गिरीश मिश्र
पिछली सदी के आखिरी दो दशकों से नवउदारवाद की आंधी चल रही है। इसके साथ ही यह दावा जोर-शोर से किया जा रहा है कि देर-सबेर सारी दुनिया अमेरिकी रंग में सराबोर हो जाएगी। दूसरे शब्दों में विश्व के सब देशों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। यह दावा 12 अक्टूबर 1999 को पूर्व अमेरिकी विदेशमंत्री हेनरी किसिंगर ने डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने एक भाषण के दौरान किया। उन्हीं के शब्दों में, ”बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमंडलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने संबंधी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते विकास के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूंजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उसके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर और कुछ नहीं किया जा सकता।” उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवनशैली को स्वीकारने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प विश्व के पास नहीं है।
न्यूयार्क टाइम्स के स्तंभकार टॉमस एल. फ्रिडमैन ने रेखांकित किया कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक, मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतांत्रिक एवं पूंजीवादी बने।
‘इतिहास का अंत’ की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका, अभी सर्वाधिक उन्नत पूंजीवादी समाज है। उसके संस्थान बाजार की शक्तियों के तर्कसंगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमंडलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य है। न्यूयार्क टाइम्स से ही जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपर्युक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और मां अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परंतु अरसे से पुडुचेरी (पांडिचेरी) में रहते हैं।
कपूर मानते हैं कि भारत का बड़ी तेजी से अमेरिकीकरण हो रहा है। अमेरिकी कॉफी हाउस शृंखला ‘स्टार बक्स’ और ऑनलाइन शॉपिंग के अग्रदूत ‘अमेजन डॉट कॉम’ बड़े जोर-शोर से यहां आ रहे हैं। यह नवउदारवाद-अनुप्राणित भारत के भूमंडलीकरण के ऊपर निर्णायक मुहर होगी। इनके आगमन से भारत में उपभोक्तावाद को एक नई ऊंचाई ही नहीं मिलेगी, बल्कि इससे ‘भारत विलक्षण अमेरिकीकरण की प्रक्रिया में नवीनतम प्रसंग का संकेत भी मिलता है।’( देखें कपूर का लेख ‘दी अमेरिकनाइजेशन ऑफ इंडिया’, न्यूयार्क टाइम्स की भूमंडलीय संस्करण, इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून, 13 मार्च 2012)
कपूर अपनी तरुणाई के दिनों की याद करते हुए कहते हैं कि तब उन्हें लगता था कि अमेरिका और भारत के बीच कुछ भी साम्य नहीं है। दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। अमेरिका में पूंजीवादी समृद्धि थी तो भारत में अपरिग्रही समाजवाद था। सांस्कृतिक, सामाजिक और अनुभवात्मक दृष्टि से दोनों नितांत पृथक थे। मगर 1991 के बाद सब कुछ तेजी से बदलने लगा क्योंकि भारत ने नवउदारवाद को अपनाया और नेहरूवादी चिंतन एवं राष्ट्रीय आंदोलन के दृष्टिकोण को बाहर कर दिया। वर्ष 1993 में कपूर जब अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर अमेरिका से भारत लौटे, तब उन्होंने पाया कि बड़ी तेजी से बदलाव हो रहे हैं। शहरों में मॉलों और कांच के चौखटों से सुसज्जित दफ्तरों की भरमार है। देहात में फूस की झोपडिय़ों की जगह पक्के मकान बन रहे हैं। काजू और आम के बागानों के स्थान पर फाटकदार बस्तियां बन गई हैं। शहर हो या देहात, हर जगह ‘एक नवस्वतंत्र जनसमूह उपभोक्तावाद और आत्माभिव्यक्ति के आवेश में है।’ तब उन्हें याद आया उपन्यासकार आर.के. नारायण का वह कथन जो उन्होंने आधी सदी पूर्व अमेरिकी यात्रा के बाद दर्ज किया था, ‘अमेरिका और भारत, दृष्टिकोण और दर्शन में, एक दूसरे से काफी भिन्न हैं। भारतीय दर्शन अपरिग्रह और उलझनहीन एवं जटिलता से परे दैनिक जीवन चर्या पर जोर देता है। उधर अमेरिका का जोर अभिग्रहण तथा समृद्धि की असीमित प्राप्ति पर है।’
कपूर ने 2003 में भारत में स्थायी रूप से बसने का निर्णय लिया। तब उन्होंने पाया कि नारायण के कथन अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। अमेरिका और भारत बहुत कुछ एक जैसे हो चुके हैं यानी भारत का अमेरिकीकरण हो गया है जिसे मूर्त और अमूर्त, दोनों रूपों में देखा जा सकता है। मूर्त रूप में अमेरिकीकरण की अभिव्यक्ति अमेरिकी ब्रांड की वस्तुओं की उपलब्धि और अमेरिकी कारोबारियों की संख्या में भारी वृद्धि के रूप में हो रही है। अंगे्रजी लिखने और बोलने वाले भारतीय ब्रिटिश के बदले अमेरिकी मुहावरों, वर्तनी और उच्चारणों को अपनाने लगे हैं। अमेरिकीकरण के अमूर्त साक्ष्य भी भरपूर थे। भारतीय अब पूंजीवाद को नैतिकता के आधार पर नहीं ठुकरा रहे और न ही वे निष्क्रिय और बहुधा अवसादपूर्ण भाग्यवादिता के चंगुल में हैं। उनमें एक नई आशा और विश्वास पनपा है जो अमेरिकियों की खास पहचान मानी जाती रही है। इस परिघटना को भारतीय पुनर्जागरण, उछाल, गर्जन, दहाड़ आदि अनेक नामों से जाना जाने लगा है। आज यहां भी अमेरिका की तरह बाजार आधारित पूंजीवाद, भूमंडलीकरण, बहुराष्ट्रीय निगम आदि शब्द चर्चा में हैं। पहले जैसा अमेरिका को शोषक और उत्पीड़क नहीं माना जा रहा और न ही साम्राज्यवादी कहकर उसकी भत्र्सना हो रही है। शीतयुद्धकालीन मनोवृत्ति समाप्त हो गई है। वियतनाम और बांग्लादेश के मुक्तिसंघर्षों तथा कश्मीर और गोवा पर अमेरिकी रवैये को लोग भूल चुके हैं, तभी तो इराक पर अमेरिकी हमले को लेकर भारत में कोई आलोचना नहीं दिखी। सरकार, जनता और मीडिया, सबने सकारात्मक रुख अपनाया। आम भारतीय अमेरिकियों को परिश्रमी तथा आविष्कारशील मानने लगे।
कई लोगों का दावा है कि भारत का अमेरिकीकरण एक अद्भुत परिघटना है। उसने करोड़ों लोगों को गरीबी के गर्त से निकाला और जाति, धर्म, क्षेत्र, वंश, भाषा आदि के संकुचित दायरों से बाहर लाकर व्यक्तिगत योग्यता और उपलब्धियों को किसी भी इंसान को परखने का आधार बनाया है।
कपूर ने अपनी उपर्युक्त मान्यताओं और निष्कर्षों को विगत 15 अप्रैल, 2012 को बाजार में आई अपनी पुस्तक ‘इंडिया बिकमिंग : ए पोट्र्रेट ऑफ लाइफ इन इंडिया’ में विस्तार से रखा है। वर्णन और विश्लेषण का क्रम अमेरिका से उच्च शिक्षा पूरी कर 2003 में लौटने पर शुरू होता है। याद रहे कि वे जब अमेरिका गए थे तब नवउदारवाद अपनाने की घोषणा मात्र हुई थी। वह भारतीय धरातल पर क्या रूप लेगा यह स्पष्ट नहीं था। जब वे वापस लौटे तब नवउदारवादी चिंतन को सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों का आधार बने एक दशक से कुछ अधिक समय हो चुका था। चेन्नई हवाई अड्डे से अपने घर जाने के लिए उन्होंने ईस्ट कोस्ट रोड पकड़ा जिसका स्वरूप उनकी गैरहाजिरी के दौरान काफी कुछ बदल चुका था। अब वह गड्ढों से भरी तारकोल वाली सड़क न थी।
उसका विस्तार किया गया था और आसपास की बस्तियों को हटाया और सैकड़ों-हजारों की संख्या में पेड़ों को काटा गया था। कतिपय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध किया तो उन्हें समझाया गया कि प्रगति के क्रम में समाज और पर्यावरण को नुकसान हो सकते हैं, मगर इससे व्यथित होने की आवश्यकता नहीं है। वर्ष 2003 तक ईस्ट कोस्ट रोड 160 किलोमीटर लंबे राजमार्ग में बदल चुकी थी। राजनेता उसे आधुनिक भारत का प्रतिमान बतलाकर उसका गुणगान करने लगे थे। उसका निर्माण सरकार और निजी कंपनियों के परस्पर सहयोग का परिणाम था। इस प्रकार अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अपेक्षित आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए अपेक्षित आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए पब्लिक-प्राइवेट साझेदारी का फार्मूला अपनाया जाने लगा था। सड़क की सतह से गड्ढे गायब थे और उसे तारकोल एवं पत्थर के चूरे के मिश्रण से काफी चिकना बनाया गया था। सड़कों के बीच में विभाजक लगाए गए थे जो रात में चमकते थे। जगह-जगह आपातकालीन सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी, राहदारी वसूली के लिए दफ्तर बनाए गए थे जहां काफी शक्तिशाली रोशनी का इंतजाम था। सड़क के इर्दगिर्द के गांव लापता हो चुके थे और उनकी जगह विश्रामगृह, रेस्तरां, सिनेमाघर और बीसियों चायखाने बन गए थे जहां सप्ताहांत में पर्यटक आनंद उठा सकें।
विदेशी सॉफ्टवेयर और आउट सोर्सिंग कंपनियों ने अपने कारोबार फैलाए थे। यदाकदा ही ट्रैक्टरों और बैलगाडिय़ों के दर्शन होते थे। पहले की तरह उनकी भरमार न थी। स्पष्टतया, भारत ने एक नए युग में प्रवेश कर लिया था। ट्रैक्टर और बैलगाड़ी विगतकालीन अवशेष मात्र थीं। पुराने काल के खेतों की जगह बड़े-बड़े दफ्तरों ने ले ली थी जिनमें प्रौद्योगिक कंपनियां विराजमान थीं जो भारत को तेज आर्थिक प्रगति के मार्ग पर ले जा रही थीं। इनमें याहू, पेपाल और वेरिजोन जैसी विदेशी तथा इंफोसिस, सत्यम् और विप्रो जैसी देशी कंपनियां शामिल थीं जिन्होंने भारत को भूमंडलीय व्यावसायिक मानचित्र पर स्थापित किया था। उनके कर्मी आधुनिक परिधानों में दिखे। वे मोटरसाइकिलों और स्कूटरों पर प्रतिदिन दफ्तर जाते थे। दफ्तरों के इर्दगिर्द के वातावरण को देख कपूर को दक्षिणी कैलिफोर्निया की याद हो आई। कर्मी चुस्त-दुरुस्त, अनुशासित और उत्साह एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। वे उदीयमान भारतीय अर्थव्यवस्था के प्यादे जो थे। वे देर तक काम करने के लिए तैयार रहते थे। इस प्रकार के एक नए राष्ट्र की नींव रख रहे थे।
इसी नए राष्ट्र में कपूर पहुंचे जहां धान के खेतों को हटाकर राजमार्ग तथा कृषि भूमि पर सॉफ्टवेयर समूह बन रहे थे और साड़ी की जगह पतलून ले रहा था।
यह तो रहा अमेरिकीकरण का शुक्ल पक्ष परंतु उसका कृष्ण पक्ष भी कपूर ने देखा और पुस्तक में प्रस्तुत किया है जिसे देखने के बाद ही परिघटना का संतुलित मूल्यांकन हो सकता है।
कपूर ने न सिर्फ अपने निवास के आस-पड़ोस के इलाकों को देखा, बल्कि देश के अन्य भागों की यात्रा की और ढेर सारे लोगों से मिले। उन्होंने पाया कि एक हद तक लोग, विशेषकर युवा, आवश्यकता से अधिक उत्साहित हैं। उनकी आशावादिता काफी कुछ भ्रांतिपूर्ण और यथार्थ की उपेक्षा करने वाली है। गरीबी, विषमता, अव्यवस्था और पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति जैसी समस्याएं विद्यमान ही नहीं, बल्कि निरंतर उग्रतर होती जा रही हैं। इनको ध्यान में रखने पर शॉपिंग मॉलों, चमकते-दमकते नए कार्यालय समूहों, मद्यशालाओं और कॉकटेल पार्टियों का प्रभाव उन पर पहले जैसा नहीं रहा। उन्हें एक बड़ी चिंता सताने लगी : क्या भारत नवउदारवाद के परिणामों का सफलतापूर्वक सामना कर पाएगा? क्या उपभोक्तावाद की ऊंची उठती लहरें और नग्न भौतिकवाद चिर प्रसिद्ध भारतीय आत्मा को निगल जाएंगे? उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, इसलिए भारत को अपनी नई समृद्धि के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने देखा कि नए धन के साथ विषमता भी नए-नए रूपों में आ रही है। नई स्वतंत्रता और नए अवसरों के साथ अव्यवस्था और हिंसा के द्वार भी खुल रहे हैं।
एक ओर जहां करोड़ों लोग गरीबी के गर्त से बाहर आ सके हैं, वहीं दूसरी ओर, अन्य करोड़ों लोग उसमें फंसे हुए हैं और ढेरों अन्य आदमी अनेक प्रकार की सामाजिक अस्त-व्यस्तताओं के शिकार हो रहे हैं। उनके पूर्वजों के जमाने की समाज व्यवस्था और उसमें जुड़े मूल्य तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। यह स्वीकार करना बड़ा ही कठिन और तकलीफदेह लग रहा है कि सब जगह विकास ‘सर्जनात्मक विध्वंस’ का ही एक रूप होता है। पुराना नष्ट होता है और उसकी जगह नया आता है। पुराने के साथ लगाव के कारण लोगों को उसका बिछोह होता है।
नवउदारवाद अपनाने के बाद आए परिवर्तनों को स्पष्ट करने के लिए कपूर ने कई मूर्त उदाहरण दिए हैं। वे सत्यनारायण उर्फ साथी की ओर इंगित करते हैं जिसका परिवार पुराने जमींदारों का रहा है। उच्च जाति के कारण उसका सामाजिक रुतबा भी रहा है। उसके पास हजारों एकड़ जमीन और बाग-बगीचे रहे हैं और मद्रास प्रेसीडेंसी में उसके रिश्तेदार ऊंचे ओहदों पर काबिज रहे हैं। दूसरे शब्दों में, इस परिवार का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दबदबा रहा है। मगर अब स्थिति बदल गई है। खेती का धंधा काफी कठिन हो गया है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से जमीन की उत्पादकता कम हुई है। इन सब कारणों से परिवार की वित्तीय स्थिति डगमगा गई है। अब जमीन पर मकान, दुकान आदि बनाने से अधिक फायदा हो सकेगा।
नवउदारवादी युग में गांवों का आकर्षण घटा है। नए वर्गों और समूहों का उदय हुआ है जो समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर हावी होते जा रहे हैं।
गांवों में अपराध बढ़े हैं। परंपरागत ग्राम पंचायतें शक्तिहीन हो चुकी हैं। पैसों से भरी जेबों वाले युवक बुजुर्गों की नहीं सुनते और अपनी मनमानी चलाते हैं। छोटे खेतिहरों की हालत दयनीय है। वे मुख्य रूप से बाजार के लिए उत्पादन करने लगे हैं। आए दिन बाजार में उत्पादों की मांगों और कीमतों में गिरावट आने पर ऋणग्रस्त हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने कर्ज लेकर उर्वरक, बीज, कीटनाशक दवाएं खरीदी हैं तथा सिंचाई और ट्रैक्टर का प्रबंध किया है। कर्ज का बोझ बढऩे पर वे हताश होकर आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।
शहरी नवधनाढ्य अपनी दौलत का खुलकर प्रदर्शन करते हैं। शानदार भोज देते हैं, चमकते-दमकते मकानों में रहते और बड़ी गाडिय़ों में सफर करते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत नौजवान क्रेडिट कार्डों से भरे हुए बटुए लेकर घूमते और अमेरिकी शैली में बातचीत और अभिवादन करते हैं। ऊपरी तौर पर वे जो भी गर्मजोशी दिखलाएं, वास्तव में वे भावनाशून्य हैं। वे दिल से नहीं, बल्कि दिखावे के लिए कहते और करते हैं। वे हर चीज बड़े आकार में चाहते हैं और अविलंब। वे बड़ा मकान और बड़ी गाड़ी पसंद करते हैं। गांवों से दलित एवं अन्य पिछड़ी जातियों के लोग तेजी से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। वहां उनके बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिलती है और उन्हें नए विचार। वे पैसे कमाते और अच्छी तरह खाते-पीते हैं। उनकी मनोदशा बड़ी तेजी से बदल रही है। उनमें स्वाभिमान जगा है जिससे वे बेहिचक अपने न्यायोचित हक और विशेषाधिकार मांगने लगे हैं। वे अब पहले जैसे डरपोक नहीं रह गए हैं। वे आत्मनिर्भर बन गए हैं। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि जाति व्यवस्था समाप्त हो गई और दलितों का शोषण और उत्पीडऩ खत्म हो गया है। आज भी कई राज्यों के गांवों में दलितों को दबाने की कोशिशें हो रही हैं। चूंकि दलित पहले जैसे भीरु नहीं हैं इसलिए वे विरोध में उठ खड़े होते हैं जिससे मारपीट और खून-खराबा होता है।
अब जरा शहरों की ओर देखें। बंगलुरु भारत के उन शहरों में शीर्ष पर है, जहां नवउदारवाद का सबसे अधिक असर है। वह सूचना प्रौद्योगिकी का गढ़ बन गया है। वहां आधुनिकीकरण का वर्चस्व है। चूंकि गांवों तथा अन्य कम विकसित राज्यों से काफी संख्या में लोग वहां आ रहे हैं इसलिए वहां मलिन बस्तियों तथा अनौपचारिक श्रमिक क्षेत्र का विस्तार हो रहा है। यह प्रचार जोर-शोर से चल रहा है कि हर भारतीय (वह ग्रामीण हो या शहरी) का एकमात्र लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण अमीर बनना है। यह अनायास नहीं है कि एक भारतीय टी.वी. चैनल पर ‘अपना सपना, मनी-मनी’ कार्यक्रम नियमित प्रदर्शित किया जा रहा है। खरीदारी का भूत नई पीढ़ी पर सवार है। इसके पीछे ‘प्रदर्शन प्रभाव’ का हाथ स्पष्ट है। क्रेडिट कार्ड की सुविधा के कारण आय अब खरीददारी की सीमा नहीं निर्धारित करती। खरीददारी वास्तविक आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए नहीं बल्कि वस्तुओं एवं सेवाओं के ‘प्रतीक’ या ‘प्रतिष्ठा मूल्यों’ तथा ‘प्रदर्शन प्रभाव’ को ध्यान में रखकर करते हैं।
नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के फलस्वरूप मुद्रास्फीति की दर तेजी से बढ़ी है। आर्थिक संवृद्धि की दर त्वरित होने के साथ ही कुपोषण के शिकार भारतीयों की संख्या बढ़ी है। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक आठ दशकों के दौरान खाद्यान्न उत्पादन में 30 प्रतिशत गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही है। कृषि कार्य आर्थिक दृष्टि से अपना महत्त्व तेजी से खोता जा रहा है। इसी कारण लोग दूसरे पेशों को अपनाने लगे हैं। उदाहरण के लिए, कपूर पाते हैं कि एक व्यक्ति अपनी जमीन बेचकर गायों की खरीद-फरोख्त करने लगा है। खाड़ी देशों में गोमांस की मांग तेजी से बढऩे से उसका धंधा लगातार फायदेमंद होता जा रहा है। यहां पर एक अजब सी स्थिति दिखती है। इस कारोबारी की मां हर सुबह गायों की पूजा करती और उन्हें खिलाती-पिलाती है। ग्रामवासी सपने में भी गोहत्या और गोमांस भक्षण की बात नहीं सोच सकते, किंतु अब इस प्रकार की नैतिकता पुरानी पड़ चुकी है। तभी तो गोमांस का निर्यात हो रहा है। इसी प्रकार मदिरापान, स्त्री-पुरुष संबंध आदि के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आ रहा है।
जैसा कि हम कह चुके हैं, मुद्रास्फीति की दर तेजी से बढ़ रही है। खाने-पीने की चीजों की कीमतें इसलिए भी बढ़ रही हैं कि जमीन को आवासीय कॉलोनियों, बाजारों, मॉल्स, राजमार्गों, कारखानों आदि के निर्माण में लगाया जा रहा है। इस क्रम में कुछ लोगों के पास ढेर सारे पैसे आ रहे हैं, जिनसे वे दूसरे लाभप्रद कारोबार आरंभ कर रहे हैं जबकि छोटे किसान और मजदूर रोजी-रोटी की खोज में शहरों का रुख कर रहे हैं। शहरों का तेजी से विस्तार हो रहा है और आसपास के गांव उनके अंग बनते जा रहे हैं। शहरी आबादी बढऩे के साथ शोरगुल, सड़कों पर भीड़-भाड़ और प्रदूषण में भी वृद्धि हो रही है। कई प्रकार की नई बीमारियां अपने पैर जमाने लगी हैं। उदाहरण के लिए बहुत सारे लोग सांस की बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं। मधुमेह और मनोरोग बढ़ रहे हैं। मध्यमवर्गीय कॉलोनियों को बाड़ों से घेरा जा रहा है। अपहरण और बटमारी की घटनाओं से लोग आतंकित हैं। समृद्धि की ओर बढ़ते समुदायों में कन्या भ्रूण हत्या, पारिवारिक कलह, तलाक आदि की घटनाएं बढ़ रही हैं।
कपूर जब मुंबई गए तब प्रफुल्लित हुए क्योंकि लगा कि देश गरीबी और अति संयम को त्याग सुख-समृद्धि की ओर चल पड़ा है। मगर तुरंत ही स्पष्ट हो गया कि यह धारणा सतही है। वहां धारावी की बड़ी मलिन बस्ती है। साथ ही रोज-ब-रोज नई मलिन बस्तियां पनप रही हैं, जहां लोगों की जिंदगी जानवरों से शायद ही बेहतर है। मुंबई में ही एक ओर विलासिता की वस्तुओं से अटे शानदार अपार्टमेंट हैं, तो दूसरी ओर मलिन बस्तियां। कहना न होगा कि एक देश में दो राष्ट्र बन गए हैं। कपूर तय नहीं कर पाते कि इनमें से कौन सा असली भारत है। एक ओर जहां अरबपति हैं, तो वहीं 60 प्रतिशत मुंबईकर मलिन बस्तियों में रहने को मजबूर हैं।
शहर में नवधनाढ्य नियम कानूनों की परवाह नहीं करते। इसे स्पष्ट तौर पर सड़कों पर उनके द्वारा गाड़ी चलाने के क्रम में देखा जा सकता है। अवैध निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं। इसमें ठेकेदारों को राजनेताओं की मदद मिल रही है। चूंकि हर कुछ बाजार पर छोड़ दिया गया है इसलिए अव्यवस्था का आलम है। बाजार का गुणगान करते हुए नित दिन गरीबों के साथ जोर जबर्दस्ती की जा रही है।
Maine yeh kitaab padhi hai aur lagbhag ek baithak men. Kitaab kafi santulit aur objective dhang se likhi gayi hai aur puri sanvedansheelata ke saath. Lekhak ne koshish ki hai ki kisi tarah ke nishkarshon se bacha jaaye lekin kitaab padhne ke baad peechale do dashakon me jo neetiyan bharat men apnayee gayi hain, aap uske samarthak nahin ho sakte.