शिक्षा :बदलेंगे चित्र तो बदलेगा मानस

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गायत्री आर्य

child-education-pictureमानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूली किताबों से ऐसे सभी चित्र बदलने को कहा है जिसमें लड़कियों को लड़कों के मुकाबले कमतर दिखाया जा रहा हो। उत्तराखंड की राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रमों में शामिल चित्रों पर भी (एम.एच.आर.टी) को गहरी आपत्ति है। चौथी कक्षा में हमारे आस-पास विषय की किताब में बदलती रसोई, बदलता ईंधन पाठ है। इसमें एक बुजुर्ग महिला का चित्र है जिसके बारे में मंत्रालय का कहना है कि यह चित्र महिलाओं के बारे में केवल रसोई तक सीमित रहने का संदेश देता है। इसी तरह तीसरी कक्षा में हमारे आसपास किताब में दिनेश नाम के छात्र के जरिए रोज की दिनचर्या की जानकारी दी गई है। जबकि गीता नाम के किरदार के जरिए घर की सफाई के बारे में बताया गया है। इससे भी लड़कियों को लेकर चूल्हा-चौके और साफ-सफाई तक सिमटे रहने का संदेश जा रहा है। इसी तरह एक अन्य किताब में लड़की को झाड़ू लगाते हुए दिखाया गया है। ऐसे चित्र घरेलू कामकाज को सिर्फ लड़कियों का काम बताते हैं और इस काम को करने के कारण उन्हें कमतर ठहराते हैं। ऐसे चित्रों को स्कूल की किताबों से हटाना एक बेहद अच्छी पहल है। सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल जितनी आश्चर्यजनक है उससे कहीं ज्यादा बधाई की पात्र है।

सार्थक बदलाव की इस कोशिश का निश्चित तौर पर दूरगामी असर होगा। असल में आज समाज में स्त्रियों का जो स्थान है, उनके प्रति लोगों का जो नजरिया है, वह बहुत सारी छोटी-बड़ी चीजों से मिलकर बना है। स्कूल की किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों, फिल्मों, सीरियलों, विज्ञापनों, पोस्टरों और बैनरों में दिखाए जाने वाले स्त्रियों के चित्र, उनमें लिखी गई बातें असल में हमारा मानस तैयार करती हैं। डांट, मार, पुचकार, प्रेम, शक, गुस्सा, नफरत को दिखाते हुए चित्र, बोले गए संवाद, नसीहतें, कही गई एक-एक बात समाज में स्त्री और पुरुष के स्थान को दिखाती हैं और स्थापित करती हैं।

यदि स्कूल की किताबों में रसोई, सफाई और घर के अन्य काम करते हुए सिर्फ लड़की को ही दिखाया जा रहा है, तो एक तरह से यह स्थापित किया जा रहा है कि खाना बनाना, साफ-सफाई, घर संभालना, बच्चे संभालना, बुुजुर्गों की सेवा और देखभाल आदि काम सिर्फ स्त्रियों के काम हैं। ये सारे काम अंतहीन, बिना किसी अवकाश के हैं, इनके बदले न तो कोई पैसा मिलता है न ही इन कामों से कोई पहचान ही मिलती है। अंतत: ये काम स्त्रियों के जन्मजात काम के रूप में उभरकर सामने आते हैं और यहीं से स्त्री के श्रम का अवमूल्यन भी शुरू होता है।

एक छोटा बच्चा जिसे अभी दुनियादारी सीखनी है वह अपने घर में अपनी मां और बहन को इन अंतहीन कामों में हमेशा लिप्त देखता है और पिता व भाई को इन सब जिम्मेदारियों को अनदेखा करते हुए देखता है। घर में व्यवहार में वह जो देखता है उसे फिर स्कूल की किताबों के चित्रों में फिर से देखता है। इस तरह से उसके दिमाग में इस बात की पुष्टि हो जाती है कि कौन से काम सिर्फ महिलाओं के हैं और कौन से काम पुरुषों के। साथ ही इन कामों के बदले मिलने वाले पारिश्रमिक से भी वह परिचित हो जाता है।

बच्चा देखता है कि घर के बाहर जाने के काम पिता और भाई के, यानी पुरुषों के हैं। बाहर के काम निपटाने के साथ ही साथ पुरुषों की बाहर जाने-आने को लेकर होने वाली टोकाटाकी खत्म हो जाती है। साथ ही वापस घर लौटने के समय की कोई पाबंदी नहीं होती। ऐन इसी वक्त घर की स्त्री का बाहर जाना एक घटना है जिस पर सबकी नजर होती है और जिसके घर लौटने के समय को लेकर सब अपनी-अपनी चि
ंता जताते हैं। छोटा बच्चा एक साथ ही चीजों का किताबी और व्यावहारिक पक्ष देख-समझ रहा होता है।

बच्चा सबसे ज्यादा देखकर सीखता है फिर वह चाहे व्यवहार में देखना हो या फिर चित्र में। यदि बच्चे को स्कूल की किताबों में कुछ ऐसे चित्र दिखाई पड़ें जहां लड़की स्कूल जा रही है, पढ़ाई कर रही है, बाजार जा रही है, स्त्री ऑफिस जा रही है, पढ़ा रही है, डॉक्टर है, नर्स है, ऑफिस के काम कर रही है; साथ ही भाई दूर से पानी भर कर ला रहा है, झाड़ू लगा रहा है, सफाई कर रहा है, बर्तन साफ कर रहा है, खाना बनाने में मदद कर रहा है, पिता घर का कोई काम कर रहे हैं, छोटे बच्चे को खाना खिला रहे हैं, बूढ़े व्यक्ति की सेवा कर रहे हैं, तो निश्चित तौर पर ऐसे चित्र बच्चे के दिमाग में स्त्री और पुरुष की एक अलग और नई छवि पेश करेंगे। वह समझेगा कि लड़के भी घर के काम कर सकते हैं और उन्हें करने चाहिए।

यदि ऑफिस जाने वाली स्त्रियों के लिए घर के काम और बच्चों को एक साथ संभालना एक चुनौती है, जिस पर वे हमेशा ही खरी उतरना चाहती हैं; तो लड़कों और पुरुषों को भी ऐसा लगना चाहिए कि ऑफिस के साथ घर-परिवार के, बच्चों के कामों को निबटाकर उन्हें भी खुद को साबित करना है। घर और बाहर के कामों को एक साथ साधने की जो खुशी स्त्री के मन में होती है, वह पुरुष के मन में भी तो हो सकती है और होनी चाहिए। आखिर बच्चों को, ऑफिस को, परिवार को एक साथ एक समय पर अपना 100 प्रतिशत देने की खुशी सिर्फ स्त्री के लिए ही क्यों बनी है? पुरुषों को भी तो ऐसी 100 प्रतिशत मिलने वाली खुशी और संतुष्टि पाने का उतना ही अधिकार है! 100 प्रतिशत खपकर मिलने वाली संतुष्टि और खुशी सिर्फ स्त्रियों की बपौती नहीं है! लड़कों में ऐसी चुनौती को स्वीकार करने की ललक या फिर इच्छा बचपन से ही पैदा की जा सकती है, की जानी चाहिए। पाठ्यपुस्तकों के चित्र इस काम में बुनियाद की भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि सिर्फ स्कूल की किताबों में बुनियादी बदलाव करने से और बाकी जगहों पर स्त्रियों की छवि को भोग्या के रूप में प्रकाशित करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। क्योंकि स्त्रियों को सिर्फ साफ-सफाई और घरेलू कामों में लगी रहते हुए दिखाकर भी पुरुष के मुकाबले कमतर ही दिखाया जा रहा है। जब उसे भोग्या के रूप में पेश किया जाता है उस वक्त भी स्त्री को न सिर्फ पुरुष के बरक्स कमतर साबित किया जाता है, बल्कि स्त्री को मानव होने की गरिमा से भी वंचित किया जा रहा होता है।

हमें उन तमाम चीजों को बदलना होगा, सेंसर करना होगा, जो स्त्री को बंधुआ मजदूर साबित करती हैं, भोगे जाने वाली, मजे लेने वाली चीज के तौर पर पेश करती हैं, स्त्री के अंतहीन श्रम का अवमूल्यन करती हैं। वे सारी तस्वीरें, बातें, संवाद, इशारे, भावभंगिमाएं, धार्मिक कर्म-कांड, त्यौहार, परंपराएं हर हाल में छोड़ी जानी चाहिए जो स्त्री को पुरुष से हीन, साथ ही पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ साबित करती हैं। ऐसी तस्वीरें, बातें, संवाद, त्यौहार गढ़े जाने चाहिए जो स्त्री को पुरुष के समान, उसकी साथी के तौर पर पेश करें। जो बताएं कि अपने जीवन के निर्णय लेने का जितना हक पुरुष को है उतना ही स्त्री को भी है, जो बताएं कि पुरुष को भी सहयोगी की भूमिका में आना चाहिए, जो बताएं कि घरेलू श्रम, बच्चे का लालन-पालन, और सेवा स्त्री के जन्मजात कर्म नहीं हैं। ये काम जैसे एक लड़की सीखती है वैसे ही लड़के को भी सीखने चाहिए और वे सीख सकते हैं। आखिर एक शोषणमुक्त, हंसता-खेलता, स्वस्थ समाज सिर्फ स्त्रियों की ही तो जरूरत नहीं!

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