मार्क्सवाद की प्रासंगिकता और पुनर्रचना
प्रस्तुत लेख की शुरुआत मैं एक चीनी हिंदी विद्यार्थी1 के चंद विचारपूर्ण वाक्यों से करूंगा। कुछ वर्ष पहले इस युवा विद्यार्थी से मैं दिल्ली में मिला था। तब चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी पूंजी नियोजन को लेकर मीडिया में काफी चर्चाएं थीं। आंकड़े दिए जा रहे थे कि चीन ने कितनी बड़ी मात्रा में [Read the Rest...]
दृष्टिकोण : विवाद की शब्दावली
मार्क्सवादी पॉलिटिक्स में एक और फिकरा दर्ज हो गया है। यह शब्द है ‘सामंती स्टालिनवाद’। इसका प्रयोग किसी मामूली मार्क्सवादी सिद्धांतकार ने नही, देश के प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने अपनी ही पार्टी सी.पी.आई.(एम.) की केरल शाखा के सम्बन्ध में किया है। उनके इस फिकरे ने वामपंथी बौद्धिक क्षेत्रों में खासा विवाद पैदा कर [Read the Rest...]
राजनीति/अंग्रेजी : परिवर्तन की पटकथा
विशेष : पुस्तकों पर केंद्रित छमाही आयोजन : परिच्छेद :समीक्षा ’ साक्षात्कार ’ लेख ’ कविता: जून, 2012 स्क्रिप्टिंग द चेंज; अनुराधा गांधी; संपा.-अनंद तेलतुम्बडे, शोभा सेन; दानिश बुक मूल्य: 350 (पे.बे.) ISBN 978-93-81144-11-4 औपनिवेशोत्तर भारत ने इस वर्ष अपने संसदीय लोकतंत्र के साठ वर्ष पूरे किए हैं। षष्टिपूर्ति को यादगार बनाने के लिए 13 [Read the Rest...]
नई दुनिया: एक परंपरा का अंत
करीब साढ़े छह दशक पुराने नई दुनिया के ताजातरीन अवतार (जागरण स्वामित्व नई दुनिया और आलोक मेहता संपादित नेशनल दुनिया मार्केट में आ चुके हैं। दोनों का अस्तित्व स्वतंत्र है लेकिन उद्गम स्रोत इंदौर स्थित देश का सर्वश्रेष्ठ (कभी था!) हिंदी दैनिक नई दुनिया है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। हिंदी दैनिक पत्रकारिता का [Read the Rest...]
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