Monday, December 18, 2017

किसान और लेखक

- रामाज्ञा शशिधर 21वीं सदी में अन्न और शब्द ने एक दूसरे को पहचानने से इंकार कर दिया है। एक ओर किसान और लेखक एक दूसरे को परग्रह की चीज...

सामाजिक सरोकारों की चेतना

- आनंद प्रकाश भाट, चारण, मिरासी जैसी श्रेणियां हमारे इतिहास का वास्तविक और दर्दनाक किस्सा रहीं, जिसके चलते हमारे संस्कृति-कर्मी और कलाकार आज भी सत्ता-संपन्न घरानों अथवा सरकारी संस्थान के...

बीसवीं सदी का इतिहास लेखन और के मार्क्सवादी चिंतन

-शुभनीत कौशिक बीसवीं सदी के दौरान, एक लंबे अरसे तक सोवियत रूस ने और साम्यवाद ने खुद को दुनिया के सामने पूंजीवाद से कहीं अधिक बेहतर और प्रभावशाली विकल्प के...

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सबक

- आतिफ रब्बानी मानव इतिहास में सौ साल पहले एक नया अध्याय जुड़ा; यह अध्याय था—1917 की महान रूसी क्रांति का। यह क्रांति थी नया समाज, नया इंसान बनाने की।...

अक्टूबर क्रांति और स्त्री मुक्ति का एजेंडा

- कात्यायनी क्रांति के बाद समाजवादी उसूलों पर नए समाज के निर्माण की अपेक्षाओं और आशावाद ने स्त्रियों और युवाओं की अपरिमित सर्जनात्मक ऊर्जा को निर्बंध कर दिया। सांस्कृतिक-सामाजिक दायरों...

कार्ल मार्क्स : कल और आज

- लुई मेनांड उन्नीसवीं शताब्दी के इस दार्शनिक के विचार हमें वर्तमान समय की आर्थिक और राजनीतिक असमानताओं की समझने में मदद कर सकती हैं। एक सौ तैतीस साल पहले...

श्वेत पूंजीवादी समाज में समता के सवाल

- रामशरण जोशी यह लेख, अमेरिका, कनाडा और गुयाना की यात्राओं के दौरान हुए अनुभवों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के साथ वैचारिक आदान-प्रदान पर आधारित है। 1983 से लेकर...

सुधार के नाम पर पूंजीवादी समाज का गठन

चीनी मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर मनोरंजन मोहंती से कृष्ण सिंह की बातचीत प्रश्न: रूस की क्रांति की यह 100वीं वर्षगांठ है। रूस के बाद समतावादी समाज और साम्यवाद की...

सफलता की असफलता

- प्रेम पुनेठा पिछली सदी के आखिरी दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद यह कहा जाने लगा था कि साम्यवाद समाप्त हो गया है और पूंजीवाद समर्थक विचारकों...

भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट

आंदोलन की दिशा-दशा - स्वदेश कुमार सिन्हा ''यदि गरूड़ नीची उड़ान भरता है तो, इससे कौवों के प्रसन्न होने की कोई बात नहीं, क्योंकि सबसे ऊंची उड़ान तो वही भर...