साहित्य – पटना : कविता का रागदरबारी

0
61

अजय सिंह

सन् 1970 के दशक के हमारे दोस्त – वामपंथी रुझान के हिंदी कवि – आलोकधन्वा और मंगलेश डबराल उन 43 कवियों में शामिल हैं, जो बिहार सरकार के कला-संस्कृति विभाग द्वारा राजधानी पटना में 20, 21 व 22 दिसंबर 2013 को भारतीय कविता समारोह शीर्षक से आयोजित करने जा रहा है। इसमें 14 भाषाओं के कवि अपनी कविताओं का जलवा बिखेरेंगे। इस सरकारी कार्यक्रम का उदघाटन भूमिहार जमींदारों व सामंतों की कुख्यात हत्यारी निजी सेना रणवीर सेना को बचाने व उससे साठगांठ करने के गंभीर आरोप से घिरे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करेंगे।

ध्यान रहे, जस्टिस अमीरदास आयोग को, जो अपनी रिपोर्ट पेश करनेवाला था, नीतीश सरकार ने भंग कर दिया था (2005 में, जब नीतीश की अगुवायी में बिहार में पहली बार जनता दल (यूनाइटेड) – भाजपा गठबंधन सरकार बनी थी)। इस आयोग को यह पता लगाना था कि बिहार में जनसंहारों के पीछे रणवीर सेना की क्या भूमिका थी और किस-किस राजनीतिक पार्टी से उसका रिश्ता था, जहां से उसे संरक्षण मिलता था। आयोग की जांच के घेरे में नीतीश की पार्टी जद (यू) और (उन दिनों) नीतीश सरकार में शामिल भाजपा थी। आयोग को भंग करके नीतीश कुमार ने रणवीर सेना और उसे संरक्षण दे रही राजनीतिक पार्टियों को बचा लिया। पिछले दिनों लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला व मियांपुर जनसंहारों के अपराधी जिस तरह पटना हाईकोर्ट से बरी हुए हैं, उसके लिए भी नीतीश कुमार की कड़ी आलोचना हुई है।

लेकिन इन सबसे बेपरवाह हिंदी, उर्दू, कन्नड़, डोगरी, तमिल, पंजाबी, मराठी, तेलुगू, मलयालय, बंगला, मैथिली, असमी, उडिय़ा व अंग्रेजी के 43 कवि नीतीश कुमार की छवि चमकाने के लिए किये जा रहे इस आयोजन में भाग लेने आ रहे हैं। इनमें बंगला के नबारूण भट्टाचार्य, मलयालम के के. सचिदानंदन, उडिय़ा के सीताकांत महापात्र, तेलुगू के याकूब, तमिल के सुकुमारन, कन्नड़ के चंद्रशेखर कंबार, पंजाबी के सुरजीत पातर, उर्दू के निदा फाजली, मराठी के चंद्रकांत पाटिल, डोगरी की पद्मा सचदेव, मैथिली के गंगेश गुंजन, असमी के करबी डेका हजारिका व अंग्रेजी के जीत तायल शामिल हैं। हिंदी कवियों में आलोकधन्वा व मंगलेश डबराल के अलावा अरुण कमल, सुरेंद्र स्निग्ध, अशोक वाजपेयी, कुंवरनारायण, लीलाधर जगूड़ी, चंद्रकांत देवताले, केदारनाथ सिंह, अनामिका, गगन गिल आदि शामिल हैं। कार्यक्रम में 18 हिंदी कवि आमंत्रित हैं।

इस कार्यक्रम का (परदे के पीछे से) असली सूत्रधार आलोकधन्वा को बताया जा रहा है, जिनकी नीतीश सरकार से गहरी नजदीकी इन दिनों चर्चा में है। ऐसा कहा जा रहा है कि ज्यादातर कवियों का चयन उन्हीं ने किया है। वैसे, इस कार्यक्रम को करने के लिए राज्य सरकार ने एक समिति बनायी है, जिसके एक सदस्य आलोकधन्वा हैं। हिंदी कहानीकार उषा किरण खान भी इस समिति की सदस्य है। बाकी सदस्य सरकारी कारिंदे हैं। समिति का अध्यक्ष रामवचन राय को बनाया गया है, जिन्हें पटना के हिंदी अखबार कभी ‘हिंदी विद्वान’ तो कभी ‘हिंदी लेखक’ लिखते हैं। नीतीश सरकार ने बिहार राज्य सार्वजनिक पुस्तकालय प्राधिकार व सूचना केंद्र बनाया है, जिसका अध्यक्ष रामवचन राय को बनाया गया है। यानी, वह भी सरकारी आदमी हैं – नीतीश के कृपापात्र!

इधर आलोकधन्वा की ‘सक्रियता’ व नीतीश सरकार से उनकी बढ़ती नजदीकी और रब्त-जब्त उनके पुराने मित्रों और प्रशंसकों के लिए खासी हैरान करनेवाली है। पटना के हिंदी अखबारों में उनकी फोटो व खबरें और ‘सद्विचार’ आए दिन छपते देखे जा सकते हैं। शायद ही कोई अन्य हिंदी कवि/लेखक अन्य कहीं इस तरह अखबारों में छपता हो। ज्यादातर कार्यक्रम सरकारी या अद्र्ध सरकारी होते हैं, जिनमें आलोकधन्वा की शिरकत रहती है। उदाहरणके लिए इधर गत माह के एक पखवाड़े को देखा जाए तो एक दिन आलोकधन्वा अखबारों में राज्य सरकार के सूचना मंत्री वृषि
ण पटेल के साथ नजर आए – वह और मंत्री किसी महिला ऑटो रिक्शा चालक को तारीफ की चिट्ठी दे रहे थे। एक अन्य दिन उन्हें बिहार विधान परिषद के सभागार में पाया गया – विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह के साथ, किसी किताब को जारी करते हुए। इसमें अवधेश नारायण सिंह ने एक फड़कता हुआ जुमला आलोकधन्वा को सुनाया और उसे नसीहत दी: ‘कलम के सिपाही सो गए, तो राजनीति के मसीहा वतन बेच देंगे।’ (इसके बाद भी ‘कलम का सिपाही’ जगा कि नहीं, कहना मुश्किल है!) अब यह सवाल बेमानी है कि वृषिण पटेल या अवधेश नारायण सिंह के साथ आलोकधन्वा क्यों थे और क्या कर रहे थे। किसी एक दिन वह विनोद भारद्वाज का उपन्यास जारी करते हुए दिखाई दिए। फिर एक दिन अमृता शेरगिल पर एक कार्यक्रम में उसे कुछ बोलते हुए सुना गया।

सवाल है, कविता के मोर्चे पर इस भूतपूर्व नक्सलवादी, आत्ममुग्ध कवि की यह सक्रियता क्यों नहीं है? उसका कवि कर्म कहां छूट गया? सत्ता के साथ संपर्क कार्य कैसे प्रमुख काम बन गया? अगर आप उत्तर प्रदेश पर भी निगाह डालें, तो पायेंगे कि यहां भी प्रगतिशील धारा से जुड़े कई लेखक, कवि व कलाकार सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (मुलायम सिंह यादव – अखिलेश यादव) से अपने तार जोडऩे और बदले में इनाम-पुरस्कार पाने में लगे हुए हैं। एक थके-हारे वामपंथी लेखक की टिप्पणी थी: ‘विरोध की मुद्रा अपनाने से आखिर हमें क्या मिला, सिवा आर्थिक नुकसान के!’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here