे विश्वास है कि मेरी आशंका को झूठा होने का मौका दोगे।

जिन प्रभावशाली और सांकेतिक रेखाओं के साथ तुमने अपने और नीलांबर के व्यक्तित्व ह्रास को उकेरा है वह सिर्फ ईर्ष्या ही जगा सकती है। बहुत से पाठकों को अति-बौद्धिकता की शिकायत भले ही हो। ऐंबेसियों और बड़े पत्र संस्थानों का रोल भी इसमें रहता तो ज्यादा अच्छा होता। बहरहाल, जो जैसा है, उसके लिए सिर्फ तुम्हें बधाई दी जा सकती है।

मैं आभारी हूं कि तुमने मुझे अपनी राय संशोधित करने का अवसर दिया। नई कृति की प्रतीक्षा के साथ।

सस्नेह

(राजेंद्र यादव)

पत्र किसी पुराने घिसे टाइपराइटर पर उतने ही पुराने रिब्बन से टाइप किया गया था। इस में कम से कम नौ जगह संशोधन हैं। कुछ टाइपिंग की गलती के कारण और कुछ अक्षरों के न उभरने के कारण। कह नहीं सकता वह स्वयं टाइप करते थे या स्टेनो रखा हुआ था। इन तीस वर्षों में पत्र का कागज तो पीला पड़ ही गया है उसके अक्षर भी खासे कमजोर हो गए हैं। पर लैटर हैड के ऊपर अंग्रेजी में लाल हर्फों में लिखा ‘राजेंद्र यादव’ नाम जरूर स्पष्ट पढ़ा जा सकता है।

मैंने इस पत्र का आज तक कभी भी सार्वजनिक इस्तेमाल नहीं किया। साहित्यिक होने के बावजूद यह एक निजी पत्र था। हां, बातों में इसका अवश्य जिक्र किया है। अब यादव जी नहीं हैं और लेकिन दरवाजा, बल्कि कहना चाहिए उसके लेखक का भी, जो होना था हो चुका है। मैंने उनको इसका जवाब भी नहीं लिखा पर निजी बातचीत में अवश्य स्पष्ट किया कि पांडुलिपि में कोई भी मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया है। वैसे भी प्रकाशक को जो पांडुलिपि देखने को दी थी वह कुल मिलाकर अंतिम नहीं थी। बाद में उसमें वर्तनी आदि का बदलाव और कुछ भाषागत संपादन जरूरी था। पर वह मेरी बात से पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाए थे। वैसे भी मैं इतने बड़े लेखक को झूठा साबित करने की सोच ही नहीं सकता था। अगर मैंने कोई सुझाव माना होता तो अवश्य स्वीकार करता।

पर यहां यह कोई मुद्दा नहीं है। असल बात यह है कि राजेंद्र जी को मेरी बात लगभग साल भर तक कचोटती रही होगी। मुझे नहीं लगता कि अरविंद कुमार ने उन्हें मेरी बात पहुंचाने में ज्यादा देर की होगी। अरविंद कम शरारती नहीं हैं। फिर बात थी भी मजेदार। वैसे भी लोगों को – जिसमें मैं भी शामिल हूं – यादव जी को छेडऩे में मजा भी कम नहीं आता था, क्यों कि वह भी ऐसे अवसरों को जाने नहीं देते थे। उनसे कोई भी, कभी भी, कुछ भी कह सकता था और कह देता था। पर असली बात यह है कि यादव जी ने जिस तरह से पूरे मसले को लिया और फिर एक तरह से अपनी गलती स्वीकारी, वह उनका बड़प्पन था। निश्चय ही उन्होंने मेरी हौसला अफजाई की पर इस प्रक्रिया में स्वयं को पूरी तरह खुला छोड़ दिया (वलनरेबुल)। मैं इसका लाभ अपने अहं की तुष्टि के लिए उठा सकता था और उनका मजाक उड़ा सकता था। पर पत्र ने मुझे उनका आजीवन भक्त बना दिया। यह पत्र उनकी ईमानदारी और साहस दोनों का प्रमाण है।

पर मेरे और उनके बीच यह अंतिम पत्र व्यवहार नहीं था। अगले जो दो पत्र व्यवहार हुए वे कहीं ज्यादा कटु थे। एक ही शहर में रहते हुए पत्र लिखने की नौबत आना, सामान्य स्थिति हो भी नहीं सकती थी।

नैतिकता के दंड की अवधारणा

जैनेंद्र कुमार की दूसरी बरसी पर 24 दिसंबर 1990 को उन्हें श्रद्धांजलि देने त्रिवेणी सभागार मंडी हाउस में एक सभा का आयोजन था। वक्ताओं में राजेंद्र यादव और योगेश गुप्त के अलावा शैलेश मटियानी तथा प्रणवकुमार वंद्योपाध्याय भी थे। उस शाम बड़ी ठंड थी और हाल में ज्यादा लोग नहीं थे। पहले योगेश गुप्त ने, जो जैनेंद्र जी के लेखन से खासे प्रभावित रहे और उनके साथ पूर्वोदय प्रकाशन में काम भी किया था, अपनी बात रखी। उन्होंने बिस्मिला ही गलत की। उनका कहना था, यद्यपि जैनेंद्र जी एक महान प्रतिभा थे, एक साहित्यिक के रूप में उनमें सहिष्णुता भी थी पर वे सरासर दो स्तरों पर जीनेवाले आदमी थे। उनका गांधीवाद सदा उन पर हावी रहता था। जब कभी वह अपनी विचारधारा के आग्रह से उबर पाये उन्होंने बेहतर साहित्य रचा। योगेश गुप्त ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि यह उन की समझ में नहीं आता कि ऐसे व्यक्ति (जो जिंदगी भर अहिंसा और गांधीवाद का नाम लेता रहा हो) का अंत इस तरह का क्यों हुआ? गुप्त का सीधा संकेत जैनेंद्र जी के वाणी-विलोप की ओर था।

राजेंद्र यादव ने कमोबेश योगेश गुप्त की अवधारणा को तार्किक परिणति तक पहुंचाते हुए कहा, जब हम अपने किसी एक अंग से जबर्दस्ती करते हैं तो शरीर का वह अंग प्रतिकार करता है। जैनेंद्र जी की वाणी के संदर्भ में वही हुआ। उन्होंने कभी वह नहीं कहा जो वह कहना चाहते थे। एक तरह से उन्हें दंड मिला।

एक अजीब किस्म की मनोवैज्ञानिकता और तार्किकता के तहत कही जाने के बावजूद ये बातें, इस हद तक असहनीय हो गई थीं कि लगभग हर श्रोता कसमसाने लगा था। पर तभी राजेंद्र जी को बीच में ही टोकते हुए वीरेंद्र जैन उठे और बोले आपकी टांग इसलिए टूटी कि आप बहुत ज्यादा नहीं घूमते थे?

यादव जी ही नहीं बल्कि पूरा हॉल स्तब्ध हो गया। ऐसी हिंसक प्रतिक्रिया की शायद ही किसी को उम्मीद रही हो।

पर यादव जी को संभलने में देर नहीं लगी। उसके बाद उन्होंने अपनी बात जितने संक्षेप में हो सकती थी रखी। सभा को उखडऩे में देर नहीं लगी। उस माहौल की अजीब-सी कड़वाहट दिलो-दिमाग पर कई दिनों तक छायी रही। इस पूरे मुद्दे पर बाद में मैंने एक लेख स्टीफन हॉकिंग का संदर्भ उठाते हुए लिखा, जिसमें दोनों ही पक्षों को लताड़ा था। हॉकिंग की किताब ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम हाल ही में आई थी और खासी चर्चा में थी। मेरा कहना था कि शरीर अपने आप में उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि हमारा मस्तिष्क। अगर वह सक्रिय है तो शरीर को महत्व देना गैरजरूरी है। हॉकिंग का शरीर काम नहीं करता, इस पर भी विज्ञान की दुनिया उन्हें न्यूटन से आगे का वैज्ञानिक मानती है और पश्चिमी समाज ने उनकी प्रतिभा का लाभ उठाने के लिए उनकी शारीरिक अपंगता पर विजय पाने के लिए कई उपकरण बनाए हैं। दूसरी ओर हमें इतना असहिष्णु भी नहीं होना चाहिए कि हम किसी और को अपनी बात, फिर चाहे वह कितनी ही गलत क्यों न हो, कहने ही न दें। शालीनता और शिष्टाचार की सीमाएं इस तरह नहीं तोड़ी जानी चाहिए। इसके बाद जब राजेंद्र जी मुझे मिले तो बोले, यार तुम भी न जाने कहां-कहां से संदर्भ ले आते हो। निश्चय ही उन्हें अपनी बात का कटना बहुत भाया नहीं था।

इस प्रसंग को मैं इसलिए याद कर रहा हूं क्योंकि उन दिनों वह योगेश गुप्त के काफी निकट थे और मुझे लगता है उनके खासे प्रभाव में भी थे। योगेश गुप्त अपने अमूर्त और काफी हद तक एब्सर्ट विचारों के लिए सुपरिचित थे। कुछ मनोविज्ञान कुछ मार्क्सवाद का एक अपने ही किस्म का चिंतन था जो उन्होंने विकसित किया हुआ था। यादव जी को यह संभवत: इसलिए पसंद आया होगा क्योंकि यह उनके अति नैतिकतावाद के विरोध के अनुकूल था। वह हर नैतिकता को आर्यसमाजी नैतिकता से जोड़ देते थे। हो सकता है उनका परिवार आर्यसमाजी रहा हो या उस पर आर्यसमाज का प्रभाव रहा हो। वह अक्सर नैतिक कट्टरता का विरोध करने के लिए आर्यसमाज के भजन और गीतों की पंक्तियों की पैरोडी कर दिया करते थे। पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि उस दौर में पश्चिमी भारत, विशेषकर हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तत्कालीन पश्चिमी भारत जिसमें विभाजन से पूर्व का सारा पंजाब शामिल था और विशेषकर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खासतौर पर पिछड़ी (ओबीसी) जातियों में आर्यसमाज का खासा प्रभाव था। कहना मुश्किल है कि राजेंद्र जी के उदारवाद का सीधा संबंध आर्यसमाजी कट्टरता की प्रतिक्रिया से था या प्रगतिशील उदारता से। पर यह कहना जरूर मुश्किल है कि मार्क्सवाद या कम्युनिज्म का उन पर कितना प्रभाव था। था भी या नहीं। वह कम्युनिस्ट थे भी तो बहुत ही हाशिये के। वैसे एक हद तक उन्हें पश्चिम के चमकीले विचार (फैंसी आइडियाज) जरूर आकर्षित किया करते थे। उन्हीं की तर्ज पर हंस की कुछ लेख मालाएं भी देखी जा सकती हैं। इन्हीं के चलते उनका यह चरम विश्वास था कि कोई भी अच्छा लेखक सीधा-सरल और नियम धरम माननेवाला हो ही नहीं सकता। दूसरे शब्दों में कोई लेखक उनकी नजरों में तभी अच्छा हो सकता था जब उसमें कोई न कोई पेंच हो, कोई दुष्टता हो। बिना जटिलता का व्यक्ति रचनात्मक नहीं हो सकता यह उनका खुले आम मानना था।

इस बीच हंस को निकले सवा दो वर्ष हो चुके थे और धीरे-धीरे वह नारी, दलित और उदार विचारों, जिसमें धार्मिक संकीर्णता और सांप्रदायिकता विरोध विशेष रूप से मुखर था, के मंच के रूप में विकसित होता जा रहा था। इसका एक कारण यह भी था कि एक मामले में यह दौर विशेषकर दलित और नारीवादी उभार का था। हंस ने इसे एक राह प्रदान की।

हंस और परंपरा का सवाल

एक बात जो मुझे सदा अजीब लगती रही है वह थी उनका नए हंस को प्रेमचंद के हंस से जोडऩे की। इसे वह क्यों पुराने हंस का पुनर्प्रकाशन कह रहे हैं, यह बात मेरी समझ में कभी नहीं आई? राजेंद्र जी ने इस बात तक का ध्यान रखा कि उनके हंस का विमोचन भी ठीक प्रेमचंद के जन्म दिन (28 31 जुलाई ) पर ही हो। मेरा सदा यह मानना रहा है कि कम से कम हिंदी का लेखक होने के नाते और अपने विचारों तथा लेखन में स्वयं को जनता से जुड़ा मानने के बाद, कौन-सा ऐसा कथाकार है जो प्रेमचंद से नहीं जुड़ा है। ‘हंस’ नाम का भारतीय साहित्य, विशेष कर हिंदीवालों के लिए ऐतिहासिक और भावात्मक महत्व है। यह नाम रखना अपने आप में बढिय़ा विचार है पर यह कहना कि नया ‘हंस’ पुराने ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन है, गैर जरूरी है। वह अपने ‘हंस’ के विषय-सूचीवाले पृष्ठ पर ऊपर ही ‘संस्थापक प्रेमचंद 1930’ छापते रहे। आखिर इस ‘गिमिक’ की क्या जरूरत थी!

सच यह है जिस हंस को प्रेमचंद ने चलाया था वह कुछ ही वर्ष रह पाया। बाद में उनके बेटे अमृत राय ने उसका पुनर्प्रकाशन किया। पर वह भी ज्यादा नहीं चला। इसके बाद वह अमृत राय परिवार के नाम पंजीकृत नहीं रह पाया और अंतत: स्वतंत्र हो कर दिल्ली के हंसराज कालेज के पास पहुंच गया था। 1987 तक कालेज इसी नाम से अपनी वार्षिक पत्रिका हंस निकालता था। राजेंद्र जी ने वह नाम उसी कालेज से लिया था।

यह तो वैसा ही हुआ कि आज कोई सरस्वती शुरू कर दे और इसे महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती का पुनर्प्रकाशन कहने लगे। इसका क्या अर्थ होगा? कुल मिला कर मेरा कहना था कि राजेंद्र जी स्वयं इतने बड़े लेखक हैं, उनका काम बोलेगा और बतलाएगा कि वह प्रेमचंद के कितना निकट हैं।

कंस की अधूरी कहानी

पर सच कुछ और भी है। वह है हंस को एक सफल व्यावसायिक पत्रिका बनाने की इच्छा। या कहिए वह असफल अक्षर प्रकाशन को हंस के माध्यम से एक सफल व्यावसायिक प्रकाशन के रूप में खड़ा करने की मंशा भी रखते थे और इसके लिए हर संभव कोशिश कर रहे थे। इस संदर्भ में मुझे एक व्यक्ति की याद आ रही है। उसका नाम भूपेंद्र कुमार स्नेही था। उन्हें मैं एक अर्से से जानता था। वह मूलत: गीतकार थे। मनोहरश्याम जोशी ने, जो उन दिनों साप्ताहिक हिंदुस्तान का संपादन कर रहे थे, दिल्ली में हुए एक हाई प्रोफाइल दहेज हत्याकांड की रिपोर्टिंग स्नेही से करवाई। उन्होंने रिपोर्टिंग ऐसी काव्यात्मक भाषा में की कि पूरी शृंखला, जो कई अंकों में चली, हिट हो गई। उसके बाद तो वह इस तरह की रिपोर्टिंग के विशेषज्ञ हो गए। लखनऊ के डा. गौतम हत्याकांड और न जाने किस किस हत्याकांड पर उन्होंने धारावाहिक लिखे। इसी के चलते उन्हें माया-मनोहर कहानियां वालों ने पकड़ लिया। जैसे ही आपातकाल हटा स्नेही को, जो उन दिनों डाकतार विभाग की पत्रिका में काम कर रहे थे, अपना दिल्ली प्रतिनिधि बना लिया। उन्हीं के नेतृत्व में माया कहानियों की पत्रिका से बदल कर राजनीति की पत्रिका बनी। उस दौर में मनोहर कहानियां चार लाख के आसपास बिका करती थी और माया डेढ़-दो लाख, जो अपने तरह के प्रतिमान थे। मनोहर कहानियां शुद्ध अपराधों की पत्रिका थी।

हाल ही के अपने लेख ((‘राजेंद्र यादव होने का अर्थ’, जनसत्ता 3 नवंबर 2013) में राजेंद्र जी के मित्र और कवि अजित कुमार ने अक्षर प्रकाशन में हंस के प्रकाशन की तैयारियों के बारे में होनेवाली मीटिंगों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण वाक्य लिखा है, ”… मैं उसकी लंबी तैयारी के दौरान ही राजेंद्र का साथ दे सका जब कि सर्वश्री ललाणी, उमराव सिंह आदि मित्रों के साथ ‘कंस’? या ‘हंस’? की लंबी चौड़ी उत्तेजक बहसें हुआ करती थीं…?’’ इस वाक्य से थोड़ा भ्रम पैदा होता है मानो ‘हंस’ या ‘कंस’ निकालने के बीच द्वंद्व था। पर मसला ऐसा नहीं था। मसला था ‘हंस’ के साथ ‘कंस’ भी निकालने का।

उन मीटिंगों में, जिनका जिक्र अजित कुमार ने किया है, एक और सज्जन भी शामिल हुआ करते थे वह थे भूपेंद्र कुमार स्नेही। यह बात मुझे स्नेही ने स्वयं तभी बतला दी थी कि वह राजेंद्र यादव के दफ्तर में बुलाए जाते हैं। गोकि बतलाई बहुत ही सरसरी तौर पर थी। वैसे तब तक मेरी और स्नेही की दूरी बढऩे लगी थी। उन्होंने ही बतलाया था कि हंस के साथ कंस निकालने की योजना है। मुझे यकायक इस बात पर यकीन नहीं हुआ था कि एक इतना स्थापित और गंभीर लेखक कंस जैसी पत्रिका के बारे में सोच भी सकता है! कुल मिला कर उसे अपराध और रहस्य व रोमांच की पत्रिका होना था। मुझे लगा था स्नेही अपने को बेमतलब महत्व दे रहा है। पर अब समझ में आता है कि यह संभवत: इसलिए भी था कि माया-मनोहर कहानियां प्रकाशन पारिवारिक झगड़ों की वजह से संकट की ओर जा रहा था और अंतत: बंद हो गया। स्नेही चूंकि खाली थे या बेरोजगारी की ओर बढ़ रहे थे इसलिए उन्हें इस योजना से जोड़ लिया गया होगा। कहा नहीं जा सकता कि कंस की यह योजना वास्तव में किसकी थी, राजेंद्र जी की या उनके व्यापारी मित्र ललाणी या उमराव सिंह की जो चाहते होंगे कि साहित्यिक हंस अपने पैरों पर खड़ा हो सके। जो भी हो, एक मामले में जिसने भी योजना बनाई थी, बाजार का सही आंकलन किया था। उसके बाद क्या हुआ कहा नहीं जा सकता। वैसे भी किसी प्रकाशन गृह के लिए सिर्फ एक ही पत्रिका पर निर्भर रहना, व्यावसायिक रूप से लाभप्रद नहीं होता है। संभवत: यही कारण रहा होगा कि अक्षर प्रकाशन से बाद में एक और पत्रिका गौतम नवलखा के संपादन में सांचा नाम से भी निकाली गई थी। यह हिंदी में अपने तरह की गंभीर राजनीतिक-सामाजिक विषयों की पत्रिका थी पर जो दुर्भाग्य से ज्यादा चल नहीं पाई और खासी ‘कड़वाहट’ के साथ बंद हुई।

उसके बाद स्नेही से मेरा संबंध पूरी तरह खत्म हो गया। संभवत: वह बीमार रहने लगे (कैंसर से) और फिर मुझे उनके देहांत का ही समाचार मिला।

यह सौभाग्य ही कहा जाएगा कि हंस के साथ कंस नहीं निकला अन्यथा कंस के भाई हंस को प्रेमचंद के हंस से जोडऩा कितना हास्यास्पद हो जाता, कल्पना की जा सकती है।

उचित समय

कुल मिला कर हंस का प्रकाशन, चाहे व्यावसायिक कहिये या सांस्कृतिक कारण, बहुत ही सही समय पर हुआ। हिंदी समाज उस समय एक बड़े खालीपन की ओर बढ़ रहा था। धर्मयुग से धर्मवीर भारती और साप्ताहिक हिंदुस्तान से मनोहरश्याम जोशी के चले जाने के बाद ये पत्रिकाएं संभल नहीं पाईं थीं। गणेश मंत्री तथा मृणाल पांडे के नेतृत्व ने इन्हें पूरी तरह अप्रासंगिक बनाने में देर नहीं लगाई थी। इसके साथ एक और घटना घट रही थी वह थी हिंदी की दैनिक पत्रकारिता में जबर्दस्त उभार की और वह लोकप्रियता की नई से नई नीचाईयों को छूने में लगी थी। यद्यपि रविवार और इंडिया टुडे पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा था पर वे साहित्य की पत्रिकाएं न होकर मूलत: राजनीतिक पत्रिकाएं थीं। साहित्य के वर्चस्व का दौर खत्म हो रहा था और उसी के साथ सामान्य रुचि की पत्रिकाएं पूरे देश में और लगभग हर भाषा में पराभव की ओर थीं।

90 की शुरुआत में साप्ताहिक हिंदुस्तान को तो बंद ही कर दिया गया। यह अपने आप में निराशाजनक घटना थी। मुझे लगा कि हिंदी समाज को, यानी लेखकों को इसका विरोध करना चाहिए। मैंने अपने कुछ मित्रों से इस बारे में बात की और एक पत्र साप्ताहिक हिंदुस्तान के मालिकों के नाम लिखा। कई लोगों ने उस पर हस्ताक्षर किए। हमारा कहना यह था कि पत्रिका को बंद करने की जगह प्रकाशकों को नए संपादक लाने चाहिए।

मैं इस पर हस्ताक्षर करवाने राजेंद्र जी के पास हंस के कार्यालय गया। उन्होंने पहले तो इधर-उधर की कई बातें कीं। उदाहरण के लिए कि अगर कोई संस्थान अपनी पत्रिका बंद कर रहा है तो हम इस बारे में क्या कर सकते हैं। पर जब मैं अपने तर्क रखता गया तो उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए। अभी हम उस पत्र में और हस्ताक्षर करवा ही रहे थे कि मुझे एक निकट के मित्र ने कहा कि राजेंद्र जी कह रहे हैं कि पंकज बिष्ट इसलिए यह कर रहा है क्योंकि साप्ताहिक हिंदुस्तान का संपादक (मृणाल पांडे) पहाड़ी है। यानी वह पहाड़ी की नौकरी बचाने में लगा हुआ है। जबकि मेरा कहना बिल्कुल उलट था।

यह बात मुझे बहुत अखरी। मैंने पत्र से अपना हाथ खींच लिया। वैसे भी हमारे पत्र से कुछ होना-जाना नहीं था। यह एक किस्म का प्रतीकात्मक विरोध जरूर होता। बात आई-गई हो गई पर मैं उसे भूला नहीं। उसके कुछ वर्ष बाद धर्मयुग भी बंद कर दिया गया। उदयन शर्मा के नेतृत्व में रविवार को भी बंद होने में ज्यादा समय नहीं लगा। स्वाभाविक है कि हंस के लिए इस तरह स्वयं ही मैदान खाली होता गया, पर दुर्भाग्य की बात यह है कि हंस उसका बहुत ही सीमित लाभ उठा पाया। इसका सबसे बड़ा कारण संभवत: पूंजी की कमी रहा होगा। वह कभी भी बड़ी प्रसार संख्या प्राप्त नहीं कर पाया। जहां तक मुझे याद है, उसे एक बड़े वितरक (इंडिया बुक हाउस) के माध्यम से भी बेचने की शुरुआत की गई थी, पर यह वितरक चूंकि अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं को बेचने का विशेषज्ञ था, इसलिए उसने जल्दी ही हाथ खड़े कर दिए। पर इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि हंस का लक्षित पाठक वर्ग हिंदी का ‘अपवर्ड मोबाइल’ मध्यवर्ग था। हो न हो उनके दिमाग में कहीं धर्मवीर भारती के दौर का धर्मयुग का पाठक रहा होगा। ‘बिजनेस’, जिसका अर्थ अखबारों के धंधे में विज्ञापन से होता है, के स्तर पर तो हंस कभी सफल हो ही नहीं पाया। वैसे भी हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं को बड़े व्यापारिक-विज्ञापन मुश्किल से ही मिलते हैं। मिलते भी तो एक लाख से कहीं ऊपर की प्रसार संख्या हासिल करने के बाद जो आंकड़ा हंस के लिए शुरुआती सारे मिजानों और गणनाओं (कल्क्युलेशन) के बावजूद कभी संभव हो ही नहीं पाया। इसलिए एक मात्र सहारा सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र का रहता है। पप्पू यादव और निशंक जैसे लोगों से संपर्क क्या बतलाता है? राजेंद्र जी को इस के लिए लगातार ऐसे लोगों से संपर्क बनाए रखना पड़ता था जो सरकारी पदों पर थे और किसी भी तरह से विज्ञापन आदि दिलाने में मददगार साबित हो सकते थे। यह विज्ञापन के तौर पर भी हो सकता था और अन्य तरीकों से भी। इसी क्रम में उन्होंने कई लेखिकाओं को बनाया और कई लेखकों को चढ़ाया। (आप एक ही पुस्तक की चार-चार समीक्षाएं यों ही नहीं छापते।) वैसे भी हंस की आय पर, अगर वह स्वयं नहीं भी निर्भर हों तो भी, कम से कम चार-पांच आदमियों का स्टॉफ सदा निर्भर रहा है। इतने लोगों की तनख्वाह, जो हर माह चालीस से पचास हजार तो होती ही होगी, इकट्ठा करना खेल नहीं है। जो पत्रिका निकालते हैं वे जानते हैं कि बिक्री की राशि वसूलना कितना कठिन काम है। इसमें शंका नहीं है कि वह सफल ‘फंड रेजर’ थे और सारी अड़चनों के बावजूद अपनी भूमिका को सफलता पूर्वक निभा पाए थे।

हंस के पाठक वर्ग का सवाल

यहां प्रश्न हो सकता है कि जब हंस का लक्षित पाठक वर्ग हिंदी का तथाकथित ‘अपवर्ड मोबाइल’ मध्यवर्ग था तो उसमें दलित कैसे आया? जहां तक नारी और नारीवाद का सवाल है, उसकी स्वीकार्यता इस वर्ग में बहुत आसान है पर दलित विषयों को स्वीकार करना खासा मुश्किल है। इसलिए यह प्रश्न थोड़ा जटिल है। इसका एक संभावित कारण यह हो सकता है कि उन्हें समझते देर नहीं लगी होगी कि अब हिंदी में उच्च-मध्यवर्ग पाठक का मिलना कठिन है और नए पाठक वर्ग की तलाश होनी चाहिए। वह पाठक वर्ग उभरता हुआ दलित व पिछड़ी जातियां का वर्ग ही हो सकता है। यह बतलाना जरूरी नहीं है कि इस बीच दलित लेखन अपने ही ऐतिहासिक कारणों से उभरने लगा था। राजेंद्र जी ने इसे निश्चय ही मंच दिया। पर देखने की बात यह है कि इस दौर की सबसे महत्वपूर्ण कृति जूठन को हंस में वह महत्व नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी।

पर मेरे विचार में वह बड़े शो मैन भी थे। ऐसा शोमैन जो भव्य और विशाल आयोजनों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करता है। भव्यता की यह महत्वाकांक्षा या तो व्यावसायिकता से जोड़ी जा सकती है या फिर सामंती मानसिकता से। पर इसका संबंध आधारभूत (ग्रासरूट) बदलाव से नहीं था, जिसमें आप चीजों को बेआवाज, धीरे-धीरे और धैर्य के साथ बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। यहां ध्यान रखने की बात यह है कि इस धैर्य का संबंध मूलत: प्रतिबद्धता से होता है, जहां निजता नहीं बल्कि वैचारिक और सामाजिक सरोकार बाकी सारी निजी उपलब्धियों को गैरजरूरी बना देते हैं। इस सब जोड़-तोड़ ने हंस को जिलाए तो रखा पर सदा किसी न किसी विवाद में भी उलझाए रखा। ‘लांग रन’ में ये काना फूसियां और विवाद उसकी प्रतिष्ठा के लिए निश्चय ही घातक साबित हुए।

वह सदा से ही इस बात को समझते थे कि मैं उनका भक्त नहीं हूं। हां, मित्र हो सकता हूं। वह मेरे व्यवहार को लेकर परेशान रहते थे और कई बार समझा चुके थे कि ऐसे स्वभाव के कारण तुम अकेले पड़ जाओगे।

मेरी कमी अपनी तरह की थी। मैं उनसे, और उनके माध्यम से हंस से, कम से कम एक हद तक गंभीर और नेतृत्वकारी भूमिका की अपेक्षा रखता था। अक्सर चाहता था कि वह सैद्धांतिक स्टैंड लें पर ऐसा होता नहीं था और मेरी निराशा बढ़ती जाती थी। मेरी इस अपेक्षा का कारण संभवत: मेरी शुरुआती नासमझी थी जो राजेंद्र यादव के जटिल व्यवहार के कारण पैदा हुई होगी। धीरे-धीरे हुआ यह कि मेरी असहमतियां उग्र होने लगीं। नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों से राजेंद्र जी को संबंध रखने में कोई उज्र नहीं था वे मुझे सह्य नहीं थे अपनी चतुराई और व्यवहार कुशलता के नाते। वह कई बार कहते थे: भांत-भांत के लोगन को खेलन दो खावन दो। यह ब्रज का कोई का दोहा है, न जाने किस का।

फोल्डरों और किताबों की कीमत

आप याद कर सकते हैं कि हंस ने शायद ही कभी किसी साहित्यिक प्रतिष्ठान के खिलाफ कुछ कहा हो। उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा से सालाना 20-25 हजार का अनुदान लेने और इसे सारे साल पत्रिका में छापते चले जाने में कोई आपत्ति नहीं हुई। यह योजना हमारे मित्र रामशरण जोशी के इस संस्था के उपाध्यक्ष होने के दौरान शुरू की गई थी। मैंने इसका तब भी विरोध किया था। मेरा तर्क था, अगर संस्थान को पत्रिकाओं की मदद ही करनी है तो वह विज्ञापन के रूप में होनी चाहिए। इसमें पत्र-पत्रिकाओं की प्रतिष्ठा भी बची रहती है और मदद भी हो जाती है। यह ज्यादा सम्मानजनक तरीका है, बनिस्बत कि हर अंक में यह छापने के कि हमें केंद्रीय हिंदी संस्थान से आर्थिक सहयोग मिला है। पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी। हंस समेत सब लोग अनुदान की पंक्ति में जा खड़े हुए।

राजनीतिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ उनका स्टैंड कुल मिला कर उन विषयों तक सीमित था जो वृहत्तर संदर्भ में भारतीय समाज में सर्वव्याप्त हैं और ऐसे विषय हैं जिनको कोई भी, कभी भी पीट सकता है, जैसे कि सांप्रदायिकता और जातिवाद या फिर नारी उत्पीडऩ। पर उन्होंने नक्सलवाद, कश्मीर और उत्तरपूर्व के सैन्यकरण और नागरिक अधिकारों के दमन जैसे मामलों पर कभी कोई सीधा-सीधा या स्थायी स्टैंड नहीं लिया।

उसका कारण भी था क्योंकि आपको रह-रह कर स्टैब्लिशमेंट के पास जाना होता है – जानी-मानी हस्तियों को देस-परदेस से बुलाने, बैग से लेकर मुफ्त में रंगीन किताब बांटने तक के लिए तो आप किस तरह से सत्ता व सत्ताधारियों का विरोध कर सकते हैं। या करेंगे भी तो एक सीमा से ज्यादा नहीं करेंगे। हंस के साथ उन्हें कई समझौते करने पड़े। जैसे उन्होंने सबसे पहले लालू यादव के हाथों एक लाख का बिहार सरकार का पुरस्कार लिया। वह भी तब जब कि वहां लक्ष्मणपुर बाथे जैसा हत्याकांड हुआ था। उनका तर्क था यह पैसा मुझे हंस के लिए चाहिए। उसके बाद उन्होंने दिल्ली हिंदी अकादमी का एक लाख का पुरस्कार लिया। उसे भी हंस के बहाने ही लिया। जबकि उससे पहले वह कोई पुरस्कार नहीं ले रहे थे। गत वर्ष उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने दस लाख रुपए के पुरस्कार से सम्मानित किया था। असल में समझौतों की अपनी शृंखला होती है या कहना चाहिए अपनी वैलोसिटी किसी बर्फ की लुढ़कती हुई चट्टान की तरह, जो जितना लुढ़कती है उतनी तीव्रता हासिल करती जाती है और उतना ही वजन भी।

गत वर्ष वह अपनी सारी अस्वस्थताओं के बावजूद शेखर जोशी को इफ्को सम्मान देने लखनऊ गए थे। उस अशोभनीय सम्मान में उन्हें मात्र लेखक होने के कारण नहीं ले जाया गया था। आयोजकों ने अगर उनका फायदा उठाया तो उन्होंने आयोजकों का और इस वर्ष के अयोजन में जो कहानी संग्रह बंटा उसकी कीमत कुछ नहीं तो बाजार में पांच सौ रूपये से कम नहीं होगी। अगर उसकी लागत 250 रुपए भी आंकी जाए और एक हजार किताबें भी छपी होंगी माना जाए तो यह लागत दो लाख 50 हजार रुपया आती है। यह बहुत अनुदार अनुमान है। इसी तरह कहा जाता था कि जब उन्हें ग्रीन पार्क का घर छोडऩा पड़ा तो एक लेखिका ने उन्हें अपने पैसे से पूरा घर बना कर दिया। निश्चय ही उसकी भरपाई हंस के माध्यम से ही की गई होगी।

वह 1994 या 95 में ही मयूर विहार आ गए थे। मैं 1996 में आया। उनके यहां मेरा आना-जाना 1999 से बढ़ा। तब तक वह हिंदुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट में रहने लगे थे। मैं भी अक्सर उनकी पार्टियों में बुलाया जाने लगा। शाम की इन पार्टियों में, जो अधिकांशत: उनके घर पर हुआ करती थीं, सामान्यत: पांच-सात लोग ही नियमित रूप से शामिल रहते थे। बहुत हुआ तो दस। इन में हिंदी अंग्रेजी के पत्रकार, मीडिया के लोग, लेखक और राजेंद्र जी के पुराने मित्र ललाणी व उनके भक्त सुनील हुआ करते थे।

इन पार्टियों की सबसे अच्छी बात यह होती थी कि ये दस बजे तक हर हालत में खत्म हो जाती थीं या यादव जी कर देते थे। एक मामले में उनमें जबर्दस्त आत्म नियंत्रण था। चूंकि वहां से हमारा घर नजदीक ही है मैं और रामशरण जोशी पैदल ही लौट जाया करते थे। मैं अपने को मिसफिट पहले ही महसूस करने लगा था। इस बीच मेरे और यादव जी के बीच कई तरह के मतभेद उभरने लगे। जैसा कि मैं कह चुका हूं उनके भांति-भांति के मित्रों और कई तरह के समझौतों को लेकर। अंतत: मैंने उनकी पार्टियों से बचना शुरू कर दिया। हंस के कार्यालय तो संभवत: मैं पिछले एक-डेढ़ दशक से नहीं गया होऊंगा। उनके आकाश भारती दर्शन के नए फ्लैट में भी मैं सिर्फ तीन बार गया। पहली बार उनकी बीमारी के दौरान हालचाल पूछने। दूसरी बार जब उन्हें एक पत्रकार ने गाली दी थी तब स्थिति जानने-समझने के लिए।

लेकिन तीसरी बार का प्रसंग थोड़ा विस्तार में बतलाना जरूरी है। वह इस वर्ष के अगस्त महीने की बात है। जनसत्ता ने हंस के वार्षिक समारोह का अरुंधति रॉय और वरवर राव द्वारा बहिष्कार करने पर गलत-शलत रिपोर्टिंग की थी और संपादकीय भी लिखा था। वह गोष्ठी पूरी तरह असफल हो गई थी। पर एक मामले में हंस की यह पहली गोष्ठी नहीं थी जो असफल हो रही थी। इससे पहले भी कई गोष्ठियों के साथ ऐसा हो चुका था। उदाहरण के लिए इतिहासकार मुशीरुल हसन का पूरी तरह से अगंभीर व्याख्यान। उसके बाद माओवाद पर गोष्ठी जिसमें छत्तीसगढ़ के तत्कालीन महानिदेशक विश्वरंजन और अरुंधति रॉय को वक्ता के तौर पर बुलाया गया था। रॉय ने इसमें आने से इंकार कर दिया था और महानिदेशक महोदय आए ही नहीं। इससे कुछ ही बेहतर हाल ‘दीन की बेटियों’ शीर्षक गोष्ठी का हुआ था। गोकि पिछले कुछ वर्षों से समयांतर हंस के इन कार्यक्रमों की आलोचना कर रहा था पर इस बार हमने सोचा राजेंद्र जी से बात की ही जानी चाहिए। इसके अलावा एक और गंभीर मसला भी था। हंस से ही जुड़े एक व्यक्ति ने यह कहना शुरू कर दिया था कि वरवर राव ने हैदराबाद से आनेजाने का हवाई जहाज का किराया लेने के बावजूद दिल्ली आकर भी हंस की गोष्ठी का बहिष्कार किया और उसी टिकट से वापस लौट गए। जब मैंने पता लगाया तो यह बात झूठी थी। यह वामपंथियों को बदनाम करने के षडय़ंत्र का ही हिस्सा था। राजेंद्र जी से मेरी बढ़ती नाराजगी का एक कारण यह भी था कि जाने-अनजाने हंस वामपंथियों के विरोध का मंच भी बनता जा रहा था। वैसे भी हंस की नीतियों में कोई स्थिरता तो थी नहीं इसलिए कहा नहीं जा सकता था कि वह कब कहां को बहक ले।

एक और कारण ने भी इस मुलाकात को जरूरी बना दिया था। राजेंद्र जी इस बात को लेकर भी विशेष रूप से फोन कर चुके थे कि हमने दिल्ली सरकार को तथाकथित साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जानेवाले विज्ञापनों के संदर्भ में जो पत्र लिखा है वह गलत है। उन्हें लग रहा था कि इससे बाकी पत्रिकाओं को नुकसान पहुंचेगा। मैं इस प्रसंग को लेकर उन से बात करने को कई वर्ष से बेचैन था।

मेरे साथ प्रेमपाल शर्मा भी थे।

वह पहले से बेहतर थे। मैंने उनसे सीधे कहा, हम आप से कुछ बातें पूछने आए हैं। पहली बात तो यह है कि क्या आप की अरुंधति से बात हुई थी? और क्या उन्होंने गोष्ठी में आने का वायदा किया था?

राजेंद्र जी का कहना था, बहुत पहले बात हुई थी तब उसने कहा था दिल्ली में हूंगी तो आ जाऊंगी। दूसरे शब्दों में इसका मतलब यह हुआ कि वह बचना चाहती थीं।

मैंने दूसरा सवाल पूछा, क्या हंस ने वरवर राव को एयर टिकट दिया था?

उन्होंने बतलाया, हमने वायदा किया है। पर वह आए ही नहीं, आएंगे तो देंगे।

अजीब बात थी। अगस्त की आठ-दस तारीख हो चुकी थी। समारोह 28 31 जुलाई को था। मैंने कहा, अब कहां आएंगे वह तो हैदाराबाद जा चुके हैं।

अब मैंने उनसे तीसरी बात की।

इसकी पृष्ठभूमि कुछ इस तरह थी कि हमने दिल्ली सरकार को उसके द्वारा तथाकथित साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जानेवाले विज्ञापनों के संदर्भ में एक पत्र लिखा था। जिससे हड़कंप मचा हुआ था। पत्र में हमने सिर्फ यह लिखा था कि ये विज्ञापन केवल साहित्य के नाम पर और विशेषकर बड़े संस्थानों को नहीं दिए जाने चाहिए। ये मूलत: छोटी पत्रिकाओं को दिए जाने चाहिए जो अपने संसाधनों से निकलती हैं। फिर चाहे वे किसी भी विषय की हों।

मैंने कहा, आप यह बतलाइये कि हमें विज्ञापनों की उस सूची से किसने काटा? जहां तक मेरी जानकारी थी यह जानबूझकर किया गया था। आप को विज्ञापन मिल सकता है? नया ज्ञानोदय को मिल सकता है, साहित्य अमृत और वागर्थ को मिल सकता है पर हमें नहीं मिल सकता क्यों कि हम साहित्यिक नहीं हैं! अगर साहित्य ही मानदंड है तो फिर आप कैसे साहित्यिक हैं? सिर्फ कहानियां छाप देने से? क्या आप गैरसाहित्यिक विषयों पर नहीं छापते?

राजेंद्र जी बोले, नहीं समयांतर को विज्ञापन मिलना चाहिए था।

मैंने कहा, आप आज यह बात कह रहे हैं। क्या आपने पिछले पांच साल में एक बार भी यह बात कही? उनके पास कोई जवाब नहीं था।

मैं आक्रोश में बोलता गया, आप लोग उम्मीद करते थे कि इससे समयांतर मर जाएगा?

यह तुमसे किसने कहा!

हमें इस बीच कितना नुकसान हुआ है जानते हैं – लगभग 15 लाख का। यह तब है जब कि मैं अकेला आदमी था जिसने उस मीटिंग में छोटी पत्रिकाओं का पक्ष लिया था और कहा था कि इनके ऊपर प्रसार की बंदिश नहीं होनी चाहिए। यही नहीं मैं आपके साथ दो बार आइआइसी में तत्कालीन दिल्ली सूचना व प्रचार के निदेशक उदय सहाय से भी मिला था और सब की सिफारिश करता रहा था।

यादव जी के पास किसी चीज का कोई जवाब नहीं था। मैंने भी मामले को ज्यादा नहीं बढ़ाया।

आखिरी बात जो हमने उस दिन की वह थी भविष्य में हंस की गोष्ठियों का स्वरूप क्या हो जिससे कम से कम वे इस तरह से असफल तो न हों जिस तरह से पिछले तीन वर्षों से हो रही थीं। मेरा सुझाव था कि बड़े नामों की ओर न जाया जाए। बेहतर हो हिंदी में काम करनेवाली प्रतिभाओं को ही वक्ताओं के रूप में बुलाया जाए और उनसे कहा जाए कि वे अपने विषय ढंग से तैयार करके लाएं।

हम दोनों का यह भी कहना था कि हंस की गोष्ठी में लोग वक्ताओं के नाम पर नहीं बल्कि हंस के नाम पर आते हैं और आप के कारण आते हैं। राजेंद्र जी हमारी बात से सहमत हो गए थे और बोले अगली बार इस बात का ध्यान रखेंगे।

हंस में मैं

सन् 1998 की बात है। मैं पहली जून से सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक अवकाश ले चुका था और अभी यह निर्णय करने में लगा हुआ था कि मुझे आगे किस तरह से और क्या करना है। पर उससे पहले मैं अपना एक उपन्यास पूरा कर लेना चाहता था और उस पर जुट भी गया था।

कि एक दिन मुझे राजेंद्र जी ने बुलाया।

उन्होंने जो बात कही उसका लब्बो-लुवाब यह था कि हंस से जुड़ जाओ। पर मैंने नौकरी नई नौकरी पकडऩे के लिए नहीं छोड़ी थी। मुझे अगर नौकरी ही करनी थी तो फिर सरकारी नौकरी ही क्या बुरी थी! साहित्य की राजनीति भी मेरा ध्येय नहीं था। वह भी आजकल के माध्यम से की जा सकती थी। मैं स्वतंत्र रूप से काम करना चाहता था, वह तरीका क्या हो, यह मुझे तय करना था। वैसे भी इस बीच मैं अपने काम में लग गया था और वर्षों बाद फिर से उपन्यास पर हाथ आजमा रहा था।

राजेंद्र जी एक बात बार-बार दोहरा रहे थे, वह यह कि मैं कितने पैसे लूंगा। मैंने उनसे पूरी दृढ़ता से कहा, मैं नौकरी करने को तैयार नहीं हूं। उस दिन हमारी बात वहीं पर छूट गई।

पर राजेंद्र जी जिस काम के पीछे पड़ जाएं आसानी से हार नहीं मानते थे। उन्होंने फिर से बड़े आग्रह से मिलने बुलाया। फिर वही बातें हुईं। उनके आग्रह को देखते हुए इस बार मैंने कहा, मैं हंस के लिए काम करने को तैयार हूं पर नियमित रूप से नहीं। हफ्ते में एकआध दिन आकर जो मेरे लायक होगा कर दिया करूंगा। वह बार-बार यह भी पूछते जा रहे थे, पैसे कितने लोगे? फिर खुद ही कहते, तुम तो पैसे ज्यादा लोगे। मैं हंस को देखते हुए उनकी मजबूरी समझ सकता था। मैंने उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश की कि मैं पैसे के लिए भविष्य में कोई काम नहीं करनेवाला हूं। चूंकि हंस का काम है, और आप कह रहे हैं, जो मुझ से होगा कर दूंगा। बहुत हुआ तो आप मुझे आने-जाने का पैसा दे सकते हैं। यह मैंने उनका मान रखने के लिए कहा था।

बात आई-गई हो गई। अचानक अक्टूबर 98 में मुझ से कहा गया कि मैं हंस का एक उपन्यास अंक संपादित कर दूं। मैं राजी हो गया। गोकि पैसे की कोई बात नहीं हुई थी और मैंने इसे सम्मान के तौर पर किया था। पर अंत में राजेंद्र जी ने मना करने के बावजूद मुझे दस हजार रुपए दिए। बाद में लोगों (कहना चाहिए उनके एक पुराने सहकर्मी से जिसे हंस की सभी अंदरूनी बातें अपने संपर्कों के कारण पता लग जाती थीं और आज भी लग जाती हैं) से पता चला कि यह पैसा संजय सहाय ने विशेष रूप से दिया है। यह बात मैंने संजय से कुछ घुमा-फिरा कर कही भी थी। उनकी जिस तरह की प्रतिक्रिया हुई उससे मुझे शंका नहीं रही कि पैसा सहाय का ही था। वह एक तरह से मेरे ऋण से उऋण होने की कोशिश कर रहे थे। इसके पीछे एक और कहानी है जिसका संबंध मेरे आजकल के संपादन के दौर से है, पर यहां उसे बताना जरूरी नहीं है।

164 पृष्ठों का यह विशेषांक जनवरी 1990 1999 में ‘हिंदी उपन्यास एक सदी’ के रूप में प्रकाशित हुआ। कहा नहीं जा सकता सामान्य से दोगुने पृष्ठों के इस अंक पर कितना खर्च आया होगा और उसे किसने वहन किया होगा? राशि निश्चय ही बड़ी रही होगी, इसके बावजूद कि उस अंक में 22 पृष्ठों का विज्ञापन था।

इस दौरान एक किस्सा हुआ। देवेंद्र चौबे ने उस अंक में आजादी के बाद के हिंदी उपन्यासों पर एक लेख लिखा। उसके साथ 20 उपन्यासों (टॉप ट्वेंटी) की एक सूची भी बनाई। सूची में राजेंद्र यादव का और मेरा भी नाम था। मैंने अपना नाम काट दिया इस पर चौबे ने राजेंद्र जी के नाम को भी काटना उचित समझा। मैंने उन्हें रोक दिया और कहा कि राजेंद्र जी को दिखला दें। बेहतर हो वह स्वयं काटें। पर राजेंद्र जी ने अपने नाम पर कोई आपत्ति नहीं की लिहाजा उनका नाम शामिल रहा। चाहें तो इस किस्से को इसी वर्ष जुलाई में वितरित संग्रह देहरी दीप में हंस के तीन संपादकों द्वारा अपनी-अपनी कहानियों को इस पुस्तक में शामिल करने से जोड़ कर देख सकते हैं जिसकी समयांतर में आलोचना की गई थी।

इसके बाद विभिन्न स्रोतों से मुझे पता चला कि हंस के दो फाइनेंसरों या समर्थकों (संयोग से जो मेरे भी मित्र थे) ने यादव जी पर दबाव डाला है कि वह संपादक के रूप में मुझे रखें जिससे कि हंस में आया ठहराव खत्म हो सके। तब मेरी समझ में आया कि उनके दबाव को काटने के लिए यादव जी मुझ से ऐसा कुछ कहलवाना चाहते थे जो फाइनेंसरों को एक अच्छे जवाब के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। मान लो मैं कहता कि मैं 50 हजार  लूंगा तो झंझट ही खत्म हो जाता। इतना पैसा इकट्ठा करना मुश्किल हो जाता और मेरे नाम का दबाव स्वयं ही हट जाता। दूसरे शब्दों में यह पूरा झमेला इस बात की ओर भी संकेत कर रहा था कि हंस का आर्थिक संकट कम नहीं है। अगर कम होता तो फाइनेंसरों के दबाव में राजेंद्र जी आते ही क्यों? इसके अलावा कुछ हद तक संकट हंस के स्तर में आ रही गिरावट भी माना जा सकता था। अक्टूबर 1998 में मैंने समयांतर की शुरुआत कर दी। निश्चय ही इससे यादव जी को आराम से सांस लेने की मोहलत मिली होगी। एक बार उन्होंने मुझ से कहा भी था, हम तो तुम्हें चाहते थे पर तब तक तुमने समयांतर शुरू कर दिया था। मैं उनकी बात सुनकर मुस्करा दिया था।

चूंकि यादव जी हंस पर लगातार और पूरा नियंत्रण चाहते थे इसलिए मेरे जैसा आदमी उनके लिए खतरा न सही, सरदर्द तो साबित हो ही सकता था। वह हंस का साहित्य और साहित्येतर कारणों से अक्सर पक्षपातपूर्ण तरीके से इस्तेमाल करते भी थे और वह छिपा भी नहीं रह पाता था। इसलिए अक्सर लोग उनसे असंतुष्ट रहते थे। उदाहरण के लिए अजित कुमार ने अपने लेख (‘राजेंद्र यादव होने का अर्थ’) में एक ऐसे ही प्रसंग का उल्लेख किया है जब हंस के किसी विवादग्रस्त निर्णय को अजित कुमार के सर मढ़ दिया गया था। असल में एक बार इसी तरह मेरे भी नाम का इस्तेमाल किया गया था। इसने भी मेरे और राजेंद्र जी के बीच दूरी को बढ़ाने का काम किया।

वैसे उनकी और मेरी दृष्टि में कहानियों को लेकर भी आधारभूत अंतर था। वह नई कहानी की भावुकता और आडंबर से इतना भर उभरे थे कि उसमें सरलीकृत सामाजिक स्थितियों – विशेषकर दलित और नारी विषयक समस्याओं – के पैबंद बड़ी मात्रा में दिखलाई देने लगे थे। चूंकि मुझे पूरी छूट नहीं मिलनी थी, ऐसे में मेरे और उनके बीच मतभेद और फिर टकराव लाजमी था। हमारे बीच टकराव के और भी कई दैनंदिन कारण हो सकते थे। जैसे कि उनके कई मित्र लोग मुझे सहन नहीं थे और उनको मैं। उदाहरण के तौर पर अरविंद जैन प्रसंग को याद किया जा सकता है। उन्होंने विष्णु प्रभाकर के साथ जो घपला किया था वह निहायत शर्मनाक था। इसकी शिकायत विष्णु जी रह-रह कर किया करते थे। जैन का नाम कानूनी सलाहकार के रूप में हंस में जाता था (संभवत: 1994 के आसपास)। मेरे और हरिनारायण (जो तब हंस में ही काम कर रहे थे) के दबाव के कारण हंस से अरविंद जैन का नाम निकाल दिया गया था पर दूसरे ही अंक में राजेंद्र जी ने उसे फिर से छापना शुरू कर दिया था। यह बात और है कि अरविंद जैन से मोहभंग होने में यादव जी को ज्यादा समय नहीं लगा। पर बढ़ती उम्र और अन्य किस्म की असुरक्षाओं के चलते वह चमचों से बच नहीं पाए जो हंस का और उनका लाभ उठाने से नहीं चूकते थे। हंस में औसत किस्म के लेखकों की भरमार काफी हद तक इस मजबूरी का भी संकेत है। जो भी हो इसलिए किसी भी हालत में आ बैल मुझे मार की स्थिति में मैं नहीं पडऩा चाहता था।

उनका अधिकार

पर एक मामले में यह अनैतिक भी था। हंस उनका मानस पुत्र था। उनके जीवन भर की कमाई इसलिए उस पर उनका नियंत्रण न रहना कोई अच्छी बात नहीं थी। हंस के माध्यम से उन्होंने अपने जीवन के संध्याकाल में सत्ता का सुख भोगा था। हंस ने लेखन की दुनिया में उनके महत्व को वैसे ही स्थापित कर दिया था जैसे अकादमिक जगत पर पकड़ ने नामवर सिंह को वर्षों से हिंदी साहित्य का सरताज बनाया हुआ था या फिर अशोक वाजपेयी को साहित्य जगत में सरकारी संस्थाओं में अपनी पहुंच के कारण आज भी बनाया हुआ है। मेरा यादव जी को लेकर आंकलन बिल्कुल सही साबित हुआ। असल में हंस उनके लिए मात्र हिंदी की रचनात्मकता को मंच देने और उसकी परवरिश का माध्यम नहीं था बल्कि अपनी सामाजिक स्थिति बनाने का भी माध्यम था। उसके जरिये उन्होंने मित्रों और अनुयायियों का एक बड़ा वर्ग जुटाया हुआ था और वही उनकी महिला भक्तों की कतार का सबसे बड़ा स्रोत था। इस तरह से उन्हें उनकी ऊर्जा के स्रोत से ही पूरी तरह अलग कर देना अनैतिक और अमानवीय होता। यह और बात है कि वह उसे आसानी से जाने भी नहीं देते। तब तक, यानी 14 वर्ष पहले तक उनमें खासा दमखम था।

पत्रिका के प्रति उनमें प्रेम के और कारण भी हो सकते हैं। यह मेरा अनुमान है। मैं गलत भी हो सकता हूं। नई कहानी के उनके दोनों मित्र पत्रिकाओं से जुड़े थे – मोहन राकेश और कमलेश्वर। सारिका ने मोहन राकेश को लोकप्रिय और प्रतिष्ठित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। यह बात और है कि वह उसमें ज्यादा नहीं टिके और उन्होंने नाटकों के जरिये बाद में साहित्य और सांस्कृतिक जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। इसी तरह कमलेश्वर ने सारिका के जरिये बाकायदा एक आंदोलन ही खड़ा कर दिया था और पूरे हिंदी कहानी परिदृश्य को लगभग ‘हाइजैक’ कर लिया था। वह अंत तक किसी न किसी पत्र-पत्रिका से जुड़े ही रहे। राजेंद्र यादव ने कभी किसी पत्र-पत्रिका में संपादक के रूप में काम नहीं किया, सिवा शुरुआती दिनों में ज्ञानोदय के सहायक संपादक के रूप में। यह उनके एक लेखक के रूप में स्वतंत्र रहने की जिद्दों में एक थी। चाहें तो कह सकते हैं योरोपीय लेखकों की तरह जिन्हें वह और उनके नई कहानी के लेखक यथावत नकल करना चाहते थे। पर भारतीय परिस्थितियां भिन्न थीं। विशेषकर हिंदी की, जहां पुस्तक प्रकाशन का काम कभी भी व्यावसायिक स्तर पर पर नहीं चल पाया था और जिसने शायद ही कभी अपने लेखकों को इतना पैसा दिया हो कि वे रॉयल्टी पर निर्भर हो सकें। इसलिए राजेंद्र जी को अपने निर्णय पर अफसोस जरूर रहा होगा और यह समझते ज्यादा देर नहीं लगी होगी कि हिंदी का हर प्रभावशाली लेखक कुल मिला कर संपादक जरूर बना है – राकेश और कमलेश्वर के अलावा अज्ञेय, देवेंद्र सत्यार्थी, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, धर्मवीर भारती, मनोहरश्याम जोशी, भीष्म साहनी, रघुवीर सहाय आदि इसके उदाहरण हैं। पत्र-पत्रिकाएं रामानंद दोषी, राजेंद्र अवस्थी और कन्हैया लाल नंदन जैसे दूसरी श्रेणी के लेखकों तक के लिए अतिरिक्त ताकत का स्रोत रही थीं। इस की उन्होंने अपनी तरह से हंस के माध्यम से अगले 27 वर्षों तक जमकर क्षतिपूर्ति की।

हंस के महत्व को लेकर एक घटना का जिक्र किया जा सकता है। सन 2004 की बात है। राजेंद्र जी के साथ मैं दिनकर के जन्मदिन समारोह पर उनके गांव सिमरिया गया हुआ था। समयांतर के पुराने सहयोगी और मित्र कवि रामाज्ञा शशिधर उसी गांव के हैं। बड़ा भव्य समारोह हुआ और उससे बेहतर आवभगत। लौटते हुए हमें गाड़ी बरौनी स्टेशन से पकडऩी थी। जिस प्लेटफार्म पर गाड़ी सामान्यत: आया करती थी हम उसी पर जा कर प्रतीक्षा करने लगे कि तभी घोषणा हुई, गाड़ी दूसरे प्लेटफार्म पर आ रही है। हमारा डिब्बा चूंकि नंबर के हिसाब से इंजन की ओर था हम प्लेटफार्म पर शुरू में ही खड़े हो गए थे। राजेंद्र जी के लिए इतनी जल्दी दूसरे प्लेटफार्म पर पुल के रास्ते, जो प्लेटफार्म के मध्य में था, पहुंचना फिर वहां से दूसरे प्लेटफार्म के शुरू तक जाना आसान नहीं था। नौबत यह थी कि अगर चलते तो गाड़ी निश्चित रूप से छूट जाती। हमें छोडऩे आए लड़कों में से कोई भागकर स्टेशन मास्टर के पास गया। एक तरीका यही हो सकता था कि गाड़ी को तब तक रोका जाए जब तक हम अपने डिब्बे में नहीं पहुंच जाते। पर कुछ देर बाद देखा कि स्टेशन मास्टर साहब चले आ रहे हैं। वह हिंदी साहित्य के विद्यार्थी रहे थे और हंस के पाठक थे। उन्होंने बड़े आदर से यादव जी को प्रणाम किया और कहा आप निश्चिंत हो कर यहीं खड़े रहें गाड़ी इसी प्लेटफार्म पर आएगी। उसके बाद नए सिरे से गाड़ी के आने की घोषणा हुई और हमारा डिब्बा वहीं आया जहां यादव जी खड़े थे।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जब उन्हें ग्रीन पार्क छोडऩा पड़ा तो एक महिला ने उनके रहने का इंतजाम किया था। क्या अगर हंस न होता तो भी यह सब संभव होता?

गोकि उन्होंने अपनी षष्टिपूर्ति के अवसरपर 1989 में आगरा विश्वविद्यालय के सीनेट हाल में, जिसमें मैं भी था, कहा था, मैं जैसा भी हूं आगरा का हूं, पर सच यह है कि हंस ने उन्हें पूरी हिंदी का, हिंदी प्रदेश का बल्कि कहना चाहिए पूरे देश के हिंदी बोलने-समझनेवालों का बना दिया था।

यौन वर्जनाएं और नई कहानी के कर्णधार

राजेंद्र जी किसी लोकायत ऋषि की तरह थे जिसने हिंदू आध्यात्मिकता से अपने को मुक्त कर लिया था पर जो अपने नव भौतिकतावाद में अराजक न कहें तो भी अनियंत्रित सुखवादी – ऐंद्रिकतावादी – हो गया था कुछ-कुछ तांत्रिक साधकों-सा जिनके लिए सिर्फ आत्ममुक्ति या तुष्टि (?) चरम होती है। अफसोस कि वह स्वयं को जानते-बूझते भी भौतिकतावाद की आधुनिक परंपरा से नहीं जोड़ पाए जो निजी यथार्थ को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करती है। वह किसी पार्टी से न जुड़े हों पर वामपंथी लेखक संगठनों में सक्रिय तो रहे ही। संभवत: बड़ा तथ्य यह है कि हम अपनी परंपराओं, सुरक्षाओं और स्वार्थों से उतने ही मुक्त हो पाते हैं जितना होना चाहते हैं। यादव जी इस मामले में अपवाद न होकर नियम थे। वह अक्सर कहा करते थे तुम लेखकों को भूखों मारना चाहते हो। मेरा नई कहानी आंदोलन के बारे में यह विचार है कि यह आंदोलन मूलत: मध्यवर्गीय महत्त्वाकांक्षाओं का आंदोलन था। इसने नए उभरते भारतीय मध्यवर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का काम किया। रचनाओं में अपवाद हो सकते हैं, पर मुख्य स्वर वही है जो आगे चल कर निखरता गया है। वे चाहते थे हिंदी लेखक उस तरह जियें जिस तरह से 19वीं और 20वीं सदी के योरोपीय और अमेरिकी लेखक जिया करते थे – जॉयस, हेमिंग्वे, मॉम, सात्र्र, कामू, ग्राहम ग्रीन आदि की तरह। नई कहानी आंदोलन के लगभग सभी कहानीकारों की कृतियों में ही नहीं उनके निजी व्यवहार में भी आप इस वर्ग की बेचैन अभिव्यक्तियां देख सकते हैं।

मैं जब भी पुलिसवालों, आयकर अधिकारियों और तटकर अधिकारियों द्वारा किए जानेवाले साहित्यिक आयोजनों की आलोचना करता तो वह कहा करते, अरे यार इतना भ्रष्टाचार है। अगर थोड़ा बहुत लेखन में खर्च कर ही दिया तो क्या हुआ?

मुझे अब कभी-कभी सोच कर डर लगता है कि अगर यादव जी (या उस तरह से मोहन राकेश या निर्मल वर्मा) आज लिखना शुरू कर रहे होते तो संभव है अंग्रेजी को चुनते। राजेंद्र यादव के पाइप पीते और मोहन राकेश के सिगार का धुंआं उड़ाते चित्र क्या छवि उभारते हैं और कैसा संकेत देते हैं? एक चित्र में तो यादव जी हूबहू कामू नजर आते हैं – वह लगभग वैसा ही चेस्टर पहने हैं।

बात 1994-95 की ही है। मैं एक दिन अपने कमरे में बैठा हुआ था कि मोहम्मद असलम आ धमका। असलम अंग्रेजी पत्रकार था पर साथ ही वह साहित्य का प्रेमी था और हिंदी व उर्दू भी पढ़ता था।

एक खबर आप से जांचनी है, उसने कहा।

क्या? असल में वह उन दिनों दैनिक एशियन एज में एक गॉसिप कॉलम लिखा करता था। उससे पहले वह इंडिया टुडे में काम कर चुका था।

बोला, आपको पता है, राजेंद्र जी और मन्नू जी अलग-अलग हो गए हैं?

हैं! खुद मेरे लिए यह खबर थी। ऐसा कैसे हो सकता है? मुझे यकीन नहीं आया। तब यादव जी कुछ नहीं तो 63 या 64 वर्ष के रहे होंगे, इसी के आसपास मन्नू जी। वह हिंदी की सबसे चर्चित जोड़ी थी। बल्कि कहना चाहिए एकमात्र जोड़ी थी जिन्होंने मिलकर एक कहानी संग्रह तक लिखा था। इसलिए मैं कहे बिना नहीं रहा, मैंने तो नहीं सुना। मुझे लगता नहीं यह सही है।

असलम ने हंस का नंबर मांगा। मैंने दे तो दिया पर डर भी लगता रहा कि कहीं यादव जी को पता न चल जाए कि असलम मेरे यहां से फोन कर रहा है। असलम उनसे पहले से ही परिचित था और हंस में उसकी कहानी भी छपी थी। मैंने उससे कह दिया उन्हें पता नहीं चलना चाहिए कि तुम मेरे यानी आजकल के दफ्तर से बोल रहे हो।

जो वार्तालाप हुआ वह मेरे लिए अत्यंत पीड़ा जनक था। असलम के पूछने पर कि आप लोग अलग हो गए हैं, राजेंद्र जी का सीधा-सा जवाब था, हां हम अलग हो गए हैं।

”इस उम्र में?’’

उनका उत्तर था, जब साथ नहीं रह पा रहे हैं तो कोई भी उम्र अलग रहने के लिए गलत नहीं है। जितनी उम्र है उसे शांति से बिताएं, समझदार आदमियों की तरह।’’

इसका कोई और कारण भी हो सकता है? उसने कुरेदने की कोशिश की।

क्या साथ न रह पाना काफी नहीं है! इतने साल साथ रह कर देख चुके हैं।

फोन बंद कर उसने लंबी सांस ली और मुझे देखने लगा।

कोई और कारण है? उसके आखिरी प्रश्न से मुझे लगा मामला इतना सीधा नहीं है।

वह बोला, सुनने में तो आया है किसी औरत के कारण हुआ है। कौन है यह उसे भी पता नहीं था।

अगले रविवार एशियन एज के गॉसिप कालम में यह खबर छपी थी।

बाद में मैंने कई बातें सुनीं। उनमें सबसे ज्यादा आधिकारिक यह थी कि मन्नू जी ने उनके यौनाचार से तंग आकर उन्हें निकाल दिया था। कई बार मुझे लगा है जैसे वह चाहते भी यही थे। जितना हो सके स्वच्छंद हो कर जिएं और वह जिये भी। इस सब ने मुझे सारी घटनाओं को एक नए ही संदर्भ में देखने का मौका दिया है।

यौन नैतिकता या कहिए भारतीय समाज की यौन वर्जनाएं तोडऩे की नई कहानी के कर्णधारों में जो बेचैनी नजर आती है, जिसे बाद में नारीवाद का रूप दिया गया, वह रेखांकन के योग्य है। महिलाओं के प्रति अतिरिक्त लगाव, विवाहेतर संबंध और एक से अधिक विवाह व विच्छेद उस दौर के लेखकों में जिस बड़े पैमाने पर मिलते हैं वह भी कम चकित करनेवाला नहीं है। यह एक खास तरह की समाजविज्ञानी परिघटना है इसलिए इस प्रवृत्ति की ज्यादा गहरे जा कर विश्लेषण की जरूरत है।

स्वच्छंदता, उच्छृंखलता, अहर्निश आनंदवाद और आत्मकेंद्रितता अंतत: हमें कहां लाकर पटक सकती है, राजेंद्र यादव के अंतिम दिन इसका प्रमाण हैं। उनको लेकर अंतत: जिस तरह की बातें सोशल मीडिया – ब्लॉगों, फेसबुक आदि – और अखबारों (तहलका) में आईं वे विशेष कर पीड़ा दायक थीं। उनके बेटों बल्कि पोतों के बराबर के बच्चे उन पर जो मन में आया लिख रहे थे। उनके मित्रों के लिए उनका पक्ष लेना मुश्किल हो चुका था। उनके सारे किए-कमाए पर पानी फिर रहा था और हंस को भी मिट्टी में मिलाने पर कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही थी। कई लोग उनका साथ छोड़ रहे थे। इस वर्ष के उनके जन्म दिन पर उनके कई पुराने मित्र नहीं पहुंचे थे, यह भी चर्चा का विषय था। वह स्वयं भी इस बात को जानते थे और उन्होंने नहीं आनेवालों को फोन पर उलाहना भी दिया था। अफसोस कि यादव जी दीवार पर लिखी इबारत को नहीं पढ़ पा रहे थे। या पढ़ रहे थे पर असहाय हो चुके थे।

न जाने किस मौके पर पहली बार उन्होंने मुझे यह दोहा सुनाया था: कबिरा भग की प्रीतड़ी केते गए गड़ंत। मैंने सोचा यह उनके उपजाऊ मस्तिष्क की मौलिक उपज है। पर बाद में पता चला वाकई यह कबीर का दोहा है जो पूरा इस प्रकार है:

कबिरा भग की प्रीतड़ी, केते गए गडंत।

केते अजहूं जायसी, नरकि हसंत हसंत।।

– साखी

कुल मिलाकर राजेंद्र यादव एक उदार लोकतांत्रिक व्यक्ति थे। उनकी अपनी सीमाएं थीं। वह उन्हें छिपाते नहीं थे या फिर वे छिपती नहीं थीं। इसका कारण संभवत: उनका एक ऐसा खुला आदमी होना था जिसके जीवन में लगभग सबको झांकने की सुविधा थी। कई बार यह प्रवृत्ति शालीनता की सीमा लांघ जाती थी। (मैं नहीं जानता उनमें और कमलेश्वर में ऐसा क्यों था कि वे अपने प्रेम प्रसंगों को सार्वजनिक तौर पर बढ़-चढ़ कर बतलाने में, लिखने में, जरा भी नहीं हिचकते थे।) पर अगर आप उनकी तुलना उनके अन्य समकालीनों से करें तो ऐसा व्यक्ति शायद ही कोई और मिले। न नामवर सिंह, न भीष्म साहनी, न निर्मल वर्मा, न मनोहरश्याम जोशी, न केदारनाथ सिंह और न ही अशोक वाजपेयी। ये सारे अच्छे लोग हैं पर इन लोगों के जीवन में आप एक सीमा से ज्यादा ताक-झांक नहीं कर सकते थे या कर सकते हैं। और अगर आप इन के बाद की पीढ़ी की बात करें, यानी हमारी, तो वह और भी गई गुजरी है – निहायत स्वार्थी और सीक्रेटिव। कुछ न कुछ छिपाने में लगी।

वह जीवन के हर पल का आनंद लेना चाहते थे, उन्होंने यह आनंद लिया भी। मैंने नोट किया कि वह एक सामान्य आदमी की तरह जीना चाहते हैं, किसी संत या बलिदानी की तरह नहीं। या इसे यों भी कह सकते हैं, सारी प्रतिभा के बावजूद अपनी इच्छाओं में और व्यवहार में वह एक सामान्य आदमी ही थे। उसी तरह की कमजोरियां उनमें थीं। कभी वह बहुत उदार नजर आते थे तो कभी कंजूस। कभी अत्यंत व्यावहारिक तिकड़मी तो कभी असुरक्षित। सच यह है कि उनका साथ और दोस्ती मेरे लिए सदा आनंद का कारण रही। लेकिन हमारे रास्ते अलग-अलग थे। वह साहित्य को अंतिम मान कर चलते रहे (हंस उनकी सीमा बन गया था) और मैं उसकी सीमा को तोडऩे में लगा हूं।

उनमें एक और बड़ा गुण दूसरों की प्रतिभा को स्वीकार करना भी था। उदाहरण के लिए वह शैलेश मटियानी के जबर्दस्त प्रशंसक थे जबकि उस दौर के अन्य लोग मटियानी के प्रचंड स्वाभिमानी स्वभाव के कारण उन पर बात करना तक न तो पसंद करते थे और न ही करते हैं। गोकि उन्होंने कई युवाओं को अवसर दिया और बढ़ाया पर ऐसा भी असंभव नहीं है कि वह नई प्रतिभाओं से डरते हों क्योंकि वह बाद के कई वर्षों तक कहते रहते थे कि नए लोगों को जरूरत से ज्यादा जल्दी प्रचार मिल जाता है। इस पर एक बार मैंने उनकी बात का जवाब देते हुए एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि वह स्वयं तो 22 वर्ष की अवस्था में प्रसिद्ध हो गए और नए लोगों को कहते हैं कि उन्हें प्रसिद्धि नहीं मिलनी चाहिए।

लेकिन मेरा अपना अनुभव कुछ और ही रहा है। कई वर्ष पहले मुझे एक विशेष सम्मान मिला था जिसका मुझे सदा गर्व रहेगा। उन्होंने और मन्नू जी ने उस चिडिय़ा का नाम के प्रकाशन के सम्मान में एक पार्टी अपने ग्रीन पार्क के फ्लैट में दी थी। तब वे लोग साथ रहते थे। यह बात 89-90 की है। मुझे याद आ रहा है उस पार्टी में असगर वजाहत, अर्चना वर्मा और संभवत: मोहम्मद असलम भी शामिल थे। यह बात और है कि मेरा और राजेंद्र जी का असली झगड़ा उस चिडिय़ा का नाम को लेकर ही हुआ था। उस पर एक पत्र व्यवहार है। तीसरा झगड़ा समयांतर को लेकर था, वह भी किसी और के लिए, अपने लिए नहीं। उस पर भी एक पत्र व्यवहार है। इन शेष दो झगड़ों पर अवसर आने पर कभी लिखूंगा। पर अंत में यहां यह जरूर लिखना चाहूंगा कि पिछले लगभग चार-पांच वर्षों से समयांतर में हंस और राजेंद्र यादव पर लगातार और कई बार तीखे भी, आक्रमण होते रहे हैं। पर उन्होंने एक बार भी व्यक्तिगत तौर पर मुझ से नहीं कहा कि तुम क्या कर रहे हो। हां लिखे हुए का जवाब लिख कर जरूर दिया।

जब मैं टटोलता हूं तो पाता हूं, इस पीढ़ी ने न कोई बड़ा लेखक पैदा किया न ही कोई बड़ा आदमी – दृष्टिवान और बलिदानी। सिनेमा के महानायक और क्रिकेट के भारत रत्नों को अगर छोड़ दें तो भी हमारे समाज ने जो रत्न पैदा किए वे धीरूभाईअंबानी एंड को। और सुब्रुत राय सहारा जैसे लोग हैं और जिस की परिणति नरेंद्र मोदी के उभरने के रूप में सामने आ रही है। सुना है लगभग एक दशक पहले आइएएस अधिकारी गौतम गोस्वामी को एशिया का नया उभरता हीरो घोषित करनेवाली टाइम पत्रिका अब नरेंद्र मोदी को मैन ऑफ द ईयर कहने जा रही है। यह बात और है कि गौतम गोस्वामी को अंतत: बाढ़ पीडि़त कोष के 17.8 करोड़ रुपए गबन करने के आरोप में जेल जाना पड़ा था। ऐसे में राजेंद्र यादव को कमतर आंकना, किसी पाखंड से कम नहीं होगा।

यद्यपि पिछले एक वर्ष से उनका स्वास्थ्य सामान्य नहीं था। वह इस बीच लंबे बीमार पड़ चुके थे। मित्र और शुभचिंतक अंदर ही अंदर चिंतित भी रहने लगे थे। पर जब 29 अक्टूबर की सुबह सात बजे फोन आया और सुना कि राजेंद्र जी नहीं रहे तो यकीन नहीं हुआ। सिर्फ दो दिन पहले वह एक गोष्ठी में वक्ता के रूप में शामिल हुए थे। एक सप्ताह पहले ही उन्होंने मुझे फोन किया था, सुना तुम बीमार हो, तुमने बतलाया नहीं।

मैं तीसरी मंजिल में रहता हूं जहां लिफ्ट नहीं है अन्यथा वह आ ही जाते।

मैं उस दिन चौथी बार उनके नए फ्लैट में किसी तरह पहुंचा था, रामशरण जोशी, हरि सुमन बिष्ट और ज्योत्स्ना के साथ। उन्हें ठंडे कांच के ताबूत में लिटाया हुआ था। फूल चढ़ाते हुए मैंने देखा उनकी ऊष्मा प्रशीतक ताबूत की ठंडी सरहदों से टकराकर कांच पर बूंदें बनीं झिलमिला रही थीं। वहां एक मिनट बैठना भारी हो गया। वह निष्क्रियता बेचैन करने वाली थी। हम जब भी राजेंद्र यादव से मिलने आते थे, क्या चुप बैठने आते थे?

बाहर उनके प्रशंसकों, लेखकों और मीडिया के लोगों का तांता था। कुछ देर किंकव्र्यविमूढ़ बैठे रहने के बाद हम लौट आए थे। अंतिम संस्कार शाम तीन बजे होना था।

शायद मेरी नियति उन्हें इस तरह चुपचाप विदा करने की नहीं थी। मैं श्मशान नहीं गया। वैसे कारण था, स्वास्थ्य। पर अब तक आप जान ही चुके हैं, हम असमति के सहयात्री थे।

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