मार्क्सवादी पॉलिटिक्स में एक और फिकरा दर्ज हो गया है। यह शब्द है ‘सामंती स्टालिनवाद’। इसका प्रयोग किसी मामूली मार्क्सवादी सिद्धांतकार ने नही, देश के प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने अपनी ही पार्टी सी.पी.आई.(एम.) की केरल शाखा के सम्बन्ध में किया है। उनके इस फिकरे ने वामपंथी बौद्धिक क्षेत्रों में खासा विवाद पैदा कर दिया है। इंटरनेट, ईमेल,एसएमएस आदि के माध्यम से अनेक बुद्धिजीवियों ने पटनायक से ‘सामंती स्टालिनवाद’ को व्याख्यायित करने की मांग की है। अर्थशास्त्री से जानना चाहा है कि सीपीआई (एम) में किस प्रकार की सामंती स्टालिनवादी या सामंत स्टालिनवादी प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं? यह पार्टी किस प्रकार से इन प्रवृत्तियों की शिकार है? उन्हें अचानक सामंती स्टालिनवादी प्रवृत्तियां कैसे दिखाई देने लगी हैं? यदि केरल इकाई में सामंती स्टालिनवाद है तो पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व या अन्य राज्यों की इकाइयां भी ऐसी प्रवृत्तियों से कैसे अछूती रह सकती हैं? क्या स्टालिनवाद को सामंतवाद से जोड़ा जाना ठीक है? इन दोनों में क्या समानता हो सकती है? ऐतिहासिक दृष्टि से इन दोनों विचारों में कोई तालमेल नहीं है, दोनों परस्पर शत्रु हैं। तब स्टालिनवाद का सामंतवाद से विशेषीकरण करने का क्या अर्थ हो सकता है? यद्यपि, मार्क्सवादी पार्टी की स्टालिनवादी कहकर अक्सर आलोचना की भी जाती है। फिर भी इसे ‘सामंती स्टालिनवादी’ कहने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं? बुद्धिजीवियों ने पटनायक से यह भी पूछा है कि पार्टी में ‘सामंती स्टालिनवाद’ को सिद्ध करने के लिए क्या उनके पास कोई ठोस प्रमाण है?
जेएनयू के प्रो. प्रभात पटनायक 1975 के सीपीएम के सदस्य हैं। उनकी पत्नी उत्सा पटनायक भी वामपंथी अर्थशास्त्री मानी जाती हैं। दोनों ही पार्टी के प्रति समर्पित हैं। उनके माता-पिता कम्युनिस्ट थे। फिर भी उन्होंने अपनी ही पार्टी की केरल इकाई को उसकी कार्यशैली के सवाल पर कटघरे में खडा किया है। उस पर ‘बुर्जुआ उदारतावाद की वर्चस्वता’ का भी आरोप लगाया है। पार्टी इन दोनों ही प्रवृत्तियों की कड़ी गिरफ्त में है। इससे पार्टी को क्षति पहुंच रही है। जाहिर है, पटनायक ने केरल इकाई को ‘सामंती स्टालिनवाद’ से परिभाषित कर पार्टी के आंतरिक व बाहरी संकट को और बढ़ा दिया है। इस ताजा विवाद की जड़ में पटनायक की अगले महीने कोझीकोड में आयोजित ‘चिंता रवि स्मारक’ संगोष्ठी में व्याख्यान देने की स्वीकृति है। केरल के कतिपय बौद्धिक क्षेत्र पटनायक के संगोष्ठी में शामिल होने का विरोध भी कर रहे हैं। ये क्षेत्र सीपीएम विरोधी हैं और नहीं चाहते की पटनायक संगोष्ठी में अपना व्याख्यान दें। सभी जानते हैं कि केरल इकाई बुरी तरह से विवादास्पद ही नहीं, गुटबाजी से ग्रस्त भी रही है। केन्द्रीय नेतृत्व के लिए चुनौती बनी हुई है। महासचिव प्रकाश करात इसी प्रदेश से हैं लेकिन इस इकाई को लगाम लगाने और विवादों का माकूल हल निकालने में असमर्थ दिखाई देते हैं। इस परिदृश्य में दिल्ली से पटनायक का संगोष्ठी में शामिल होना और राज्य शाखा को ‘सामंती स्टालिनवाद’ और ‘बुर्जुआ उदारतावाद का वर्चस्व’ जैसे फिकरों से पोतने से कई सैद्धांतिक समस्याएं भी पैदा होंगी।
अब सवाल अकेली राज्य इकाई का भी नहीं रहा बल्कि इन फिकरों ने सैद्धांतिक व व्यावहारिक विमर्शों को भी जन्म दे दिया है। बीती सदी में स्टालिनवाद की तीखी आलोचनाएं हो चुकी हैं। स्टालिन को ‘फासीवादी’, ‘तानाशाह, ‘अलोकतांत्रिक’, ‘घोर व्यक्तिवादी’, ‘हत्यारा’ आदि सब कुछ कहा गया है। लेकिन सामंतवादी, पूंजीवादी, बुर्जुआ उदारवादी जैसे शब्द स्टालिन पर चस्पा नहीं किए गए थे। जहां तक मैं समझता हूं ‘सामंती स्टालिनवाद’ से स्टालिन और उनकी कार्यशैली शायद परिभाषित नहीं हो। हालांकि उन्होंने अपने विरोधियों का सफाया कराया था। यह सब कुछ इतिहास में दर्ज है लेकिन उनके उत्तराधिकारी ख्रुश्चेव, बुल्गानिन, ब्रेजनेव, ग्रोर्वाचोव आदि ने भी स्टालिन को सामंतवाद से नहीं रंगा था। यह संभव है कि निजी चर्चाओं में स्टालिन-विरोधी नेता उन्हें ‘सामंती’ कहते रहे होंगे लेकिन मार्क्सवादी चिंतन व शब्दकोश में यह शब्द शायद ही दर्ज हुआ हो। जब छठें व सातवें दशकों में तत्कालीन सोवियत संघ को ‘सामाजिक साम्राज्यवादी’ से परिभाषित किया गया था तब भी बौद्धिक क्षेत्रों में इसे लेकर गंभीर विमर्श जन्मा था। भारत की सीपीआई (एमएल) ने इस थिसिस को काफी आगे बढ़ाया भी था। यहां तक कि सामाजिक साम्राज्यवाद को मुख्य दुश्मन घोषित किया गया था। यह अलग बात है कि अब सोवियत संघ का वजूद ही नहीं रहा और आज भी ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद’ विश्व मानवता का ‘मुख्य दुश्मन’ बना हुआ है। क्या पुरानी थिसिसों का नए परिप्रेक्ष्य में परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए? अत: ‘सामंती स्टालिनवाद’ के वैचारिक आधार व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को भी समझने की जरूरत है।
किसी भी संस्था या व्यक्ति में प्रवृत्तियां हठात जन्म नहीं लेतीं। क्या सामंती स्टालिनवाद का सम्बन्ध केवल सीपीएम से ही है या इसके दायरे में सम्पूर्ण कम्युनिस्ट आंदोलन भी आता है?
‘सामंती स्टालिनवाद’ किन-किन अर्थों में ‘संशोधनवाद’, ‘सुधारवाद’,, ‘संसदीय सुधारवाद’, ‘पूंजीवादी उदारवाद’, ‘सर्वहारा तानाशाही’, ‘वामपंथ संकीर्णता’ व् ‘व्यक्तिवाद’. ‘रेनीगेड’ आदि से अलहदा है? इसके वैचारिक, सैद्धांतिक, व्याव्हारात्मक जैसे आधार क्या हैं? क्या अब तक के ज्ञात मार्क्सवादी औजार वस्तुगत स्थिति का विश्लेषण करने में चूक गए? क्या ‘सामंती स्टालिनवाद’ इस मामले में अधिक उपयोगी सिद्ध होगा? क्या यह फिकरा अन्य वामपंथी पार्टियों पर भी लागू होता है? क्या वे भी इस प्रवृत्ति की शिकार हो चुकी हैं। इस चुनौती का सामना कैसे किया जाए और इसका समाधान क्या है? क्या राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में ‘पर्ज’ की जरूरत है? इस प्रकार के सवाल ‘सामंती स्टालिनवाद’ से जुड़े हुए हैं।
यह भी संभव है कि पटनायक ने केरल की इकाई की ओट में सम्पूर्ण पार्टी पर ही सैद्धांतिक राकेट दागा हो क्योंकि 2009 के आम चुनावों में सीपीएम की असाधारण पराजय ने नेतृत्व चिंतन व कार्यशैली दोनों की भावी सार्थकता पर सवालिया निशान लगा दिया था। केरल और पश्चिम बंगाल दोनों ही प्रदेशों में इस पार्टी ने लंबे समय तक सत्ता-सुख भोगा है। पिछले ही दिनों बंगाल पार्टी के एक पूर्व सांसद को भ्रष्टाचार के मामले में दल से निष्कासित भी किया गया है। पार्टी की एक अन्य पूर्व राज्यसभा सांसद के घर छापा पड़ा था। उसके पति और दामाद को विभिन्न आरोपों में गिरफ्तार भी किया गया था। पार्टी का विस्तार क्यों नहीं हो रहा है? इसके जनाधार क्यों सिकुड़ रहे हैं? क्यों यह आजतक हिंदी पट्टी में अपना प्रभाव जमाने में नाकाम रही है? कहीं इसका कारण नेतृत्व की कार्यशैली का ‘सामंती स्टालिनवाद’ तो नहीं हैं? चूंकि यह पार्टी पूंजीवादी संसदवाद की नशेड़ी बन चुकी है इसलिए कहीं बुर्जुआ उदारवादी शक्तियों का इसकी चिंतन व कार्यपद्धतियों पर आधिपत्य हो सकता है। शायद पटनायक के वैचारिक निचोड़ में पार्टी की वर्तमान रीति-नीति अब चुक चुकी हो। इक्कीसवीं सदी की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में ने ‘फाम्र्यूलेशनों’ और रणनीति की आवश्यकता पटनायक महसूस कर रहे हों। इसलिए वे सामंती स्टालिनवाद के कार्ड के जरिए पार्टी के भीतर और बाहर वैचारिक बहस चलाने की कोशिश कर रहे हों। उन्होंने कहा भी है कि वे संगोष्ठी में भाग लेने के बहाने वैचारिक बिंदुओं से टकराना चाहते हैं। वे खुली बहस करना चाहते हैं। नेतृत्व उनके ताजा फाम्र्यूलेशन (सामंती स्टालिनवाद) को किस तरह से लेगा, यह तो भविष्य बतलाएगा। अभी तो पटनायक को चाहिए कि वे अपने धमाकेदार फिकरे का खुलासा करें ताकि इस पर खुलकर बहस की जा सके। नि:संदेह ‘सामाजिक साम्राज्यवाद’ के पश्चात ‘सामंती स्टालिनवाद’ बेहद उत्तेजक विमर्श की मांग करता है। फिलहाल इस पर धुंध छाई हुई है।
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