निधन : रामलाल धूरिया

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सितंबर खासे कष्ट और पीड़ा में गुजरा। 21 तारीख की बात है। हमारे वरिष्ठ मित्र डीआर चौधरी का फोन आया, क्या आप कॉफी हाउस आ रहे हैं। शनिवार होने के नाते उन्हें उम्मीद थी कि मैं आऊंगा। मैंने बतलाया, पिछले दस दिन से बीमार होने के कारण निकल नहीं पा रहा हूं। उन्होंने बातचीत में पूछा, धूरिया साहब कैसे हैं? असल में वह धूरिया के दिल्ली विश्वविद्यालय के सहयोगी हैं। मैंने कहा, उनसे कुछ समय पहले ही मिलने गया था। स्वास्थ्य कोई बहुत ठीक नहीं है पर ऐसा कोई ज्यादा बिगड़ा भी नहीं है। चौधरी जी ने कहा, मैं पता लगाता हूं। कुछ देर बाद उनका फोन आया, बिष्ट साहब मामला गड़बड़ है, डिटेल पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं। पर जब देर तक उनका फोन नहीं आया तो मैं बेचैन हो गया। मैंने रेखा अवस्थी के यहां फोन करने की कोशिश की पर फोन लग नहीं रहा था। और मैं धूरिया साहब की सोसाइटी में किसी को जानता नहीं था। तब मुझे कांतिमोहन याद आए। खुद उन्हें भी कुछ पता नहीं था। उन्होंने जल्दी ही पूछ कर बतला दिया, धूरिया जी का देहांत हुए तो दस दिन के करीब हो गए हैं। शोक सभा भी हो चुकी है।

अजीब दुर्भाग्य था कि ऐन उसी दौर में मैं बीमार पड़ा था। उनका घर मेरे घर से मुश्किल से दो किलोमीटर की दूरी पर भी नहीं है, पर महानगर की विडंबनाएं अपनी ही तरह की हैं, जिन पर आप सिर्फ हाथ मल सकते हैं।

रामलाल जी को मैं लगभग अस्सी के दशक से जानता था। वह बेनागा काफी हाउस आनेवालों में थे पर मेरी उनसे निकटता नब्बे के दशक के मध्य से बढ़ी। वह जल्दी से किसी को मित्र बनानेवाले लोगों में नहीं थे। न ही आसानी से खुलते थे। उनसे संबंध बढऩे के दो कारण हुए। उनके पिछले पचास साल के मित्र अनवार रिजवी बहुत ही मुखर और खुले आदमी हैं। पहला कारण अनवार साहब थे। दूसरा हुआ यह कि नब्बे के मध्य तक लेखकों ने काफी हाउस आना लगभग बंद कर दिया था। विष्णु प्रभाकर अक्सर अकेले ही बैठे रह जाते थे। दूसरी ओर उर्दू के लेखकों का भी सिलसिला घट रहा था। अनवार रिज़वी और वह उर्दू लेखकों की मंडली में ही बैठा करते थे। ऐसे में न जाने कम हम सब लोग एक ही मेज पर बैठने लगे। फिर विष्णु प्रभाकर ने भी उम्र और मकान बदल लेने के कारण काफी हाउस आना बंद कर दिया तो एक तरह से हम तीन लोग बचे जो सप्ताह में दो दिन ही सही पर काफी हाउस आते थे।

पहले धूरिया जी, हम दोनों आएं या न आएं, हर रोज आया करते थे। फिर उनका स्वास्थ्य बिगडऩे लगा और तो हम भी लोगों के साथ सप्ताह में दो दिन आने लगे। मेरी उनसे इसलिए भी निकटता बढ़ी क्योंकि हम दोनों एक ही इलाके मयूर विहार में रहते थे। इसलिए हमारा लौटने का साथ रहता था। हां आते समय वह मुझ से कई घंटे पहले आ जाया करते थे। वर्ष बीतते गए। उम्र और उम्र संबंधी स्वास्थ्य की समस्याओं – कभी मोतियाबिंद तो कभी डायबिटीज के बढ़ते-घटते रहने ने उनका आना बंद किया। उन्हें एक और समस्या यह हो गई थी कि वह ज्यादा देर तक अपना संतुलन नहीं बनाए रख पाते थे। लगभग पांच साल पुरानी बात है। एक दिन वह मोहन सिंह प्लेस के सामने सड़क पार करते हुए उसके डिवाइडर पर गिर पड़े। सौभाग्य से किसी गाड़ी ने उनके सिर पर टक्कर नहीं मारी। यह कॉमनवैल्थ खेलों से पहले की बात है तब तक खडग़ सिंह मार्ग पर पैदल यात्रियों को रोकने के लिए ऊंची बाड़ नहीं बनाई गई थी। वह बड़े स्वाभिमानी व्यक्ति थे और चलने में किसी की मदद लेना पसंद नहीं करते थे। न ही अपना जरूरत से ज्यादा सामान जिसे लेकर चलने का उन्हें अजीब शौक था, किसी को सौंपते थे। जो भी हो, इस तरह कुछ समय बाद उनका आना बंद हो गया। अब कभी छठे-छमाहे मैं या अनवार साहब उन्हें देखने चले जाया करते थे। गत वर्ष से स्वास्थ्य के कारणों से अनवार रिज़वी का भी कॉफी हाउस आना लगभग बंद हो गया है।

धूरिया जी दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी डीएवी कॉलेज (सांध्य) में अंग्रेजी पढ़ाते थे। पढऩे-पढ़ाने का उन्हें विकट शौक था। वह उर्दू और पंजाबी तो जानते ही थे फ्रांसीसी और जर्मन भी जानते थे। मैं उनके पास दारस्पीगल और पेरिस मैच जैसी पत्रिकाएं देखा करता था। कहने की जरूरत नहीं है कि वह गार्डियन-ल मांद साप्ताहिक, टाइम और इकोनामिस्ट भी खरीदा करते थे। यहां तक कि न्यू स्टेट्स मैन और टीएलएस भी वह तब तक मंगाते रहे जब तक कि उनके दाम असह्य नहीं हो गए। जहां तक भारतीय पत्र-पत्रिकाओं का सवाल था, ईपीडब्लू, सेमिनार, फ्रंटियर जैसी शायद ही कोई पत्रिका हो जिसे वह न खरीदते हों। वह अमेरिकी, ब्रिटिश और साहित्य अकादेमी के पुस्तकालयों में भी लगातार जाते थे, कभी किताबें लेने और कभी लौटाने। हर शाम उनका बैग कई किताबों और पत्रिकाओं से भरा रहता था। कई वर्ष बाद जब मैं पहली बार उनके फ्लैट में गया तो यह देख कर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि उनका आधा घर वास्तव में किसी छोटे-मोटे पुस्तकाल से कम नहीं है।

इस वर्ष के शुरू में जब मैं पाकिस्तान से लौटा तो मैंने उन्हें लाहौर के अपने अनुभवों के बारे में बतलाया था। अपनी स्मृतियों में डूबते हुए उन्होंने बतलाया कि किशोरावस्था में वह किस तरह से किसूर से लाहौर जाया करते थे और वहां किस धर्मशाला में ठहरा करते थे। उनका गांव किसूर के निकट ही था और किसूर लाहौर से कोई बहुत दूर नहीं है।

उनका परिवार विभाजन का शिकार हुआ था। उन्हें अपना जमा-जमाया सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा था। वह बतलाते थे शुरू में तो हमें अंदाज ही नहीं था कि मसला इतना गंभीर होने जा रहा है। सोचा था, हम लौट आएंगे। यहां उनका परिवार पहले सहारनपुर पहुंचा जहां उन्हें एक आटे की चक्की में काम करना पड़ा और फिर उन्होंने रिक्शा चलाया और इस तरह अपने माता-पिता और छोटी बहन को पाला। इसके बावजूद उन्होंने पढऩा नहीं छोड़ा। वहां से उनका परिवार यमुनानगर आया, जहां उन्होंने बीए किया और फिर वह दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में उन्होंने डीडीए और रक्षा मंत्रालय में क्लर्की की और इस बीच अपनी आगे की पढ़ाई भी जारी रखी और अंतत: दिल्ली विश्वविद्यालय में लेक्चरर लगे। रामलाल जी ने आजीवन विवाह नहीं किया। संभवत: अपने परिवार की सुरक्षा के कारण। उनकी एक मात्र बहन देहरादून ब्याही हुई हैं। गर्मियों की छुट्टी में अक्सर वह वहीं चले जाया करते थे। उनकी इच्छा थी कि वह अपने आखिरी दिन वहीं काटें, बहन के नजदीक जिसे वह बच्चे से भी ज्यादा प्यार करते थे। दिल्ली के फ्लैट के अलावा उन्होंने देहरादून में जमीन का एक टुकड़ा ले रखा था जिस पर उन्होंने अपनी पेंशन और प्रोविडेंट फंड से मिले पैसे से मकान बनवाया था। पिछले कई वर्षों से वह कह रहे थे कि अब मैं देहरादून जानेवाला हूं। पर न जाने क्या हुआ, वह मकान बन जाने के बावजूद वहां नहीं जा सके।

धूरिया जी बचपन में ही आरएसएस के संपर्क में आ गए थे, जिसका कुछ समय तक उन पर प्रभाव रहा। विशेषकर शरणार्थी होने के कारण आरएसएस की ओर झुकाव समझ में आनेवाला भी था। पर वह विद्वान आदमी थे। उन्हें आरएसएस की संकीर्णता समझते देर नहीं लगी। उन्होंने आरएसएस पर अंग्रेजी में एक पुस्तिका भी लिखी जिसे सेक्यूलर डेमोक्रेसी वाले डीआर गोयल ने छापा। यह पुस्तिका आरएसएस को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी। उन्होंने मुझे वह देने का वायदा किया था पर उन्हें उसकी कापी मिल नहीं पाई। दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षकों की राजनीति में वह वाम पंथियों के साथ रहे। वह मूलत: सीपीआई के समर्थक थे और आजीवन रहे। मैं नहीं जानता रामलाल धूरिया का जन्म कब हुआ। मैं जो भी उनके बारे में जानता हूं वह उन्होंने मुझे अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग कारणों से बतलाई और जो मेरी स्मृति में बनी हुई है।

जानता तो मैं यह भी नहीं हूं कि सितंबर की किस तारीख को उनका देहावसान हुआ। कोशिश करूं तो पता लगा सकता हूं। पर अब यह सब कोई जरूरी नहीं लगता। यह जरूर है कि वह 84 वर्ष के आसपास थे। वह मेरे मित्र थे और जब तक मैं काफी हाउस जा सकूंगा उन्हें हर रोज याद करता रहूंगा।

वह समयांतर के समर्थक थे और उन्होंने पत्रिका के लिए एक लेख भी लिखा था।

इस टिप्पणी को खत्म करने से पहले मैं आप को अपने एक बेतरतीब से सपने के बारे में बतलाने की इजाजत चाहता हूं।

मैं बहुत कम सपने देखता हूं। पर इस छह अक्टूबर की रात मुझे एक ऐसा सपना आया जिसे मैं भूल नहीं सकता। मैंने देखा कि मैं काफी हाउस की छत पर न जाने कब से अकेला बैठा हूं। बहुत रात हो गई है। पूरे फर्श पर कमजोर पीली सी रोशनी फैली हुई है। किसी चौकीदार या बैरे ने मुझसे अचानक आकर कहा, कॉफी हाउस बंद हो गया है। यानी अब आप भी जाइये। वहां वाकई कोई था भी नहीं।

उठा तो देखा, मेरे शांतिनिकेतनी थैले का कंधे का हिस्सा तार-तार हो गया है। किसी तरह उसे संभालता मैं बाहर आया और सीढिय़ां उतरने लगा। पर अचानक पता चला कि आगे सीढिय़ां बिल्कुल टूटी हुई हैं और वहां एक विशाल गड्ढा होने के कारण आगे जा पाना असंभव है। दूसरे रास्ते की तलाश में मैं लौटा पर भटक गया। किसी तरह बाहर निकला तो देखा एक बिल्कुल अनजानी घनी बस्ती में हूं। पर वहां सन्नाटा है। चारों ओर अनंत सर्पाकार गलियां हैं पर उन्हें मैं जानता नहीं हूं। अचानक देखा एक औरत तेजी से कहीं बढ़ी जा रही है। मैंने रोककर उससे रास्ता पूछना चाहा पर वह इतनी तेजी में थी कि मेरे आवाज देने से पहले ही न जाने कौन-सी गली में गायब हो गई।

फिर नींद खुल गई। मेरा प्रश्न है क्या इसका संबंध ऊपर के प्रसंग से हो सकता है?

– पंकज बिष्ट

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