पूंजी का संकट और समाजवादी प्रयोग
गोपाल प्रधान चर्चित हंगारी मार्क्सवादी चिंतक इस्तवान मेजारोस समाजवादी आक्रामकता के दौर की राजनीतिक कार्यवाही के लिहाज से कहते हैं कि ‘अर्थतंत्र की पुनर्संरचना‘ तक अपने आपको सीमित रखने की रणनीति पर दोबारा सोचना चाहिए और उसकी जगह वर्तमान संदर्भ में ‘राजनीति के क्रांतिकारी पुनर्गठन‘ के कार्यभार पर बल देना चाहिए। असल में राजनीति में [Read the Rest...]
अस्मिता की राजनीति असली संघर्षों से ध्यान बंटाती है
आनंद तेलतुंबड़े से भूपेन सिंह का साक्षात्कार आनंद तेलतुंबड़े आइआइटी खडग़पुर में प्रबंधन के प्रोफेसर हैं। उन्होंने भारत में जाति, वर्ग, राजनीतिक अर्थशास्त्र और लोकतांत्रिक राजनीति पर करीब दो दर्जन किताबें लिखी हैं। उन्हें देश और दुनिया में मौलिक प्रस्थापनाओं के लिए जाना जाता है और काफी सम्मान के साथ पढ़ा-सुना जाता है। वह प्रसिद्ध [Read the Rest...]
अस्मिता की लड़ाई और वाम
मौजूदा दौर में पहचान की राजनीति के अधिक सादृश्यता हासिल करने का मतलब क्या यह कहना मुनासिब होगा कि यह मसला अपने आप में अनोखा है, जिसका कोई इतिहास नहीं है। इतिहास के बीते दौर का सिंहावलोकन इसी सच्चाई को रेखांकित करता है कि तमाम चरणों एवं युगों में यह ज्वलंत मसला रहा है। असमानताओं, [Read the Rest...]
मार्क्सवाद की प्रासंगिकता और पुनर्रचना
प्रस्तुत लेख की शुरुआत मैं एक चीनी हिंदी विद्यार्थी1 के चंद विचारपूर्ण वाक्यों से करूंगा। कुछ वर्ष पहले इस युवा विद्यार्थी से मैं दिल्ली में मिला था। तब चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी पूंजी नियोजन को लेकर मीडिया में काफी चर्चाएं थीं। आंकड़े दिए जा रहे थे कि चीन ने कितनी बड़ी मात्रा में [Read the Rest...]
ऑक्युपाई आंदोलन के निहितार्थ
माइकल येट्स सितंबर 2011 में मैनहैटन के जुकोटी पार्क में उभरे विश्वव्यापी ऑक्युपाई आंदोलन ने अपने नारे के तौर पर ‘वी आर द 99”’ को अपनाया। जनता की भारी तादाद के साथ जैसा तादातम्य इस नारे ने स्थापित किया है वैसा काफी लंबे समय में बहुत कम ही नारे कर पाए हैं। ऐसा क्यों हुआ [Read the Rest...]

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