किसानों ने आंदोलन की नई जमीन तैयार कर दी

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संघर्ष के छह माह पर  मनदीप पुनिया की रिपोर्ट

किसान आंदोलन के छह महीने बाद जब आप सिंघु या टिकरी जाएंगे तो देखेंगे कि दिल्ली से खुलने वाले हाइवे कायदे से गांव बन गए हैं। हजारों ट्रॉलियों और झोपडिय़ों के बीच टहलते किसान जब्र का जवाब अपने सब्र से दे रहे हैं। यह आंदोलन पसरकर एक विश्वविद्यालय हो गया है, जिसमें कई लाख रहवासी हैं।

 

वह 25 नवंबर, 2020 की सर्द सुबह थी। हरियाणा के किसान दिल्ली जाने के लिए अंबाला में जरनैली सड़क (जीटी रोड) पर जमा हो रहे थे। ट्रैक्टरों के पीछे जुड़ी ट्रॉलियों को तिरपालों से ढका गया था। इन ट्रॉलियों में बिस्तर, चूल्हा-सिलेंडर और राशन जैसी तमाम वे चीजें रखी थीं, जो आगे चलकर किसानों के पक्के मोर्चे के लिए जरूरी थीं। उन ट्रॉलियों में बैठकर जब किसानों के साथ मैं दिल्ली आ रहा था, तो किसान मुझे बार-बार कह रहे थे कि छह महीने का राशन लेकर चले हैं और हम दिल्ली पहुंचकर ही रहेंगे।

लेकिन इन किसानों के पास पहुंचने से पहले मैं हरियाणा पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेडों और खोदी गई सड़कों को देखकर आया था। मुझे उस समय लगा कि किसान पुलिस नाकों के पास जाएंगे, पुलिस के साथ थोड़ा संघर्ष करेंगे और फिर वहीं बैठ जाएंगे, क्योंकि पंजाब के किसान नेता यह फैसला ले चुके थे कि सरकार उन्हें जहां रोकेगी वे वहीं पर बैठ जाएंगे, यानी पंजाब और हरियाणा की सरहदों पर बैठकर आंदोलन चलेगा।

लेकिन किसान नेताओं की इस रणनीति के उलट-पुलट होने में उस वक्त देर नहीं लगी जब 25 नवंबर को हरियाणा के किसानों ने अंबाला में हरियाणा पुलिस का पहला नाका तोड़ डाला और जरनैली सड़क पर उनके ट्रैक्टर दिल्ली की तरफ दौड़ पड़े। उस घटना का वीडियो पूरे हरियाणा और पंजाब में वायरल होने लगा था। उस वीडियो में हरियाणा के नौजवान किसान अपने ट्रैक्टरों से बैरिकेड हटा रहे थे, पुलिस किसानों पर आंसू गैस के गोले और पानी की तेज बौछारें मार रही थी। एकाएक एक नौजवान सर्द मौसम में किसानों पर मारी जा रही पानी की तेज बौछारों को रोकने के लिए वाटर कैनन पर चढ़ गया और पुलिस के हाथ आने से पहले ही पानी वाली टोंटी बंद कर अपने ट्रैक्टर में वापस कूद गया। उस नौजवान का नाम था नवदीप सिंह।

नवदीप ने वाटर कैनन से ट्रैक्टर में मारी उस छलांग का ऐसा असर हुआ कि सभी की नजर किसानों पर आ टिकी। जब जत्था 26 नवंबर की सुबह दिल्ली के लिए निकला, तो नौजवानों ने हरियाणा सरकार के लगाए बैरिकेड तोड़ दिए। 26 नवंबर का सूरज पुलिस नाकों को तोडऩे के लिए ही चढ़ा था। सूरज ढलते-ढलते किसान दिल्ली की सरहद से महज 50 किलोमीटर पहले रुक गए थे।

27 नवंबर की पहली पोह के साथ किसान दिल्ली की ओर बढ़े, दिल्ली पहुंचते ही स्वागत में सिंघू बॉर्डर पर पुलिस के दागे सौ से ज्यादा आंसू गैस के गोले भी वे झेल गए और सूरज ढलते-ढलते अपनी नई रणनीति के साथ दिल्ली की सरहदों पर ही जम गए। सरकार और सरकारी आदमी, किसानों को दिल्ली के बुराड़ी मैदान में बुलाते रहे, लेकिन किसानों ने दिल्ली में घिरकर बैठने की बजाय दिल्ली को घेरकर बैठना उचित समझा।

किसानों के दिल्ली के मोर्चों की छमाही पर आंदोलन का शुरुआती किस्सा इसलिए सुनाया ताकि सनद रहे कि सरकार ने किसानों को दिल्ली तक न पहुंचने देने के लिए कितने जतन किए और किसान उन बाधाओं से कितनी बहादुरी से लड़े।

किसान आंदोलन के छह महीने बाद जब आप सिंघु या टिकरी जाएंगे तो देखेंगे कि दिल्ली से खुलने वाले हाइ-वे कायदे से गांव बन गए हैं। हजारों ट्रॉलियों और झोपडिय़ों के बीच टहलते किसान जब्र का जवाब अपने सब्र से दे रहे हैं। यह आंदोलन पसरकर एक विश्वविद्यालय हो गया है, जिसमें कई लाख रहवासी हैं।

इस छमाही पर मैं किसान नेता सुरेश कोथ से पूछ बैठा, ”क्या प्लान है?’’ पूछने पर उन्होंने बताया कि यहीं जमे रहेंगे। कब तक? जब तक सरकार मान नहीं जाती। नहीं मानी तो? हम या तो जीतकर जाएंगे या हमारी लाशें ही वापस जाएंगी। घरवालों को कहकर आए हैं कि एक हार खरीदकर रख लीजिए। अगर जीतकर वापस गए तो हमारे गले में डाल देना और अगर इस संघर्ष में मारे गए तो हमारी फोटो पर चढ़ा देना।

दिल्ली के मुख्य पांच बॉर्डरों पर मोर्चे अपनी जगह कायम हैं, लेकिन मीडिया से गायब हैं। किसान आंदोलन के बारे में मीडिया ने अब तक कई नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश की है। शुरू से लेकर अब तक मीडिया यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है कि मामला सिर्फ  पंजाब से जुड़ा है, चूंकि पंजाब में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए सारा बखेड़ा उसी का खड़ा किया हुआ है।

पिछले वर्ष मानवाधिकार दिवस यानी 10 दिसंबर को जब किसानों ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की तो मीडिया ने किसानों को नक्सली घोषित कर दिया। इस वर्ष 26 जनवरी को जब किसान लालकिले पहुंच गए तो मीडिया ने किसानों को खालिस्तानी स्थापित किया। मैं मीडिया को हमेशा ‘रूलिंग क्लास टूल’ मानता हूं और मेरी यह धारणा 28 जनवरी की उस रात बहुत मजबूत हुई, जब पुलिस गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों को हटाने के लिए पहुंची थी। उस रात सत्ता के चाटुकार पत्रकार कह रहे थे, ”उखड़ गए किसानों के तंबू।‘’ पत्रकार जब किसानों की बेबसी की तस्वीर दिखाकर मखौल उड़ा रहे थे, उसी समय हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान पंचायत करके दिल्ली मोर्चों के लिए रवाना हो गए थे। अगली सुबह आंदोलनकारी किसानों ने उनके गांव से आए किसानों के हाथ से ही पानी पिया।

खैर, किसान विज्ञापन नहीं देते हैं मीडिया को। विज्ञापन तो सरकार और कॉरपोरेट घरानों से मिलते हैं, इसलिए खबरों की बुनावट का अपना एक पक्ष है और किसानों का अपना। हालांकि सभी को अपनी बात दूर तक पहुंचाने के लिए लाउडस्पीकर और एंप्लीफायर की जरूरत होती है, लेकिन मोर्चे पर डटे किसानों ने दिल्ली के टीवी चैनलों को नमस्ते बोल रखी है। उनके खिलाफ हवा बनाने वाला एक भी टीवी चैनल अपनी माइक आईडी (माइक पर लगी नाम पट्टी) के साथ मोर्चे पर जाकर रिपोर्ट तक नहीं कर सकता है। लेकिन किसानों को यह नहीं पता कि जिन्हें वे उल्टे पैर लौटा रहे हैं, वहां उनकी जगह कोई और घेर रहा है। आंदोलनों के दौरान ऐसा अक्सर होता है कि मीडिया में आंदोलन का चेहरा कोई और होता है, जमीन पर कोई और।

 

सभी पीढिय़ों की साझेदारी

किसान आंदोलन में सभी पीढिय़ां जुटी दिखाई देंगी। आंदोलन की अगुवाई तो बुजुर्ग कर रहे हैं, लेकिन कार्रवाई की कमान उन्होंने नौजवानों की अगली पीढ़ी को दे रखी है। मुझे लगता है कि आंदोलन लोकतंत्र के स्कूल होते हैं और इस स्कूल में बुजुर्ग अपनी अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं। इस आंदोलन में सिर्फ लड़के नहीं, लड़कियां भी शामिल हैं। इसमें सिर्फ छात्र ही नहीं, कलाकार, लेखक-कवि से लेकर समाज का हर एक तबका शामिल है। आम तौर पर किसान के बारे में सोचते ही पुरुष किसान की छवि दिमाग में आती है, लेकिन महिलाओं ने इस आंदोलन में पहली कतार में लड़ाई लड़ी है। बीती 16 मई को हरियाणा के हिसार में महिला किसानों को पुलिस के दमन का सामना करना पड़ा।

मीडिया द्वारा आंदोलन पर यह लेबल लगाया जाता रहा है कि यह आंदोलन संपन्न किसानों का है। नौजवान किसानों के हाथ में टच स्क्रीन फोन है और वे जीन्स पहने हुए हैं। मेरे हिसाब से टीवी में किसान की फटेहाल तस्वीर देखकर जी रहा सामान्य निवासी इस संपन्नता को नहीं समझ पाएगा। वह किसान को फटे-पुराने कपड़े और टूटी चप्पलों में देखने का आदि हो गया है। उसे स्कॉर्पियों, एसयूवी, ट्रैक्टर आदि का दृश्य एकबारगी के लिए अजनबी जान पड़ता है। अरे भाइयों, गांव जाकर देखो, जीन्स पहने हुए नौजवान किसान अपने खेतों में काम करते हुए दिखेगा और वह अपने ट्रैक्टर पर लोक संगीत भी सुनता मिलेगा। खैर, आपके मानसिक चित्र में वह दृश्य क्या पता फिट न बैठे।

मैं यह मानकर चल रहा हूं इस आंदोलन के मुद्दों के बारे में सभी लोगों को पता होगा। इसलिए मैं इसकी राजनीति प्राप्ति पर बात करना चाहूंगा। नब्बे के दशक तक किसान एक राजनीतिक वर्ग के रूप में जिंदा था। लेकिन नब्बे के दशक की शुरुआत से ही इस देश में विभाजनकारी और अस्मितावादी राजनीति के चक्कर में किसान की अपनी पहचान पीछे छूट गई थी। मौजूदा किसान आंदोलन इस बात का संकेत है कि वह दौर एक बार फिर लौट सकता है।

किसानों की उभरती ताकत को खतरा माने बैठे चुनावी राजनीति में सक्रिय लोग, इस आंदोलन को कभी हिंसक घोषित करने में लग जाते हैं, तो कभी किसानों को बर्बर बताने लगते हैं।

26 जनवरी की घटना को इस तरह से प्रचारित किया गया था, जैसे किसानों ने कितना बड़ा गुनाह कर दिया हो। मैं उस दिन किसानों की परेड को कवर कर रहा था। उस दिन जब किसान दिल्ली में घुसे तो दिल्ली पुलिस की गोली से 25 साल के नवरीत सिंह की मौत हो गई। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इस बात से साफ इनकार कर दिया कि नवरीत की मौत पुलिस की गोली से हुई है और उल्टा उन पत्रकारों पर पुलिस ने केस दर्ज कर लिए जिन्होंने यह खबर चलाई थी। देश का मीडिया उस दिन राज्य की हिंसा की बजाय किसानों को हिंसक बताने लगा रहा। मेरे हिसाब से डालमियां को किराए पर दिए गए लाल किले के खाली पोल पर किसान यूनियन और निशान साहिब का झंडा फहरा देना हिंसा नहीं है। बल्कि उस दिन दिल्ली के लोगों ने किसानों का जिस तरह से स्वागत किया, वे तस्वीरें कहीं नहीं दिखाई गईं।

26 जनवरी के बाद शुरू हुई किसानों की गिरफ्तारियों पर भारत के न्यायपसंद लोग भी चुप्पी मारे बैठे रहे। कोई भी मानव अधिकार संस्था उनकी पैरवी करने के लिए तैयार नहीं हुई। मैं खुद दिल्ली के कई संगठनों का फोन करता रहा, लेकिन उन्होंने राज्य के इस दमन चक्र के खिलाफ एक शब्द तक नहीं बोला। असल में तो दिल्ली में जमे एनजीओवादी प्रगतिशीलों को इस आंदोलन की धार से ही दिक्कत है। उनको लगता है कि आंदोलनों को बेचारगी भरा बनाया जाना चाहिए, ताकि लोगों की सहानुभूति मिले, सरकार का भी दिल पसीजे और कुछ मिल जाए। वे शायद यह भूल जाते हैं कि यह लड़ाई लोगों की बेचारगी की तस्वीर दिखाकर 100 में से 2 लेने की लड़ाई नहीं है, बल्कि सौ का सौ हासिल करने की लड़ाई है। बेचारगी की तरफ मोडऩे वाले लोगों को मैदान में संघर्ष करते किसान हिंसक नजर आते हैं। इसके उलट किसानों पर लाठी-डंडे बरसाने वाली पुलिस पर वे  खूंखार चुप्पी साध लेते हैं।

किसान छह महीने से दिल्ली के बॉर्डरों पर बैठे हैं। एक बार सोचिए कि सरकार इन किसानों से पिछले 5 महीने से बात तक भी नहीं कर रही है। मई 26 को आंदोलन की छमाही पर किसानों ने काला दिवस मनाया। दिल्ली के बॉर्डरों पर किसानों ने काले झंडे लहराए और सरकार के पुतले फूंके गए।

यह आजाद भारत का सबसे बड़ा और लंबा किसान आंदोलन है और इस आंदोलन को हम सिर्फ दिल्ली के बॉर्डरों पर लगे किसान मोर्चों तक भी नहीं समेट सकते। इस बीच भारत के अलग-अलग इलाकों से बहुतेरी तस्वीरें आईं जिनमें लोगों ने अपने घरों, वाहनों और ट्रैक्टरों पर किसान यूनियनों के झंडे लगाए हुए हैं। भारत के अधितकर शहरों में किसानों के धरने पॉइंट बने हुए हैं। जब भी संयुक्त किसान मोर्चा कोई आवाज देता है, पूरे देश में वह आवाज गूंजती है। जब किसान चले थे तब उन्होंने कहा था कि वे छह महीने का इंतजाम करके आए हैं। छह महीने पूरे हुए। इस छमाही पर कई लोगों का यह भी कहना था कि इतना लंबा आंदोलन हो गया है, अब किसानों को जो कुछ मिल रहा है उसे लेकर वापस चले जाना चाहिए। लेकिन किसान इन छह महीनों में थके नहीं हैं, इस बात की ताकीद कोई भी कर सकता है जो किसान मोर्चों पर जाकर किसी भी किसान से यह पूछ ले, ”आप कब वापस जाएंगे।‘’ उधर से जवाब आएगा, ”जब ये तीनों कृषि कानून वापस हो जाएंगे।‘’

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