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रामशरण जोशी

रामशरण जोशी

मार्क्‍सवाद की प्रासंगिकता और पुनर्रचना

मार्क्‍सवाद की प्रासंगिकता और पुनर्रचना

Author: रामशरण जोशी Edition : February 2013

प्रस्तुत लेख की शुरुआत मैं एक चीनी हिंदी विद्यार्थी1 के चंद विचारपूर्ण वाक्यों से करूंगा। कुछ वर्ष पहले इस युवा विद्यार्थी से मैं दिल्ली में मिला था। तब चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी पूंजी नियोजन को लेकर मीडिया में काफी चर्चाएं थीं। आंकड़े दिए जा रहे थे कि चीन ने कितनी बड़ी मात्रा में [Read the Rest...]

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दृष्टिकोण : विवाद की शब्दावली

दृष्टिकोण : विवाद की शब्दावली

Author: रामशरण जोशी Edition : July 2012

मार्क्सवादी पॉलिटिक्स में एक और फिकरा दर्ज हो गया है। यह शब्द है ‘सामंती स्टालिनवाद’। इसका प्रयोग किसी मामूली मार्क्सवादी सिद्धांतकार ने नही, देश के प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने अपनी ही पार्टी सी.पी.आई.(एम.) की केरल शाखा के सम्बन्ध में किया है। उनके इस फिकरे ने वामपंथी बौद्धिक क्षेत्रों में खासा विवाद पैदा कर [Read the Rest...]

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Posted in दृष्टिको‡ण | Tagged cpiml, feudal-Stalinist trend, marxism, prabhat patnaik, stalin | 1 Response

राजनीति/अंग्रेजी : परिवर्तन की पटकथा

राजनीति/अंग्रेजी : परिवर्तन की पटकथा

Author: रामशरण जोशी Edition : June 2012

विशेष : पुस्तकों पर केंद्रित छमाही आयोजन : परिच्छेद :समीक्षा ’ साक्षात्कार ’ लेख ’ कविता: जून, 2012 स्क्रिप्टिंग द चेंज; अनुराधा गांधी; संपा.-अनंद तेलतुम्बडे, शोभा सेन; दानिश बुक मूल्य: 350 (पे.बे.) ISBN 978-93-81144-11-4 औपनिवेशोत्तर भारत ने इस वर्ष अपने संसदीय लोकतंत्र के साठ वर्ष पूरे किए हैं। षष्टिपूर्ति को यादगार बनाने के लिए 13 [Read the Rest...]

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Posted in पुस्तक समीक्षा | Tagged anuradha gandhi, scripting the change | Leave a response

नई दुनिया: एक परंपरा का अंत

नई दुनिया: एक परंपरा का अंत

Author: रामशरण जोशी Edition : May 2012

करीब साढ़े छह दशक पुराने नई दुनिया के ताजातरीन अवतार (जागरण स्वामित्व नई दुनिया और आलोक मेहता संपादित नेशनल दुनिया मार्केट में आ चुके हैं। दोनों का अस्तित्व स्वतंत्र है लेकिन उद्गम स्रोत इंदौर स्थित देश का सर्वश्रेष्ठ (कभी था!) हिंदी दैनिक नई दुनिया है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। हिंदी दैनिक पत्रकारिता का [Read the Rest...]

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Posted in दृष्टिको‡ण | Tagged abhay chhajlani, alok mehta, ambani brothers, jagran, media, media and money, naidunia, rajendra mathur | 1 Response

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अब तक सबसे ज्यादा पढ़े गये

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हाल में ज्यादा पढ़े गये

  • लेख : समाजवाद नए समाज की मांग करता है
  • पूंजी का संकट और समाजवादी प्रयोग
  • वामपंथ ने जेंडर के सवाल को पूरी तरह छोड़ दिया
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