हमारे बारे में..

समयांतर के इंटरनैट पाठकों का पुन: स्वागत। हम फिर से उपस्थित हैं और  रहेंगे।

आगे बढ़ने से पूर्व आइये एक नजर समयांतर के इतिहास पर डालें। समयांतर का अपना  छोटा-सा उबड़-खाबड़ सा इतिहास है – लगभग 42 वर्ष का। इसकी शुरूआत 1970 में क्षेत्रीय पाक्षिक के तौर पर हुई। तीस पैसे कीमत का यह अखबार तब  सिर्फ दो साल चल पाया।

आपातकाल के उस अंधेरे दौर की जो बातें बाद में सामने आईं, विशेषकर बुद्धिजीवीयों की भूमिका को लेकर, उससे उद्वेलित हो समयांतर को एक त्रैमासिक साहित्य-संस्कृति अनियकालिक के रूप में निकालने की योजना बनी। उस दौर के कई उभरते लेखक इससे जुड़े।  इस कड़ी का पहला अंक 1978 के मध्य में निकाला। 60 पृष्ठों के अंक का मूल्य दो रुपये थे।

गोकि यह अंक अपनी सफाई-छपाई में कोई बहुत आकर्षक नहीं था इस पर भी इस में कई महत्वपूर्ण रचनाएं और रचनाकार शामिल थे।  पिछले दिनों धर्मवीर भारती के संदर्भ में इस अंक के एक लेख  ‘चाटुकारिता की कला”  की विशेष रूप से चर्चा हुई। उस लेख में  बतलाया गया था कि मनोहर आशीष द्वारा बनाए गई डाक्यूमेंट्री सूर्य के अंश की कमेंट्री धर्मवीर भारती ने लिखी थी। इस में आपातकाल का महिमा मंडन था। इस संदर्भ में एक लेख तब माया में प्रकाशित हुआ था और उसे समयांतर में उद्धृत किया गया था। भारती उससे पहले जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समर्थक थे और उन्होंने जेपी की प्रशंसा में ‘मुनादी” नामक कविता लिखी थी जो धर्मयुग में धूमधाम से प्रकाशित हुई थी। स्व. भारती की पत्नी कांता भारती का कहना था कि यह हो ही नहीं सकता कि धर्मवीर भारती ने ऐसा कुछ लिखा हो। अंतत: यह विवाद हंस द्वारा माया में छपे मूल लेख के प्रकाशन के साथ समाप्त हुआ था।

दूसरा अंक नवंबर, 1978 में (90 पृष्ठ, मूल्य तीन रुपये) प्रकाशित हुआ जो फिल्मों पर केंद्रित था। इसमें बैटलशिप पोटेंपकिन पर लेखक के अलावा लातिन अमेरिकी क्रांतिकारी फिल्मकार फर्नांदो सोलानास का साक्षात्कार तथा ऋत्विक घटक पर लेख आदि थे।

दुर्भाग्य से यह प्रयास चल नहीं पाया।

21 वर्ष की चुप्पी के बाद अक्टूबर, 1999 में समयांतर का तीसरा जन्म हुआ।

इस बार इसे मासिक के तौर पर शुरू किया गया।  ए-4 आकार की इस 32 पृष्ठ की पत्रिका की कीमत रखी गई पांच रुपये।  तय किया गया कि पत्रिका उदार प्रगतिशील विचारों का मंच रहेगी। यह वस्तुनिष्ठ होगी और अपनी बात को बिना लाग-लपेट और दबाव के कहने की कोशिश करेगी। इसीलिए इसका आधार वाक्य ‘असहमति का साहस और सहमति का विवेक”  रखा गया। यानी जो बातें असुविधाजनक हैं वे तो कहनी ही हैं पर साथ ही वे बातें भी नहीं छिपानी हैं जो स्वयं हमारे लिए भी असुविधाजनक हो सकती हैं। एक मामले में यह 1978 में प्रकाशित दो अंकों की ही अगली कड़ी मानी जा सकती है। इस पर भी इस बार के समयांतर की विषयवस्तु के साथ ही साथ उसकी साज-सज्जा को भी जो रूप दिया गया वह कई मायनों में भिन्न था।

पहला खर्च को कम करने के लिए निर्णय किया गया की इसमें कोई रेखांकन या फोटो नहीं छापा जाएगा। दूसरा, इसका आवरण भी नहीं होगा और लेखों का प्रकाशन आवरण से ही शुरू हो जाएगा। इस नए रूप को आकार देने में हमने न्यू स्टेट्समैन, फ्रंटियर और इकानामिक एंड पोलिटिकल वीकली से प्रेरणा गृहण की। अपनी विषय वस्तु का भी विस्तार किया और पत्रिका को सामाजिक-सांस्कृतिक रूप देने की कोशिश की गई। साहित्य उसका एक अहम हिस्सा रहा।

अपनी 13 वर्ष की तीसरी अनवरत यात्रा में पत्रिका में देश-विदेश के के प्रकाशित होनेवाले लेखकों में एडवर्ड सईद, रोमिला थापर, सुमित सरकार, हेरल्ड पिंटर, नोम चोम्स्की, तारिक अली, माइकेल मूर,उंबर्तो इको, अशोक मित्र, प्रभात पटनायक, महाश्वेता देवी, वरवर राव, तस्लीमा नसरीन, बिनायक सेन जैसे लेखक शामिल हैं। साथ में हिंदी के महत्वपूर्ण लेखक राजेन्द्र यादव, शैलेश मटियानी, मनोहरश्याम जोशी, कमलेश्वर, प्रभा खेतान, आनंद प्रकाश, कमल नयन काबरा, रामशरण जोशी, मंगलेश डबराल, अजय सिंह, असद जैदी, बटरोही आदि लेखक भी प्रकाशित होते रहे हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि समयांतर लगातार युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का मंच रहा है। इस में प्रकाशित कई प्रतिभाशाली युवा लेखकों ने साहित्य, पत्रकारिता और अकादमिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

समयांतर के लिए एक बड़ी उपलब्धि प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखिका अरुंधति रॉय को सबसे पहले हिंदी में छापना कही जा सकती है।

हमारी कोशिश रहती है कि पाठक देश-दुनिया के बारे में अद्यतन जानकारी से वंचित न रहें। इसलिए विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित महत्वपूर्ण सामग्री को अनुवाद कर के हम लगातार प्रस्तुत करने की कोशिश करते रहते हैं। पर हमें यह बतलाते हुए भी फख्र है कि समयांतर के कई लेख हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में तो प्रकाशित होते ही हैं, विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी अनुदित हो प्रकाशित होते रहते हैं। इस संदर्भ में हम पिछले कुछ वर्षों में समयांतर में प्रकाशित अविनाश झा, रंजना पाढ़ी और चंद्रकला के लेखों का उल्लेख करना चाहेंगे जो बाद में सुप्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका इकानामिक एंड पोलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुए।

हमें यह कहते हुए भी प्रसन्नता है कि समयांतर के कुछ स्तंभ, विशेषकर दिल्ली मेल, इतना लोकप्रिय रहा है कि उसकी नकल की जाती रही है। हिंदी के एक जाने-माने पत्रकार ने इस की तर्ज पर एक स्तंभ शुरू किया था पर वह चल नहीं पाया। इसी तरह दिल्ली मेल के स्तंभकार दरबारी लाल का नाम तो राजधानी से पिछले दो-तीन वर्ष से प्रकाशित हो रही एक व्यावसायिक साप्ताहिक पत्रिका ने बाकायदा उड़ाया हुआ है।

समयांतर के प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य अपने समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करने के साथ ही साथ  उसके वैश्विक संदर्भों से भी पाठकों का परिचय करवाना है। उसका स्टैंड सदा जनोन्मुखी, प्रगतिशील और सेक्युलर रहा है। पर पिछले 13 वर्षों के अनवरत प्रकाशन के बावजूद समयांतर इस स्थिति में नहीं है कि वह एक सीमा से ज्यादा अपना विस्तार कर सके। पर हम इसे कोई मुद्दा नहीं बनाना चाहते। बल्कि लगातर इस प्रयत्न में रहते हैं कि किस तरह अपनी सीमाओं में रह कर पत्रिका को जीवंत और सामयिक बनाए रखा जाए। यानी जो हो सकता है किया जाए। यही कारण है कि हमने वार्षिक और दो पुस्तक केंद्रित विशेष अंक निकालने की शुरूआत की।

इन्हीं कोशिशों के चलते, इंटरनेट के विस्तार और सुविधा को देखते हुए हमने दो वर्ष पूर्व कोशिश की कि समयांतर का वेब संस्करण भी उपलब्ध हो। अपनी आर्थिक सीमाओं को देखते हुए हमने कोशिश की कि ऐसा रास्ता निकले  कि कम से कम खर्च में इंटरनेट के पाठकों तक भी हमारी पहुंच बनी रहे और ‘समयांतर’ की बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। हर नयी तकनीक के साथ कुछ शुरुआती दिक्क्तें आती ही हैं। वैब पर अपनी उपस्थिति बनाने बाद यह प्रयोग भी कतिपय कारणों से शुरू से ही लडख़ड़ाता चला और जल्दी ही घिसटने लगा। ऐसी स्थिति आई कि पिछ्ले कुछ समय से समयांतर नैट से गायब हो गया। इससे हमारे कुछ देसी-विदेशी पाठकों को जरूर असुविधा हुई है, जिसके लिये हमें खेद है। फिलहाल महत्वपूर्ण यह है कि हम फिर से नेट पर उपस्थित हैं ,इस बार और अधिक तैयारी, उत्साह और नयी साज-सज्जा के साथ।

हमें आशा है नये अकों को प्रतिदिन एक लेख के हिसाब से नैट पर डालते रहेंगे, इसलिये हमारे पाठक हर दिन कुछ ना कुछ नया पाते रहेंगे। आप चाहें तो नैट संस्करण को अपनी ई-मेल से सब्स्क्राइब करा लें ताकि आपको नयें लेखों की जानकारी आपकी मेल पर मिलती रहे।

हम अपने पाठकों को यह याद दिलवाना चाहेंगे कि यद्यपि समयांतर का मुख्य उद्देश्य अपनी बात को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचना है पर उसका आर्थिक आधार पत्रिका की बिक्री और चंदा है। हम समयांतर के नेट संस्करण के पाठकों से चाहेंगे कि वे इस बात को न भूलें कि पत्रिका का अपने मुद्रित रूप में बचा रहना जरूरी है। यह सही है कि समयांतर लाभ के लिए निकाली जानेवाली पत्रिका नहीं है इस पर भी कागज और छपाई आदि की बढ़ती कीमतों ने मुद्रित संस्करण के लिए आर्थिक संकट बढ़ा दिया है। इसके लिये हम शीघ्र ही ऑनलाइन पेमेंट की व्यवस्था प्रारम्भ करेंगें ताकि “समयांतर” के शुभ-चिंतक अपना योगदान वहाँ दे सकें।

आशा है आपका प्यार हमें मिलता रहेगा, और आप समयांतर को खुद भी पढेंगे और अपने मित्रों को भी पढ़ायेंगें। जो आलेख आपको अच्छा लगे उसे लेख के नीचे लगे बटन पर क्लिक करके या मेल करके अपने मित्रों तक भी पहुँचायें।

आपकी टिप्पणीयाँ हमारे लिये महत्वपूर्ण हैं कृपया अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिये लेख के साथ अपनी टिप्पणी छोड़ें।

पंकज बिष्ट 

31 responses to “हमारे बारे में..”

  1. Mehul Trivedi

    Best wishes!

  2. Palash Biswas

    Excellent! My villagers in Basantipur read lot of things as they have access to internet. They may not get Samayantar at the stall. It happens countrywide. We have a massive readership online. I had been insisting for long that Samayantar must be online.Earlier attempt filed. I hope this attemept to sustain.

    My heartiest congratulations to the Samayantar team.

    Palash

  3. jitendra jeetu

    aseem shubhkamnayen sweekaren!!!kaafi samay se prateeksha thee…

  4. avanish Pathak

    इस प्रयास के लिए आपको बहुत – बहुत धन्यवाद । मैंने 2004 से पाच सालों तक लगातार समयांतर पढ़ा। लेकिन पिछले तीन सालों से शहर-दर-शहर भटक रहा हूं। इसलिए समयांतर का साथ छूट गया । एक दो बार आपको नेट पर तलाशा लेकिन पुराने अंक ही दिखे। आज संयोगवश ही समयांतर की तलाश की और यह अच्छी खबर मिली। धन्यवाद

  5. जवाहर चौधरी

    बहुत समय से समयान्तर पढ़ने को नहीं मिल रहा था ।
    नेट सुविधा से अब संभव बना दिया है आपने ।
    आभार और बहुत सारा धन्यवाद ।

  6. Ajay Sharma

    बहुत – बहुत धन्यवाद

  7. Abhishek Avtans

    समयांतर को नेट पर दुबारा देख कर हर्ष हुआ। आपके परिश्रम और लगन को साधुवाद।

  8. kumar rakesh

    samyantar ki puri team ko badhai… all the best………!

  9. sushil budakoti 'shailanchali'

    yah jaankar hardik prasannta ho rahi hai ki samayantar ab net par bhi upasthit rahega. sampadan mandal iske lie sadhuvad ka patra to hai hi saath hi ek bade pathak varg ka samayantar se judaav hoga . aisi apexa ki jani chahie.
    Bhale hi patrika ki purva ki do yatraein adhuri rahi thi, magar ab to rastriya star ki badi se badi patrika ki vishay vastu bhi iske saamne halki padti hai.
    Sushil Budakoti ‘Shailanchali’

  10. aksaditya

    यदि आपको कोई लेख या समाचार भेजना है तो उसका क्या उपाय है ?

    1. समयांतर डैस्क

      कृपया उसे samayantar @ yahoo.com पर भेजें।

  11. shavy

    badhai is liye nahi ke ap chap rahe is liye ki ap kya chap rahen
    shaivy.rj@gmail.com

  12. Dr Bhausaheb Navale

    Ham manpurvak samyantar ke ujjval bhavishya ki kamna karte hai. Dr. Bhausaheb Navale

  13. COL>(Rtd.) Dr.Vipin Chaturvedi, AMC.Rishikesh

    Pankaj ji,
    hum pahile mil chuke hain. MOB. 09997913346 0135-2442246

  14. COL>(Rtd.) Dr.Vipin Chaturvedi, AMC.Rishikesh

    Main ab Rishikesh men hun aur medical pustaken HIndi men likh raha hun.
    Hal hi men meri pustak Manav Sharir Ki ASTHIYAN uTTAR pRADESH hINDI sANSTHAN, lUCKNOW SE PRAKASHIT HUI HAI.PANKAJ JI AAPASE MILNA CHAHUNGAA.

  15. Satyanarayan Jeengar

    sir ji
    auaust 2013 ka ank abhi tak update nahi hua kya?
    Nahi hua ho to please meri mail par send karain, thax.

  16. baby kumari

    hello sir, main apna ek lekh dena chahti hun ‘Samyantar’ me. kaise bhejun kripya btaen.

  17. sweta

    क्या समयान्तर पर अपनी रचनाएं भेजने की भी सुविधा है यदि हाँ तो प्लीज़ पूरी जानकारी देने का कष्ट करें |

  18. jaiprakash tripathi

    इस अंधेरे समय में उम्मीद, आशा, जोश और सच का पर्याय है समयांतर. पढ़ते जाओ, पढ़ते जाओ, मन नहीं भरता. सच मनुष्यता की क‌ितनी बड़ी ताकत होता है, यहां पढ़ कर पता चलता है और आसपास के चोर-चपा‌टियों को पहचानने की दृ‌षि्ट भी ‌मिलती है

  19. Utkarsh Shukla

    हिन्दी सेवा :राष्ट्र सेवा
    पंकज जी नमस्कार ,समयांतर पढ़ता रहा हूँ ,नेट पर पढ़ कर अच्छा लगा । समयांतर में शोध आलेख प्रकाशन के लिए

    भेजना चाहता हूँ । प्रकाशन के लिए क्या नियम है ।

    डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल
    हिन्दी-विभाग ,महर्षि दयानंद कॉलेज
    परेल, मुंबई – 400012

  20. प्रत्युष प्रशांत

    सर,
    मैं समयातंर के पुराना पाठक रहा हूं, कमरे बदलने के चक्कर में सारे पुराने अंक स्वाहा हो गये है। पुराने अंक कैसे उपलब्ध हो सकते है….कृपया सूचित अवश्य करें
    धन्यवाद

  21. ramesh joshi

    मैं पंकज बिष्ट का मेल और फोन नंबर चाहता हूँ , कैसे संभव है ?

  22. naval singh

    श्रीमान जी,
    समयांतर नेट पर पढ रहे है पर इच्छा है इसे संग्रहीत करने की पोस्ट से किस तरह मिल सकती है बताए। सदस्यता कैसे ली जा सकती है।
    – नवल सिंह,टोहाना, जिला फतेहाबाद हरियाणा

  23. Arun Maheshwari

    समयांतर के इस नये अवतार के लिये साधुवाद । हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं । अन्य कई पत्रिकाओं की तरह ही हम समयांतर के प्रिंट संस्करण के एकाध अंक ही देख पाये थे । बीच-बीच में चर्चा ज़रूर सुनते रहे । अब नेट पर आ जाने से नियमित देख पाऊँगा । प्रिंट के प्रति आपका आग्रह समझ में आता है, लेकिन आजकल शुदध रूप से ऑनलाइन संस्करण भी कई पत्रिकाओं के निकलते है । टाइम्स जैसी पत्रिका का भी प्रिंट एडिशन बंद हो चुका है । इसलिये इस माध्यम पर पूरी आस्था बनाये रखियें । इसकी अपनी एक अर्थनीति भी है । उसे समझ लेने से सुविधा होगी और पत्रिका के इस रूप में टिकाऊपन आयेगा । यह किसी से भी कम प्रभावशाली नहीं है ।

  24. aksaditya

    क्या समयान्तर पर अपनी रचनाएं भेजने की भी सुविधा है यदि हाँ तो प्लीज़ पूरी जानकारी देने का कष्ट करें |

  25. Saleem Manto

    क्या समयान्तर पर अपनी रचनाएं भेजने की भी सुविधा है यदि हाँ तो प्लीज़ पूरी जानकारी देने का कष्ट करें |

  26. Dr. Vinod Kumar - LPU

    pankaj ji plz give me ur contact no my MOB. is 09876758830

  27. omveer karan

    Sir apni rachnain email se konse formet me bhejna hai pdfe ya kisi aur main?

  28. Harish Sarohia

    क्या मुझे समयांतर का फरवरी 2006 का अंक मिल सकता है I

  29. B.R.BAPUJI

    We want the current address of editorial office of Samayantar. We would like to send two review copies of the book ‘bachonkeliye arthasaastra: marxki punjii ke aadhaarit paath’ originally written by Ranganayakamma in Telugu and translated into Hindi by Prashanth Rahi via English version. I am unable to see it in this online edition. We have the old address in a ten year old hard copy of samayantar. —B.R. BAPUJI, for Sweet Home Publications, Hyderabad [9948283810]. Email: brbapuji@gmail.com

  30. B.R.BAPUJI

    I apologize for not searching for it in another link related to subscriptions. Now I got the address. Sorry to bother you.

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