कोरोना, तुलसीदास और ‘भावी’का खेल

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भारत  के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोविड- 19 से मरने वालों के परिजनों को सांत्वना देने के लिए ‘महाकवि तुलसीदास के जिस दोहे का जाप करने के लिए  सुझाया था वह यह है :

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥

(मुनिनाथ ने बिलखकर कहा – हे भरत! सुनो, भावी बड़ी बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं॥)

किसी लेखक का, समाज विशेष में, बड़ा होना इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितना प्रासंगिक है और हां, किस के हित के लिए ‘रघुनाथ गाथा’ गाता है। दूसरे शब्दों में वह किसी समाज विशेष की सोच, उसके चिंतन और अंतत: उसके हितों तथा जीवन शैली को किस हद तक प्रभावित करता है।

जिस व्यक्ति ने फेसबुक पर इस दोहे को उद्धृत किया था, उसने संदर्भ सहित इसकी जो व्याख्या की वह इस प्रकार थी : ”कोरोना से मौत की सारी जवाबदेही विधाता (ईश्वर) की है, मरना-जीना सब उनके हाथ में है।

”यह आदमी (राजनाथ सिंह) सलाह दे रहा है कि विधाता (ईश्वर) से ही अपने प्रियजनों की हत्या (ऑक्सीजन, वेंटीलेटर, आईसीयू, बेड और डॉक्टर की कमी से हुई मौतों) का हिसाब मांगें, मोदी-अमित शाह और राजनाथ सिंह से नहीं। राजनाथ सिंह ने बताया कि कोरोना का इलाज: ‘रामचरितमानस  का पाठ करो, दवा का काम करेगा’।‘’

कितना सहज और आजमाया हुआ नुस्खा है। संभवत: इसमें यह भी अंतरनिहित है कि अगर मर गए तो संतोष भी वही (आस्था) देगी। यानी आपको संतोष करना भी जाएगा।

भारतीय जनता, विशेषकर उत्तर भारत की वह जनता, जो अपनी दरिद्रता से बचने के लिए सात समुद्र पार दूसरी दुनिया में इंडीज तक पहुंची, उसने रामचरितमानस यानी तुलसीदास को साथ रखा और गुलामों से बद्दतर स्थितियों को भी चुपचाप सहते गए। देख रहे हैं न उनके वंशज आज किस तरह से फलफूल चुके हैं। शायद कहीं यह भी कहा गया है: संतोषम् परम सुखम!

हमें भूलना नहीं चाहिए कि तुलसीदास राम की महिमा के सबसे बड़े गायक हैं। और यह भी महज संयोग नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड  बहुमत दिलवाने में राम नाम की सबसे बड़ी भूमिका रही है।

माक्र्स को दोहराने की जरूरत नहीं है। धर्म अफीम हो या न हो, हथियार तो है ही। उन लोगों के हाथ में जो इसे चलाना जानते हैं। और भाजपा ने सिद्ध कर दिया है कि इसमें उसका सानी नहीं है। स्पष्ट है कि राजनाथ सिंह उसी हथियार का इस्तेमाल कर रहे थे।

पर धर्म की सीमा उसे इससे आगे नहीं जाने देती। धर्म में आधुनिक समाज की चुनौतियों का सामना करने की सामथ्र्य नहीं है। वह हमें न तो आधुनिकता की वह समझ देता है, जो तार्किक और वैज्ञानिक हो और न ही क्षमता, जो इसकी चुनौतियों का सामना करने के लिए समाज को तैयार करे।

पर मसला यह नहीं है। असल में राजनाथ सिंह यह नहीं कह रहे हैं कि विधाता से कुछ मांगे, बल्कि कह रहे हैं कि यह आपकी नियति है। इसलिए अगर सिलेंडर नहीं मिल रहे हैं, दवाएं नहीं मिल रहीं हैं, अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं और हैं भी तो आप को नहीं मिल रहे हैं, या फिर मिल भी गए हैं तो इस भयावह महामारी में जो आदमी के फेफड़ों को जकड़ लेती है, और अगर डॉक्टर कहते हैं कि आपके प्रियजन को बचाने के लिए ऑक्सीजन चाहिए, जो हमारे पास नहीं है, तो आपको सरकार को दोष नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह नियति है। यानी मरना-जीना आदमी के वश में नहीं है।

तब सवाल है अगर ऐसा है तो फिर क्यों अस्पताल हैं? क्यों दवाएं हैं? क्यों स्वास्थ्य मंत्री हैं, क्यों डॉक्टर आदि हैं? सब निरर्थक हैं। क्या 21वीं सदी के तीसरे दशक में होशो हवास में कोई माई का लाल यह कहने की हिम्मत कर सकता है? स्पष्ट है कि यह प्रगति विरोधी, विज्ञान विरोधी और मानव विरोधी विचारधारा है जो आदमी को कुंद करने में निर्णायक साबित होती है।

पर मसला यह नहीं है।

आखिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को विधानसभा के चुनावों के एक वर्ष से भी कम रह जाने के बावजूद क्यों हटाया गया? किस राज्य में हरिद्वार है? महाकुंभ कहां होता है? सामने नजर आती महामारी के बावजूद क्यों कुंभ करवाया गया? इसी तरह जय श्री राम का नारा लगाते हुए बंगाल और असम में किसने धावा बोला है? क्या कुंभ का संबंध बंगाल के चुनाव से नहीं है? पूरा देश कोविड-19 से हाहाकार कर रहा है और भाजपा और उसका नेतृत्व, जो नरेंद्र मोदी की जेब में है, इतने दिनों से वहां क्यों चक्कर मार रहा है? देश का गृहमंत्री कामधाम छोड़ कर बंगाल फतह करने क्यों उतरा हुआ था? साफ है कि एक व्यक्ति है जो चाहता है कि वह पैसे और प्रचार के बल पर लोकतंत्र को हाईजैक कर पूरे देश का एकछत्र शासक बने। यह मंशा किसी मध्यकालीन निरंकुश शासक से कम नहीं है। मोदी सरकार का ध्येय और मंशा न तो देश को बेहतर शासन देना है और न ही एक ईमानदार सरकार, जिसका मुख्य ध्येय जन कल्याण हो।

इस संपादकीय के लिखे जाने के आखिरी दिन की खबरें हैं कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा कोविड संक्रमित देशों में पहुंच गया है। अकेले अप्रैल माह में देश 69,36,034 लोग बीमार हैं। अकेल इसी माह 48,768 मौतें हो चुकी हैं। ये सिर्फ सरकारी आंकड़े  हैं। दुनिया जानती ही नहीं बल्कि कह भी रही है कि ये आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। बल्कि इससे कई गुना ज्यादा हैं। सरकार में न ईमानदारी रह गई है, न ही वह सक्षम है कि इस बीमारी और मौत की सुनामी को आसानी से रोक सके। यह तो अभी दूसरी लहर है। बीमारी की तीसरी लहर आने वाली है, तब क्या होगा? क्या रामचरितमानस का सामूहिक पाठ?

इस सरकार की अकर्मण्यता, अक्षमता और दिशाहीनता देखनी हो तो दिल्ली को देखें जहां केंद्रीय सरकार स्वयं विराजमान है।

दिल्ली में अकेले अप्रैल माह में 5,850 लोग मरे हैं। सिर्फ 24 घंटों में 375 मौतें। यानी प्रतिदिन मरने वालों को औसत 195 हो गया है जो एक माह पहले सिर्फ चार था।

यह क्यों हुआ, इसका बड़ा कारण था कि केंद्रीय सरकार चाहती थी कि दिल्ली की आम आदमी पार्टी की  सरकार की भद्द पिटे, वह नाकारा साबित हो और किसी तरह से उसे हटाया जाए, जो उसकी आंख की किरकिरी बनी हुई है। पिछले ही संसदीय सत्र में ऐसा कानून पास किया गया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री से ज्यादा शक्तिशाली वहां नियुक्त एक नौकरशाह, जो उप- राज्यपाल कहलाता है, वह हो गया है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि जनता द्वारा चुनी सरकार को एक सरकारी नौकर के नीचे कर दिया गया है।  विडंबना देखिये स्वयं उपराज्यपाल ही कोरोना से पस्त पड़ गए हैं।

पर मोदी की ‘खुदीइतनी बुलंद है कि वह नहीं मानते कि वह सर्वशक्तिमान नहीं हैं। पर आज तक ऐसा नहीं हुआ है। उनका बोया जल्दी ही सामने आने वाला है। बड़बोलापन अंतत: नाक रगडऩे को मजबूर करता है। शालीनता, विनम्रता, वस्तुनिष्ठता ही किसी को महान बनाती है। यह काम समाज का है।

साल भर भी नहीं हुआ है जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डाओस में दुनिया के देशों के कर्णधारों के सामने कहा था :  ”साथियो भारत की सफलता को किसी एक देश की सफलता से आंकना उचित नहीं होगा। जिस देश में विश्व की 18 प्रतिशत आबादी रहती हो उस देश ने कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण करके पूरी दुनिया को, मानवता को बड़ी त्रासदी से भी बचाया है।‘’

यह सरकार किस हद तक बड़बोली और आत्ममुग्ध हो सकती है यह भाषण उसका प्रमाण है। इसके बाद वह निश्चिंत हो अपनी विजय यात्रा के अभियानों में जुट गए। आज देश कटोरा लेकर भीख मांग रहा है? बांग्लादेश और श्रीलंका तक ने मदद करने की कोशिश की है। यह मत पूछिए नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले सात साल में क्या किया? सिर्फ हाल के दो समाचारों को ले लीजिए।

पहला 29 और दूसरा 30 अप्रैल का है। 29 के समाचार के अनुसार, पिछले एक वर्ष में अहमदाबाद के एक छोटे व्यापारिक घराने के मालिक गौतम अडाणी की मार्केट कैपिटलाइजेशन कीमत अंबानी और टाटा के बाद तीसरे नंबर पर पहुंच गई है। मार्च, 20 से अप्रैल, 21 तक  सिर्फ  455 प्रतिशत बढ़ी है।

दूसरे समाचार के अनुसार, मुकेश अंबानी के कुल लाभ में गत वर्ष मार्च की तुलना में रिकार्ड 13,227 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है। (दोनों का स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड)

तुलसीदास की चौपाइयों का पाठ करने की सलाह देने वालों से सिर्फ यह पूछा जाना चाहिए, चलो आपने मुख्यमंत्री बदल कर महाकुंभ करने के लिए जो दबाव बनावाया वह माना धर्म के नाम पर था पर यह बतलाइए यह आईपीएल क्या बला है?

पूरा देश त्राहि-त्राहि कर रहा है और आप क्रिकेट का तमाशा किए जा रहे हैं। वह भी दिल्ली महानगर में जहां इस समय देश के सबसे ज्यादा मरीज हैं! जब लोग बेराजगार हैं और पेट भरना मुश्किल हो गया है तो सटोरियों और कालेधन के इस खेल के चालू रखे जाने का क्या कारण हो सकता है?

क्या तुलसीदास ने कहीं किसी चौपाई में इसके बारे में भी कहा है, जिसे जपा जा सके? क्या राजनाथ सिंह बतलाएंगे?

इस लेख के शुरू में जिस पोस्ट का जिक्र है उसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा हुआ है : ”मैं समझता था, यह आदमी थोड़ा कम मूर्ख संघी-भाजपाई है, ये तो मूर्खों का बाप निकला।‘’

पोस्ट हमारे मित्र और लेखक सिद्धार्थ की है जिनकी अंतिम बात से सहमत हो पाना मुश्किल हो रहा है।

हमें इसे मूर्खता कहना उचित नहीं लग रहा है।  क्या इसे धूर्तता नहीं कहा जा सकता?

हमाम में सब नंगे हैं।

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