भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने गहरे अविश्वास तथा तनाव का स्थान क्या उम्मीद ले पाएगी? क्या दोनों देशों की सरकारें अपने परंपरागत दृष्टिकोण से हटकर अमन की एक नई उम्मीद जगाने के प्रति वास्तव में गंभीर होंगी?
दुनिया का सबसे ऊंचा और बहुत ही खर्चीला रणक्षेत्र सियाचिन क्या भारत और पाकिस्तान के बीच शांति के हिमनद में बदलेगा? दोनों देशों के बीच दशकों पुराने गहरे अविश्वास तथा तनाव का स्थान क्या उम्मीद ले पाएगी? क्या दोनों देशों की सरकारें अपने परंपरागत दृष्टिकोण से हटकर अमन की एक नई उम्मीद जगाने के प्रति वास्तव में गंभीर होंगी?
सियाचिन में सात अप्रैल की दुखद घटना के बाद आशा की एक किरण नजर तो आ रही है, क्योंकि इस घटना ने पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान के माहौल को कुछ हद तक बदला है। ऐसा पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं और सैन्य प्रमुख के बयानों से लग रहा है। सियाचिन हिमनद (ग्लेशियर) भारत-पाकिस्तान के बीच विवादास्पद मुद्दों में से एक है। यह करीब 72 किलोमीटर लंबा है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 21 हजार फीट है। यह काराकोरम रेंज के पांच सबसे बड़े हिमनदों में सबसे लंबा और कश्मीर में स्थित है। सात अप्रैल को सियाचिन ग्लेशियर में पाकिस्तान के 124 सैनिक और 11 नागरिक हिमस्खलन की चपेट में आने से 80 फीट गहरे बर्फ में दफ्न हो गए। काफी खर्चीले और लंबे बचाव व राहत कार्यों के बावजूद इन 124 सैनिकों और 11 नागरिकों का पता 50 दिन बाद कहीं जाकर लगा। तब भी सिर्फ तीन शव ही निकाले जा सके थे। वर्ष 1984 से भारत के 950 और पाकिस्तान के तीन हजार सैनिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी हैं। इनमें अधिकतर की मौत सियाचिन के भीषणतम और कठोर मौसम के कारण हुई है। यहां का तापमान शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस तक गिरता है। इसके बावजूद यह दोनों देशों की सेनाओं का स्थायी निगरानी केंद्र है। सालटोरो रिज में अपनी सेना को बनाए रखने के लिए माना जाता है कि भारत हर रोज पांच करोड़ रुपये खर्च करता है। यानी एक साल में 1, 825 करोड़ रुपये। लेखक, विश्लेषक आमिर मीर ने पाकिस्तानी अखबार द न्यूज में लिखा, ”सियाचिन के मामले पर झगड़े ने 1984 से अप्रैल 2012 के बीच आठ हजार भारतीयों और पाकिस्तानियों की जानें लीं।” एक और पाकिस्तानी विशेषज्ञ और लेखक फारूख सलीम लिखते हैं कि ”अगर इससे तुलना करें तो 1965 के भारत-पाक युद्ध में कुल हताहतों की संख्या 3, 800 थी।” सलीम पाकिस्तानी अखबार द न्यूज डेली में लिखते हैं, ”आज तक के सभी शीत युद्धों में से सबसे बड़े शीत युद्ध का अभी तक के खर्चे का लेखा-जोखा अब पांच अरब डालर से भी अधिक है, जो कि पाकिस्तान के पूरे सालाना रक्षा बजट के बराबर है।” सियाचिन विवाद पर वह आगे कहते हैं कि पाकिस्तान को यह दो सौ मिलियन डालर से तीन सौ मिलियन डालर सालाना के करीब पड़ता है, जो कि पाकिस्तानी मुद्रा में पांच करोड़ प्रतिदिन है। वह कहते हैं, ”बिना किसी रणनीतिक, खनिज, सामरिक महत्त्व का यह विश्व का सबसे निरर्थक और मूर्खतापूर्ण युद्ध होना चाहिए।” ( मेल टुडे, 12 अप्रैल 2012 )।
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 13 जून 2005 को सियाचिन आधार शिविर पर भारतीय सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था, ”सियाचिन को सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र कहा जाता है, जहां रहना बहुत ही मुश्किल है। अब समय आ गया है कि हम प्रयास करें कि यह संघर्ष के केंद्र की जगह शांति के प्रतीक में बदले।” हालांकि 2005 के बाद से सियाचिन के मुद्दे पर स्थिति में कुछ हद तक बातचीत के अलावा कोई ठोस बदलाव होता नजर नहीं आया है। लेकिन सात अप्रैल, 2012 की उस भीषण घटना के बाद जो सबसे अहम बयान आया वह था पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी का माना जा सकता है। उन्होंने यह कहकर एक तरह से सभी को अचंभे में डाल दिया कि सियाचिन क्षेत्र का असैन्यीकरण होना चाहिए। जबकि यह वही कयानी हैं जिन्होंने सन् 2008 में कहा था कि वह अपने दृष्टिकोण में ”भारत केंद्रित” हैं। कयानी ने कहा कि दो पड़ोसियों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, ताकि हर कोई जनता की भलाई पर ध्यान केंद्रित कर सके …भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी शत्रुता को समझौते के जरिए हल किया जाना चाहिए। अठारह अप्रैल को कयानी ने कहा कि दोनों देशों को एक साथ बैठना चाहिए और सियाचिन सहित सभी मुद्दों को हल करना चाहिए। कयानी के इस बयान को इसलिए ज्यादा अहम माना जा रहा है क्योंकि यह बयान पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की ओर से नहीं बल्कि सेना के शीर्ष स्तर से आया है। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान में सेना वहां के राजनीतिक प्रतिष्ठानों से ज्यादा ताकतवर है। पाकिस्तानी सेना देश की भारत और कश्मीर नीतियों को निर्देशित करती है और साथ ही यह फैसला करती है कि क्या पुनर्मेल को आगे बढ़ाना चाहिए या नहीं।
भारत ने भी कयानी और पाकिस्तान के राजनीतिक हलकों से आए बयानों का स्वागत किया। तीस अप्रैल को भारत के रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने लोकसभा में कहा कि सरकार सियाचिन हिमनद के असैन्यीकरण के लिए पाकिस्तान के साथ उद्देश्यपूर्ण वार्ता कर रही थी। जमीनी आधार तैयार करने के लिए दोनों देशों के रक्षा सचिव इस साल के अंत में इस्लामाबाद में मिलेंगे।
असल में सियाचिन की इस ताजा दुखद घटना ने पाकिस्तान की राजनीतिक सोच को काफी हद तक बदला है। यह एक ऐसा प्रस्थान बिंदु हो सकता है जहां से दोनों देश विवादों, खासकर सियाचिन के मुद्दे के हल के लिए गंभीरता के साथ ठोस कदम उठाने की सार्थक पहल कर सकते हैं। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने तो पाकिस्तान की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि उसे सियाचिन से एकतरफा अपनी सेना को वापस बुला लेना चाहिए। 17 अप्रैल को स्कार्दू एयरपोर्ट पर शरीफ ने कहा कि इसे अहं का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। पाकिस्तान को पहल करनी चाहिए। तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान ने समाचार साप्ताहिक इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, ”पाकिस्तान और भारत को सियाचिन से सैन्य बलों को एक साथ हटाना चाहिए।” पाकिस्तान में राष्ट्रीय सुरक्षा पर संसदीय बहस के दौरान एक सदस्य ने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि सियाचिन ग्लेशियर में 1984 से, जब से दोनों देशों के बीच झड़प हुई थी, अति कठोर मौसम के कारण जितने लोग मारे गए उतने आपसी संघर्ष में नहीं मारे गए। इसी बहस के दौरान पाकिस्तान के ट्रेजेरी सीनेटर मोहम्मद अदील ने कहा, ” हम करीब तीस साल से इतना महंगा युद्ध क्यों लड़ रहे हैं।” उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में मानव गतिविधियां, जिसमें भारत और पाकिस्तानी बलों की ओर से फायरिंग भी शामिल है, इस इलाके में ग्लेशियर को प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने पाकिस्तानी सरकार से कहा कि वह संसद को इस बारे में बताए कि वह ग्लेशियर को बचाने तथा सियाचिन विवाद का हल निकालने के लिए क्या कर रही है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने एक बयान जारी करके कहा, ” दोनों देशों की सरकारें सियाचिन के मामले का समाधान करें, निश्चय ही विवादास्पद मुद्दों का भी… यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे संसाधनों को अपनी जनता के कल्याण और तरक्की के लिए खर्च करेंगे बजाय कि दुनिया के सबसे ऊंचे य़ुद्धक्षेत्र पर बहुत ही खर्चीले बचाव एवं राहत अभियानों और अपनी सेनाओं की लागत पर।”
इस घटना के बाद भारत से ज्यादा पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठानों के अंदर और आम जनता में सियाचिन के मुद्दे को लेकर बहस चल रही है। ऐसा भारतीय मीडिया में प्रकाशित समाचारों से लग रहा है। लेकिन असल पेच वहीं आकर फंसता है- वह है गहरे अविश्वास का माहौल। ”खासकर भारत की ओर से पाकिस्तानी सेना को लेकर। सन् 1984 में भारतीय खुफिया एजेंसी ने पाकिस्तानी सेना के सालटोरो रिज को हथियाने की योजना को लेकर ठोस सबूत दिए थे। सालटोरो रिज सियाचिन ग्लेशियर के दक्षिण-पश्चिमी भाग में पड़ती है। उस समय परवेज मुशर्रफ स्कार्दू ब्रिगेड कमांडर थे और इस आपरेशन के तत्कालीन आफिसर इंचार्ज भी। 13 अप्रैल, 1984 में भारतीय सेना ने हेलीबोर्न आपरेशन मेघदूत शुरू किया। कुमाऊं रेजीमेंट के पर्वतारोहियों को सालटोरो रिज पर, विशेष चोटियों को कब्जे में लेने के लिए, उतारा गया। 48 घंटों के अंदर पाकिस्तानी फौज ने भी एक ऑपरेशन शुरू किया और बहुत ऊंचाई पर तथा बहुत ठंडी जलवायु में युद्ध लड़े गए किंतु जो पहले आए थे ऊंचाइयां उनकी ही रहीं। मात्र यह एक लाभ है जो भारतीय सेना थाल में परोस कर पाकिस्तान को देने के लिए तैयार नहीं है।”( इंडिया टुडे, 14 मई 2012)।
लेकिन असल मुद्दा यह है कि दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ते कायम करने और विवादास्पद मुद्दों को हल करने का काम उन दोनों देशों की सेनाओं का नहीं बल्कि लोकतांत्रिक सरकारों का है। भारत में राजनीतिक सत्ता पर पाकिस्तान की तरह सेना का निर्देश नहीं चलता, इसलिए एक बड़ा देश होने के नाते भारत की सरकार को इस विवाद का हल निकालने के लिए सार्थक पहल करनी चाहिए। खासकर तब जब पाकिस्तान की सेना लचीला रुख अपना रही है। वैसे भी अविश्वास की खाई को सरकारें ही पाट सकती हैं। जो कि दोनों पड़ोसियों की जनता के हित में ही होगा। वैसे भी पाकिस्तान आज ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहां कट्टरपंथी और आतंकवादी तत्त्व इस कदर हावी हैं कि उसे विखंडन की राह पर ले जा सकते हैं। जैसा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने हाल ही में भारत की अपनी निजी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि जिस तरह भारत आतंकवाद का शिकार है उसी तरह पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार है। विश्लेषक भी अब यह मान रहे हैं कि कई मामलों में यह देखने में आया है कि पाकिस्तान के अंदर जो आतंक का उद्योग है उस पर अब पाकिस्तानी सेना और सत्ता प्रतिष्ठान का उस तरह से नियंत्रण नहीं है जैसा कि पहले रहता था।
एक टूटता और क्रमश: कमजोर होता पाकिस्तान भारत के हित में नहीं होगा। क्योंकि भविष्य में पाकिस्तान में सक्रिय विघटनकारी तत्त्व अपनी ताकत का अधिक से अधिक इस्तेमाल भारत के खिलाफ ही करेंगे।
हालांकि इस अविश्वास को पाटना कोई आसान काम भी नहीं है। खासकर भारत सरकार के लिए, क्योंकि भारत में राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठानों में एक तबका ऐसा है जो पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह के सामान्य संबंध बनाने के खिलाफ लगातार मुखर रहता है। खासकर भारत में राजनीति का दक्षिणपंथी खेमा, जिसे पाकिस्तान विरोध के नाम पर समय-समय पर राजनीतिक खुराक मिलती रहती है। अगर इसे पार पाने में कुछ हद तक कामयाबी मिल भी जाए तो हथियारों की लॉबी का पूरा एक ऐसा जाल है जो दोनों देशों के बीच किसी तरह से संबंध सामान्य नहीं होने देना चाहता। अंतरराष्ट्रीय हथियार गिरोह का यह ”छिपा” हुआ हाथ सेना से लेकर राजनीति के गलियारों और मीडिया तक हर जगह मौजूद रहता है और देश भक्ति और राष्ट्रवाद की आड़ में अपना खेल दिखलाता रहता है। भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ती इस अंतरराष्ट्रीय हथियार लॉबी के हित में नहीं है। शत्रुता ही उसका असली मुनाफा है, क्योंकि इसके कारण ही वह अपना खजाना भरता है। शत्रुता कायम रहेगी तो हथियार भी बिकेंगे। सन् 2010 में ही भारत ने 333 करोड़ अमेरिकी डालर के हथियार खरीदे। हथियार आयात करने के मामले में भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा देश है और कई विकसित देशों से हथियार मंगाता है। हथियारों की खरीद, उनके आधुनिकीकरण जैसे कि राकेट, मिसाइल और सामरिक महत्त्व के उपग्रहों की लांचिंग पर भारत का खर्चा लगातार बढ़ रहा है, जबकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य, साफ पेयजल और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। यही हाल लगभग पाकिस्तान का है। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष के वक्तव्य के बाद भारतीय मीडिया के एक हिस्से में अचानक पाकिस्तान के प्रति आक्रामकता दिखलाई देने लगी है। सुरक्षा, सावधानी और विश्वासघात की कहानियां बढ़-बढ़ कर सुनाई जाने लगी हैं।
हथियार लॉबी का दखल किस तरह से है इसका हवाला अंग्रेजी समाचार पत्र डेक्कन हेराल्ड ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में दिया है। हेराल्ड ने एक अप्रैल के अंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट में लिखा है, ”जैसे-जैसे भारत सैन्य उपकरणों पर बहुत अधिक खर्च करने वाले देशों में से एक देश के रूप में उभरकर सामने आ रहा है, वैसे-वैसे लग रहा है कि अफसरों के एक हिस्से, जिसकी संख्या लगातार बढ़ रही है, ने सिद्धांतों और विश्वास पर रिटायरमेंट के बाद चलने का निर्णय ले लिया है। वैश्विक सैन्य उद्योग के परिसरों के प्रलोभन में आकर उन्होंने स्वयं ही इस चकाचौंध कर देने वाली कारपोरेट दुनिया के गंदे हिस्सों में, करोड़ों के हथियारों के ठेकेदारों के लॉबिस्ट के रूप में प्रवेश ले लिया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसके विषय में सैन्य बल में से कोई बात करना पसंद नहीं करता। इनमें से बहुत से हथियार के ठेकों में लॉबिस्ट या बिचौलियों के अस्तित्व से इनकार करते हैं, किंतु निजी तौर पर वे मानते हैं कि यह व्यापार पनप रहा है। इन लॉबिस्टों के लिए पुराने लोगों का नेटवर्क बहुत कारगर साबित होता है, क्योंकि उनमें से अधिकतर बाहर की दुनिया के लिए अनाम और गुमनाम रहते हैं। अगर कुछ मामलों में भ्रष्टाचार की गंध भी उठे जिसके कारण कुछ फर्मों को ब्लैकलिस्ट करने या कांट्रेक्ट रद्द करने की स्थिति आ भी जाए तो भी लॉबिस्ट कानून के परिदृश्य से बाहर ही रहते हैं, क्योंकि कागजों पर उनके नाम नहीं होते।”
पिछले दिनों सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) तेजिंदर सिंह ने एक घटिया स्तर की खरीद के लिए उन्हें घूस की पेशकश की थी। जनरल वी.के. सिंह के इस बयान ने एक तरह से विवादों का भानुमति का पिटारा खोल दिया। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक ने डेक्कन हेराल्ड के साथ बातचीत में माना कि ” हथियारों का व्यापार, पूरे विश्व में, बहुत ही प्रतिस्पर्धी है और साथ ही अनैतिक भी। आपके पास दलाल, डीलर, भ्रष्ट अधिकारी और नेता होते हैं। यहां तक अपने देश के उत्पादनकर्ताओं के लिए नेता लॉबिंग करने वाले बन जाते हैं। उत्पादनकर्ता और डीलर अक्सर उन लोगों को घूस और कमीशन देने की कोशिश करते हैं जिन्हें वे आसानी से अपनी पकड़ में आने वाला समझते हैं।”
”वायुसेना के एक अधिकारी 1980 के दशक की एक घटना याद करते हुए कहते हैं कि जब भारतीय वायुसेना के पास एक खास तरह के वॉल्व की अत्यधिक कमी थी, उस समय उसकी कीमत 40 रुपए प्रति वॉल्व थी। यह सोवियत गणतंत्र से आता था। एक दिन एक भद्र पुरुष वायु भवन में आए और उन्होंने हूबहू वॉल्व की बिक्री का प्रस्ताव रखा, जिसकी कीमत पांच हजार रुपए प्रति वॉल्व बताई। उनके पास उनके सिंगापुर स्थित गोदाम में स्टाक तैयार था।” ( डेक्कन हेराल्ड, व्हीलिंग एंड डीलिंग इन डिफेंस कान्ट्रेक्टक्स, 1 अप्रैल 2012)। जैसा कि यह अखबार अपनी इस रिपोर्ट में आगे लिखता है कि वह एक शुरुआत थी। इसके बाद बाढ़ आ गई। पहले जगुआर फाइटर्स और फिर बोफोर्स तोप और साथ ही आर्थिक उदारीकरण।
लेकिन इस तरह की बाधाएं तो हमेशा बनी ही रहेंगी। भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य और आगे की दिशा में ले जाने के लिए जरूरत है एक दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की। इससे कुछ बात बन सकती है। कम से कम सियाचिन के मामले में तो कुछ हो ही सकता है। जहां दो ऐसे देश जिनकी अधिसंख्य जनता को ठीक से रोटी नहीं मिलती, और जो आधि सदी पहले एक थे, निरर्थक रूप से अरबों रुपये खर्च कर रहे हैं।
आज अतिआधुनिक तकनीक के दौर में सियाचिन में बिना किसी सेना की मौजूदगी के एक-दूसरे की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। भारत के पास तो रीसेट-1 जैसा अतिआधुनिक स्वेदशी रडार इमेजिंग सेटेलाइट है, जो उसने हाल ही में लांच किया है। इस सेटेलाइट को लांच करके भारत ने अंतरिक्ष और सुरक्षा क्षमताओं में एक बहुत लंबी छलांग लगाई है। यह रडार दूसरे देश के सैन्य अभियानों को देख सकता है। इसके जरिए बादलों से ढके क्षेत्र में भी गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।
इसलिए भारतीय नेतृत्व को सिर्फ कर्णप्रिय बातें ही नहीं करनी होंगी बल्कि बातचीत और विवादास्पद मुद्दों के समाधान के लिए जमीनी स्तर पर ठोस पहल भी करनी होगी। साथ ही पाकिस्तानी राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व सियाचिन की घटना के बाद जिस तरह के सकारात्मक संदेश दे रहा है उसे हकीकत में बदलने के लिए उसे कुछ सकारात्मक करता हुआ नजर भी आना पड़ेगा। निश्चय ही बड़ा देश होने के नाते भारत की जिम्मेदारी भी बड़ी है। दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के लिए जो पहल एक बार फिर शुरू हुई है उसे सतत गति देनी होगी। जैसे की दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने के लिए सीमा पर एक एकीकृत चौकी खोली जा रही है। दोनों सरकारों ने निश्चय किया है कि वे भारत-पाकिस्तान वाणिज्य परिषद का गठन करेंगे। इसके अलावा अहम बात यह है कि पाकिस्तान भारत को अति वरियता वाले राष्ट्र का दर्जा देने के प्रयास के बहुत करीब है। पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री मखदूम अमीन फहीन ने पिछले दिनों भारत में अपनी यात्रा के दौरान कहा था, ”हमें यह समझना चाहिए की लडऩे में कोई फायदा नहीं है। हम क्यों नहीं संवाद करते? क्यों आगे नहीं बढ़ते हैं? हम व्यापार के जरिए बहुत सारे क्षेत्रों में आगे बढ़ सकते हैं। बाकी बचे हुए मुद्दे भी तब सुलझा लिए जा सकते हैं।”
क्या हमारा राजनीतिक नेतृत्व इसे सुन रहा है?
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