महामारी का विस्फोट

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– सिद्धार्थ

महामारी विज्ञान के सारे विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अभी कोरोना के इस दूसरी लहर का सबसे बदत्तर रूप आना बाकी है।  अनुमान है कि इस लहर का सबसे बदत्तर रूप इस माह के मध्य  तक सकता है, जब प्रतिदिन कमसेकम पांच से छह लाख लोग कोरोना के शिकार हो सकते हैं। इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि कोरोना से घोषित तौर पर संक्रमित लोगों की संख्या में प्रतिदिन हजारों की संख्या में नहीं बल्कि लाखों की संख्या में वृद्धि हो रही है, जबकि जांच की रफ्तार महामारी के फैलाव की तुलना में काफी धीमी है, दस दिनों के भीतर(18 से 27 अप्रैल) कोरोना संक्रमित घोषित लोगों की संख्या 19,29,329 से बढ़कर 29,78,709 हो गई है यानी दस दिन में 10 लाख से अधिक की वृद्धि।

 

राज्य असफल हो चुका है, हम असफल हो चुके हैं, हम सभी असफल हो चुके हैं।‘’

– दिल्ली उच्च न्यायालय

 

कोरोना महामारी के विकराल संकट से हमारा देश जिस तरह कराह और चीख रहा है, असमय मौत के शिकार लोगों की जलती लाशों के धुएं से आसमान का दम घुट रहा है, अपने आत्मीय जनों-परिजनों को लोग खो रहे हैं, उनके रोने-बिलखने और सिसकने-चिघाडऩे की आवाजें कानों के पर्दे फाड़ रही हैं, बीमार परिजनों-आत्मीय जनों के लिए अस्पताल, बेड, दवा और ऑक्सीजन के लिए जिस तरह लोग बेबस और लाचार नजर आ रहे हैं, अपने लोगों को दम तोड़ते देख रहे हैं, लाशों को सम्मानजनक अंतिम विदाई भी नहीं नसीब हो रही है, जो जीवित हैं, वे अपनी और अपने परिजनों की खैर मना रहे हैं। इस सब को किसी शब्द में अभिव्यक्त कर पाना नामुमकिन है। ऐसा भय, ऐसी असुरक्षा, ऐसी अव्यवस्था जीवित स्मृति में याद नहीं पड़ती। लोग वर्तमान से ही नहीं भविष्य को लेकर भी जिस आशिंकित हैं उसने जीवन को नकर में बदल दिया है।

महामारी विज्ञान के सारे विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अभी कोरोना के इस दूसरी लहर का सबसे बदत्तर रूप आना बाकी है।  अनुमान है कि इस लहर का सबसे बदत्तर रूप इस माह के मध्य  तक आ सकता है, जब प्रतिदिन कम-से-कम पांच से छह लाख लोग कोरोना के शिकार हो सकते हैं। इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि कोरोना से घोषित तौर पर संक्रमित लोगों की संख्या में प्रतिदिन हजारों की संख्या में नहीं बल्कि लाखों की संख्या में वृद्धि हो रही है, जबकि जांच की रफ्तार महामारी के फैलाव की तुलना में काफी धीमी है, दस दिनों के भीतर (18 से 27 अप्रैल) कोरोना संक्रमित घोषित लोगों की संख्या 19,29,329 से बढ़कर 29,78,709 हो गई है यानी दस दिन में 10 लाख से अधिक की वृद्धि। प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हो रही है। मरने वालों की संख्या हजारों में पहुंच गई है। मौत के आधिकारिक आंकड़े, कोरोना से हुई वास्तविक मौतों से कई गुना कम हैं, इसकी गवाही श्मशान घाट और कब्रिस्तान दे रहे हैं। सारे विशेषज्ञ कह रहे हैं कि येे आंकड़े वास्तविक स्थिति का बयान नहीं करते हैं।  कोरोना देश के गांव-गांव, कस्बे-कस्बे में पहुंच गया है, जहां न जांच की कोई सुविधा है, न इलाज के लिए अस्पताल।  ज्यादातर जांच और आंकड़े महानगरों और बड़े शहरों तक सीमित हैं, वहां भी जांच करवाना आसान नहीं रहा है। इसके अलावा जांच की अब तक की सबसे विश्वसनीय तकनीक आटी-पीसीआर की सफलता दर भी करीब 60 प्रतिशत है यानी करीब 40 प्रतिशत लोग कोरोना पॉजीटिव होते हुए भी जांच में निगेटिव पाए जा रहे हैं, जबकि स्कैन साफ-साफ संक्रमण की गवाही दे रहा है। इसलिए अधिकांश विशेषज्ञ मान रहे हैं कि कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या आधिकारिक तौर पर घोषित संख्या से तीन-चार गुना अधिक हो सकती है। जब प्रतिदिन अधिकतम दो से तीन लाख कोरोना के शिकार लोगों को समुचित चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने में सरकारें पूरी तरह नाकामयाब हैं, अस्पताल चरमरा गए हैं और लोगों को मरने के लिए उनके भाग्य-भरोसे छोड़ दिया गया है, जब प्रतिदिन करीब छह लाख या इससे अधिक लोग घोषित तौर पर कोरोना के शिकार होंगे और इसके कई गुना अघोषित तौर पर, तब कैसी भयावह स्थिति होगी!

क्या 21 वीं सदी का भारत ब्रिटिशकालीन अकालों और महामारियों (प्लेग- स्पेनी फ्लू) के दौरान हुई अकाल मौतों के भयावह दृश्य को दुहराएगा और हमारे शासक हाथ-पर-हाथ धरे सबकुछ देखते रहेंगे, अपने प्रयासों एवं सफलता की डींग हांकते रहेंगे, इसे प्राकृतिक विपदा कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेंगे और भारतीय जन रो-धोकर चुपचाप सबकुछ बर्दाश्त कर लेगा या वह इस तबाही के जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ खड़ा होगा?

प्रश्न यह है कि इस महामारी और इसकी विकरालता के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या यह प्राकृतिक आपदा है या इसके जन्म और इसके जनसंहारक विस्तार में किसी व्यक्ति, वर्ग, समूह, सरकार और समुदाय-विशेष की कोई भूमिका है। सबसे पहले इस बीमारी के जन्म के सबसे बुनियादी वजह पर अत्यंत संक्षेप में निगाह डालते हैं। कोविड- 19 महामारी वैश्विक पूंजी संचय की पूंजीवादी व्यवस्था का परिणाम है। जिसे जॉन बेलामी फोस्टर और इंतान सुवांडी ने इन शब्दों में अभिव्यक्ति दी है- कोविड-19 महामारी और दूसरी इससे भी ज्यादा खूंखार और तेजी से फैलने में ताकतवर बीमारियों का खतरा हाल के इस साम्राज्यवादी (पूंजीवाद के चरम रूप) विकास का ही परिणाम है। वैश्विक शोषण और लूट की शृंखलाओं ने न केवल पारिस्थितिकी तंत्रों को बल्कि जीव-जंतुओं के पारस्परिक संबंधों में भी उथल-पुथल मचा दिया है और रोगाणुयुक्त विषैले मिश्रण का निर्माण कर रही है। इन सब समस्याओं की जड़ में है- अनुवांशिक एकल संवर्धन के साथ कृषि-व्यवसायी निगमों का आविर्भाव, पारिस्थितिकी तंत्रों की बड़े पैमाने पर तबाही, जिसमें जीव-प्रजातियों के अनियंत्रित मिश्रण बन रहे हैं, प्राकृतिक और सामाजिक सीमाओं को ताक पर रखकर जमीन, जलाशयों, जंगलों, जीव-प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्रों को ‘मुफ्त का माल’ समझकर लूटने पर आधारित है वैश्विक पूंजी संचय की यह व्यवस्था। (मंथली रिव्यू, 2020, वॉल्यूम 72, जून 2020) यानी कोविड-19 महामारी कोई अचनाक और अकारण पैदा होने वाली प्राकृतिक विपदा नहीं है, पूंजीवादी व्यवस्था के मुनाफे की हवस और इसके लिए जरूरी उपभोक्तावादी जीवन शैली का परिणाम है, जिसकी ओर भारत भी बहुत तेजी से बढ़ रहा है। विकास का यही मॉडल भारत के शासक वर्ग का भी आदर्श मॉडल है।

खैर बीमारी क्यों पैदा हुई, कैसे पूरी दुनिया में फैली और कैसे भारत इसका शिकार हुआ, इस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है और बहुत सारे तथ्य सामने आ चुके हैं। कैसे कोरोना की पहली लहर के दौरान भी हमारे प्रधानमंत्री जी भारत के लोगों के जीवन और रोजी-रोटी की रक्षा की जगह अपनी राजनीति चटकाने, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने और कुछ चंद कॉरपोरेट घरानों की तिजोरी भरने में लगे रहे हैं, यह कहानी कई बार दुहराई जा चुकी है। कैसे कोरोना की पहली लहर के दौरान प्रधानमंत्री के मनमानी और अंहकार भरे रवैए के चलते लाखों लोगों के पलायन की दिल दहला देने वाली त्रासदी भारत ने देखी, उस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। आज हमारे सामने प्रश्न यह है कि कोरोना के जिस दूसरी लहर का त्रासदी-भरा परिणाम भारतीय जनता झेल रही है, उसका सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन और क्यों है?

इस प्रश्न के उत्तर पर कमोवेश देश-दुनिया के वे सभी लोग सहमत हैं, जो तथ्यों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं, उनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें काफी हद तक नरेंद्र मोदी के समर्थक के रूप में जाना जाता है। इसमें देश-दुनिया के वे अखबार-पत्रिकाएं भी शामिल हैं, जो कभी मोदी को भारत के उज्जवल भविष्य के कर्णधार के रूप में देखती थीं। सभी एक स्वर से कह रहे हैं कि यदि किसी एक व्यक्ति को इस बार महामारी को फैलाने, उसे विकराल बनाने और लोगों की जान जोखिम में डालने, स्वास्थ्य-व्यवस्था के चरमराने, टीकाकरण की धीमी दर और कोरोना से बचाव के लिए आवश्यक व्यवहार (कोरोना प्रोटोकाल या कोरोना एपरोप्रिएट बिहेवियर, मास्क, भौतिक दूरी और बचाव के अन्य उपाय) के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और ठहराना जाना चाहिए, तो उस व्यक्ति का नाम है- नरेंद्र दामोदर दास मोदी। कोरोना की पहली लहर से निपटने में मोदी की पीठ थपथपाने वाले शेखर गुप्ता ने दूसरी लहर के कहर के बाद ट्वीट किया कि ”मैं 60 के दशक में पैदा हुआ हूं और तमाम संकट देखे हैं, जिसमें 3 युद्ध, खाद्यान्न संकट आदि शामिल हैं, लेकिन ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी। आजादी के बाद का यह सबसे बड़ा संकट है, लेकिन सरकार को इतना निष्क्रिय कभी नहीं देखा, कोई कंट्रोल रूम नहीं, कोई जिम्मेदार नहीं।‘’ कभी मोदी का गुणगान गाने वाले चर्चित लेखक चेतन भगत ने देश में कोरोना महामारी के भीषण कहर के बीच वैक्सीन की कमी को लेकर सरकार पर तंज कसा। कई ट्वीट्स करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि युद्ध जैसी स्थिति है, वैक्सीन की कमी है लेकिन फाइजर और मॉडर्ना जैसी वैक्सिनों को इमरजेंसी-यूज की इजाजत नहीं दी गई। एक ट्वीट में तो उन्होंने कहा कि ”अवैज्ञानिक चेतना के लोग राष्ट्र को बर्बाद कर देते हैं, इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि वे देश पर कितना गर्व करते हैं” (Unscientific minds ruin a nation, no matter how proud they are of that nation.)। 25 अप्रैल को आस्ट्रेलिया के अखबार आस्ट्रेलियन  ”मोदी भारत को वायरस-जन्य कयामत की ओर ले जा रहे हैं” शीर्षक से लिखा कि चुनावों और रैलियों में जुटी हजारों की भीड़, कुंभ मेले में जुटे लाखों लोग और विशेषज्ञों की सलाह की अनदेखी ने भारत को इस कगार पर पहुंचाया है। साथ ही ऑक्सीजन और वैक्सीन की कमी को लेकर भारत सरकार की आलोचना की गई। इस सबके लिए अखबार ने मोदी को जिम्मेदार ठहराया। अखबार ने मोदी को अंहकारी, अंधराष्ट्रवादी और भीड़ की चाहत के भूखे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया और कहा कि इन तत्वों के संयोग और उनके आस-पास अक्षम नौकरशाहों की उपस्थिति का मेल, भारत को वायरस-जन्य कयामत की ओर ले जा रहा है। अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि ”हजारों दर्शकों को क्रिकेट मैचों के लिए स्टेडियम भरने की अनुमति दे दी गई; फिल्म थिएटर खोले गए; और सरकार ने कुंभ मेला जैसे धार्मिक समारोहों की अनुमति दे दी, एक त्योहार जिसमें लाखों हिंदू गंगा नदी में स्नान करने के लिए जुटे।“ ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाले अखबार गार्जियन ने अपने संपादकीय में लिखा कि ”देश की विनाशकारी कोविड-19 की लहर (दूसरी लहर) का मूल कारण भारतीय प्रधानमंत्री का अति-आत्मविश्वास है।ÓÓ उसने यह भी लिखा है- ”उनको (पीएम मोदी को) गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और उन गलतियों को सुधारना चाहिए।“ अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक  लेख के मुताबिक- ”विशेषज्ञों का कहना है कि आत्मसंतोष और सरकार के गलत कदमों ने भारत को एक सफल दिख रही कहानी को (पहली लहर) दुनिया की सबसे बुरी तरह प्रभावित जगहों की तरफ मोड़ दिया। महामारी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि भारत में लगातार नाकामी के वैश्विक प्रभाव होंगे।“ इसमें आगे कहा गया है कि भारत का टीकाकरण अभियान ”लेट-लतीफी और अवरोधों से त्रस्त है।“ विदेशी अखबारों में मोदी की इतनी छिछालेदर हुई की उनके इमेज को दुरुस्त करने के काम में विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर को लगा दिया गया है। उन्होंने विदेशों में स्थित सभी राजदूतों से वर्चुअल बातचीत की और उन्हें संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया, जो एकतरफा तरीके से यह प्रचार चला रहा है कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार कोविड-19 की दूसरी लहर का सामना करने में असफल साबित हुई है, उसका प्रतिवाद करें। इसमें विदेशी अखबारों के साथ उन टीवी चैनलों का भी जिक्र किया गया है, जो मोदी सरकार को असफल दिखा रहे हैं।

दी प्रिंट के संपादक नव-उदारवादी नीतियों के समर्थक और दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाले शेखर गुप्ता भी अपने साप्ताहिक कॉलम ‘नेशनल इंट्रेस्ट’ में मोदी की चिंतन-प्रक्रिया और कार्यप्रणाली को ही भारत में कोरोना संकट की दूसरी लहर की तबाही के लिए जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि सबसे पहली बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी को विशेषज्ञों की जगह वफादार लोग चाहिए, चाहे वह नौकरशाह हो, चाहे वे सलाहकार हों या संवैधानिक सस्थाओं के प्रमुख। तय है कि वफादार लोग हां में हां मिलाने के लिए होते हैं, अपनी विशेषज्ञता के आधार पर सही सलाह देने के लिए नहीं। शेखर गुप्ता ने पूर्व के प्रधानमंत्रियों (चाहे वे किसी पार्टी के रहे हों) का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे पूर्व के प्रधानमंत्री विशेषज्ञों को अपनी सरकार में स्थान देते थे और उनकी सलाह सुनते थे और उसके आधार पर निर्णय लेते थे। इसके विपरीत प्रधानमंत्री मोदी ने अधिकांश विशेषज्ञों को किनारे लगा दिया और उन लोगों को स्थान दिया, जो पहले से उनके प्रति वफादार थे, उनमें कई गुजरात में मोदी के साथ काम कर चुके विश्वसनीय वफादार भी शामिल हैं। जब विशेषज्ञ होंगे नहीं या वे अपनी बात कहने का साहस नहीं रखते होंगे, सही सलाह कौन देगा और यदि सही सलाह नहीं मिली या नहीं सुनी गई तो बर्बादी-तबाही निश्चित होती है। उन्होंने यहां तक कहा कि अक्सर ताकतवर शासक अपने इर्द-गिर्द जी-हजूरी करने वाले लोग ही पसंद करते हैं। इसका एक उदाहरण देते हुए शेखर गुप्ता ने कहा कि यदि मोदी ने रघुराजन या किसी अन्य आर्थिक विशेषज्ञ से सलाह ली होती, तो देश नोटबंदी से हुए आर्थिक तबाही से बच जाता। नरेंद्र मोदी की ताकत और कमजोरी की ओर इशारा करते हुए एक बार रघुराजन ने भी कहा था कि मोदी और उनकी टीम को ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव जीतने तो आता है, लेकिन चुनाव जीतना और सरकार चलाना एक ही चीज नहीं है। इसका निहितार्थ यह था कि मोदी को सरकार चलाने नहीं आता, सिर्फ चुनाव जीतने आता है। बहुत सारे विशेषज्ञ यह कहते हैं कि मोदी और उनकी टीम हेडिंग मैंजेमेंट में ही लगी रहती है।

मोदी के संदर्भ में चाहे अन्य बातों पर जितनी भी असहमति हो, लेकिन एक बात पर सभी सहमत हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में कैबिनेट की सारी शक्तियां अपने पास केंद्रित कर ली हैं, इसके साथ उन्होंने भारतीय राज्य की विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं पर अपना एकछत्र नियंत्रण विभिन्न तरीकों से कायम कर लिया है। राज्यों को भी विभिन्न प्रकार से नियंत्रित करके संघी प्रणाली को काफी हद तक पंगु बना दिया है। भाजपा पार्टी पर तो उनका एकछत्र राज्य है ही। इस स्थिति में पार्टी और सरकार के स्तर पर लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। कहीं से कोई भी ऐसी राय आने की संभावना के दरवाजे बंद कर दिए गए हैं, जो मोदी से असहमति रखते हों। मोदी जनता के वोट से चुने गए एक तानाशाह हैं, जिसे दुनिया की संस्थाओं ने लोकतांत्रिक तानाशाह की श्रेणी में रखा है। मोदी इतने आत्ममुग्ध व्यक्तित्व हैं कि अक्सर ही खुद की पीठ थपथपाते रहते हैं। इस आत्मुग्धता का परिणाम आज देश भुगत रहा है। कोरोना की पहली लहर को थोड़ा कमजोर पड़ते ही मोदी ने कोरोना पर विजय की घोषणा करते हुए, यहां तक कह दिया कि जो काम दुनिया का कोई देश नहीं कर पाया, वह भारत ने करके दिखा दिया। उन्होंने 28 जून को वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम (डावोस) को संबोधित करते हुए कोरोना पर विजय की घोषणा कर दिया। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि ”कई विशेषज्ञ कह रहे थे कि भारत कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देश होगा, लेकिन हमने सभी मुश्किलों पर जीत हासिल की है।“ वैक्सीन के संदर्भ में अपनी पीठ थपथपाते हुए उन्होंने कहा कि ”अभी तो मेड इन इंडिया वैक्सीन दुनिया में आई है। आने वाले समय में कई और वैक्सीन आने वाली हैं। ये वैक्सीन दुनिया के देशों को और ज्यादा बड़े लेवल पर मदद करेगी।“  इसमें वैक्सीन गुरु बनने की भी बू आ रही थी।

भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने भी मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए, कोरोना महामारी पर मोदी के विजय की घोषणा इन शब्दों में की- ”कोरोना संक्रमण के इस विनाशकारी समय में, जब अमेरिका, ब्रिटेन समेत तमाम बड़े और शक्तिशाली देश अनेक तरह के संशय में थे, उस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा, ‘जान है तो जहान है’ और इसी सिद्धांत के आधार पर पूरे देश में लॉकडाउन कर 130 करोड़ भारतवासियों की रक्षा की।“ नड्डा ने आगे कहा, ”प्रधानमंत्री ने 130 करोड़ के आबादी वाले भारत देश को बचाने का काम किया। इतना ही नहीं कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए जिस प्रकार युद्ध स्तर पर तैयारी की गई उसका परिणाम है कि जहां कोरोना संक्रमण के प्रारंभ में मार्च में देश में एक दिन में सिर्फ 15 लोगों के जांच की व्यवस्था थी, वहीं आज देश में एक दिन में 11 लाख तक जांच किए जा रहे हैं।“ भाजपा की केंद्रीय कार्यकारिणी में भी कोरोना पर विजय के लिए मोदी की पीठ थपथपाते हुए प्रस्ताव पारित हुआ।

देशी-विदेशी सभी विशेषज्ञ दबे और खुले रूप में यह कह रहे हैं कि कोरोना पर विजय के बड़बोलेपन-भरे दावे ने भारत में शासन से लेकर जनता तक इस मनोदशा का निर्माण किया कि भारत कोरोना मुक्त हो चुका है, जबकि देशी-विदेशी विशेषज्ञ निरंतर दूसरी लहर की चेतावनी दे रहे थे। जब यूरोप-अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों में करोना की दूसरी लहर अपनी चरम पर थी, यहां तक भारत के भीतर महाराष्ट्र में भी कोरोना अपना कहर बरपा रहा था। उस दौरान प्रधानमंत्री-गृहमंत्री और उनकी पूरी कैबिनेट बंगाल फतेह के अभियान में लगी थी और कुंभ का आयोजन कर रही थी। इस पूरी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अपने आचरण से यह संदेश दे रहे थे कि कोरोना से डरने और इसकी परवाह करने की कोई जरूरत नहीं है। अपनी स्वायत्तता खो चुका रीढ़विहीन चुनाव आयोग कोरोना की चिंता से मुक्त होकर इन नेताओं को कोरोना फैलाने की खुली इजाजत तब तक दे रखा था, जब तक कोलकाता और मद्रास के हाइकोर्ट ने कड़ी फटकार नहीं लगाई। एक तरफ लाशों के अंबार लग रहे थे, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री-गृहमंत्री कोरोना प्रोटोकाल की ऐसी-तैसी करते हुए विशाल रैलियों को मुस्कुराते हुए संबोधित कर रहे थे। जब कोई रास्ता नहीं बचा तब जाकर अंत समय में चुनाव आयोग और प्रधानमंत्री एक साथ जागे और रैलियों पर थोड़ी सी लगाम लगी।

इस पूरे घटनाक्रम को देखकर कोई भी इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने आपराधिक कृत्य किया और आस्ट्रेलियन अखबार के शब्दों में कहा जाए तो देश को वायरस-जन्य कयामत की ओर ढकेल दिया है।

नरेंद्र मोदी के उभार और राष्ट्रीय नेता बनने में नरसंहार, दंगा और ध्रुवीकरण कराने की उनकी क्षमता की मुख्य भूमिका रही है। 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के करीब 5 महीने के अंदर (28 फरवरी, 2002) ही, उन्होंने गुजरात नरसंहार को अंजाम दिया। जिसमें हजारों मुसलमानों का कत्लेआम, खुलेआम सड़कों पर मुस्लिम महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और लोगों को जिंदा जलाया गया। इसके बाद नरेंद्र मोदी हिंदू हृदयसम्राट बने और राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। मुसलमानों का नरसंहार करने और उन्हें उनकी औकात बताने की क्षमता ही वह सबसे पहली और मुख्य योग्यता थी, जिसने उन्हें हिंदुओं के एक बड़े हिस्से का उन्हें चहेता बना दिया। 7 साल तक प्रधानमंत्री रहते हुए जनहित में शासन-प्रशासन चलाने, अर्थव्यवस्था को गति देने, रोजगार देने, भूख-गरीबी कम करने, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था का इंतजाम करने और देश में शांति-सौहार्द और बंधुता बनाने की क्षमता का परिचय मोदी ने नहीं दिया, न उनमें यह क्षमता है। मोदी सिर्फ और सिर्फ विध्वंस और नरसंहार दे सकते हैं। शायद इसी को ध्यान में रखकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वे देश के लिए विध्वंसक साबित होंगे। मनमोहन सिंह की भविष्यवाणी सही साबित हुई, मोदी ने देश को विध्वंस के कगार पर ला खड़ा किया है। भारतीय जन के सामने इस समय का एकमात्र तात्कालिक कार्यभार है, मोदी और उनकी टीम से मुक्ति पाने का उपाय सोचना, क्योंकि सबसे बड़ी इस मानवीय त्रासदी के असल अपराधी वे ही हैं।

जिस एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक ने कोरोना को इतना जानलेवा और व्यापक बना दिया, उसके लिए वे तथाकथित उदारवादी, प्रगतिशील और वामपंथी लोग जिम्मेदार हैं, जो यह कहते रहें कि कोरोना कोई बीमारी नहीं है और न ही कोई वायरस है, बल्कि यह दुनिया के शासक वर्ग, टीका बनाने वाली कंपनियों, दवा कंपनियों, चिकित्सा व्यवसाय में लगी कंपनियों, डाक्टरों और कॉरपोरेट निगमों का मिला-जुला षड्यंत्र हैं और इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। सरकार, सरकारी तंत्र और मुनाफाखोर कंपनियों और डॉक्टरों पर अविश्वास की पहले से मौजूद परिस्थिति ने इस चिंतन-प्रक्रिया और विचार-प्रक्रिया को एक पुख्ता आधार मुहैया कराया। जब करोना की दूसरी लहर से महाराष्ट्र और एक हद तक पंजाब कराह रहा था, तब कोरोना षड्यंत्र है, इस थियरी के प्रस्तोता यह कह रहे थे कि यह सब झूठ सरकार और मीडिया द्वारा फैलाया जा रहा है, ताकि किसान आंदोलन को खत्म किया जा सके। यह सब कुछ करने वालों में सोशल मीडिया के कुछ नामी-गिरामी लोग भी थे, जिनकी बातों पर लोग भरोसा करते हैं। यहां तक कहा गया कि टीका बेचने के लिए बिल गेट्स ये सारे षड्यंत्र रच रहा है, यह भी प्रचार खूब जोर-शोर से किया गया।

एक तरफ मोदी कोरोना पर विजय की घोषणा कर अपनी पीठ थपथपा रहे थे, दूसरी तरफ मोदी-विरोधियों का एक बड़ा हिस्सा कोरोना को सिर्फ षड्यंत्र घोषित कर रहा था। अनचाहे तरीके से दोनों बातों में मेल हो गया। मोदी को नेता मानने वाली जनता और मोदी-विरोधियों को अपना नेतृत्वकारी मानने वाले दोनों इस बात पर एकमत हो गए कि कोरोना-फोरोना कुछ नहीं है, सिर्फ एक डर है। इसी तरह की एक षड्यंत्रकारी थियरी टीके के बारे में भी प्रचारित की गई है, बिना किसी तथ्य या अपवादस्वरूप तथ्यों के सहारे या पूरी तरह अफवाह के आधार पर। इस सबका परिणाम हुआ कि लोग कोरोना संक्रमण के प्रति लापरवाह हो गए और टीके को लेकर बड़े पैमाने पर हिचकिचाहट या विरोध-भाव पैदा हो गया। यानी कोरोना से लडऩे के सभी उपाय संदेह के घेरे में आ गए।

यह तय है कि इस सबके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार सरकार और सरकारी तंत्र है, लेकिन नागरिक समाज के एक हिस्से ने भी अपनी षड्यंत्रकारी थियरी के चलते कोरोना के प्रसार में एक अहम भूमिका अदा की। उनकी मंशा चाहे कितनी ही भली क्यों न रही हो। यह सब कुछ अवैज्ञानिक सोच और दुनिया के सभी वैज्ञानिक और डॉक्टर खरीदे जा सकते हैं और किसी विश्वव्यापी षड्यंत्र का हिस्सा बन सकते हैं, इस तथ्यहीन सोच का नतीजा था। तथाकथित आयुर्वेदाचार्य रामदेव और आयुर्वेदाचार्यों की तरह होमोपैथी के डॉक्टरों और उस पद्धति के समर्थकों के तथ्यहीन दावों ने कितनी जनहानि की यह भी देखा जाना चाहिए। मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं कि कोरोना-फोरोना कुछ नहीं है, ऐसा कहने वालों में कुछ ने अपने अत्यंत आत्मीय जनों को खो दिया है और होमोपैथी में इसका इलाज है, ऐसा कहने वालों में कई लोगों की जान जाते बची और कुछ इसके शिकार हो गए।

अंत में दिल्ली हाइकोर्ट के शब्दों में कह सकते हैं- ”राज्य असफल हो चुका है, हम असफल हो चुके हैं, हम सभी असफल हो चुके हैं।“ मैं सिर्फ इतना ही जोडऩा चाहता हूं कि ईश्वर बहुत पहले ही असफल हो चुका है। भविष्य की एक नई मानवीय दुनिया रचने के बारे में शिद्दत से सोचने और लडऩे का समय बहुत अधिक मनुष्य जाति के पास बचा नहीं है।

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