संस्मरण : करुणा उपजाती अज्ञेयता

महावीर सरवर

अपने अपने अज्ञेय: सं.: ओम थानवी; (दो खंड) वाणी प्रकाशन ;

पृष्ठ : 1053; मूल्य : रु. 1500, ISBN : 9789350009161, ISBN : 9789350009178

apney-apney-agyeyaअगर गहराई से अज्ञेय के जीवन और साहित्य की पड़ताल की जाये तो उनकी छवि शेक्सपियर के किसी दुखांत नाटक के केंद्रीय पात्र की बनती है जो उनके प्रति दया ही उपजाती है। इसका कारण उनकी तेजस्विता, प्रखरता और ओज का एक पुच्छल तारे की तरह लोप हो जाना है। दरअसल अज्ञेय को समझने के लिए एक तथ्य समझने की जरूरत है – अज्ञेय का उत्स। अज्ञेय की इयता, प्रतिष्ठा और अस्तित्व की ओजस्विता, उनके क्रांतिकाल की गतिविधियों के दौरान उनकी निष्कलंक छवि, उनके जेल में बिताए गए वर्षों और शेखर एक जीवनी के लेखन व उसकी साहित्यिक महता पर टिकी है।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ पर आई दो खंडों में संपादित इस स्मरणमाला को पढ़ते हुए कई बार प्रख्यात फिल्मकार महेश भट्ट का लिखा एक बहुत मार्मिक और विचलित करने वाला किस्सा याद आता रहा। शायद विदेश के किसी कैफे में अपने दाशर्निक मित्र कृष्णमूर्ति के साथ कॉफी पीते हुए उन्होंने कृष्णमूर्ति से पूछा कि मैं आप के लिए लिए कुछ कर सकता हूं? कृष्णमूर्ति ने उत्तर दिया था, बस, मेरी मृत्यु के बाद मुझे कभी भी याद मत करना। किसी प्रिय दिवंगत के स्मरण से मनुष्य को सहज ही ‘सेंस ऑॅफ लॉस’ की पीड़ा झेलनी पड़ती है और अगर कृष्णमूर्ति के उपरोक्त निषेधात्मक निवेदन की भी पालना करनी हो तो कल्पना करना ही मुश्किल है कि न जाने भट्ट साहब कितनी बार खलिश और तड़प से गुजरते होंगे और कितने विचलित और बेबस होते हुए कृष्णमूर्ति को याद करते होंगे।

शायद साहित्यकारों की जन्म शताब्दी के चलते आयोजनों में अज्ञेय पर सबसे ज्यादा काम हुआ है। अज्ञेय के पाठको को समर्पित यह संकलन भी उसी शृंखला में आ जुड़ा है। अज्ञेय के सदाशयी पाठको की अपेक्षा भी ये रही होगी कि इस संकलन में अज्ञेय के बारे में कुछ ऐसे ही संस्मरण हों जो उन्हें विचारों और भावनाओं के स्तर पर आत्ममंथन के लिए विवश कर सकें। आश्चर्य है कि कई धुरंधर लेखकों के संस्मरणों के इस संकलन में इस्मत चुगताई के ‘दोजखी’ या अश्क के ‘मंटो मेरा दुश्मन’ या साहिर लुधियानवी के देवेंद्र सत्यार्थी पर लिखे मील का पत्थर संस्मरणों को लगभग छूते हुए इस संकलन में मुश्किल से तीन चार संस्मरण हैं। पाठकों को अधिकतर जाना, पढ़ा और पुनरावृत ही मिलेगा सिवाय कुछ छोटी-मोटी नई जानकारियों के। कुल मिलाकर इतनेसारे लेखों को पढऩे के बाद अज्ञेय एक कुशल सफल ऑल राउंडर दुनियादार नजर आते हैं।

क्रांतिकारियों का साथ, जेल यात्रा और शेखर एक जीवनी की रचना – अज्ञेय के जीवन के तीन ही स्वर्णिम बिंदु हैं। वस्तुत: इन संस्मरणों से भी यह स्पष्ट है कि अज्ञेय और ‘शेखर …’ एक दूसरे के पर्याय हैं और एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं। इन संस्मरणों से पता चलता है कि जैनेंद्र को केवल शेखर एक जीवनी का पहला भाग ही पसंद आया और उसके बाद नदी के द्वीप खाली-खाली लगा। रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ को शेखर के बाद नदी के द्वीप छिछला उपन्यास लगा। नामवर सिंह ने शेखर को पांच सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में एक माना है। लक्ष्मीधर मालवीय, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इत्यादि ने शेखर कई बार पढ़ा। विजय मोहन सिंह ने अज्ञेय को लिखा था कि शेखर को पढ़कर मैं आपको अपने काफी निकट महसूस करता हूं और उन्होंने ऑफर किया था कि मैं खुद उन आलोचकों को जवाब देने के लिए तैयार हूं जिनको आपने अपनी इस सबसे प्यारी पुस्तक की आलोचनाओं का मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया। उन्होंने यह भी लिखा है कि 1952-53 तक सरस्वती प्रकाशन से इस उपन्यास के चार-पांच संस्करण निकल चुके थे। रमेश ऋषिकल्प ने एक टिप्पणी की है कि हमने अंतिम समय तक अज्ञेय के भीतर ‘शेखर’ को विकसित होते देखा है।

वात्स्यायन का अवतरण बतौर अज्ञेय इतिहास के उस छोटे से काल खंड में हुआ जब उनका जुड़ाव हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्यों, विशेषकर चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और भगवतीचरण वोहरा तथा अन्य क्रांतिकारियों से होता है। उस समय की कल्पना करते हुए फ्रांसीसी क्रांति पर लिखी वड्र्सवर्थ की कविता की पंक्तियां याद आ जाती हैं – ‘ब्लिस वॉज इट इन दैट डॉन टू बी अलाइव, बट टू बी यंग वॉज वेरी हैवन !’ क्रांतिकारियों के तेवरों की तस्वीर बिस्मिल की इन पंक्तियों में है, ‘वक्त आने पर बता देंगे तुझे ऐ आसमां। हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।’ क्रांति के उस दौर के अज्ञेय के कुछ उज्जवल चित्र इन संस्मरणों में हैं। जगदीश चतुर्वेदी ने अपने संस्मरण में बताया है कि भगवती चरण वोहरा के बियावान जंगल में रावी तट पर बम दुर्घटना में घायल होने पर अज्ञेय अपने डाक्टरी पढ़ रहे भाई को जिद करके इलाज के लिए लाए थे। यह बड़ा जोखिम भरा काम था। निर्मला ठाकुर के अनुसार प्रकाशवती (यशपाल की पत्नी) ने उनके पति को बताया था कि क्रांतिकारियों के इस समूह में उन दिनों केवल दो व्यक्ति ऐसे थे जिनकी उन पर बुरी नजर नहीं थी एक चंद्रशेखर आजाद और दूसरे वात्स्यायन।

वह विप्लवी दौर शीघ्र ही खत्म भी हो गया और बकौल मजरूह – ‘जमीं खा गई आसमां कैसे कैसे’ । एकाकी अज्ञेय जेल में बंदी हुए और सिर पर फांसी कि लटकती तलवार के साये में उन्होंने शेखर एक जीवनी लिखने की सोची। यह उपन्यास उन उपन्यासों की श्रेणी का है जिन्हें जर्मन भाषा में नॉवेल ऑफ ऐजुकेशन किस्म के उपन्यास कहा जाता है। जिनके नायक अपनी किशोर अवस्था में समाज के प्रचलित मूल्यों से टकराते हैं और यही टकराव उनके जीवन के विकास में बहुत अहम भूमिका निभाता है। ये उपन्यास काफी हद तक आत्मकथात्मक होते हैं। योरोपीय साहित्य में ऐसे कई क्लासिक उपन्यास हैं – ऑफ ह्यूूमेन बॉंडेज, ज्यां क्रिस्तोफ, डेविड कॉपरफील्ड, ऑलिवर ट्विस्ट आदि। शेखर एक जीवनी शायद इस श्रेणि के उन बिरले उपन्यासों में होगा जिनके कथ्य और शिल्प की रूपरेखा किसी क्रांतिकारी की संभावित मौत के साये में रची गई। इसलिए इस उपन्यास में बड़ी प्रचंड प्रखरता है, जबरदस्त काट है और उपन्यास में वर्णनों और स्थितियों की यथार्थता बहुत से स्थलों पर अत्यंत सशक्त है। अधिकांश संवेदनशील भारतीय किशोर और युवक काफी सीमा तक अपने को उपन्यास के नायक शेखर से आइडेंटीफाई करेंगे। इसीलिए यह हिंदी साहित्य का पहला प्रभावशाली आधुनिक उपन्यास है। बेवजह नहीं कि संस्मरणों के इस संकलन में बहुत से लेखकों ने अज्ञेय को किसी न किसी तरह शेखर एक जीवनी को केंद्र में रखकर याद किया है। लेकिन इन संस्मरणों की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि शेखर रचने के बाद अज्ञेय के साहित्य और जीवन में जो ढलान आया उस पर कुछ भी गूढ़, विश्लेषणात्मक और सारगर्भित ढंग से नहीं कहा गया।

संकलन में अज्ञेय की अथक अध्ययनशीलता, बौद्धिकता, काव्य प्रतिभा, कुशल पत्रकारिता, हिंदी भाषा के संरक्षण तथा सामाजिक भलमानुषता का जिक्र कई संस्मरणों में आया है। कई प्रशंसात्मक बातें तो उनके तथाकथित विरोधियों ने लिखीं हैं। कमलेश्वर के अनुसार अज्ञेय हमारी सांस्कृतिक विरासत को निरंतर संवारते रहे। रेणु, निर्मल वर्मा, लोठार लुत्से, गोविंद मिश्र, प्रफुल्ल चंद्र ओझा, रघुवीर सहाय, जानकी वल्लव शास्त्री, रमेश चंद्र शाह, कृष्ण दत्त पालीवाल, विद्यानिवास मिश्र, कुंवर नारायण, मनोहर श्याम जोशी, प्रयाग शुक्ल, पुष्पा भारती, पद्मा सचदेव, इला डालमिया और उनके जीवनीकार राम कमल राय आदि के संस्मरण अज्ञेय के जीवन और साहित्य के कमोबेश सकारात्मक संस्मरण हैं। लोठार लुत्से का कहना है कि उनके योरोपीय मित्र भी उनके बिना विपन्नतर हैं। इला डालमिया के संस्मरण से आशा थी कि उनका अज्ञेय के साहित्य और जीवन के आयामों पर बहुत विशद, विश्लेषणात्मक, अंतरंग और संश्लिष्ट संस्मरण होगा, पर उनका संस्मरण महज एक स्पष्टीकरण-सा ही बना है। मनोहर श्याम जोशी की दो बड़ी दिलचस्प टिप्पणियां हैं – ‘अज्ञेय पूर्व और पश्चिम, लोक मानस और अभिजात मानस, अतीत और भविष्य, परंपरा और प्रयोग को घोल कर पी और पिला गए’। उनकी दूसरी टिप्पणी है ‘अज्ञेय पर जो आरोप लगाया जाता है वह इतना टुच्चा होता है कि अज्ञेय की महानता से मेल नहीं खाता’।

अज्ञेय सहज और आत्मीय लगते हैं – रूपवती जैन, कुसुम गुप्ता, मानस मुकुल दास और निर्मला ठाकुर के संस्मरणों में। जैन का संस्मरण अज्ञेय की क्रांतिकारी गतिविधियों और मेरठ सत्याग्रह के समय का है। यह इस लिए हृदयस्पर्शी और उल्लेखनीय है कि यह एक गैर-साहित्यिक हस्ती का लिखा हुआ है। अज्ञेय क्योंकि उस दौरान और उसके आस पास क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त रहे तो उनकी एक मासूम-सी तेजस्विता और पड़ोस के घर के बाशिंदे जैसी छवि अच्छी बनी है। जैनेंद्र से बीच-बीच की अनबन के बावजूद उनके परिवार से अज्ञेय के संबंध रागात्मक बने रहे – कुसुम गुप्ता के संस्मरण में इसका वर्णन है। मानस मुकुल दास का संस्मरण संकलन का सबसे लंबा संस्मरण है और अज्ञेय के लगभग पांच दशकों तक एक परिवार के साथ प्रगाढ़ संबंधों का ‘मैटर – ऑफ – फैक्ट’ अंदाज में वर्णन करता है। कई संस्मरणों में अज्ञेय का औरों को आर्थिक रूप से और अन्य प्रकार की सहायता देने का भी जिक्र है। प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’ की आर्थिक स्थिति की चिंता, गिरिराज किशोर की नौकरी की परेशानी, प्रयाग शुक्ल के रोजगार में अज्ञेय की मदद कुछ ऐसे ही प्रसंग हैं।

कुछ संस्मरणों के लेखकों से उनके राग-द्वेष के मिले-जुले संबंध रहे। प्रभाकर माचवे के साथ उनके अंतिम दस वर्षों के संबंध खिंचे-खिंचे रहे। माचवे का कहना है कि कवि के नाते उनका अहम् स्फीत था और शेष हिंदी कवियों को या तो वह अपना शिष्य मानते थे या अपना शत्रु। पंजाबी लेखकों जैसे उपेंद्र नाथ अश्क और सत्यार्थी से वह चिढ़ते थे। केशव चंद्र वर्मा के संस्मरण में जिक्र है कि अज्ञेय के परिमल की एक मीटिंग में अपना प्रस्ताव थोपने की कोशिश के विरोध के कारण उन्हें अपना प्रस्ताव खीझ से वापस लेना पड़ा। उन्हें सदा आंखें मूंद कर साथ चलने वालों की तलाश थी जो परिमल से उन्हें नहीं मिली इसीलिए उन्हें इलाहाबाद से विरक्ति हो गई, वहां का तेवर उन्हें रास नहीं आया और उन्होंने दिल्ली को अपने कार्य क्षेत्र के लिए चुना। शायद इस संकलन कि सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी केशव चंद्र वर्मा की ही है:

‘हैरानी की बात यह है कि अज्ञेय जैसा विविध अनुभवधनी, भाषाविद, काव्यकला मर्मज्ञ, दार्शनिक समझ वाला, दुनियाभर के श्रेष्ठ साहित्यकारों से साक्षात्कार करने वाला, भाषा संप्रेषण के अनेक स्तरों पर साझेदारी का दावा करने वाला रचनाकार – अपनी संपूर्ण सृजन यात्रा में सार्वभौम रूप से हिंदी पाठक की सहज स्वीकृति नहीं पा सका। अपने ही समसामयिक प्रेमचंद या मैथिलीशरण गुप्त को छोड़ भी दें तो भी हजारी प्रसाद द्विवेदी, दिनकर या बच्चन जैसी सहज स्वीकृति भी अज्ञेय के लिए सदा अनुपलब्ध रही। वह अंतत: केवल एक विशिष्ठ वर्ग के पाठकों के ही लेखक रहे, यूं भी कह सकते हैं कि वह लेखकों या संभावित लेखकों के ही लेखक रहे।’

Book-release-Kolkataओम थानवी ने भूमिका में कहा है कि अज्ञेय अनेक लोगों के लिए चुप्पे, घुन्ने और मनहूस रहे। ऐसा अज्ञेय ने भी कहीं कहा है कि कई लोग उनके निकट के बंदों से पूछा करते हैं कि कभी उन्होंने अज्ञेय को खुलकर हंसते देखा है। अज्ञेय ने कहा है कि उनके बंधु स्वयं इस प्रश्न पर हंसते हैं क्योंकि वह और उनके बंधु उनके साथ बैठकर अनेकों बार अनेकों विषयों पर हंसे हैं। अज्ञेय का मानना था कि अपने थोड़े से बंदों से उन्हें यथेष्ठ सामाजिक तृप्ति मिल जाती थी और बहुत-सी खुराफात से बच कर वह दत्तचित्त होकर अपना काम कर सकते थे। हो सकता है कि अज्ञेय अपने बंधुओं और मित्रों के दायरे से ही संतुष्ट रहे हो परंतु इतना अवश्य है कि इस छोटे से कुटुंब से उनका अहित अधिक हुआ। कमलेश्वर ने अपने संस्मरण में लिखा है …- ”अज्ञेय पूर्ण हुए थे, परंतु उनकी पूर्णता को खंडित किया था उन्होंने जो अज्ञेय को जानने और उन्हें ‘भाई’ कहने का सामाजिक लाबादा लपेट कर खुद कुछ महत्त्वपूर्ण बनने की कोशिश करते हैं और अज्ञेय की विराट पहचान को धूमिल करते हैं।”

इसी प्रकार लखनऊ में अज्ञेय के हरी घास पर क्षण भर कविता संग्रह के एकल काव्य पाठ के माहौल की घटना को नरेश मेहता ने अज्ञेय के गुरुडम की स्थापना जैसा बताया है। अगरबत्तियों की दैवीय सुगंध और काव्य की पैगंबरी वाणी की नाटकीय शैली का वर्णन करते हुए नरेश मेहता ने लिखा है – ‘मेरी निश्चित धारणा है कि वात्स्यायन को हमने सहज नहीं होने दिया। जीवन के उत्तरकाल में जब वह सहज होना भी चाहते रहे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। काफी दिनों के बाद अगर मूर्ति वापस व्यक्ति बनना चाहे तो मूर्ति तो खंडित होती है वह व्यक्ति भी नहीं बन पाती।’

1942-44 के बाद (हालांकि 1960 तक वे कुछ अच्छी कहानियां भी लिखते रहे) उनका जीवन विवादों में घिरना शुरू हो जाता है। इस संबंध में कमलेश्वर की वह नाटकीय टिप्पणी भी याद करने योग्य है, जिसका आशय ऐसा था कि 14 अगस्त 1947 की रात के 11 बज कर 59 मिनट और 59 सेकेंड के बाद भारत के समाज को समर्पित, त्यागी, बलिदानी पीढ़ी का एकदम नकारात्मक कायांतरण हो गया। शायद वात्स्यायन जो अज्ञेय बने थे उनके चरित्र में भी पूरी तरह बदलाव आने लगा था और मौत से रूबरू होने, जेल में पारा दिए जाने के बाद वह शायद आत्मकेंद्रित हो गए और धीरे-धीरे समाज विमुख हो गए। लगभग 1960 के बाद उनकी रचनाओं में प्रगतिकामी तत्त्व गायब हो गए। उनकी भव्यता ‘फुल ऑफ साउंड एंड फ्यूरी एंड सिगनिफाईंग नथिंग’ बन कर रह गई। इन संस्मरणों में अज्ञेय के इस क्षरण का कहीं भी जिक्र या विश्लेषण नहीं है। परंतु, उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण बने व्यक्तित्व की फिजा बनी रही। उनकी एक साख थी। इसीलिए उनके साहित्य क ी गिरावट के बावजूद उनके आत्मीयों का उनसे मेल-जोल रहा – स्वार्थ साधकों की तरह। इसीलिए बहुत से लेखकों के संस्मरणों में सतही अपील है।

कई संस्मरणों में ब्रेगिंग (शेखी) का तत्त्व भी है। शायद यह दिखाने के लिए कि उनके एक महान साहित्यकार से घनिष्ठ संबंध रहे। यहां ब्यौरे शिष्टाचार और आचार-व्यवहार के सुरुचिपूर्ण आदान-प्रदान जैसे हैं। और यह सब जैसे डेल कारनेगी के हिदायतनामों के अनुपालना में हो रहा हो। मनोहर श्याम जोशी ने अपने संस्मरण में अज्ञेय के कुछ उसूल गिनवाए हैं। प्रकट ही अज्ञेय का भी व्यक्तित्व दुर्लभ था। अज्ञेय का स्वादिष्ट नाश्ते या भोजन की व्यवस्था करना, पुस्तकें या अन्य वस्तुएं भेंट करना, कार में लिफ्ट देना, अपने परिचय के बूते पर कुछ कार्य कराना, साहित्यिक और अन्य किस्म की पत्रिकाओं में किसी कार्य से संबंधित मदद करना, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन देना आदि कई बातों का विवरण उनकी इमेज को एक राजा बेटा या वीर बालक की-सी बना देता है। बहुत हास्यास्पद लगता है कि अज्ञेय के टोस्ट सेंकने का वर्णन कई संस्मरणों में आया है और दिल करता है कि कहें ‘या अज्ञेय जी, हम न हुए’। या अज्ञेय जी सुरुचिपूर्ण ढंग से शराब की ट्राली ले कर आते हैं गोविंद मिश्र के लिए। वह भी एक संभावित नोबेल लॉरियेट की ऐसी मेहमान नवाजी से गदगद हो गए होंगे।

अज्ञेय का बौद्धिक और साहित्यिक आतंक बहुत था। बहुत से साहित्यकारों की उनसे भेंटे एक झिझक के साथ होती हैं। कई लेखक अपने प्रश्न पूरे दिल से भी नहीं पूछ पाते। राजेश जोशी के शेखर भाग 3 के बारे में प्रश्न पूछने या पंकज बिष्ट के उनसे मिलने पर जो खामोशी या मितवादिता अज्ञेय दिखाते हैं, वह निश्चय ही ‘चुप’ की हास्यास्पद ‘दहाड़’ है। कुछ साहित्यकारों या लेखकों से उनका पहली ही भेंट में खुलकर मिलना किसी योजना का हिस्सा लगता है। रामशरण जोशी का अज्ञेय से भेंट का संस्मरण, उनके विरोधी विचारधारा के पक्षधर होने के बावजूद बड़े संतोष और उल्लसित भाव से भरा है लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि अज्ञेय ने इस होनहार बिरवां के पत्ते की चिकनाई भांप ली हो।

अज्ञेय के साहित्य और जीवन के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण है समष्टि बनाम व्यष्टि का प्रश्न। इन संस्मरणों में इस विषय पर बहुत से लेखकों ने किसी न किसी रूप में लिखा है परंतु अज्ञेय के विचार से खांटी विरोध या अन्यथा मत का स्वर लगभग गायब है। इस संबंध में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को ज्ञानोदय मार्च 1960 को दिए गए उनके प्रश्न का उत्तर यह है कि – ”कलाकार की एकांत साधना को अत्यधिक महत्त्व देता हुआ भी मैं समझता रहा हूं कि समय-समय पर उसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं पर अपना अभिमत प्रकट करना चाहिए, किंतु अपने साहित्यिक व्यक्तित्व का ऐसा सामाजिक उपयोग होने देने में उसे दलबंदी से बचाना चाहिए क्योंकि बिना इसके वह अपने निजी दायित्व से स्खलित हो जाता है।” अज्ञेय ने मार्क्सवाद को इस युग का सबसे बड़ा जीवनदर्शन मानने या न मानने के प्रश्न पर कहीं यह कहा है कि – ”मैं समझता हूं कि मार्क्सिज्म के नाम पर जो जुल्म हुआ है उस की जड़ में यह भूल है कि उसे व्यापक जीवनदर्शन मान लिया गया – इतना ही नहीं, उसे अंतिम मान लिया गया स्वयं उसी की शिक्षा के विरुद्ध।” इन संस्मरणों में भी एक जगह जिक्र आया है कि चीन और रूस में क्रांति के बाद सामूहिक उत्पीडऩों में लाखों लोगों की हत्या हुई और अब उन देशों के नेता भी इसकी कटु भर्त्सना करते हैं, इसे ‘ब्लंडर’ मानते हैं।

इस संबंध में उल्लेखनीय है कि शेखर एक जीवनी में रूस की क्रांति के बारे में लिखते हुए अज्ञेय ने स्वयं उसे सबसे विराट, सबसे आग्नेय, घोरतम युग प्रवर्तक क्रांति बताया है। हालांकि मार्क्स अपने सिद्धांतों को समाज की समस्याओं के और विशेषकर भौतिकवाद के अध्ययन में उपयोगी मानते थे पर उनका अपना कथन था कि भगवान का शुक्र है कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूं। इसलिए मुद्दा दरअसल लेखक के किसी विचारधारा से बंधने या न बंधने का नहीं है। साहित्य मूलत: जन सामान्य की बहुमुखी समस्याओं का निराकरण करने की चेष्टा है। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ और रागदरबारी उपन्यास किसी भी तरह किसी विचारधारा से प्रभावित नहीं माने जा सकते, इसी तरह अमृत लाल नागर के बहुत से उपन्यास भी मनुष्यों की कई समस्याओं और स्थितियों का वर्णन करते हैं और ये भी किसी विचारधारा से प्रभावित नहीं माने जा सकते। जहां तक दलबंदी का प्रश्न है स्वयं अज्ञेय के साथी भगत सिंह भी मार्क्सवाद में यकीन रखते हुए किसी दलगत संस्था से नहीं जुड़े थे। स्वयं नेहरू, जिनका अभिनंदन ग्रंथ अज्ञेय ने संपादित किया वह भी, बकौल श्याम बेनेगल, महात्मा बुद्ध, गांधी और मार्क्स से प्रभावित थे। किसी भी दर्शन को मानने वाला स्वयं गलत हो सकता है पर यह जरूरी नहीं कि वह दर्शन ही गलत हो। जैसा कि लॉर्ड एक्टन का कथन प्रसिद्ध है – शक्ति आदमी को भ्रष्ट कर सकती है और निरंकुश शक्ति उसे पूरी तरह भ्रष्ट करती है। इसी प्रकार किसी भी अच्छे दर्शन का मानने वाला यदि निरंकुश हो जाए तो वह पूरी तरह भ्रष्ट और अत्याचारी हो सकता है। इसलिए साहित्य में समष्टि का वर्चस्व होने के प्रति अज्ञेय की धारणा तर्कसंगत नहीं थी। यहां यह भी विचारणीय है कि उनसे उम्र में लगभग 20 – 30 वर्ष छोटे साहित्यकारों ने तत्कालीन विषम सामाजिक व्यवस्था, सामंती मूल्यों, भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरणों और समाज की अन्य सोचनीय स्थितियों पर गौर किया और राग दरबारी, अग्नि बीज जैसे उपन्यास लिखे गए। पर अज्ञेय की कलम से स्वतंत्रता के बाद ऐसी कोई गल्प रचना नहीं आई, हालांकि साहित्य में गल्प साहित्य ही अधिकतर समाज के लिए सार्थकता रखता है। ऐसे परिदृश्य में बड़ा विचित्र लगता है कि (जैसा इन संस्मरणों मे जिक्र आया है) धर्मयुग पत्रिका में कभी लॉरेंस डूरेल और अज्ञेय के नाम पर नॉबेल पुरस्कार मिलने की चर्चा हुई थी, और कर्ण सिंह ने भी उनकी नॉबेल पुरस्कार के लिए अनुशंसा की थी।

अज्ञेय के अत्यंत घनिष्ठ और निजी दायरों के व्यक्तियों ने उनके जीवन और जीवनशैली को बिना किसी ऐतराज या प्रतिक्रिया के स्वीकार कर लिया था। उन्होंने अपनी इच्छा अनुसार जीने में कोई परेशानी नहीं उठाई और एक निश्चिंत, बाल-बच्चों की किसी भी प्रकार की जिम्मेवारी से मुक्त जीवन जिया, ऐसा व्यक्ति शायद आम आदमी की समस्याओं को समझ ही नहीं सकता था। जय जानकी यात्रा जैसे आयोजन और शांति, स्वतंत्रता, भारतीयता, मुक्ति जैसे लगभग निरापद प्रश्नों पर चिंतन करना, जिसकी उनके निकट और आत्मीय मित्रों तथा साहित्यकारों ने प्रकट ही प्रशंसा की है, उनसे एक आम आदमी और सजग पाठक अपने को बिल्कुल जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर सकता। इन संस्करणों में इन बातों पर गहन विमर्श की कमी खलती है।

अज्ञेय मॉयकोवस्की के कथन ‘स्लैप द एल्डर’ से परिचित रहे ही होंगे। पता नहीं उनमें अपने आचरण और जीवन के प्रति इस कथन को ध्यान में रखते हुए कोई प्रश्नाकुलता थी या नहीं या उनके निकट आत्मीयों में उनके प्रति ऐसी कोई उत्कंठा या असुविधाजनक जिज्ञासा थी या नहीं। ऐसा आभास होता है कि अज्ञेय के किसी भी आत्मीय ने उनसे अप्रिय या आलोचनात्मक प्रश्न उनके साहित्य और जीवन के बारे में पूछने की हिम्मत नहीं की। अज्ञेय की छवि लगातार एक आत्मकेंद्रित व्यक्ति और वायवी दार्शनिक की होती चली गई। यह संस्मरण लगभग एक तरफा भाव या विचार प्रदर्शन हैं और यह संकलन अज्ञेय के बारे में सूचनाओं की निदेशिका बन कर रह गया है। यह संस्मरणात्मक संकलन शायद अज्ञेय के बारे में प्रकाशित होने वाली अंतिम पुस्तकों में हो। अज्ञेय का लगभग पूरा आंकलन और मूल्यांकन केशव चंद्र वर्मा की उपरोक्त टिप्पणी में समाया हुआ है।

इस संकलन के संपादन में बहुत परिश्रम किया गया है। एक हजार से ज्यादा पृष्ठों के संग्रह में 104 लेखकों के संस्मरण हैं। पर पता नहीं अज्ञेय के सजग पाठकों की इस से जिज्ञासाएं शांत होगीं या नहीं या उन्हें आत्ममंथन की कोई प्रेरणा मिलेगी या नहीं पर वे अज्ञेय को याद रखेंगे – शेखर एक जीवनी के लिए और खेद के साथ।

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