ऊंची विकास दर का मिथक
चंद्रभूषण किसी युद्ध का बुनियादी विभ्रम जब अपना जलवा खो दे तो उस युद्ध को समाप्त मान लिया जाना चाहिए – आर्थर मिलर (1915-2005), प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार, डेथ ऑफ अ सेल्समैन के लेखक जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद राहुल गांधी ने अपने भाव विह्वल वक्तव्य [Read the Rest...]
पूंजी का संकट और समाजवादी प्रयोग
गोपाल प्रधान चर्चित हंगारी मार्क्सवादी चिंतक इस्तवान मेजारोस समाजवादी आक्रामकता के दौर की राजनीतिक कार्यवाही के लिहाज से कहते हैं कि ‘अर्थतंत्र की पुनर्संरचना‘ तक अपने आपको सीमित रखने की रणनीति पर दोबारा सोचना चाहिए और उसकी जगह वर्तमान संदर्भ में ‘राजनीति के क्रांतिकारी पुनर्गठन‘ के कार्यभार पर बल देना चाहिए। असल में राजनीति में [Read the Rest...]
अस्मिता की राजनीति असली संघर्षों से ध्यान बंटाती है
आनंद तेलतुंबड़े से भूपेन सिंह का साक्षात्कार आनंद तेलतुंबड़े आइआइटी खडग़पुर में प्रबंधन के प्रोफेसर हैं। उन्होंने भारत में जाति, वर्ग, राजनीतिक अर्थशास्त्र और लोकतांत्रिक राजनीति पर करीब दो दर्जन किताबें लिखी हैं। उन्हें देश और दुनिया में मौलिक प्रस्थापनाओं के लिए जाना जाता है और काफी सम्मान के साथ पढ़ा-सुना जाता है। वह प्रसिद्ध [Read the Rest...]
ऑक्युपाई आंदोलन के निहितार्थ
माइकल येट्स सितंबर 2011 में मैनहैटन के जुकोटी पार्क में उभरे विश्वव्यापी ऑक्युपाई आंदोलन ने अपने नारे के तौर पर ‘वी आर द 99”’ को अपनाया। जनता की भारी तादाद के साथ जैसा तादातम्य इस नारे ने स्थापित किया है वैसा काफी लंबे समय में बहुत कम ही नारे कर पाए हैं। ऐसा क्यों हुआ [Read the Rest...]
भटकाव का शिकार है माकपा नेतृत्व
प्रसेनजीत बोस अप्रैल 2012 में माकपा के कालीकट महाधिवेशन में यह समझ कायम हुई थी कि तीसरे मोर्चे से इतर एक नए वाम जनवादी विकल्प को खड़ा करने का प्रयास किया जाएगा। यह हमेशा ही स्पष्ट रहा है कि कांग्रेस की नवउदारवादी, जनविरोधी नीतियों के खिलाफ भाजपा तो विकल्प हो ही नहीं सकती। लेकिन दरअसल [Read the Rest...]

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