‘इस्लाम की बेटियां’ जैसा विषय हो और तस्लीमा नसरीन उपस्थित होने के बावजूद न बोलें, यह सामान्य नहीं है। हमारा इशारा हंस के वार्षिकोत्सव की ओर है जिसमें इस विषय पर बात करने पाकिस्तान से जाहिदा हिना और किश्वर नाहिद विशेष तौर पर आईं थीं। बेशक इस विषय पर बोलने के लिए तस्लीमा सबसे उपयुक्त व्यक्ति कहीं जा सकती हैं। पर सच यही है कि वह गोष्ठी में उपस्थित थीं पर बोली नहीं। इस का कारण है। 2007 में हैदराबाद में उन पर कट्टरपंथियों द्वारा हुए हमले के बाद से वह भारत में किसी सार्वजनिक सभा/गोष्ठी में भागीदारी नहीं करती हैं। अगर यह पाबंदी नहीं है तो भी कहा जा सकता है कि उन्हें ऐसी सलाह दी गई है। वह बेहद साहसी और जुझारु व्यक्ति हैं। आसानी से हार नहीं मानतीं। इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि वह स्वयं चुप लगा गई हों। उन्होंने द हिंदू (मैट्रो प्लस, दिल्ली संस्करण, 30 अगस्त)में प्रकाशित साक्षात्कार में कहा भी है कि ”मैं सामाजिक और राजनीतिक रूप से अवांछित व्यक्ति हूं। लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि चाहे जो हो, मुझे चुप्प नहीं करवाया जा सकता। मैं मृत्युपर्यंत न्याय और समानता के लिए लड़ती रहूंगी।”
पर यहां संदर्भ दूसरा है। देश का जो हाल है उसमें न जाने कब कौन-सा कट्टरपंथी गिरोह अपनी धार्मिकता का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए उन पर हमला कर बैठे। और यह निश्चित है कि सरकार कुछ नहीं करेगी। दूसरे शब्दों में वह तस्लीमा को लेकर किसी तरह का झंझट नहीं चाहती और तस्लीमा के पास भी कोई ज्यादा विकल्प नहीं हैं।
तस्लीमा नसरीन दिल्ली में ही कहीं रहती हैं पर आने-जाने की खुली छूट – चाहे स्वैच्छिक को या कानूनी – के न होने से आम लोगों से मिलना-जुलना नहीं हो पाता है। यह बात उन्होंने साक्षात्कार में कही है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि उन्हें भारत में रहने की इजाजत काफी संघर्ष के बाद मिली है। गोकि वह कोलकाता में रहना चाहती हैं पर हैदराबाद की घटना के बाद उनको लेकर कोलकाता में दंगे हुए और उन्हें शहर छोडऩा पड़ा। यह सर्वविदित है कि तस्लीमा अपने धर्म यानी इस्लाम की बड़ी आलोचक हैं। बल्कि कहना चाहिए वह इस्लाम पर पितृसत्ता की जकड़ तथा इस पर मुल्ला-मौलवियों के नियंत्रण की आलोचक हैं। और यह बात बांग्लादेश से लेकर भारत तक, किसी भी कट्टरपंथी को रास नहीं आती, चाहे वे धार्मिक हों या पितृसत्ता के समर्थक। पर भारतीय राजनीति में इसने कुछ और ही रंग ले लिया है। संविधान के आधारभूत सिद्धांतों में एक धर्मनिरपेक्षता की दिन-रात कसमें खानेवाले हमारे राजनीतिक दल और सत्ताधारी वोट बैंक के दबाव में किसी भी धार्मिक समुदाय की मदांधता के खिलाफ कोई भी ऐसी बात नहीं कहते जो समुदाय विशेष की कट्टरता को नागवार गुजरे। दूसरे शब्दों में हमारा पूरा राजनीतिक तंत्र अंध धार्मिकता और उन्माद को पोषित करने के सबसे बड़े माध्यम में बदल गया है। पश्चिम बंगाल का तीन दशक का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन इसका सबसे खराब उदाहरण है।
यह कहने की जरूरत नहीं है कि कोलकाता में जो दंगे हुए उनके पीछे यही राजनीतिक प्रवृत्तियां काम कर रही थीं। पर इसकी पृष्ठभूमि में एक और बात हुई और वह थी उनकी आत्मकथा द्विखंडिता का प्रकाशन। इसमें इस्लाम की आलोचना के साथ कुछ ऐसे प्रसंगों का भी जिक्र था जिनका संबंध बंगला के कुछ जाने-माने भारतीय लेखकों से रहा है। माकपा के निकट के इन लोगों ने तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार से द्विखंडिता पर प्रतिबंध लगवा दिया। बहाना रहा इस्लाम। इस संदर्भ में सुनील गंगोपाध्याय का प्रश्र के उत्तर में यह कहना मजेदार है कि ”…2007 में जब वह (तस्लीमा) कोलकाता छोडऩेवाली थीं, उससे ठीक पहले मैंने उनकी तरफ से टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम से माफी मांगी और उन्हें (तस्लीमा) को उनकी गलतियों के लिए माफ कर देने को कहा। लेकिन वह नहीं माना।” इसी साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा है कि मैं किसी भी तरह की सेंसरशिप के खिलाफ हूं। उनकी किताब को प्रतिबंधित करवाने में मेरी कोई भूमिका नहीं थी। मैंने कुल मिला कर यह किया कि उन्हें मुसलिम धर्म पर आक्रमण न करने की सलाह दी।” क्या इसका यह अर्थ लगाया जाए कि उन्होंने द्विखंडिता प्रकाशन से पूर्व पढ़ी थी? और क्या यह इस बात की ओर इशारा नहीं है कि माकपा सरकार ने तस्लीमा की उचित सुरक्षा का प्रबंध नहीं किया बल्कि एक इमाम की चलने दी? (आउटलुक, 17 सितंबर) खैर!
पर प्रकाशक जिसने किताब पर पैसा लगाया था वह क्यों मानता। वह मामले को न्यायालय ले गया और अंतत: कोलकाता उच्च न्यायालय ने प्रतिबंध उठा दिया। प्रश्र है अगर पुस्तक में इतने ही विवादास्पद प्रसंग थे तो न्यायालय ने प्रतिबंध क्यों हटाया? पर जहां तक याद पड़ता है न्यायालय के आदेश पर किताब से कुछ ऐसे प्रसंग निकाल दिए गए थे जिन का संबंध कुछ लोगों के निजी आचरण से था। उस दौरान यह बात उड़ी थी कि इस किताब को प्रतिबंधित करवाने में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय का भी हाथ है, क्यों कि उन पर भी नकारात्मक टिप्पणी है, या तस्लीमा की स्पष्टवादिता के चलते, उन्हें ऐसा कुछ होने का डर है। गंगोपाध्याय अपने कृतित्व के अलावा वैसे भी अपनी जीवन शैली के लिए बांग्ला साहित्यिक दुनिया में चर्चित रहे हैं।
लगता है तस्लीमा उस पूरे प्रसंग को भूल नहीं पाई हैं। और यह स्वाभाविक भी है। इसके कारण वह पश्चिम बंगाल से भी निष्कासन सह रही हैं। अपने देश में तो वह पहले ही अवांछित (पर्सोना नॉन ग्राटा) हैं और घुस नहीं सकती हैं। पश्चिम बंगाल को वह अपना दूसरा घर मानती हैं जहां उन्हें अपने ही समाज में होने का सुकून मिलता है। दिल्ली में ऐसा हो नहीं पाता। जैसा कि उन्होंने कहा है, वह इस कमी को लिखने से पूरा करती हैं।
सितंबर के पहले सप्ताह में उन्होंने ट्वीटर पर लिखा कि सुनील गंगोपाध्याय ने उनका यौन उत्पीडऩ किया और बदसलूकी भी की। इस पर सुनील गंगोपाध्याय ने पूछा कि अगर ऐसा था तो वह इतने वर्ष तक चुप क्यों रहीं?
इस पर तस्लीमा का जवाब था, ”क्या आरोप लगाने की कोई समय सीमा होती है? सुनीलदा ने जो अपराध किए हैं उन्हें मैं क्यों उजागर नहीं कर सकती? मैंने ट्वीटर पर इसलिए टिप्पणी की क्योंकि सुनीलदा आईपीएस अधिकारी नज़रुल इस्लाम की किताब पर राज्य सरकार द्वारा की गई कार्रवाही की आलोचना कर रहे हैं। वही आदमी जो मुझे कोलकाता से बाहर करने के षडय़ंत्र में हिस्सेदार था अब संत बनने की कोशिश कर रहा है।”
साफ है कि तस्लीमा ने अपना बदला ले लिया है। यह बदला सिर्फ गंगोपाध्याय से ही नहीं है बल्कि माकपा से भी है, जिसके गंगोपाध्याय निकट हैं और जिसकी सरकार के दौरान उन्हें राज्य छोडऩा पड़ा था। पर मजे की बात यह है कि वह अब भी, जब कि राज्य में ममता बनर्जी की घोर माकपा विरोधी त्रिणमूल सरकार है, नहीं जा सकतीं। असल में जिन कारणों यानी मुस्लिम वोट के कारण माकपा ने उन्हें बाहर निकाला उन्हीं कारणों से अब त्रिणमूल उन्हें नहीं आने दे रही है।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का यही वास्तविक चेहरा है।
एक और नज़रुल
पर ममता बनर्जी शासित बंगाल में जो हो रहा है वह कम डरावना नहीं है। राज्य सरकार की पूरी कोशिश रहती है कि उसके खिलाफ कोई कुछ न बोले। इसी का नतीजा है कि लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों तथा सरकार के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है और महाश्वेता देवी, सुनंदा सान्याल, सुकांत चौधरी और कबीर सुमन जैसे जानेमाने लोग सरकार से दूर हो गए हैं। पर सरकार इससे बेपरवाह है। उसकी असहिष्णुता लगातार बढ़ रही है। पहले उसने एक कार्टून बनाने पर एक प्राध्यापक को बंद करवाया। उसके बाद एक पूर्व आईएएस अधिकारी दीपक कुमार घोष की कुछ ही माह पूर्व प्रकाशित किताब को, जिसमें वर्तमान शासन की आलोचना की गई थी, आरोप है कि राज्य सरकार ने दबवा दिया। और अब आया है नज़रुल इस्लाम का नंबर।
बंगला के महाकवि काज़ी नज़रुल इस्लाम के ही नामधारी नज़रुल इस्लाम भी साहित्यकार हैं पर वह अब भी सरकारी सेवा में हैं। वह आईपीएस अधिकारी हैं और इन दिनों पुलिस प्रशिक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक हैं। वह वामपंथी शासन के आलोचक रहे हैं और शुरू में ममता बनर्जी के निकट थे। इधर उनकी जिस किताब को लेकर बवाल मचा है उसका शीर्षक है मुशलमांदेर की करनिया (मुसलमानों को क्या करना चाहिए)। इसमें उन्होंने त्रिणमूल सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार मुसलमानों की स्थिति को सुधारने के नाम पर दोहरे मापदंड अपना रही है। उनका कहना है कि मुलसमानों को आरक्षण देकर या इमामों को भत्ता देकर मुसलमानों की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि अल्पसंख्यक समुदाय को आधुनिक शिक्षा मिले। जो अपने आप में वाजिब बात है पर राज्य सरकार इन तार्किक और सामान्य-सी आलोचना को भी सहने को तैयार नहीं है। आठ सितंबर को पुलिस ने मुशलमांदेर की करनिया के प्रकाशक के यहां छापा मार कर किताब की प्रतियों को जब्त कर लिया है।
इसकी आलोचना मृणाल सेन सहित कई बंगला बुद्धिजीवियों ने की। इनमें सुनील गंगोपाध्याय भी थे। पर अब वह चाहे जो कहें, यह किसी से छिपा नहीं है कि गंगोपाध्याय उन लोगों में से थे जिन्होंने माकपा शासन के दौर में द्विखंडिता को प्रतिबंधित करवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। वह अब कह रहे हैं कि तस्लीमा प्रचार की भूखी हैं इसलिए ऐसी बातें कहती हैं, पर धरातल पर जो सच्चाई उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। उस प्रतिबंध का नतीजा यह है कि आज पश्चिम बंगाल का कोई प्रकाशक तस्लीमा की कोई किताब छापने की हिम्मत नहीं करता। यहां तक कि पिछले कोलकाता पुस्तक मेले में उनकी किताब के विमोचन को सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में प्रतिबंधित कर दिया था। सुनील गंगोपाध्याय और उन जैसे अन्य बंगला बुद्धिजीवी और लेखक अगर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में हैं तो उनका पहला कर्तव्य बनता है कि वे तस्लीमा नसरीन के कोलकाता आने पर लगे अघोषित प्रतिबंध को खत्म करवाएं और यह भी सुनिश्चित करें कि उनकी किताबें बिना किसी रोक-टोक के छपें। बाकी बातें बाद में होंगी। अन्यथा इधर यह जो मान्यता बढ़ी है कि भारत के बंगला लेखक तस्लीमा नसरीन की लोकप्रियता से जलने लगे थे और इसी के चलते उनकी किताब को भारत में भी प्रतिबंध सहना पड़ा , कम होने की जगह मजबूत ही होगा।
सविच हो तो ऐसा
सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता के दौरान केंद्रीय साहित्य अकादेमी में क्या होता रहा होगा इसकी कुछ झलक 24 अगस्त को भुवनेश्वर में हुई कार्यकारिणी की मीटिंग के दौरान देखने को मिली। मीटिंग में सचिव अग्रहारा कृष्णमूर्ति के खिलाफ कई शिकायतें सामने आईं। सचिव महोदय उनका जवाब देने की जगह कार्यकारिणी को ठेंगे पर रख, वाक आउट कर गए। उद्दंडता की हद यह हुई कि बिना इजाजत के वह भुवनेश्वर से सीधे दिल्ली चले आए और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। उनका कार्यकाल जनवरी, 13 में समाप्त हो रहा है। कृष्णमूर्ति ने इस मामले में इतिहास बना दिया है कि वह साहित्य अकादेमी के पहले सचिव होंगे जिन्हें निलंबित कर दिया गया है और उनके खिलाफ लगे आरोपों की जांच एक कमेटी कर रही है।
कृष्णमूर्ति आपने कार्यकाल में किस तरह की मनमर्जी करते रहे उसका उदाहरण वह आरटीआई है जिसके तहत सूचना मांगी गई थी कि पिछले छह सालों में अकादेमी ने पद्म पुरस्कारों के लिए किस-किस का नाम भेजा। आधिकारिक तौर पर दिए गए उत्तर के अुनसार इस दौरान अकादेमी की ओर से 17 कन्नड़ लेखकों के नाम पद्म पुरस्कारों के लिए केंद्रीय सरकार को भेजे। इन में कई नाम लगातार दोहराए गए, जैसे कि देवनूरू महादेव का नाम छह वर्षों में पांच बार भेजा गया। कुल भेजे गए अलग-अलग नाम सात थे।
हिंदी का से इस दौरान तीन बार (2010-11-12 में) पद्मश्री के लिए नाम भेजा गया। यह भी सिर्फ एक लेखक केदारनाथ सिंह का। जबकि कन्नड से पद्मभूषण के लिए 2010 में एक नाम और 2011 तथा 2012 में दो-दो नाम भेजे गए। उर्दू से सिर्फ एक नाम बलराज कोमल का पांच बार (2006 से 2011तक) तब तक लगातार भेजा गया जब तक कि उन्हें पद्मश्री नहीं मिल गया। कोमल गोपीचंद नारंग के निकट थे या कहना चाहिए उनके उर्दू के हिंदू लेखकों के उस समूह में से थे जिन्हें नारंग लगातार बढ़ावा देते रहे हैं। कृष्णमूर्ति की प्रतिभा से अभीभूत नारंग, अपने अध्यक्ष पद के दौरान बंगलुरू से उन्हें विशेष सुविधाएं देकर लाए थे। उनकी उपलब्धियों के बारे में समयांतर के पिछले अंक में लिखा जा चुका है। लगता है सचिव महोदय ने नारंग के प्रति अपनी कृतज्ञता को कोमल के नाम को लगातार भेज कर अभिव्यक्त किया।
यहां याद दिलाना जरूरी है कि कृष्णमूर्ति पांच साल सुनील गांगुली की अध्यक्षता के दौरान सचिव रहे। इस दौरान बंगला से कुल सात बार नाम भेजे गए जिनमें सिर्फ दो लेखक शामिल थे। नबोनीता देवसेन का नाम तीन बार पद्मभूषण के लिए और सैयद मुस्तफा सिराज का नाम चार बार पद्मश्री के लिए भेजा गया।
सोने में सुहागा सचिव का यह दावा है कि सारे नाम अध्यक्ष महोदय से परामर्श के बाद भेजे गए थे। जब कार्यकारिणी की मीटिंग में सवाल उठा कि पद्म पुरस्कारों के लिए भेजे जानेवाले नामों में इस तरह का असंतुलन क्यों है तो अध्यक्ष महोदय ने कहा मैं इनके बारे में कुछ नहीं जानता। यानी ये नाम उनसे परामर्श के बाद नहीं भेजे गए थे। ऐसे में सवाल है कि अध्यक्ष महोदय क्या कर रहे थे? (वैसे जानने वाले जानते ही हैं कि वह क्या कर रहे होंगे।) स्वयं अग्रहारा कृष्णमूर्ति का कहना है कि अगर मैं अनियमितताएं कर रहा था तो पिछले छह साल में मेरे खिलाफ कोई कार्रवाही क्यों नहीं की गई? सत्य यह है कि अध्यक्ष महोदय को कृष्ण मूर्ति से कोई शिकायत ही नहीं है। तो क्या यह जांच भी रमाकांत रथ की अध्यक्षता के दौरान हुई जांच की तरह आखों में धूल झोंकना साबित होने जा रही है?
इसलिए यह तो अध्यक्ष महोदय क्या ही जानते होंगे कि सचिव महोदय ने अपने पीए को अकादेमी की अंग्रेजी पत्रिका इंडियन लिटरेचर का सहायक संपादक बना दिया है। गनीमत यह है कि उन्होंने अपने चपरासी को संपादक नहीं बनाया, कम से कम हिंदी पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य का तो बना ही सकते थे जो पद पिछले कई वर्षों से खाली है। अकादेमी का तो चप्पा-चप्पा साहित्यमय है, बस अवसर की देर है।
कृष्णमूर्ति के खिलाफ दो और आरोप विशेषकर ध्यान देने योग्य हैं। पहला अकादेमी की जनरल काउंसिल के लिए सदस्यों के चुनाव को प्रभावित करना ताकि अगला अध्यक्ष कन्नड का ही कोई लेखक बने। दूसरा आरोप यह भी है कि उन्होंने कन्नड की ऐसी कई संस्थाओं को वित्तीय सहायता दी जो या तो अस्तित्व में ही नहीं हैं या फिर नाममात्र की हैं।
सचिव बनने के और क्या-क्या फायदे हो सकते हैं इसे भी इसी आरटीआई को देखने से समझ में आ जाता है। इसके अनुसार अपने कार्यकाल में कृष्णमूर्ति ने मार्च, 12 तक सिर्फ 25 विदेश यात्राएं कीं और अब तक साहित्य अकादेमी के सिर्फ छह लाख से ऊपर यानी हर वर्ष एक लाख रुपये अपने गृह नगर बंगलूरू की ‘साहित्यिक’ यात्रा करने में खर्च किए।
- दरबारी लाल
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