दरबारी लाल
दिल्ली मेल : लिट फेस्टिवों की भरमार
Author: दरबारी लाल Edition : February 2013
जयपुर लिट फेस्ट ने और जो किया हो, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अंग्रेजी साहित्य की धूम मचा दी है। अकेले दिसंबर माह में ही देश में तीन साहित्यिक समारोह हुए। पहला मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया ने करवाया, दूसरा बंगलुरू में बैंगलोर लिटरेरी फेस्टिवल के नाम से हुआ और तीसरा पणजी का गोवा आर्ट्स एंड [Read the Rest...]
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दिल्ली मेल : गुरुओं का गुरुत्वाकषर्ण
Author: दरबारी लाल Edition : January 2013
गुरु लोग विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों का फायदा उठाते हुए किस तरह से अपने बेरोजगार छात्रों को ठग रहे हैं इसका एक उदाहरण नवंबर के अंतिम दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा रामविलास शर्मा पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के रूप में देखने को मिला। इस सेमिनार के लिए [Read the Rest...]
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दिल्ली मेल : लेखन और सत्ता की असहिष्णुताः संदर्भ तस्लीमा नसरीन
Author: दरबारी लाल Edition : October 2012
‘इस्लाम की बेटियां’ जैसा विषय हो और तस्लीमा नसरीन उपस्थित होने के बावजूद न बोलें, यह सामान्य नहीं है। हमारा इशारा हंस के वार्षिकोत्सव की ओर है जिसमें इस विषय पर बात करने पाकिस्तान से जाहिदा हिना और किश्वर नाहिद विशेष तौर पर आईं थीं। बेशक इस विषय पर बोलने के लिए तस्लीमा सबसे उपयुक्त [Read the Rest...]
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दिल्ली मेल : राजेंद्र यादव, गोपीचंद नारंग,अकादमी और भिड़ंत
Author: दरबारी लाल Edition : September 2012
राजेंद्र यादव के बहाने राजेंद्र यादव का हिंदी साहित्य को रचनात्मक योगदान बड़ा है या उनका हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य को जीवंत बनाये रखने का, इस बारे में तय कर पाना थोड़ा मुश्किल है। उनके विरोधी, जो कम नहीं हैं, मानें या न मानें पर दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे हिंदी जगत का साल [Read the Rest...]
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दिल्ली मेल : नौ सौ चूहे खाके……..
Author: दरबारी लाल Edition : August 2012
हज का रास्ता सरकारी कर्मचारियों, विशेष कर ऐसे कर्मचारियों के लिए जो जिंदगी भर मलाईदार या ताकत के पदों पर रहे हों, सेवानिवृत्ति ऐसी घटना है जो अच्छे-अच्छों को दार्शनिक बना देती है। आध्यात्म और बोध (बतर्ज गौतम बुद्ध) उसके ‘साइड इफैक्ट’ कहे जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक रहे विश्वरंजन का साहित्य प्रेम [Read the Rest...]
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दिल्ली मेल : भ्रष्टाचार का महाचक्र
Author: दरबारी लाल Edition : July 2012
केंद्रीय हिंदी संस्थान को लेकर इधर जो समाचार आ रहे हैं वे कमोबेश हिंदी के नाम पर चलनेवाले गोरखधंधे का उदाहरण हैं। कभी वह दौर था जब हमारे राजनेता हिंदी के बड़े लेखकों के व्यक्तित्व से ही नहीं बल्कि कृतित्व से भी परिचित हुआ करते थे। आज स्थिति यह है कि किसी भी नेता का [Read the Rest...]
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