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मानव विरोधी अवैज्ञानिकता

June 7, 2021 admin 0
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यह देखना, इस दौर में, आशाजनक और आश्वस्तकर है कि अंतत: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (भारतीय चिकित्सा संगठन) ने आधुनिक चिकित्साशास्त्र बल्कि कहना चाहिए तार्किकता और […]

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अमेरिका का संदर्भ भारत का पाठ

February 16, 2021 admin 0
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इसमें दो राय नहीं कि संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के सफलतम लोकतंत्रों में है। इस अर्थ में कि वहां उसके सभी स्तंभ, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका […]

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किसान आंदोलन और भारतीय समाज का भविष्य

January 13, 2021 admin 0
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यह असंगठित किसान आंदोलन इतने लंबे समय तक बिना थके और हताशा के, चलते रहने के कारण दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में प्रतिमान कायम करने जा रहा है।

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‘लव जिहाद’ का कुतर्क और यथार्थ

December 8, 2020 admin 0
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ऐसे समय में जब कोविड-19 ने दुनिया को हिलाया हुआ है, अर्थव्यवस्थाएं चौपट हैं, बेरोजगार आत्महत्या पर उतारू हैं लेकिन भाजपा शासित राज्य एक के बाद एक ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने में व्यस्त हैं।

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देश का नेता कैसा हो…

November 10, 2020 admin 0
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अक्टूबर की दो घटनाएं, यद्यपि ये पृथ्वी के दो छोरों की हैं, किसी भी बहुनस्लीय, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुभाषीय समाज के लिए ऐसे उदाहरण हैं […]

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लिबास में ढकी मंशाएं

October 7, 2020 admin 0
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प्रतिकात्मकता वैसे तो संवाद और संचार का अंग है, इसलिए सर्वव्याप्त है पर जहां तक राजनीति का सवाल है वह इसे किस तरह इस्तेमाल करती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका चरित्र क्या है। वैसे भी राज्य की परिकल्पना प्रतीकों से अटी पड़ी है। लोकतंत्रों में जहां मतदाता को रिझाना महत्त्वपूर्ण होता है, स्वप्नों और अपेक्षाओं के रसायन से भरी प्रतिकात्मकता का बोलबाला समझ में आने वाला है। यह प्रतिकात्मकता स्वर्णिम विगत और अपेक्षित भविष्य के सपनों का ऐसा रसायन होती हैं जिसका अक्सर तर्क और यथार्थ से कोई लेना देना नहीं होता। पर जो शासितों से होनेवाली प्रतिबद्धता की अपरिहार्य मांग को आसान और सह्य बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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आखिर हिंदी की उपयोगिता क्या है?

September 17, 2020 admin 0
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भाषा अपने बोलने वालों की बौद्धिक सक्रियता और गतिविधि का तो प्रमाण होती ही है, सत्ता से अपने जीवंत संवाद के सामथ्र्य की, और ज्ञान के संचयन की क्षमता के, अनुपातिक संबंध का भी मानदंड होती है। इसलिए उसके स्तर में समानता नहीं होती। दूसरे शब्दों में भाषा की शक्ति काफी हद तक उसके बोलने वालों की क्षमता पर निर्भर करती है। और यह क्षमता भाषा के स्वाभाविक गुणों से इतर कारणों से भी अर्जित की जाती है।