संपादकीय : रास लीला, राम लीला और ‘न्याय लीला’

0
81

ramleela-rasleelaउपरोक्त शब्दों में तीसरा शब्द जो अर्थ प्रेषित करता है वह रास लीला और राम लीला से बिल्कुल भिन्न है। ‘न्याय लीला’ कहते ही जो बोध होता है वह एक मायने में पहले दो शब्दों के सकारात्मक अर्थ के ठीक विपरीत जाता है। प्रश्न है आखिर ऐसा क्यों? इसका कारण स्पष्ट है। हर शब्द अपना अर्थ विस्तार करता है। विशेषकर विकासमान समाजों में शब्द अपने रूढ़ अर्थों को ‘ट्रांसेड’ कर अन्य क्षेत्रों में हो रही प्रगति के अनुपात में लगातार विस्तार पाते हैं और अभिव्यक्ति के नए आयाम तलाशने में मददगार साबित होते हैं। यहां ध्यान देने योग्य है कि न्याय के साथ ‘लीला’ जुडऩे से जो अर्थ विस्तार हो रहा है वह ‘लीला’ शब्द के समाज की सदियों की यात्रा में स्वीकार्य अर्थ वैविध्य के कारण पैदा हुआ है। यही कारण है कि इस अर्थ के लिए किसी संदर्भ विशेष की भी आवश्यकता नहीं है।

इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो मध्यप्रदेश और इलाहाबाद उच्च न्यायालयों के गोलियों की रास लीला – राम लीला फिल्म के प्रदर्शन पर जो रोक के आदेश हैं वे शब्दों की अत्यंत रूढ़ और संकीर्ण समझ व व्याख्याओं पर आधारित नजर आते हैं। दिक्कत यह है कि ये आदेश तथाकथित रामलीला समितियों की याचिकाओं पर दिए गए हैं। उदाहरण के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ का आदेश बहराइच की मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामलीला समिति द्वारा दायर याचिका पर दिया गया है। इस तरह की समितियां उत्तर भारत के गांवों तक में हैं। इसलिए किसी एक शहर की छोटी-मोटी संस्था को हिंदू समाज का प्रतिनिधि संगठन मानकर चलने से जो खतरे हो सकते हैं, वे इस आदेश से स्पष्ट हो जाते हैं। न्यायालय को कोई भी बात सुनने से पहले इस तरह की संस्था की कानूनी और सामाजिक स्थिति (लोकस स्टेंडाई) को जांच लेना चाहिए था। इस तरह तो कोई भी कभी भी किसी भी शब्द को आड़ बना कर न्यायालय की मदद से संवाद और संप्रेषण के प्रयत्न को रोकने में सफल हो जाएगा और हो रहा है। भाषा या अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों को लेकर अगर इस तरह का संकीर्ण रवैया अपनाया जाएगा तो निश्चित है कि हम विचारों के स्तर पर सिमटते जाएंगे और अंतत: एक ऐसे मुकाम पर जा पहुंचेंगे जहां हर तरह के संवाद और संप्रेषण पर कानूनी बंदिश की तलवार लटकती रहेगी। यह ऐसा फासिज्म होगा जो स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज के मूल सिद्धांतों पर ही मट्ठा डालने का काम करेगा।

पर इस प्रसंग के दूसरे पहलू भी हैं। जैसे कि इस फिल्म के शीर्षक को लेकर सिर्फ मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में ही राम भक्त न्यायालय की शरण नहीं गए। मुंबई उच्च न्यायालय में दायर इसी तरह की याचिका पर न्यायालय ने किसी भी तरह की कोई टिप्पणी करने की जगह निर्माता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए नोटिस जारी कर दिया था। मध्य प्रदेश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी तार्किक तौर पर यही तरीका अपनाना चाहिए था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तो उस स्वयंसेवी संगठन को दंडित ही कर दिया जो इस तरह की याचिका लेकर उपस्थित हुआ था। दूसरे शब्दों में इस तरह की अपीलें कोई अपवाद नहीं बल्कि एक खास तरह की योजनाबद्धता की ओर इशारा करती हैं।

पर यहां एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रदर्शन से पूर्व सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) से, जो कि एक संवैधानिक संस्था है, सभी निर्माताओं को अपनी फिल्म को पास करवाना होता है जो इसे सार्वजनिक प्रदर्शन से पूर्व देखती है और जरूरी काट-छांट के बाद ही प्रदर्शन की इजाजत देती है। अदालतों के बार-बार के रोक के आदेशों से ऐसा संकेत निकलता है मानो सेंसर बोर्ड – जिसमें फिल्मों के अलावा कला, संस्कृति और समाज विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की जानी-मानी हस्तियां होती हैं – में यह योग्यता ही नहीं है कि वह फिल्म कृतियों का समाज के संदर्भ में सही मूल्यांकन कर सके । यह स्वीकार करना थोड़ा कठिन है कि सेंसर बोर्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह भारतीय समाज की धार्मिक, सामाजिक संवेदनशीलता को न समझ पाता हो। न्यायालयों को ऐसी स्थिति नहीं पैदा करनी चाहिए जो उन्हें सेंसर बोर्ड के खिलाफ खड़ा दिखलाए। यह बात भी नहीं भूली जानी चाहिए कि फिल्म कुल मिला कर एक सांस्कृतिक उत्पाद है जिसे यथावत सामाजिक परंपराओं और रूढिय़ों को मानने और अभिव्यक्त करने के लिए बाध्य किया जाए। दूसरे शब्दों में रचनात्मक और सृजनात्मक चीजों पर न तो संकीर्ण कानूनी तरीके से निर्णय लिया जा सकता है और न ही लिया जाना चाहिए। वैसे भी क्या यह बेहतर नहीं होता कि न्यायालय फिल्म पर रोक लगाने से पहले किसी भाषाविद की ही सलाह ले लेते? न्यायालयों और सीबीएफसी के बीच का यह टकराव इस बात की ओर भी इशारा करता है कि सरकार को जल्दी ही इस संबंध में कदम उठाकर इस तरह के अवांछित और दुर्भाग्यपूर्ण टकरावों को रोकना जरूरी हो गया है। वैसे इस तरह के प्रतिबंध लगाने की मांग सिर्फ धर्म और परंपराओं के नाम पर ही नहीं की जाती बल्कि इनको आड़ बनाकर राजनीतिक कारणों से भी की जाती है। विश्वरूपम और मद्रास कैफे इसके हाल के उदाहरण हैं।

अंतिम बात। भारतीय समाज की संकीर्णतावादी ताकतें, विशेषकर सांप्रदायिक, न्यायालयों की उदारता का इस्तेमाल लगातार रूढि़वादिता, धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वासों को बढ़ाने के लिए कर रही हैं, यह बात समझी जानी चाहिए। विशेषकर बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से, कई संगठन उभरे हैं जो कट्टरता में आपस में प्रतिद्वंद्वी हैं और आत्मप्रचार के लिए कोई भी हथकं डा अपनाने से नहीं चूकते हैं। चिंता की बात है कि रचनात्मक और सृजनात्मक गतिविधियां इससे बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रही हैं।

तहलका के सबक

गत माह का एक पूरा सप्ताह जिस तरह से तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के अपनी एक युवा सहकर्मी के साथ यौन दुव्र्यवहार की कोशिश के कारनामे से भरा रहा वह एक मामले में पूरे भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों में आ रहे बदलाव की ओर इशारा करता है। निश्चय ही यह दौर उथल-पुथल का है क्योंकि शक्ति के मान्य और स्थापित संतुलन में स्थिरता नहीं रही है। पर ये बातें बाद में। इस संदर्भ में सबसे पहले स्पष्ट शब्दों में यह कहना जरूरी है कि इस मामले में जो कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए वह हर हालत में हो। चूंकि दोनों पक्ष सामने हैं, इसलिए इसे राजनीतिक मामला न बनाया जाए बल्कि एक आधुनिक समाज में स्त्री की स्वायत्तता और उसकी गरिमा व सम्मान का मासला मानकर ही चला जाए।

इस घटना का, जिसमें एक बड़े संपादक ने अपनी प्रतिष्ठा को तो, संभवत: अपने अहंकार के चलते, मिट्टी में मिला लिया है, एक विशिष्ट पत्रिका के भविष्य को भी खतरे में डाल दिया है, सबसे बड़ा सबक, अगर कोई हो सकता है तो वह यह है कि एक खुले समाज में नियम और सिद्धांत दो तरह से नहीं बरते जा सकते। भीतर कुछ और बाहर कुछ। पर शक्तिशाली अक्सर इस सत्य को भूल जाते हैं। विशेषकर पितृसत्तात्मक समाजों में लगातार स्त्रियों को निशाना बनाते समय पुरुष अपने को विशेषाधिकारी समझ बैठता है और स्त्री को संवेदनहीन भोग्या।

विशेषकर उन पदों पर, जो सार्वजनिक तौर पर ज्यादा नजरों में रहते हैं, स्थापित मर्यादाओं का पालन जरूरी है, जिनकी हम स्वयं अपने सार्वजनिक व्यवहार – शिक्षा, लेखन, मीडिया या फिर व्याख्यान – आदि के माध्यम से पैरवी करते हैं। इस में भी शंका नहीं है कि हमारे समाज में अक्सर सत्ता संतुलन एकतरफे होने के कारण उच्च पदस्थ लोगों को यह भ्रम रहता है कि वे अपराजेय हैं या फिर इतने संपर्क संपन्न कि अपने खिलाफ कुछ होने नहीं देंगे। शंका नहीं कि अक्सर ऐसा होता भी है। बल्कि एक तरह से ये ही समान्य नियम है। अगर कुछ देर को नैतिक प्रतिबद्धता और आग्रह को भूल जाएं तो भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम कुल मिला कर 21वीं सदी में रह रहे हैं जो तुलनात्मक रूप से कई गुना खुली है और जहां समाज की विभिन्न शक्तियां अपनी-अपनी तरह से प्रभावी होती जा रही हैं। इसलिए वे चाहे जितनी भी कमजोर नजर आती हों, जब सक्रिय हो जाती हैं, उनके असर को कम करके नहीं आंका जा सकता। दूसरे शब्दों में हमारे समाज में, चाहे वह कितना ही पिछड़ा क्यों न हो, अब अक्सर जो बड़े नैतिक पतनों, भ्रष्टाचारों, सामाजिक अन्यायों और दमनों के प्रतिकार और संघर्ष उभर कर सामने आ रहे हैं, उनका संबंध इसी आलोढऩ से है। सबसे बड़ी बात यह है कि स्त्रियां स्वयं को ‘एसर्ट’ कर रही हैं। अपने अधिकार मांग रही हैं और मांग रही हैं समाज में अपनी प्रतिष्ठा व चुनाव का अधिकार।

पर दिक्कत यह है कि हमारा समाज एक ओर अत्याधुनिक पश्चिमी मूल्यों को, विशेषकर समानता के, जिसमें लिंग, जाति, धर्म और क्षेत्रीयताएं गौण हो जाती हैं और मानवीय मूल्य सर्वोपरी – कम से कम संविधान के कारण, स्वीकार करने लगा है तो दूसरी ओर वह अपने सामंती मूल्यों और धार्मिक मान्यताओं के चलते गहरे कहीं परंपरागत असमानताई संस्कारों से ग्रस्त है। समाज में बड़े पैमाने पर हो रहे भौतिक परिवर्तनों, जिनमें महिलाएं बड़े पैमाने पर बाहर निकल रही हैं, और हर तरह के व्यवसायों में हाथ बंटा रही हैं, से हमारा पुरुषवर्ग तालमेल नहीं बैठा पा रहा है। हम न तो उनकी यौनिकता से, न उनके बढ़ते प्रभाव से, न उनको मिलनेवाली जरूरी कानूनी सुरक्षा के बीच स्वयं को सहज पा रहे हैं। इसने हमारे समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर बड़े पैमाने पर सामाजिक-नैतिक संकट खड़ा कर दिया है। पर बौद्धिक वर्ग के सामने यह चुनौती इसलिए ज्यादा बड़ी है कि अंतत: समाज के दिगदर्शन में उससे अपेक्षा बनी रहती है।

समस्या के और पहूलू भी हैं, जैसे कि संविधान द्वारा प्रदत्त कानूनों का सही तरीके से प्रशासनिक स्तर पर पालन न हो पाना। अगर कानून सही तरीके से काम करने लगे तो उसका डर ही अपने आप में एक बड़े निरोधक का काम करेगा और समाज में यौन अपराधों को कम करने में बड़ी मदद मिलेगी। हमें भूलना नहीं चाहिए कि अक्सर यौन अपराधों और उत्पीडऩ के पीछे वह वर्ग ज्यादा सक्रिय होता है जो समाज में ताकतवर है। दलितों के उत्पीडऩ के संदर्भ से इस बात को बखूबी समझा जा सकता है। इस तरह से देखें तो तरुण तेजपाल का मामला, अखबारों द्वारा चाहे जितने भी असंतुलित तरीके से – कारण चाहे जो भी रहे हों – और जिन भी मंशाओं के चलते उछाला गया तो, अगर एक सबक बनता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस वर्ष लागू हुए काम की जगहों में महिलाओं का यौन उत्पीडऩ (रोकथाम, निषेध और रिड्रेसल) कानून को निजी क्षेत्र में प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाएगा। वैसे उन सभी अखबारों और मीडिया घरानों से, इनमें कई जानेमाने बड़े मीडिया संस्थान भी शामिल हैं और जो तहलका के मामले को लेकर इधर इतना उद्वेलित नजर आ रहे हैं, एक बार यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उनके संस्थानों में विशाखा संहिता लागू है? या नए यौन उत्पीडऩ कानून के बारे में उन लोगों ने क्या किया है? हो सके तो इन्हें अपने संस्थानों द्वारा उठाए गए कदमों की सार्वजिनक सूचना प्रकाशित करनी चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here