दिल्ली मेल : शारीरिक बनाम मानसिक रुग्णता

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पहले यह टिप्पणी देख लीजिए:

”एक गोष्ठी में एक थोड़े जी आए और एक अकादमी बना दिए गए कवि के बारे में बोले वह उन थोड़े से कवियों में हैं, जो इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हैं। वह गोष्ठी कविता की अपेक्षा कवि के स्वास्थ्य पर गोष्ठित हो गई। फिर स्वास्थ्य से फिसलकर कवि की मिजाज पुरसी की ओर आ गई। थोड़े जी बोले कि उनका अस्वस्थ होना एक अफवाह है, क्योंकि उनके चेहरे पर हंसी व शरारत अब भी वैसी ही है। (क्या गजब ‘फेस रीडिंग’ है? जरा शरारतें भी गिना देते हुजूर)। हमने जब थोड़े जी के बारे में उस थोड़ी सी शाम में मिलने वाले थोड़ों से सुना, तो लगा कि यार ये सवाल तो थोड़े जी से किसी ने पूछा ही नहीं कि भई थोड़े जी आप कविता करते हैं या बीमारी करते हैं? बीमारी करते हैं तो क्या वे बुजुर्ग चमचे आप के डाक्टर हैं जो दवा दे रहे हैं। लेकिन ‘चमचई’ में ऐसे सवाल पूछना मना है।’’

यह टुकड़ा ‘ट्विटरा गायन, ट्विटरा वादन!’ शीर्षक व्यंग्य का हिस्सा है जो दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में 6 अक्टूबर को छपा था। इस व्यंग्य की विशेषता यह है कि यह एक ऐसे व्यक्ति को निशाना बनाता है जो एक दुर्दांत बीमारी से लड़ रहा है। हिंदी के अधिकांश लोग जानते हैं कि वह कौन व्यक्ति है। दुनिया में शायद ही कोई लेखक हो जो बीमार पर व्यंग्य करने की इस तरह की निर्ममता, रुग्ण मानसिकता और कमीनापन दिखाने की हिम्मत कर सकता हो।

पर यह कुकर्म सुधीश पचौरी ने किया है जिसे अखबार ‘हिंदी साहित्यकार’ बतलाता है। हिंदीवाले जानते हैं यह व्यक्ति खुरचनिया व्यंग्यकार है जिसकी कॉलमिस्टी संबंधों और चाटुकारिता के बल पर चलती है।

viren-dangwalइस व्यंग्य में उस गोष्ठी का संदर्भ है जो साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित सबसे महत्त्वपूर्ण समकालीन जन कवि वीरेन डंगवाल को लेकर दिल्ली में अगस्त में हुई थी। वह निजी व्यवहार के कारण भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि कवि के रूप में। वीरेन उन साहसी लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी बीमारी के बारे में छिपाया नहीं है। वह कैंसर से पीडि़त हैं और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। पिछले ही माह उनका आपरेशन भी हुआ है।

हम व्यंग्य के नाम पर इस तरह की अमानवीयता की भर्त्सना करते हैं और हिंदी समाज से भी अपील करते हैं कि इस व्यक्ति की, जो आजीवन अध्यापक रहा है, निंदा करने से न चूके। यह सोचकर भी हमारी आत्मा कांपती है कि यह अपने छात्रों को क्या पढ़ाता होगा। हम उस अखबार यानी हिंदुस्तान और उसके संपादक की भी निंदा करते हैं जिसने यह व्यंग्य बिना सोचे-समझे छपने दिया। हम मांग करते हैं कि अखबार इस घटियापन के लिए तत्काल माफी मांगे और इस स्तंभ को बंद करे।

पर कवि वीरेन डंगवाल पर यह अक्टूबर में हुआ दूसरा हमला था। ऐन उसी दिन जनसत्ता में ‘पुरस्कार लोलुप समय में’ शीर्षक लेख छपा और उसमें अकारण वीरेन को घसीटा गया कि उन्हें किस गलत तरीके से साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। लेखक यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया कि वह इसके लायक नहीं थे। पर अरुण कमल और लीलाधर जगूड़ी जैसे अवसरवादियों को यह पुरस्कार क्यों और किस तरह मिला इस पर कोई बात नहीं की गई(क्योंकि वे अकादेमी के सदस्य हैं)। पर सबसे विचित्र बात यह है कि इस लेख के लेखक ने यह नहीं बतलाया कि साहित्य अकादेमी के इतिहास में अब तक का सबसे भ्रष्ट पुरस्कार अगर किसी को मिला है तो वह उदय प्रकाश को मिला है जो तत्कालीन उपाध्यक्ष और वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कारण दिया गया। यह पुरस्कार यही नहीं कि रातों-रात एक खराब कहानी को उपन्यास बनाकर दिया गया बल
्कि इसे लेने के लिए गोरखपुर के हिंदू फासिस्ट नेता आदित्यनाथ के दबाव का भी इस्तेमाल किया गया।

इस के दो कारण हो सकते हैं। पहला वामपंथियों पर किसी न किसी बहाने आक्रमण करना और दूसरा लेखक ही नहीं बल्कि अखबार का संपादक भी अकादेमी के टुकड़ों से लाभान्वित होता रहता है और अगले चार वर्षों तक होता रहेगा।

धर्म के ठेकेदार?

कथादेश (सितंबर, 13) में कमलेश ने दूसरे ही वाक्य में ‘प्रो. अर्चना वर्मा’ के हवाले से, जो पत्रिका की संपादन सहयोगी भी हैं, लिखा है कि समास में ‘मेरा सीआइए का उल्लेख ‘पासिंग रिफरेंस’ है’। असल में कमलेश के भेजे में सीआइए के प्रोपेगेंडे का इतना कूड़ा भरा हुआ है कि वह इस जन्म उससे मुक्ति पा जाएं संभव नहीं लगता। नौ पेज के अपने इस लेख में उन्होंने आठ पेज में सिवा सीआइए के आत्मसात कर लिए प्रचार के और कुछ बोला ही नहीं है।

दिक्कत यह है कि उन्हें रूस और कम्युनिस्ट आंदोलन के बारे में आधारभूत बातें ही पता नहीं हैं। उनके ज्ञान का आलम यह है कि कम्युनिस्टों ने चालीस सालों में सोवियत रूस में चार करोड़ अपने ही लोगों को मारा। उन्हें यह नहीं पता कि इस दौरान उस देश की आबादी कितनी थी? 20 करोड़ भी नहीं। यानी उसमें से पांचवें हिस्से को मार दिया गया? इसी दौरान सोवियत रूस ने दूसरा महायुद्ध लड़ा और नात्सी जर्मन की सेनाओं को हराया। वह फौज क्या सीआइए ने मुहैया करवाई थी?

एक अन्य हास्यास्पद बात वह कहते हैं केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सोवियत संघ द्वारा दिए गए पैसे से हुई थी। भारत में कई कम्युनिस्ट पार्टियां हुई हैं। क्या माकपा या भाकपा माले की स्थापना सोवियत रूस के पैसे से हुई? ये दोनों ही पार्टियां मूलत: रूस विरोधी थीं।

यह आदमी किस तरह का संकीर्ण हिंदूवादी है इसका उदाहरण है कुलदीप कुमार से हुई बहस के संदर्भ में उसका यह कहना कि बलराज साहनी के योगदान पर कोई बात नहीं होनी चाहिए क्यों कि उनका बेटा ‘इवेंजलिस्ट’ हो गया है। इससे बड़ा कोई कुतर्क हो सकता है! किसी का बेटा क्या हो गया है इससे उसके पिता के मूल्यांकन का क्या लेना देना! गांधी का एक बेटा मुसलमान हो गया था। फिर क्या किसी को अधिकार नहीं है कि उसे जो अच्छा लगता है, वह उस धर्म को अपनाए? यह छूट तो हमारे संविधान ने दे रखी है। पर सच यह है कि यह भी झूठ है। परीक्षत साहनी ने पिछले दिनों एक पत्र लिख कर इसका खंडन किया है अब सुना है कमलेश जी बगलें झांक रहे हैं। (देखें बॉक्स)

आशा करनी चाहिए कमलेश परीक्षत साहनी की विनम्रता से कुछ सीखते हुए अब तक माफी मांग चुके होंगे और भविष्य में अपने बड़बोलेपन पर लगाम लगाएंगे।

परीक्षत साहनी का पत्र

”मेरा ध्यान जानेमाने हिंदी कवि कमलेश द्वारा हिंदी साहित्यिक पत्रिका कथादेश सितंबर, 13 में लिखे लेख की ओर दिलवाया गया है। इस लेख में कमलेशजी ने आरोप लगाया है कि मैं क्रिश्चन इवेंजलिस्ट बन गया हूं और भारत व सिंगापुर में लोगों को ईसाई बनाने में लगा हूं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि इस उद्देश्य के लिए मुझे अमेरिकी जासूसी एजेंसी सीआइए से सिंगापुर स्थित एक अमेरिकी संगठन के प्रतिनिधि के माध्यम से पैसे मिल रहे हैं।

”कमलेश जी का मैं अत्यंत सम्मान करता हूं जिन्हें मेरे चाचाजी और जानेमाने लेखक भीष्म साहनी अच्छी तरह जानते थे। पर मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि आखिर किस बात से उत्तेजित होकर उन्होंने इस तरह का आधारहीन आरोप मेरे और मेरे परिवार की इज्जत खराब करने के लिए लगाया है? मैं कहना चाहूंगा कि अपने पिता स्व. बलराज साहनी की तरह मैं सच्चा देश भक्त हूं। न मैं ने कभी लिया है और न ही मैं किसी भी जासूसी एजेंसी से, फिर चाहे वह विदेशी हो या भारतीय, किसी तरह का पैसा कभी लूंगा।
मैं यह भी दोहराना चाहूंगा कि न तो मैं ईसाई हुआ हूं और न ही मैंने कभी किसी को ऐसा करने को प्रोत्साहित किया है।

”शालीनता की मांग है कि कमलेशजी अपनी गलती मानें और एक बिना शर्त सार्वजनिक क्षमायाचना जारी करें। मैं उनका सदा आदर करता रहूंगा क्योंकि मैं मानता हूं कि मेरे प्रति उनमें कोई दुर्भावना नहीं है।’’

परीक्षत साहनी, मुंबई

भेड़ की खाल में…

समयांतर के अक्टूबर अंक में छपी कुलदीप कुमार की कोसंबी: कल्पना से यथार्थ पुस्तक की समीक्षा का व्यापक असर हुआ है। कई पाठकों का कहना है कि यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था।

पर असली मसला और सवाल कुछ और है। वह है भगवान सिंह जैसे छद्म लोगों को पैदा किसने किया और वे लेखक संगठनों की छत्रछाया में वामपंथियों के रूप में फले-फूले पले कैसे? भगवान सिंह ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं जो मार्क्सवाद की आड़ लेकर आजीवन मार्क्सवाद की ही जड़ खोदते रहे। उनके साथ सुधीश पचौरी, अजय तिवारी और उदय प्रकाश को भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। यह मूलत: बड़े नामों के आकर्षण और संगठनों की आंखमूंद कर सदस्यता का विस्तार करने की मंशा के तहत हुआ।

पर यह खतरनाक प्रवृत्ति आज भी बिना रुके जारी है। आज कुछ संगठनों को उनके पदाधिकारी खुले आम अपना कैरियर बढ़ाने – विशेषकर अकादमिक क्षेत्र में, और रिटायर्ड गुरू लोग अपना प्रचार करने (हर वर्ष देश के कोने-कोने में महात्मा गांधी की तरह अपना जन्म दिन मनवाने, दूसरे शब्दों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने, की लालसा से प्रेरित) तरह- तरह के प्रतिक्रियावादी कामों में लगे हैं। अज्ञेय जैसे रूपवादी कवि और अंग्रेज समर्थक व्यक्ति को जिस तरह से एक संगठन के एक साथ दो उच्च पदाधिकारी जी-जान से महान कवि और क्रांतिकारी सिद्ध करने पर तुले हैं वह बतलाता है कि इन संगठनों में प्रतिक्रियावादियों और अवसरवादियों का कैसा बोलबाला हो चुका है।

ये प्रवृत्तियां इन संगठनों के भविष्य के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं हैं।

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