‘सार्वजनिक साहित्यिक संस्थाओं का राजनैतिक रूपांतरण’ (समयांतर : 11 अगस्त, 2012) शीर्षक से सर्वश्री राजेश जोशी, कुमार अम्बुज व नीलेश रघुवंशी का दुख कोई अप्रत्याशित नहीं है। बल्कि मुझे तो यह बिल्कुल स्वाभाविक लगता है। अगर संस्कृति-कर्म (जिसके अंदर साहित्य भी आता है) एक अधिरचना है तो वह सत्तासीन राजनीति से अनुकूलित होगी ही। जब भी कोई व्यवस्था बदलती है तो सत्ताधारी, साहित्य और कला को अपने पक्ष और हिफाजत में बिठा लेते हैं ताकि मनोवांछित माहौल बने और उनकी विचारधारा को समाज में भरसक स्थायित्व या दीर्घजीविता मिले। इन्हें वामपंथी सरकारों ने भी किया है और इसे दक्षिणपंथी भी कर रहे हैं।
मैं इस संदर्भ में इतिहास का छोर पकड़े 1935-36 तक जाना चाहता हूं। 1936 के पहले कई अन्य देशों में लेखकों को क्रांति, बदलाव और प्रगतिशीलता के पक्ष में एकजुट करने की मुहिम प्रारंभ हो चुकी थी। 1934 में मैक्सिम गोर्की के नेतृत्व में सोवियत लेखक संघ का गठन हुआ था। जुलाई, 1935 में पेरिस में हेनरी बारबूज के नेतृत्व में ‘वल्र्ड कांगे्रस ऑफ द राइटर्स फॉर द डिफेंस ऑफ कल्चर’ की स्थापना हुई। इसमें गोर्की के अलावा रोम्यां रोला, आंदे्र मालरो और टॉमस मान जैसे लेखकों की भागीदारी थी। ये सभी फासीवाद से लडऩे का संकल्प ले रहे थे और कलम से जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहे थे।
भारत में इस प्रकार के संगठन की स्थापना थोड़े अलग और नाटकीय ढंग से हुई। 1935 में लंदन में चैरिंग रोड के निकट नानिकंग रेस्तरां के बेसमेंट में हुई बैठक में इसकी योजना बनी और सज्जाद जहीर व मुल्कराज आनंद को मुख्य रूप से इसके गठन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
प्रगतिशील लेखक संघ के लखनऊ-अधिवेशन में देश की आजादी और सामाजिक समानता के आदर्शों से भरे कई नौजवानों ने हिस्सा लिया जिनमें हसरत मोहानी, जैनेंद्र कुमार, फैज अहमद फैज, सागर निजामी, फिराक गोरखपुरी, रशीद जहां, अहमद अली, आनंद नारायण मुल्ला आदि मुख्य थे। हसरत मोहानी जैसे रचनाकार लगभग जिद के अंदाज में कह रहे थे कि प्रगतिशील लेखक संघ को सोशलिस्ट या कम्युनिस्ट होना आवश्यक है तो बन्ने भाई (सज्जाद जहीर) का लेखकों के बारे में मत था कि – ‘संघ उनसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता और प्रजातंत्र में विश्वास की मांग करता है, समाजवाद में नहीं।’ जाहिर है, इसी उदार (किंतु प्रतिबद्ध) नजरिए ने देश में लेखक संघ का अभूतपूर्व विस्तार दिया।
प्रेमचंद ने शायद इसी बहस को ध्यान में रखते हुए अपने अध्यक्षीय भाषण में अपना विचार इस रूप में रखा था कि ”साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दर्जा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।” यह बहस आज भी किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है।
तब से वामपंथी राजनीतिक संगठनों के हालात और बिगड़े हैं। आजादी के बाद प्रगतिशील आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि उससे जुड़े रचनाकार तो सत्ता के छद्म और जन-विरोधी चरित्र को उजागर करने में लगे रहे, लेकिन उनके राजनीतिक नेतृत्व ने भारतीय शासक वर्ग के साथ अपनी गोटी बैठाने की सुगम राह पकड़ ली। क्रांति के शॉर्टकट की यह तलाश आम जनता के साथ धोखाधड़ी थी। इतने दिनों बाद भी वामपंथ कतिपय विवादास्पद मुद्दों यथा, जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद, अगड़ा-पिछड़ावाद, आरक्षण, गठजोड़ आदि पर साफ और एकमत नहीं है, जिनके लिए पूंजीवादी पार्टियां बदनाम हैं।
कुछ वामपंथी जनसंगठनों ने भले ही अध्यक्ष-पद पर मुंशी प्रेमचंद, गुरुशरण सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, मैनेजर पाण्डेय जैसे गैर पार्टीमैन को चुना, पर सामान्यत: अध्यक्ष और महासचिव जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर कोई पार्टी-मेंबर ही बैठाए जाते हैं। हालांकि ऐसे वाम जन संगठनों के संविधान में कहीं खुलकर इस बिंदु पर कोई निर्देश नहीं है और इसे लेकर वहां पारदर्शिता का घोर अभाव है। फिर मेरी समझ में यह बात भी नहीं आती कि महत्त्वपूर्ण पदों के लिए मात्र पार्टी-सदस्य हो जाने से योग्यता कैसे बढ़ जाती है और यदि यही होना है तो फिर किसी जनसंगठन में बगैर पार्टी-मेंबर के व्यक्तियों का आगे बढ़कर काम करने का पुरस्कार क्या है?
इसलिए बंधु मेरे! किसी की ओर उंगली उठाने के साथ ही यह भी देखना होता है कि अपनी तीन उंगलियां हमारी ओर भी इशारा कर रही हैं कि पहले अपने को देख! पहले अपने को देख! पहले अपने को देख!
आखरी बात, अपने स्वार्थ सधने तक हमारे द्वारा किए गए कारनामों की भी है। ‘पुरस्कार, पद, प्रतिष्ठा और चर्चा के लिए हम कब, कहां, कितने दिनों तक क्यों रहे और क्यों वापस हो लिए या पहलू बदल लिया?’ यह भी ईमानदारी से गौर करने की मांग करता है।
भारत भवन में जब अशोक वाजपेयी सब कुछ थे और भोपाल गैस त्रासदी से बुद्धिजीवियों का ध्यान हटाने के लिए उन्होंने लगभग घाव ताजा रहते ही विशाल कवि-सम्मेलन का आयोजन किया था, तो उसके बहिष्कार की अपील वाम साहित्यकारों ने की थी इस पर भी इस सम्मेलन में अरुण कमल जैसे कुछेक कवियों ने भाग लिया था।
इसलिए सवाल सिर्फ योग्यता और गरिमा का ही नहीं है, वस्तुत: यह आज के वामपंथी नेतृत्व के ढुलमुलपन और दिशाहीनता का भी है जिसका प्रभाव उनके साहित्य-जन-संगठनों और लेखकों पर भी आवश्यक रूप से पड़ रहा है।
- तैयब हुसैन, पटना
साहित्य और उसके कार्टेल
सितंबर अंक में भी पाठकों के लिए काफी विचारोत्तेजक सामग्री दी गई है। ‘एक साहित्यिक संस्था की हत्या की कहानी’ से पता लगता है कि किस तरह निहित स्वार्थ महादेवी सृजन पीठ को हड़पने की कोशिशों में लिप्त हैं। ए.के. हंगल को जवरीमल्ल पारख ने अच्छी श्रद्धांजलि दी है। व्यावसायिकता से कोसों दूर मूलत: एक संवेदनशील बुद्धिजीवी कलाकार होने के नाते ही वह इप्टा गए और अंत तक जुड़े रहे। इसलिए, भले ही उन्हें विदाई देने कोई बड़ा अभिनेता या निर्माता निर्देशक न पहुंचा हो, मगर देश भर की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं और महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं ने जिस तरह उन्हें याद किया वह किसी भी तथाकथित बड़े अभिनेता को नसीब नहीं हो सकता।
‘दिल्ली मेल’ में ही कथादेश के जून 2012 अंक में प्रकाशित शालिनी माथुर के लेख पर चल रही बहस पर दरबारी लाल का सटीक विश्लेषण आंखें खोलने वाला है। उम्मीद है कि इसके बाद कथादेश के अगस्त अंक में थोथे कुतर्कों और बचाव में अपने कार्टेल के साथ उतरी कवयित्री कुछ सबक लेंगी। दरबारी लाल ने माथुर के पक्ष में लिखने वालों में अधोहस्ताक्षरी के नाम का भी उल्लेख किया है, मगर उसका सच कुछ और भी है। अधोहस्ताक्षरी ने कथादेश संपादक की सहमति से जुलाई 2012 के अंक में प्रकाशित होने की शर्त पर अपना आलेख 15 जून को ही ई मेल और कूरियर से भेज दिया था, जिसमें माथुर के लेख का बिंदुवार विश्लेषण करते हुए यह कहा गया था कि संबंधित कार्टेल चुप नहीं बैठेगा। यह भविष्यवाणी सही भी साबित हुई। इन्हीं कारणों से अगस्त अंक में उसे दिया तो गया, मगर ड़ेढ पृष्ठों का सिर्फ प्रारंभिक हिस्सा ही। संबंधित पक्ष दरबारी लाल के विश्लेषण और इस अद्वितीय घटना से कुछ सबक लें सकें तो उन्हीं का हित होगा, किसी और का नहीं।
- उद्भ्रांत,नोएडा
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