दिल्ली मेल

विरोध का विस्तार

दिल्ली मेल पर हम बात कर रहे थे राष्ट्रीय संस्कृति की। उसका ताना-बाना जहां जाकर जुड़ रहा था वह महत्वपूर्ण है। जब से लेखकों व अन्य बुद्धिजीवियों द्वारा बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कारों की वापसी होने लगी है तब से लगातार तर्क दिया जाता रहा है कि साहित्य अकादेमी ‘स्वायत्त’ है। असल में किसी [Read the Rest…]

स्वायत्तता की ‘संस्कृति’

पर हम बात कर रहे थे राष्ट्रीय संस्कृति की। उसका ताना-बाना जहां जाकर जुड़ रहा था वह महत्वपूर्ण है। जब से लेखकों व अन्य बुद्धिजीवियों द्वारा बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में पुरस्कारों की वापसी होने लगी है तब से लगातार तर्क दिया जाता रहा है कि साहित्य अकादेमी ‘स्वायत्तÓ है। असल में किसी ने, यहां [Read the Rest…]

वामपंथ के लिए ‘सबक’

वामपंथ के लिए ‘सबक त्रैमासिक कथा क्रम के अक्टूबर-दिसंबर अंक में मैत्रेयी पुष्पा का लंबा साक्षात्कार धूमधाम से प्रकाशित हुआ है जिसमें उनके आम आदमी पार्टी, उसके नेता कुमार विश्वास और उनके दिल्ली की हिंदी अकादेमी की उपाध्यक्षा हो जाने आदि पर कई बातें हैं। पर इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने जनवादी लेखक संघ के संदर्भ [Read the Rest…]

विरोध का विस्तार

इधर इलाहाबाद से खबर है। 25 नवंबर को होनेवाले मीरा स्मृति सम्मान समारोह का प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जनसंस्कृति लेखक मंच ने बहिष्कार कर दिया। कारण था इसकी अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कर रहे थे। बहिष्कार करनेवाले संगठनों ने यह कदम तिवारी के उन लेखकों के प्रति जो [Read the Rest…]

प्रभाव और रहस्य

इस वर्ष अप्रैल में ब्रितानवी पत्रकार लेंस प्राइस की लिखी एक किताब प्रकाशित हुई है जिसका नाम है द मोदी इफैक्ट। यह किताब नरेंद्र मोदी के भारत को बदलने के सपने को हासिल करने के लिए लड़े गए 2014 के चुनावों की अंदर की कथा बतलाई जाती है। इस में बतलाया गया है कि मोदी [Read the Rest…]

लेखक-सेना ?

भाजपा के नेतृत्ववाली केंद्रीय सरकार के आत्मविश्वास को लेखकों के साहित्य अकादेमी व अन्य पुरस्कार लौटाने ने जितना हिला दिया है शायद ही और किसी चीज ने हिलाया हो। अपने सीमित प्रभाव के बावजूद इसका कारण संभवत: वह नैतिक पक्ष है जो लेखक और लेखन के साथ जुड़ा रहता है। इसीलिए भाजपा सहित संघ परिवार [Read the Rest…]

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