गायत्री आर्य
स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक: चारू गुप्ता; पृष्ठ: 287; मूल्य : रु. 500 ; राजकमल
ISBN 9788126722389
भारत में सांप्रदायिकता के उदय व विकास पर काफी लेखन हो चुका है। चारु गुप्ता उस ऐतिहासिक लेखन को अधूरा समझती हैं, क्योंकि उसमें महिला व सांप्रदायिकता के अंतर्संबंधों पर बेहद कम लिखा गया है। अध्यापिका व इतिहासकार चारु गुप्ता ने इस किताब में औपनिवेशिक काल में लिंग, यौनिकता और हिंदू सांप्रदायिकता के बीच के अंतर्संबंधों की गहरी जांच-पड़ताल की है। लेखिका औपनिवेशिक भारत में स्त्री और सांप्रदायिक राजनीति के संबंध को चोली-दामन का रिश्ता मानती हैं। लेखिका ने उत्तर भारत में पनपते और उग्र होते हिंदू विमर्श व इस विमर्श द्वारा व्याख्यायिक पितृसत्ता के तेवरों को शुरू से पकडऩे की कोशिश की है। कैसे 1920 के बाद हिंदू संकीर्ण ताकतों ने कहीं ज्यादा उग्र होकर सांप्रदायिक सीमाबंदी के लिए स्त्री देह को अपना हथियार बनाया है।
दुनिया भर में समुदायों की पहचान के लिए स्त्री देह को हथियार के तौरपर प्रयोग किया गया है। लेखिका उत्तर प्रदेश के विशेष संदर्भ में बात करती हैं। उत्तर भारत में भी हिंदू प्रचारकों ने लेखों, भाषणों, सभाओं और अन्य गतिविधियों द्वारा हिंदू स्त्रियों के लिए एक घोषित-अघोषित आचार संहिता का प्रस्ताव दिया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि व संगठन आंदोलनों में भी स्त्री देह को कई प्रकार से इस्तेमाल किया गया। लेखिका बताती हैं कि कैसे महिलाओं, खासतौर से विधवाओं की जननीय क्रियाओं को हिंदुओं की तथाकथित घटती आबादी की चिंता के साथ जोड़कर देखा गया। किताब में खासतौर से हिंदू स्त्री की देह की बुनियाद पर फलती-फूलती सांप्रदायिकता और निर्मित होते हिंदू राष्ट्रके व्यापक चित्र खींचे गए हैं। 19वी सदी के अंत और 20वीं सदी के शुरू में स्त्री केंद्रित जितनी भी चिंताए भारतीय समाज में अलग-अलग धड़ों में थी ये किताब उनका कच्चा चिठ्ठा खोलती है। ”विवाद में कहने के लिए तो विधवाएं केंद्र में थीं, लेकिन उनकी अपनी आकांक्षाओं, इच्छाओं और सोच को हाशिए पर ही रखा गया। …यह बात कही जाने लगी थी कि हिंदू विधवाओं की जनन शक्तियों और कोख को अधिकाधिक हिंदू बच्चे पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि हिंदुओं कि घटती संख्या को थामा जा सके।”
किताब में यह जानकारी बड़ी रोचक है कि कैसे जाति विशेष की महिलाओं की स्थिति, क्रियाकलाप और रिवाजों ने उस जाति का दर्जा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ”अग्रवालों ने अग्रहरियों के साथ भेदभाव किया क्योंकि उनकी महिलाएं दुकानों में काम करती थीं। खटिकों को नीचा दिखाया गया क्योंकि उनकी महिलाएं सड़कों पर फल बेचती थीं। गुज्जरों के एक तबके को कमतर माना गया क्योंकि उनकी महिलाएं घी और मक्खन बेचती थीं। इस प्रकार कई मध्यवर्ती और यहां तक कि निम्न जातियों ने भी अपनी सामाजिक औकात बढ़ाने और ऊंचाई पर पहुंचने के दावों को मजबूत करने के लिए अपनी महिलाओं पर कई तरह से नियंत्रण लगाने शुरू किए।…कई चमार सभाओं ने अपनी महिलाओं को दाई बनकर दूसरे के घरों में जाने से रोका” चारु बिना किसी लाग-लपेट के लिखती हैं कि स्त्रियों से जुड़े कई मुद्दों पर प्रगतिशील हिंदू सुधारकों व संकीर्ण परंपरावादियों की सोच में बेहद समानता थी। दोनों ही धड़े महिलाओं के तथाकथित अश्लील गानों को सुनने, सार्वजनिक घाटों मे अर्धनग्न स्नान, होली, मेले व थियेटर जाने को हिंदू पतन के रूप में देखते थे।
यह किताब स्वतंत्रतापूर्व आकार ग्रहण करती सांप्रदायिक राजनीति में स्त्री देह की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर तथ्यात्मक प्रकाश डालती है। हिंदुओं की संख्या बढाने के लिए महिलाओं की प्रजनन क्षमताओं पर नियंत्रण के घिनौने प्रयासों से हमें अवगत कराती है। हमें पता चलता है कि कैसे औरतों के मुद्दे संकीर्ण, पारंपरिक, सुधारवादी हिंदुओं और ऊंची व नीची जातियों को एक छत के नीचे ले आते थे (आज भी ले आते हैं!) ”महिलाओं के सामाजिक, धार्मिक, भौतिक और सार्वजनिक कार्यक्षेत्र पर नियंत्रण ने हिंदू समाज में ताकतवर और प्रभावशाली नौकरीपेशा तबकों (विशेषकर कायस्थों और खत्रियों), पुनरूथानवाद के अधिक कट्टरपंथी विचारों की ओर झुकाव रखने वाले स्थानीय ब्राह्मणों और व्यापारियों (खासकर मारवाडिय़ों), अपने लिए क्षत्रिय वर्ग के उच्चतर दर्जे की मांग कर रही मध्यवर्ती और शूद्र जातियों(मुख्यत: अहीरों, कुर्मियों, गुर्जरों और खटिकों), और उच्च जाति के हिंदुओं से अलग अपनी अस्मिता तलाश कर रही कुछ अस्पृश्य जातियों (जैसे चमारों), के बीच एक कड़ी प्रदान की।
एक तरफ पितृसत्ता नए रंग-ढंग में प्रकट होने की तैयारी कर रही थी। दूसरी तरफ कुछ मध्यवर्गीय महिलाएं विशेषत: निम्नजातीय स्त्रियां, विधवाएं, वेश्याएं, सभ्यता के नए ढांचे को ठुकराकर इस नए रंग-ढंग की पितृसत्ता में सेंध लगा रही थीं। यह किताब नित नूतन रूप धरती पितृसत्ता, नैतिकता, यौनिकता का स्त्री पाठ है। भारतीय संदर्भ में अश्लीलता को परिभाषित करने वाला दौर भी इस किताब में प्रमुखता से दर्ज है। भारत में अश्लीलता को लेकर सबसे शुरुआती कानून 19वीं सदी के अंतिम दशक में सामने आया। अश्लीलता से जुड़ी कोई भी बहस अभिजात और लोकप्रिय साहित्य के बीच की रस्साकशी से जुड़ती है। अश्लीलता के भारतीय संस्करण के पीछे एक तरफ जहां विक्टोरियाई सोच का प्रभाव था, वहीं दूसरी तरफ हिंदू संस्कृति के शुचितावाद का भी असर था। ”अश्लीलता पर केंद्रित बहस मुख्य रूप से आनंद और मनोरंजन के लिए सेक्स बनाम प्रजनन के लिए सेक्स के विचारों पर केंद्रित थी। राष्ट्र संबंधी विमर्श में गैर-प्रजननकारी और भोगवादी यौन रुचियों पर भारी नकारात्मक दबाव पडऩे लगे। जिसके फलस्वरुप सभी गैर-प्रजननोन्मुखी यौनिकताओं को लगभग हाशिए पर धकेल दिया गया।”
असल में रीतिकाल में जैसी कामुकता से स्त्री को साहित्य में दर्ज किया गया, वह पितृसत्तात्मक और सामंती संस्कारों का ही परिणाम था। दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्रवादी पहचान खड़ी करने के दौर में जिस साहित्यिक नैतिकता की बात की गई और जिसके तहत स्त्री पर नैतिकता, पतिव्रता, शुचिता की जो नई चादरें ढकी गईं वह भी पितृसत्ता के सामंती संस्कारों का ही रूप था। लेखिका द्विवेदी युग के कवि-लेखकों द्वारा रीतिकाल के सिर्फ एक कवि भूषण की तारीफ व शृंगार वर्णन करने वाले अन्य कवियों की उपेक्षा को महिलाओं की यौन पहचान को नियंत्रित करने और अश्लीलता को पुनर्परिभाषित करने के तौर पर देखती हैं। लेकिन ऐसा करने से एक नई बहस जन्म लेती है। क्या रीतिकालीन कवियों ने नायक-नायिका के संयोग और नायिका देह के जो वर्णन किए वे स्त्री यौनिकता की वकालत के लिए किए थे? यदि रीतिकालीन उन तमाम नायिका वर्णनों को स्त्री की यौनिकता के प्रदर्शन के रूप में देखा जाएगा, तो फिर आजकल टीवी पर डियोडरेंट व परफ्यूम के विज्ञापनों में पुरुषों पर टूटकर गिरती, सेक्स करने की अटूट इच्छा प्रदर्शित करती नायिकाओं को भी अश्लील और भौंडा कैसे कहा जाएगा? क्या सेक्स की भूख से बौराई स्त्रियों को दिखाने वाले तमाम विज्ञापन स्त्री की यौनिकता, यौन इच्छाओं के प्रति बेहद जागरूक हैं! क्या सच में हमारा समाज, रीतिकालीन साहित्यकार, विज्ञापनकर्ता, मीडियाकर्मी, गीतकार आदि सभी स्त्री की यौनिकता के प्रति बेहद सचेत व संवेदनशील हैं? मुझे इसमें संदेह है। यदि ये सभी लोग स्त्री यौनिकता के प्रति वास्तव में सचेत होते तो इस तरह भौंडे और अश्लील तरीके से उसे पेश नहीं करते। इस तरह से तो समाज स्त्री की यौनिकता को और भी घृणा की नजर से देखेगा और उसे निंदनीय चीज ही समझेगा।
लेखिका आधुनिक युग के ‘चोली के पीछे क्या है’ जैसे गानों के विरोध को स्त्री यौनिकता के नकार के रूप में देखती हैं। एक पल को हम इस गाने का विरोध करने वाले शुचितावादी हिंदू संगठनों को भूल जाते हैं। तब क्या माना जाए कि उस वर्ष इस गाने को साल का ‘सर्वश्रेष्ठ गाना’ बनाने वाले श्रोता असल में इस गाने से अपनी कामुक इच्छाओं को नहीं सहला रहे थे बल्कि स्त्री यौनिकता को स्वीकार कर रहे थे? स्त्री यौनिकता का सम्मान कर रहे थे? कम से कम मैं तो भारतीय समाज को इतना स्त्री संवेदी नही पाती कि वह समय-समय पर साहित्य, गानों व विज्ञापन के माध्यम से स्त्री यौनिकता को ससम्मान स्वीकार करे। स्त्री की यौनिकता हमेशा से पितृसत्ता के लिए डर, चिंता, भय व गालियों का सबब रही थी, आज भी है और शायद रहेगी भी।
लेखिका बताती हैं कि यह वही दौर था जब एक तरफ महिलाओं के लिए नैतिकता के नए प्रतिमान गढ़े जा रहे थे तो दूसरी तरफ प्रेस की नई-नई सुविधा के चलते समाज में घोर कामुक साहित्य का बोलबाला था। ”यौन टीकाओं ने एक ‘वैसाकिनक’ लबादा तो ओढ़ लिया मगर साथ ही वे यौन उत्तेजना और गुदगुदी भी पैदा करते थे। यह साहित्य हाशिए पर नहीं बल्कि एक उभरती उपसंस्कृति के केंद्र में था। एक सी किताबों में पितृसत्तात्मक और नैतिकतावादी विचारों को आंशिक रूप से पुनर्निर्मित किया गया।” लेखिका यह साफ करने से नहीं चूकती कि ”इन गंदी किताबों को महिलाओं की पहुंच से दूर रखने के लिए खासतौर से हिदायत दी जाती थी।”
19वी सदी के अंतिम और 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में पुरुष यौनिकता भी विवाद का विषय बनी। एक तरफ शक्तिशाली हिंदू राष्ट्र के लिए वीर्यवान ब्रह्मचारी युवकों की जरूरत पर जोर था। संयम के जरिए पुरुषत्व बचाना ही लक्ष्य था। दूसरी तरफ भोग के जरिए आनंद में सच्चे पुरुषत्व को देखा जा रहा था। ”एक में पुरुषत्व का सार वीर्य को बचाए रखने में निहित था तो, दूसरे का उसको प्रवाहित कर देने में था। मगर इसके साथ ही, दोनों पितृसत्तात्मक समझ को पुष्ट करते थे-एक महिलाओं को हाशिए पर धकेल कर, तो दूसरा उन्हें अधीन बनाकर।” पुस्तक बताती है कि ब्रह्मचर्य के एजेंडे और कामोद्दीपक विज्ञापनों की खींचतान में पुरुष यौनिकता न सिर्फ केंद्र में आई बल्कि विवाद का कारण भी बनी। स्त्री यौनिकता तो पहले से ही सवालों के घेरे में थी। ”महिला यौनिकता की किसी भी अभिव्यक्ति को नई राष्ट्रवादी व्यवस्था के लिए हानिकारक माना गया। हिंदू सुधारवादी विचारों ने अश्लील गानों और त्यौहारों को असभ्य, निम्न और अनैतिक समाज के साथ जोड़ते हुए एक सीधी रेखा खींच दी।
उत्तर औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रनिर्माण की मुहिम जैसे-जैसे तेज होती गई वैसे-वैसे सभी सामाजिक व्यवहारों, रीतियों, परंपराओं, मनोरंजन के साधनों को शुद्धता की सेंसरशिप से गुजरना पड़ा । लेखिका का मानना है कि सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों की बढ़ती भागीदारी पुरुषों के लिए चिंता का विषय थी, इसलिए स्त्रियों के सांस्कृतिक जीवन और मनोरंजन तक को हिंदू सुधारवादियों की सेंसरशिप से गुजरना पड़ा। स्त्रियों द्वारा शादी-ब्याह, खुशी-गम, के मौकों पर गाए जाने वाले गीतों पर सख्त आपत्ति जताई गई। महिलाओं का अश्लील गीत गाना एक तरह से राष्ट्रविरोधी काम माना गया। साथ ही पवित्रता, पतिव्रता, शील, शुचिता आदि गुणों को स्त्रियों के प्रथम कर्तव्य के रूप में प्रचारित किए जाने की शुरुआत हुई। यहां तक कि स्त्रियों के मेला भ्रमण को अनैतिक और वेश्यावृत्ति समान माना जाने लगा। लेखिका सभ्यता की आड़ में खत्म किए जा रहे इन प्रयासों को स्त्री के प्राकृतिक आनंद को खत्म करने की साजिश के तौर पर देखती हैं। ”स्त्रियों के इस सांस्कृतिक जगत को शुद्ध और अनुशासित करके ही सम्मान अर्जित किया जा सकता था। सभ्यता की दुहाई देकर पितृसत्तात्मक शक्ति को न्यायसंगत बनाने और बरकरार रखने का यह एक और प्रयास था। महिला मनोरंजन को निम्न, गंवारू और भ्रष्ट उपमाएं देकर उनके प्राकृतिक आनंद को नियंत्रित करने की कोशिश की गई और उसके स्थान पर एक उच्च परिष्कृत और उत्कृष्ट सांस्कृतिक मनोरंजन को स्थापित करने का प्रयास किया गया।”
स्त्री की यौनिकता को नकारने वाली सोच के निर्माण के एक-एक रंग-रेशे का लेखिका ने पर्दाफाश किया है। ”प्राकृतिक सृष्टि क्रिया में पुरुष की जिम्मेवारी दस मिनट की है और स्त्री की जिम्मेवारी दस महीने की है। जब प्रकृति ने ही दस मिनट और दस महीने का अंतर जिम्मेवारी में रखा है, तब कोई कैसे दोनों जिम्मेवारी एक कर सकता है?” बाल विवाह में लड़की की उम्र को बढ़ाने की सोच का चौतरफा विरोध हुआ। लेखिका बाल विवाह का समर्थन और कमजोर प्रसव व मृत्यु के तर्कों का खंडन करने वाली सोच से हमे रूबरू कराती है। ”यदि कम उम्र में दांपत्य से मौतें ज्यादा होती हैं, तो भारत की आबादी 26 करोड़ कैसे हो गई। क्या बाल माताओं के पुत्रों जैसे सिक्ख, रोहिला और गोरखा सिपाहियों को कमजोर और स्खलित कहा जा सकता है?….भारत को नौ साल की लड़की के बच्चा जनने का गौरव है।…युवावस्था तक कन्याओं को अविवाहित रखने से उनकी मानसिक अपवित्रता का बड़ा भय हो जाएगा।”
नवजागरण के दौर में सुधारकों और विचारकों के लिए स्त्री शिक्षा का प्रश्न बेहद जटिल था। इस बात को पहले भी कई पुस्तकें हमारे सामने लाई हैं। लेखिका और ज्यादा बारीकी में जाकर स्त्री शिक्षा की जटिलताओं को उजागर करती हैं। एनी बेसेंट के स्त्री शिक्षा पर विचार भारतीय विचारकों से अलग नहीं थे। उनका मानना था ”भारत को शालीन तौर-तरीकों वाली शिक्षित पत्नियों और माताओं की, बुद्धिमती व स्नेही गृहिणियों की, बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षित शिक्षिकाओं की, पतियों को उचित परामर्श देने वाली सहगामिनियों की और बीमारियों में तीमारदारी करने वाली सुयोग्य नर्सों की आवश्यकता है, न कि वैसी स्त्री स्नातकों की जो केवल बाहरी कामकाज के लिए उपयोगी हों।”
वर्तमान में पसरी सांप्रदायिकता की जड़ें लेखिका 19वीं सदी के अंतिम व20वीं सदी के शुरुआती सालों में पाती हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रऔर स्वराज के लक्ष्य को पाने के दौरान पितृसत्ता का भारतीय संस्करण भी नए रूप-रंग में ढल रहा था। अपनी सोच और नए दृष्टिकोण को और भी ज्यादा पुख्ता व प्रमाणिक सिद्ध करने के लिए लेखिका ने किताब में19वीं-20वीं सदी में प्रकाशित चित्रों, कार्टूनों, इश्तहारों का भरपूर प्रयोग किया है। स्त्री देह व यौनिकता जैसे संवेदनशील मसले पर व्यापक समाज को कटघरे में खड़ा करने के लिए जिस साहस, धैर्य, प्रमाणिकता और तटस्थता की जरूरत है उसका परिचय लेखिका ने दिया है।
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