3 responses to “बांध : विकास नहीं विनाश का पर्याय”

  1. Nityanand Gayen

    यह सब एक सोची -समझी बहुत ही खतरनाक साजिस का हिस्सा है …यह सब कुछ पूंजीपतियों के अनुसार ही किया जा रहा है …जितने विस्थापन उतना ही फायदा . बांध निर्माण अगर विवेकपूर्ण तरीके से हो और लोगों को उचित मुयाबजा मिले तो ठीक भी कहा जा सकता है ,पर यहाँ तो सब कुछ विपरीत ही हो रहा है .

  2. raja bahuguna

    हिमालय बचाओ को लेकर आजकल बहस गरम है .एक हिमालय बचाओ अभियान, जिसकी शुरुआत प्रदेश के काबिना मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी ने खटीमा से की और जिसका समापन 9 सितम्बर को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने देहरादून में किया —-सबसे ज्यादा चर्चा में रहा .लेकिन यहाँ यह जानना जरूरी है कि मंत्री प्रसाद जहाँ श्रीनगर गढ़वाल में कानून और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाली GVK कम्पनी के हितों के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तत्पर दिखते हैं, वहीँ मुख्यमंत्री इंडिया बुल्स द्वारा स्पोंसर्ड चर्चित शख्सीयत बन गए हैं. बिजली बनाने के नाम पर उनके जन विरोधी फैसले तथा कॉरपरेट घरानों के लिए रेड कारपेट बिछाने की उनकी गतिविधियाँ हिमालय क्षेत्र के लिए हर तरह से बर्बादी का ही पैगाम लेकर आएँगी .ऐसे में सीएम और उनके सिपहसालारों का हिमालय बचाओ का राग एक कोरा पाखण्ड है. 9 सितम्बर को देहरादून के उसी मंच से सुंदर लाल बहुगुणा ने ऐलान किया कि यदि पर्वतीय क्षेत्र में पलायन नहीं रुका तो माओवाद का खतरा बढ़ जायेगा. एक जनविरोधी मंच से उनकी इस हास्यास्पद और आपत्तिजनक टिप्पणी से लगता है कि हिमालय बचाओ की उनकी मुहीम पटरी से उतर गयी है. उन्होंने ऐसा कहकर हिमालय बचाओ की बुनियादी मुहीम को दिग्भ्रमित करने का काम किया है. आज़ादी के बाद देश के शासकों ने पर्वतीय क्षेत्र में विकास की जो रणनीति लागू की है– मौजूदा हालत उसीका नतीजा है .हांल में आई उत्तरकाशी त्रासदी मानवजनित है क्योंकि असी गंगा में वहां बन रही तीन परियोजनाओं का मलबा और सैकड़ों पेड़ काटकर नदी में दफ़न कर दिए गए थे .इसी वजह से यह त्रासदी मौत और बर्बादी का पैगाम लेकर आई. इसकी पुष्टि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी की! जो मजदूर व आमजन इस त्रासदी में दफ़न हो गए– उनकीं मौत के लिए ;और ध्वस्त हुई जल विद्युत परियोजनाओं के नुकसान के लिए जिम्मेदार अपराधियों के खिलाफ सरकार मुकदमा क्यों नहीं दर्ज कर रही है , इसका जवाब उसे आम जनता को देना ही होगा. क्या सरकार के पास इतना साहस है की वो पंचेश्वर बाँध के निर्माण के लिए बढ़ने से पहले टिहरी बाँध की समीक्षा करे? क्या तपोवन विष्णुगाड परियोजना की वर्तमान स्थिति की समीक्षा करने की जिमेदारी से सरकार क्यों मुंह चुरा रही है? क्या श्रीनगर परियोजना में आपराधिक लापरवाही के लिए जिम्मेदार रेड्डी के खिलाफ सरकार कार्यवाही करेगी ??? क्या आज तक उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के दौरान मौत के शिकार हुए सैकड़ों मजदूरों के हत्यारों के खिलाफ किसी दोषी को सजा मिल सकी है?
    हिमालय बचाने के लिए हर तरह के पाखंड का पर्दाफाश करना ही होगा और गाँव और खेत बचाने को केंद्र करते हुए विकास की रणनीति बनाने के लिए जन-मुहीम को व्यापक और धारदार बनाना ही एकमात्र विकल्प है.

  3. Prakash

    It is painful and a shame that our society has lost the power and will to tolerate. It is our ‘dharma’. Fundamentalism is on rise in the society. It is not yet rampant. I believe that way development takes place, has corrupted the society. I feel it is high time that CAG like audit of society in un-developed, under-developed, developing and developed places should be performed to know the damage to social fabric in each case. Else, why some elements in the society are not ready to discuss. Instead they use power to silence thoughts, it may be Dr. Jhunjhunwala, G. D. Agarwal and so on. It is happening all over the country, and should be condemned. Let the social scientists come forward to make a study that shows changes (good/bad) in the society where a developmental project has come up, Tehri for instance. The “virus of development” is gradually “corrupting the hard files” of our ‘wisdom and vision’. All that has been mentioned in the article above is happening because of this. We should begin to realise this or Indian societies may live in fear and utter chaos.

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