दिल्ली मेल : अवैध और असंवैधानिक

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अवैध और असंवैधानिक

jasamतीसरी दुनिया के देशों में होनेवाले तख्ता पलटों की तरह रातों-रात जनसंस्कृति मंच (जसम) की दिल्ली इकाई में उलट-फेर हो गया है। इकाई को भंग कर दिया गया है और इसकी जगह अशोक भौमिक की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है।

मजे की बात यह है कि इस परिवर्तन की सूचना दिल्ली के अध्यक्ष मंगलेश डबराल तक को नहीं थी। या कहना चाहिए उन्हें बतलाने तक की जरूरत नहीं समझी गई। इकाई को क्यों भंग किया गया? उसके खिलाफ जो शिकायतें थीं न तो उन्हें बतलाई गईं और न ही दिल्ली की सचिव भाषा सिंह को। हद यह है कि इस पर उनको सफाई देने का मौका भी नहीं दिया गया। इस तरह की कोई सौजन्यता या नियम मानने की कोई औपचारिकता भी नहीं बरती गई की इकाई को भंग करने के चरम निर्णय से पहले उनसे कभी कोई लिखित में पूछताछ की गई हो कि आप की इकाई में जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है। जसम का काम करने का तरीका किस हद तक अलोकतांत्रिक है इसका उदाहरण यह है कि कि डबराल को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के बावजूद ऐसी किसी बैठक की सूचना भी नहीं थी जिसमें दिल्ली जैसी महत्त्वपूर्ण इकाई के बारे में निर्णय लिया जाना था। सच यह है कि यह सूचना कार्यकारिणी के और भी कई सदस्यों को नहीं थी।

सवाल यह है कि आखिर इस इकाई ने ऐसा क्या किया था जिसके कारण उसे भंग करने को इतने क्लेंडस्टाइन (अवैधानिक) तरीके से अंजाम दिया गया?

लगता यह है कि जसम पर भी खेल संगठनों की तरह एक गिरोह का कब्जा है जिसकी मूल रुचि साहित्य के नाम पर दुकानदारी करना है। यह गिरोह लगता है इलाहाबाद से चलता है। लोगों का कहना तो यहां तक है कि संगठन में किसी तरह के कोई भी नियम का पालन नहीं होता। जो जहां जम जाता है जम रहता है और फिर अपनी कुर्सी बचाने में लगा रहता है। नियमो की मांग करनेवालों को जितनी जल्दी हो बाहर कर दिया जाता है या वे हताश होकर स्वयं ही चले जाते हैं। इसका संविधान क्या है यह भी सार्वजनिक नहीं है।

यह अत्यंत दुखद है कि वामपंथी साहित्य और संस्कृति के मंच ऐसे दौर में कुछ लोगों को कब्जे में चले गए हैं जिनकी रुचि येन केन प्रकारेण अपनी कुर्सी बचाना है। न तो इन संगठनों के चुनाव होते हैं और न ही पदाधिकारी बदलते हैं। सब कुछ सर्वसम्मति यानी दादागिरी से होता है। इन में ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो साहित्य और संस्कृति के मामले में फैसला करते हैं पर अपनी ओर से जिन्होंने वर्षों से एक शब्द नहीं लिखा है। इसका परिणाम यह है कि ये लोग लेखकों से डरते हैं और उन्हें किसी भी महत्त्वपूर्ण पद पर अपवाद स्वरूप ही रखते हैं या फिर उन लोगों को रखते हैं जो इनका बबुआ बनने को तैयार रहते हैं। असली कब्जा, चुके आलोचकों और रिटायर्ड अध्यापकों का रहता है जो अपने साथ अपने अवसरवादी अध्यापक-शिष्यों को भी शामिल कर लेते हैं। या शिष्य लोग अपने गुरुओं को रब्बर स्टॉम्प बना कर ले आते हैं।

पर मजे की बात यह है कि दिल्ली इकाई के भंग किए जाने को समयांतर में फरवरी में छपे महमूद अंसारी के लेख  अज्ञेय भक्तों के हवाले’ से जोड़ा जा रहा है जिसमें इस संगठन को लेकर कई खरी-खरी बातें लिखी गई थीं। उन आरोपों की जांच करने या अपने तौर-तरीकों पर विचार करने की जगह संगठन की ओर से दी गई प्रतिक्रिया में, जिसमें महासचिव को छोड़ कर 20 पदाधिकारियों के हस्ताक्षर थे, कहा गया था कि ”हम इस लेख का उत्तर देने लायक नहीं समझते’’  पर पिछले चार महीनों से जसम उस लेख की वजह से हिला हुआ है और ऐसे तरीके ढूंढने में लगा है जिससे कि उसके कर्ताधर्ताओ
ं के कारनामे व मन-मर्जियां समाने न आ पायें। विरोध करनेवाले बाहर हो जाएं और बाकी कार्यकर्ताओं को सबक मिल जाए कि संगठन के दबंगों के खिलाफ बोलने की हिम्मत करनेवालों का क्या अंजाम होता है।

सम्मान की भूख का दौर

इधर एक खबर मुंबई से आई है। पिछले वर्ष कान्हा में हुए एक आयोजन में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना मनसे के एक पदाधिकारी वागीश सारस्वत को लेकर जबर्दस्त विवाद हुआ था। इसी माह मुंबई में परचम नामक साहित्यिक संस्था ने एक आयोजन किया। इसमें अशोक वाजपेयी का एकल कविता पाठ हुआ।

यह किसी से छिपा नहीं है कि मनसे एक फासीवादी संगठन है और इसमें वे सब बुराईयां हैं जो इस तरह के किसी भी संगठन में हो सकती हैं, जैसे कि चरम सांप्रदायिक होना, चरम क्षेत्रीयतावादी होना और हिंसा का सहारा लेना। मनसे के कार्यकर्ताओं ने कई बार उत्तर भारतीयों विशेष कर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के उन बच्चों के साथ मारपीट की जो केंद्रीय संस्थानों और संगठनों की परीक्षाओं में भाग लेने मुंबई आ रहे थे।

सारस्वत यही नहीं कि मनसे के पदाधिकारी हैं बल्कि वह साहित्यिक संस्था परचम से भी जुड़े हैं। अपने आप में यह अत्यंत निराशा जनक है कि हमारे वरिष्ठतम लेखक और कवि लोग बिना सोचे-समझे किसी भी कार्यक्रम में शामिल होने को तैयार रहते हैं। अशोक वाजपेयी गोकि वामपंथी नहीं हैं और वह अपनी उदारता के चलते ऐसे कई संगठनों के मंचों पर बैठ सकते हैं जो परंपरावादी हों पर वह अपने को लगातार सेक्युलर तो कहते ही रहते हैं। वाम झुकाववाले लोग भी उनसे इसी कारण संवाद रखते हैं। पर इस तरह से ऐसे किसी संगठन के व्यक्ति के साथ शामिल होना जो हिंदी विरोधी भी कहां तक सही है यह तो अशोक वाजपेयी ही बता सकते हैं।

– दरबारी लाल

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