‘कमांडो’ लेखकों के दौर में लेखन

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साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर वर्तमान सरकार की चिंता समझ में आने वाली है। पर उसकी मंशाएं भी, साथ ही साथ, उजागर हो रही हैं। पिछले तीन वर्ष में एक छोटी-सी बात यह हुई है कि केंद्रीय साहित्य अकादेमी, जिसके बारे में एक अर्से से यह भ्रम था कि वह स्वायत्त है, बिना किसी शोर शराबे के एक दिन ‘भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय’ का अंग हो गई और अब अकादेमी का हर कागज इस बात को जोर जोर से कहता नजर आता है कि यह संस्था, और जो भी हो, स्वायत्त नहीं है। एक मामले में यह अच्छा ही हुआ कि कांग्रेस सरकारों के दौर का छद्म अब नहीं रहा है कि कला व साहित्य की केंद्रीय अकादेमियां स्वायत्त हैं। इसमें शंका नहीं है कि कांग्रेस राज्य में साहित्य अकादेमी पर सरकारी नियंत्रण लगभग नहीं के बराबर था पर उसकी बनावट कुछ ऐसी थी कि जाने अनजाने उस पर सत्तापक्षीय चाटुकार प्राध्यापक-आलोचकों का कब्जा हो जाता था, जिनमें अधिकांश अपनी जातिवादिता और भाई-भतीजावाद के लिए तो जाने ही जाते थे, अपनी जड़ता के लिए भी कम चर्चित नहीं हुआ करते थे। पर तब, जो कुछ हद तक छिपाया जाता था, इस बीच सरेआम हो गया है।

फिलहाल हुआ यह है कि एक तरफ सरकार ने जैसे ही अपने अधिकार की सार्वजनिक घोषणा शुरू की उसकी कार्यप्रणाली पर दक्षिण पंथी रंग गहराता नजर आने लगा है। पर दिक्कत यह है कि आज कोई भी पुराणों और धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर लेखक नहीं बन सकता, क्योंकि इस बीच पिछले डेढ़ सौ वर्षों से पंडितों और आचार्यों के कब्जे में रहा हिंदी साहित्य भी कहां का कहां निकल गाया है। साहित्य अपनी समकालीनता के कारण समाज के यथार्थ से टकराने का काम करता है, न कि समकालीनता पर पौराणिकता का ढक्कन लगाने का। अगर पौराणिक कथाओं का चर्बा साहित्य होता तो नरेंद्र कोहली (लगभग दो दर्जन उपन्यास) जिन्हें इसी सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है और गुरुदत्त (दो सौ उपन्यास), साहित्य अकादेमी तो क्या, अब तक नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर चुके होते। विडंबना यह है कि महाकाव्यों के बोझ से दबी ऐसी रचनाएं किसी भी रूप में स्वयं को समकालीनता से जोडऩे में असफल रहती हैं और रचनात्मकता के स्तर पर भी, जिसकी पहली शर्त प्रतिभा होती है, कहीं नहीं ले जातीं। इसलिए अचानक नहीं है कि नरेंद्र कोहली को पद्मश्री तो मिला पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं मिल पाया।

लेकिन सरकार की दुविधा कुछ दूसरी ही तरह की है। वह जानती है कि सब कुछ के बावजूद समकालीन भारतीय भाषाओं के साहित्य में ऐसा कुछ नहीं है जो वह अपने हित में इस्तेमाल कर सके। संकट एक मायने में और भी है। वह समकालीन भाषाओं में ऐसे रचनाकारों को चिह्नित करने में भी असफल है जो उसके कार्यकलापों को कलात्मक अभिव्यक्ति दे सकने में समर्थ हों। दूसरे शब्दों में जो पत्रकार कर सकते हैं वह साहित्यकार नहीं कर सकते।  या जो करने को साहित्यकार तैयार नहीं हैं, वह पत्रकार कर सकते हैं।

संवेदनशीलता की एक समस्या यह भी है कि उसे प्रचार और सैद्धांतिक लफ्फाजी देर तक चकमा नहीं दे सकती। राजनीतिक उत्पीडऩ, आर्थिक क्रूरता और दमन से उपजी विद्रूपता को देशभक्ति और धार्मिक मताधंता के बल पर इस दौर में भी लंबे समय के लिए छिपाया नहीं जा सकता।  इसका सबसे बड़ा प्रमाण और ताजा उदाहरण, कहीं और से नहीं स्वयं गुजरात और गुजराती रचनात्मकता के माध्यम से हमारे सामने है। एक मामले में यह इस बात का भी प्रमाण है कि अंतत: लेखक और लेखन छद्म और झूठ को स्वीकार नहीं करता। आप धर्म और संस्कृति की आड़ में समकालीन यथार्थ से बच नहीं सकते। पर गुजरात में यह गोरख धंधा पिछले तीन दशक से अविराम चल रहा है।

इस कोरोना काल में जब लोग दवा और हवा के बिना मर रहे हों, साहित्य के कमांडो तैयार करने की सत्ता की त्वरितता को, लगता है, बढ़ाया 14 पंक्तियों की उस छोटी-सी कविता ने है, जो वर्तमान सरकार कीअसफलताओं का तिलमिला देनेवाला चित्रण है। संयोग से प्रधानमंत्री की मातृभाषा गुजराती ही है और वडनगर से, जहां के नरेंद्र भाई मोदी हैं, अमरेली कोई ज्यादा दूर नहीं है। यह अचानक नहीं है कि गुजराती की यह कविता जंगल की आग बन देखते ही देखते पिछले दो दशकों से प्रचारित गुजरात मॉडल पर भारी पड़ गई है। अंग्रेजी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में रातों रात अनुदित हो देश के कोने-कोने में पहुंची यह कविता अपने आप में एक रिकार्ड है। कम से कम हाल के वर्षों में इतने बड़े पैमाने पर, इससे पहले कोई गुजराती कविता, प्रसारित प्रचारित हुई हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। शायद रचनात्मकता की यही विशेषता है कि वह अक्सर प्रतिकूल स्थितियों में ही दूब की किसी पद दलित और कुचली छोटी सी जड़ से पैदा हो कर बरगद के पेड़ सा विशाल रूप ले लेती है। या किसी रेगिस्तान में उठते छोटे से भंवर का तूफान में बदल जाने का रूप कही जा सकती है। सच कहने वाली रचनाएं किसी सीमा को नहीं मानती हैं। वे अपने लक्ष्य में गाइडेड मिसाइल सी होती हैं जो निशाने पर ढूंढकर वार करती हैं।

स्पष्टत: यह संदर्भ कवयित्री पारुल खख्खर की कविता ‘शव वाहिनी गंगा’ का है जो अमेरी की हैं। उनकी रचनात्मकता का प्रमाण यह है कि वह ‘मोक्षदायिनी गंगा’ को ‘शव वाहिनी’ में बदल देती हैं। वह यहीं पर नहीं रुकतीं। इसके बाद ‘सब कुछ चंगा चंगा’, ‘वाह रे बिल्ला रंगा’ जैसे समकालीन और सुपरिचित (बल्कि काफी हद तक उत्तर भारतीय बाजारू) मुहावरों से कवयित्री ने जो भाव संप्रेषित किए हैं उनकी लक्ष्य वेधता की क्षमता की दाद दिए बिना रह पाना संभव नहीं है। इस छोटी सी कविता का शीर्षक जितना घातक है उससे कम इसका उन्नीसवी सदी के पूर्वाद्ध में हेंस क्रिश्चन एंडरसन की बच्चों के लिए लिखी कहानी ‘सम्राट के नए वस्त्र’ (एंपरर्स न्यू क्लोद्स) के मूल संदेश का जो इस्तेमाल है वह भी अपनी प्रचंडता में कम विराट नहीं है।

ऐसे उदाहरण विश्व साहित्य में ढ़ूंढना मुश्किल नहीं है, जब लेखक वर्ग चरित्र में प्रतिक्रियावादी होने के बावजूद अपनी रचनाओं में जन समर्थन में खड़ा नजर आता हैं। लेखन मात्र आत्मा की आवाज ही नहीं है बल्कि संवेदना और विवेक का भी समन्वय है। पारुल खख्खर के साथ भी लगभग यही हुआ है। कहा जाता है कि वह भाजपा समर्थक हैं या कम से रही तो हैं ही। परंपरावादी गृहणी भी हैं ही। अगर हैं भी तो गुजरात की पिछले तीन दशक की ध्रुविकृत राजनीति में, जिसमें दो दशक पूर्व की भयावह सांप्रदायिकता भी शामिल है, ऐसा होना आश्चर्य की बात नहीं है।

साहित्यिक कृतियां अक्सर ऐसे दौर में अर्थवान हो उठती हैं जब बाकी समाज अपनी चुप्पियों से ही घुटने लगता है। ये रचनाएं अपने समय की नब्ज, संवेदनाओं, हताशाओं, असफलताओं और कामनाओं यानी उस यथार्थ को समेटे होती हैं जिसे सत्ताधारी निजी और उन सरकारी-गैर सरकारी दस्तावेजों तथा आख्यानों-वृत्तांतों के अंबार से ढकने की कोशिश करते हैं, जिनकी प्रामाणिकता ही उनकी अविश्वसनीयता को पैदा करती हैं। याद कीजिए काफ्का के लेखन और हिटलर के फासिस्टी प्रचार को।

 

साहित्य बनाम राजनीति

पर महत्त्वपूर्ण यह है कि पारुल खख्खर की कविता हिंदू धर्म की दुहाई दे कर अपनी राजनीतिक या सामाजिक मंशाओं की पूर्ति करती नजर नहीं आती हैं। सत्य यह भी है कि गुजरात जैसे व्यापारिक-मूल्य हावी, यथास्थिति और काफी हद तक परंपरावादी राज्य में वह उस नेतृत्व की खिल्ली उड़ाती  हैं जिसे विवेकहीन तरीके से अब तक सर्वगुण संपन्न नेता और शासक सिद्ध किया जाता रहा है। नस्ल, जाति और धार्मिक श्रेष्ठताओं की मरीचिकाएं शायद इसी तरह भरमाती हैं।

जैसा कि होता है राजा आसानी से सीखते नहीं हैं। निर्वस्त्रता की स्थिति उन्हें और अधिक दुराग्रही तथा आक्रामक बना देती है। उन्हें अपनी भुजाओं पर, अपने गुप्तचरों पर और अपनी साधन संपन्नता पर, विवेक और संवेदना से ज्यादा विश्वास होता है। और शायद स्मृति पर भी, जो प्रतिशोध और शक्ति प्रदर्शन के लिए बेताब रहती है।

नरेंद्र मोदी सरकार के मन में साहित्य अगर कांटे की तरह चुभता रहा हो तो आश्चर्य नहीं। आज से लगभग छह वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी की जयजयकार के अखंड कीर्तिन से भारतीय आकाश गुंजायमान रहा करता था, उनकी सरकार को पहली चुनौती लेखकों से ही मिली थी। तब 40 के करीब तो साहित्य अकादेमी पुरस्कार ही लौटा दिए गए थे। विरोध करने वाले कुल लेखकों और बुद्धिजीवियों की संख्या अखिल भारतीय स्तर पर हजारो  में थी।

पुरस्कार वापसी की नेत्री नयनतारा सहगल ने लिखा था: ”आज शासकों की विचारधारा फासिस्ट विचारधारा है और यही वह बात है जो मेरे लिए चिंता का विषय है।‘’ आने वाले वर्षों ने उनकी बात की पुष्टि ही की है।  यह बात उन्होंने तब भी यूंही नहीं कही थी। उसी समय दिल्ली से कुछ ही मील की दूरी पर दादरी में अल्पसंख्यकों की निर्मम हत्या हुई थी और गौरी लंकेश, कलबुर्गी व गोविंद पानसरे जैसे रेशनलिस्ट चुनकर मार डाले गए थे। आज तक उनके हत्यारों में से सिर्फ गौरी लंकेश का ही हत्यारा पकड़ा गया है। पिछले सात साल का इतिहास यह है कि भाजपा की हिंदूवादी केंद्र व राज्य सरकारों ने अपने विरोधियों को चुन चुन कर उत्पीडि़त किया है। अपनी सत्ता का जैसा दुरुपयोग इस सरकार ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत किया उसका प्रमाण इस कानून के तहत बंदी लोगों को फहरिश्त है। यही नहीं अल्पसंख्यकों को इरादतन निशाना बनाया गया और सांप्रदायिकता का जमकर इस्तेमाल हुआ। जून माह के मध्यम में दिल्ली के कुख्यात कारागार तिहाड़ जेल से मुक्त हुए तीन युवाओं की जमानत के दौरान न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी इसकी गवाह है।

 

लेखकों को ‘निमार्ण’

इस पृष्ठभूमि में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत वैश्विक नागरिक के दृष्टिकोणवाले 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं को छह माह के प्रशिक्षण के दौरान लेखक बनाने की घोषणा हुई है। पहली खेप में 75 युवा चुने जाएंगे और इन्हें 50 हजार रुपये प्रति माह दिए जाने की योजना के पीछे की मंशा को समझा जा सकता है। वैसे यह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इसके लिए उन्होंने संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की साहित्य अकादेमी को नहीं चुना है। इस योजना का कार्यान्वयन करेगा नेशनल बुक ट्रस्ट। यानी कि वह संस्था जो मूलत: पुस्तक प्रकाशन का काम करती है। साहित्य का प्रकाशन उसके एजेंडे का एक हिस्सा मात्र है, वह भी एक सीमा तक ही। आखिर ऐसा क्यों कि या गया? क्या लेखकों से बचने के लिए? या फिर योजना कुछ और ही है? इन प्रशिक्षित (कमांडो) ‘लेखकों’ को हर छमाही में 75 की खेप को मैदान में उतारा जाएगा तब पारुल खख्खर जैसे लोगों का क्या होगा? फिलहाल तो यह काम गुजराती अकादेमी के अध्यक्ष विष्णु पंड्या जैसे लोग पूरे जोशो खरोश से निभा रहे हैं।

इस माह लेखक बनाने की जिस योजना का अनावरण प्रधानमंत्री ने किया है उसका सीधा संबंध मई के प्रारंभ में प्रकाशित  कविता ‘शिववाहिनी गंगा’ से न हो, कहना मुश्किल है पर यह भी सत्य है कि इसका संबंध साहित्यकारों की पुरस्कार वापसी से निश्चित है। सच यह है कि लेखकों द्वारा छह वर्ष पहले मिली चुनौती की गुस्ताखी का कोई ‘माकूल जवाब’ वह और उनकी सरकार अभी तक नहीं दे पाई है। अब लगता है अपने किसी ‘समझदार’  नौकरशाह की सलाह मान कर प्रति-लेखकों की कमांडो फोर्स खड़ी कर उस पुरानी हसरत को पूरी करने ने का समय आ ही गया है।

पर लेखकों (हिंदी) के लिए अच्छा संयोग यह भी है कि इसी महीने उत्तर प्रदेश सरकार ने भी लेखकों को दिए जानेवाले राजकीय पुरस्कारों की राशि में बड़ी वृद्धि कर दी है। जैसे कि चार लाख के पुरस्कार पांच लाख के कर दिए गए हैं। इसी तरह हर तरह के पुरस्कारों की राशि में, जिन की संख्या 57 है, वृद्धि की है। प्रदेश सरकार ने पुरस्कारों की मद की कुल एक करोड़ 25 लाख की राशि को बढ़ा कर एक करोड़ 62 लाख 50 हजार पर पहुंचा दिया है।

अच्छे दिन, लगता है, आने ही वाले हैं, लेखकों के।

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