प्रासंगिकता और प्रतिबद्धता के सवाल

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  • नवीन पाठक

साहित्य अकादेमी पुरस्कार  और साहित्य के सरकारीकरण की सीमाएं

 

कहना चाहिए हिंदी के पुरस्कार, को लेकर जो हंगामा मचा है वह अकादेमी की दुर्दशा के साथ ही साथ हिंदी साहित्यिक बिरादरी की इस संस्था के प्रति दोचित्ती मानसिकता का भी नतीजा है। सारी बहस दो ध्रुवों में बंट गई है। पर जिस बात पर दोनों पक्ष सहमत नजर आ रहे लगते हैं वह है पुरस्कारों का महत्त्व। वे मान रहे हैं कि पुरस्कार होने चाहिए। उनकी उपयोगिता है। वे यह भी, परोक्ष रूप से ही सही, मान रहे हैं कि साहित्य की केंद्रीय अकादेमी किसी भी रचना के मामले में अंतिम है, फिर उसके निर्णायक चाहे जैसे भी हों। यानी कुल मिलाकर आपत्ति इस बात की है कि उस पर नियंत्रण किस का है? स्पष्ट है कि इधर भाजपा समर्थक या उनकी विचारधारा से सहमत लोगों का है। इसलिए जो लोग उसका विरोध कर रहे हैं वे पुरस्कृत कृति की गुणवत्ता से तो सहमत हैं, असहमत हैं तो इस बात पर कि पुरस्कार क्यों लिया जा रहा है।

आश्चर्यजनक यह है कि उनका सरोकार यह नहीं है कि इस तरह की कोई भी संस्था स्वायत्त और स्वतंत्र होनी चाहिए। उस पर सरकार का किसी भी रूप में नियंत्रण नहीं होना चाहिए। और अगर होना चाहिए तो फिर आपत्ति किस बात की? अकादेमी केंद्रीय सरकार की है और सरकार पर भाजपा विराजमान है।

अप्रासंगिक हो चुकी सोवियत दौरकी शैली की इस अकादेमी के आज के अस्तित्ववादी संकट का मूल कारण क्या यही नहीं है? आज जो हो रहा है तत्कालीन सरकारों को उसके लिए दोषी माना जाना चाहिए, इस अर्थ में कि जो ढांचा बनाया गया वह कहने को स्वायत्त था पर उस पर अप्रत्यक्ष ही सही केंद्रीय सरकार का नियंत्रण भी बना रहा। यहां तक कि उसमें लेखकों के प्रतिनिधित्व की जो प्रक्रिया है उससे बेहतर ललित कला अकादेमी में है जिसमें प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव होता है। समयांतर में इस पर लिखा जा चुका है कि साहित्य अकादेमी में अगर सीधा प्रतिनिधित्व हो तो उसका संभावित क्या तरीका हो सकता है।

चूंकि आज उसके प्रतिनिधि अधिकांशत: विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों के संस्थानों से नामित आचार्य गण होते हैं, परिणाम स्वरूप इस पर आचार्यों का शाश्वत कब्जा हो चुका है। यहां तक कि (महाबलियों – एक हिंदी, दूसरा उर्दू) नामवर सिंह और गोपीचंद नारंग उसी कोटे के तहत अकादेमी को चलाते रहे। समय के साथ एक ओर हिंदी विभागों पर औसत लोगों की तादात हर दिन बढ़ती गई, दूसरी ओर विश्वविद्यालयों पर सरकारों के हिसाब के रंगदारों का नियंत्रण। उसका एक कारण केंद्रीय अकादेमी में प्रतिनिधित्व भेजने का अधिकार राज्यपालों और कुलपितयों का होना भी रहा है। इसका सीधा असर साहित्य अकादेमी के प्रतिनिधित्व पर देखा जा सकता है।

वैसे अकादेमी में गैर सरकारी साहित्यिक/लेखक संगठनों का भी प्रतिनिधित्व होता है। पर अफसोस की बात है कि कोई भी वामपंथी संगठन का इसमें आज तक कभी प्रतिनिधित्व नहीं हुआ है। कम से कम इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह कि आखिर वामपंथी लेखक संगठनों का अकादेमी में कभी कोई प्रतिनिधित्व क्यों नहीं रहा है? इसका बहुत ही सामान्य सा तकनीकी कारण है। वह यह कि कोई भी लेखक संगठन सोसाइटी एक्ट में पंजीकृत नहीं है, इसलिए वह स्वयं ही बाहर हो जाता है। पर ऐसा क्यों है? इसलिए कि उसे सोसाइटी एक्ट, जैसे कि अपने संगठन के समय पर चुनाव करवाना, ऑडिट करना आदि मानने पड़ते हैं। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि विधानसभाओं और लोकसभा का चुनाव लडऩे वाले, राज्य की और केंद्र की भी सरकारें चलाने वाले, अपनी यूनियनों को पंजीकृत करने वाले, वामपंथी दल लेखक संगठनों को रजिस्टर करवाने से क्यों बचते हैं? नतीजा, उनका सरकारी और संवैधानिक साहित्यिक संस्थाओं और गतिविधियों में प्रतिनिधित्व नहीं है।

चूंकि आप साहित्य अकादेमी में या फिर सरकार की अन्य तथाकथित स्वायत्त संस्थाओं में जो हो रहा है, उसे इनके संरचनात्मक गठन की खामियों को समझे बिना नहीं जान सकते। इसलिए किसी एक पुरस्कृत को चुटिया पकड़ कर घुमाने से दबंगई का आनंद तो मिल सकता है पर असली गड़बड़ समझ में कभी नहीं आ पाएगी।

दूसरे शब्दों में, सच यह है कि आज जो लोग साहित्य अकादेमी को नियंत्रित कर रहे हैं वे सब उसी कानूनी तरीके से आए हैं जिस तरह से पहले वाले आया करते थे। यद्यपि यहां उन पर सवाल नहीं उठाया गया है पर यह समझना भी जरूरी है कि आज जिनका पुरस्कारों के लिए चयन हुआ है वह उतना ही सही या गलत है जितना कि इससे पहले मिले किसी भी लेखक का। फिलहाल जो है उस पर बात करें।

 

हिंदी भाषा और समाज का संबंध

हिंदी देश की सबसे बड़ी भाषा है यानी उसके बोलने वाले सबसे ज्यादा हैं। अब मसला यह है कि अगर हिंदी सबसे बड़ी भाषा है तो फिर सरकारी पुरस्कारों के लिए इतनी हाय-तौबा क्यों है? क्यों हिंदी के पाठक और आलोचक यानी उसका अकादमिक पक्ष किसी रचना के महत्त्व में निर्णायक नहीं है? एक सरकारी संस्था क्यों है? यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस पुरस्कार के साथ जो राशि प्रदान की जाती है वह कभी कोई ऐसी बड़ी नहीं रही है जिसके लिए सरकारी अफसर, प्रोफेसर या वरिष्ठ पत्रकार जान लड़ा दें।

तो फिर?

कारणों की बात करें।

नंबर एक, हिंदी समाज में साहित्य का महत्त्व नहीं के बराबर हो चुका है। चूंकि साहित्य का स्कूल-कॉलेजों के बाहर पढऩा-पढ़ाया जाना लगभग नाममात्र का रह गया है इसलिए रचनाकारों को स्वयं को लेखक सिद्ध करने के लिए वैसाखियों की जरूरत पड़ती है। अब तो आलम यह है कि हिंदी के अधिसंख्य दैनिक पत्र साहित्य पर अपने कॉलम खराब करना मूर्खता मानते हैं। हाल ही में ज्ञानपीठ संस्थान की साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय का प्रकाशन स्थगित कर दिया गया है। कहा नहीं जा सकता कि उसका प्रकाशन होगा या नहीं। यह सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि जब निजी प्रयत्नों से निकलने वाली छोटी-छोटी साहित्यिक पत्रिकाएं महीनों पहले लौट चुकी हैं, इतनी बड़ी संस्था को क्या दिक्कत हो सकती है। पर हिंदी जगत सोशल मीडिया में मस्त है। पाठकों को छोडि़ए लेखक समाज तक में सन्नाटा है। इधर साहित्य की हिंदी में जो पत्रिकाएं रह गई हैं, वे पहले भी कभी आत्मनिर्भर नहीं थीं पर दूसरे तरीकों से ‘संतुलनÓ बनाए हुए थीं। अब तो खैर संकट और भी बढ़ गया है। अस्तित्व के इस संघर्ष में जो हो रहा है उसका विकृत रूप रह-रह कर सामने आ रहा है जिसे इन पत्रिकाओं में छपे विज्ञापनों से समझा जा सकता है।

चूंकि साहित्य के पाठक ही नहीं रहे हैं, इसलिए पाठक केंद्रित मंच भी नहीं रहे हैं। जो  हैं, वे लेखक संगठनों के हैं और राजनीतिक पार्टियों की छत्रछाया में चलते हैं। इनमें वाम संगठन जो अब तक सबसे ज्यादा सक्रिय रहे, अब उल्टी सांस ले रहे हैं। यह बड़ा तथ्य है कि केंद्र और लगभग पूरे उत्तर भारत में धुर दक्षिणपंथियों के शासन के बावजूद उनके साहित्यिक संगठनों के लिए बड़े लेखकों को अपने साथ ले पाना शायद ही कभी संभव हो पाएगा। यही कारण है कि उनके संगठनों से तब भी, जब वे विपक्ष में थे, साहित्यकार मुश्किल से ही जुड़ पाते थे। जब कि विपक्ष के साथ रहना लेखकों के लिए सदा आकर्षित करने वाला होता है। रचनात्मकता मूलत: यथास्थिति के साथ नहीं जाती। यह भी कम बड़ी विडंबना नहीं है कि वामपंथी संगठनों में भी सबसे कम लेखक पिछले कई दशकों से ऐतिहासिक प्रगतिशील लेखक संगठन के साथ हैं। इसके दो कारण नजर आते हैं। एक स्वयं सीपीआई के प्रभाव का घटना और दूसरा इसका लगातार सत्ताधारी कांग्रेस के निकट रहना माना जा सकता है। आपातकाल में भी इसी ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया था जब कि अन्य, विशेषकार वामपंथी संगठनों के लेखक, जेलों में थे।

पर आज विद्यमान तीन वामपंथी लेखक संगठनों की अपनी ही किस्म की सीमाएं हैं। इनके कर्ताधर्ताओं के लिए लेखक होना कभी भी जरूरी नहीं रहा है। बहुत हुआ तो वे प्राध्यापक/ओलचक टाइप के लोग रहे हैं इसलिए लेखकों को भी काडर मान कर चलते हैं। यह अचानक नहीं है कि सबके अपने-अपने लेखक और अपने-अपने आलोचक हैं। हां, पाठक/श्रोता कमोबेश एक हैं। इनसे बाहर जो वामपंथी हैं फिर वे चाहे जो भी हों, इन संगठनों को स्वीकार्य नहीं हैं। अपवाद हो सकते हैं, पर जैसा कि कहा जाता है, अपवाद ही नियमों को सिद्ध करते हैं। दक्षिणपंथियों का हाल तो और भी बुरा है। इस जमात में इधर प्रतिभाहीनता का विस्फोट ही हो चुका है।

इस परिदृश्य में क्या होना था? यही न कि लेखक उन मंचों की तलाश करें जो उन्हें प्रतिष्ठित और सम्मानित करें। चूंकि ऐसे मंच अब केंद्र और राज्य सरकारों के पास रह गए हैं, इसलिए लाइन इन संस्थानों के बाहर लगी है।

यह भी बड़ा तथ्य है कि अकादेमी से बाहर के पुरस्कार और भी गए गुजरे हैं फिर चाहे वे राज्य सरकारों के हों, ज्ञानपीठ के हों, बिड़ला फाउंडेशन के हों या उर्वरक उत्पादक इफको द्वारा दिया जाने वाला दस लाख का पुरस्कार। हमारे समाज कहिए या देश का दुर्भाग्य यह है कि इसका कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो राजनीति की महामारी से बचा हुआ हो। महामारी मात्र विचारधारा की नहीं है बल्कि जाति, धर्म और क्षेत्रीयता की भी है। जिन लोगों को इससे बचना चाहिए था, यहां राजनीति का मतलब दलीय राजनीति से है, वे खुद छुटभईये राजनेताओं के पिछलग्गू हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इनमें से किसी भी पुरस्कार की तुलना पुलित्जर या बुकर जैसे पुरस्कारों की विश्वसनीयता से नहीं की जा सकती। यहां नोबेल की बात इसलिए नहीं की जा रही है क्योंकि यह पुरस्कार यद्यपि शुरू से ही विवादास्पद रहा है पर इधर खासा अविश्वसनीय भी हो गया है।

वातावरण में फैली बेचैन सड़ांध के मूल में सबसे आगे स्वयं साहित्य अकादेमी की विश्वसनीयता है, दूसरा लेखकों द्वारा अकादेमी पुरस्कार को दिए जाने वाले महत्त्व (तिकड़म) को लेकर है। इसमें इधर एक और तथ्य को भी जोड़ा जा सकता है, वह है सत्ता में भाजपा का होना। बल्कि कहना चाहिए इस तथ्य ने आग में घी का काम किया है। पहले तथ्य को लें।

संयोग यह है कि फिलहाल जो पार्टी सत्ता में है, जैसा कि सर्वविदित है, उसका साहित्य और कलाओं से जो नाता है वह खासा विवादास्पद है। इसलिए यह दोहराना मजबूरी है कि वह साहित्य की मूल समझ और अवधारणा के ही विपरीत जाता है। यही कारण है कि दक्षिणपंथियों के साथ अच्छे लेखक/कलाकार नजर ही नहीं आएंगे। पर जहां तक अकादेमी की प्रशासनिक या चयन प्रक्रिया का सवाल है, यह बिना किसी शंका के कहा जा सकता है कि उसमें कोई परिर्वतन इस सरकार ने नहीं किया है। शायद उसे कोई जरूरत ही महसूस नहीं हुई है।

सत्य यह है कि साहित्य अकादेमी अपनी संरचना में जिस तरह की कमियों की जकड़ में है और जिसे हक्सर रिपोर्ट के बावजूद किसी भी सरकार ने नहीं सुधारा, हां लीपा-पोती जरूर हुई है, उन्हें सुधारे बिना इस अकादेमी की न तो विश्वसनीयता को बचाया जा सकता है और न ही उसे प्रासंगिक बनाया जा सकता है।

पर सवाल है इस संरचना में सुधार क्यों नहीं किए गए? यह सवाल जितना जरूरी है उतना ही बेचैन करने वाला है। एक वाक्य में कहें तो इसलिए कि दरबारियों और सिपहसालारों की जागीरें चलती रहें। नामवर सिंह से लेकर नारंग तक क्या करते रहे? कमलेश्वर जैसे लोग क्या अचानक चोबदार बने? 2015 में देश में बढ़ती सांप्रदायिकता को मुद्दा बना कर पुरस्कार वापसी का जो अभियान चला था उसके एक साल बाद ही ‘वामपंथीÓ नामवर सिंह ने जब साहित्य अकादेमी का फैलो बनना स्वीकारा तब किसी ने क्यों नहीं उनका विरोध किया? यह भी कम मजेदार नहीं है कि उन्होंने स्वयं कभी साहित्य अकादेमी का अध्यक्ष बनने का प्रयत्न नहीं किया, पर वह हिंदी की सूबेदारी कस कर संभाले रहे और तब तक रहे जब तक हिंदी की जागीरदारी को कोई चुनौती नहीं दे पाया। इस संदर्भ में यह प्रसंग भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि हिंदीवालों ने 1998 में हिंदीवाले के खिलाफ काम किया और उडिय़ा के रमाकांत रथ को जितवाया। वो तो कहिए ‘विधाताÓ ने हिंदी की दुर्दशा पर रहम खाया और ऐसे हालात बने कि पहला हिंदीवाला अकादेमी के बनाए जाने के छह दशक बाद अध्यक्ष के आसन पर विराजमान हो पाया। इसी तरह क्या कोई बता सकता है कि महाश्वेता देवी क्यों और किसके कारण हारीं?

 

रिकार्ड जब बनते हैं

इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि लंबे समय तक अकादेमी पर कथित वामपंथी लेखकों, बल्कि कहना चाहिए आलोचक या आलोचकों, का कब्जा रहा। उनका नेता जिस तरह की हूक लगाता सारे सियार उसी तरह की हुआ-हुआ करने लगते थे। लेखक रातों-रात जरूरत के मुताबिक बड़े और छोटे कर दिए जाते थे। दलित लेखकों का कहना भी इस संदर्भ में शत-प्रतिशत सही है कि साहित्य की संस्थाओं पर ऊंची जातियों का अखंड कब्जा भारतीय जीवन के अन्य क्षेत्रों से कुछ ज्यादा ही कड़ा रहा है। इसलिए यह संयोग नहीं है कि आज तक एक भी दलित को कम से कम हिंदी में पुरस्कार लायक नहीं पाया गया है। कोई जरनल बॉडी या कार्यकारिणी का सदस्य बना हो यह और भी मुश्किल है। ओमप्रकाश वाल्मीकि को अब भुना रहे लोगों ने पहले कभी क्यों नहीं कहा कि उनकी आत्मकथा मील का पत्थर है और उसे पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसी तरह तुलसीराम की भरपूर प्रशंसा करने वालों ने उन्हें वामपंथी होने के बावजूद पुरस्कार के योग्य नहीं माना। क्या इसमें उनका दलित होना आड़े आया होगा? संयोगवश सुदामा पाण्डे धूमिल के संग्रह को उनके देहांत के चार वर्ष बाद पुरस्कृत किया गया था। जहां तक नियमों का सवाल है, हमें भूलना नहीं चाहिए कि उन्हें आदमी ही तो बनाते हैं और आदमियों के लिए ही बनाते हैं। (कम से कम यह तो नहीं भुलाया जा सकता कि आदमी-आदमी में अंतर होता है और भारतीय समाज से बेहतर इसे कौन जानता है!) इसी तरह का एक चरम उदाहरण है जबकि हिंदी के छोटी उम्र के लेखक को पुरस्कार दिए जाने के संदर्भ में यह अफवाह रही कि उस दौर के संयोजक को उनकी हीरक जयंती पर 75 हजार की थैली चढ़ाई गई थी।

कुल मिलाकर असली मुद्दा यह है कि क्या कोई पुरस्कार फिर चाहे सरकारी हो अथवा निजी क्षेत्र का, उसका देश की सबसे बड़ी भाषा के संदर्भ में क्या कोई अर्थ रह गया है? क्या उसे वाकई रचना के महत्त्व को पहचानने का मानक माना जा सकता है? हिंदी के ही कई बड़े लेखक जैसे कि फणीश्वरनाथ रेणु, राजेंद्र यादव, कृष्ण बलदेव वैद, शैलेश मटियानी, शेखर जोशी और गुलशेर खान शानी को तो पुरस्कार योग्य कभी पाया ही नहीं गया। मन्नू भंडारी को अब क्या ही मिलेगा, सवाल रहेगा कि संजीव, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम, कात्यायनी, असद जैदी को भी क्या अब मिल पाएगा? और संयोग से अगर मिल भी गया तो लगता है यशपाल की तरह ही मिलेगा। इनमें से सब कमोबेश आठवें दशक में चल रहे हैं।

मन्नू जी 90 वर्ष की हो रही हैं। दूसरी ओर श्रीलाल शुक्ल (पीसीएस) को रागदरबारी के छपने के अगले ही वर्ष यानी 1969 में अकादेमी दे दिया गया था तब उनकी उम्र थी 45 वर्ष। अशोक वाजपेयी (आईएएस) को 1994 में सम्मानित किया गया था तब वह 43 वर्ष के थे। अल्का सरावगी को जब 2001 में पुरस्कृत किया गया वह 41 वर्ष की थीं। संभवत: हिंदी की अब तक की, सबसे कम उम्र की रिकॉर्ड होल्डर वही हैं।

 

नया विवाद

इस पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया में इस वर्ष के साहित्य अकादेमी के हिंदी पुरस्कार को लेकर जो विवाद हुआ है वह इस मामले में महत्त्वपूर्ण है कि इस मंच पर लाग-लपेट कम देखने को मिलता है यद्यपि अक्सर अति होते भी देर नहीं लगती। इस वर्ष अर्थात 2020 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार कवयित्री अनामिका (टोकरी में दिगंत : थेरीगाथा 2014) को उनके कविता संग्रह पर प्रदान किया गया है। विडंबना यह है कि वह कविता के लिए पुरस्कृत होने वाली पहली महिला हैं। यानी आधुनिक मीराबाई मानी जाने वाली महादेवी वर्मा को भी यह पुरस्कार नहीं मिला था। पर इस मंच की प्रतिक्रियाएं इस बात को लेकर नहीं हैं कि उन्हें पुरस्कार क्यों मिला, बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों के हक में उन्होंने इसे अस्वीकार क्यों नहीं किया? इस प्रक्रिया की अनदेखी करना इस मायने में हानिकारक है कि अपनी आक्रामकता और अराजकता के बावजूद सरोकार मानवीय हैं और अभिव्यक्ति स्वत:स्फूर्त और काफी हद तक ईमानदार है। इसलिए उसके प्रतिनिधिक अंशों पर बात करना स्थिति को और वस्तुगत ढंग से परखने में सहायक हो सकता है। इसलिए भी कि ये वृहत्तर लेखकीय व पाठकीय प्रतिक्रियाएं हैं।

कवयित्री और एक्टिविस्ट कविता कृष्ण पल्लवी ने अनामिका को अकादेमी पुरस्कार मिलने पर फेसबुक में लिखा है : ”यूं तो सत्ता के इन साहित्यिक प्रतिष्ठानों से पुरस्कृत होना ही किसी की प्रगतिशीलता के लिए मैं एक लांछन और कलंक मानती हूं, लेकिन एक घनघोर आतताई बर्बर फासिस्ट सत्ता के दौर में भी जो लोग सत्ता और पूंजी के प्रतिष्ठानों से पुरस्कृत होकर धन्यभाग महसूस करते हैं उन्हें तो मैं हत्यारों का दरबारी और इतिहास का अपराधी मानती हूं।‘’

यह ‘स्टैंड’ निश्चय ही अतिवादी है, इस पर भी अपनी स्पष्टता के कारण स्थिति के दूसरे पक्ष को समझने में मददगार है। यह वक्तव्य इस नतीजे पर पहुंचाता है कि कोई भी सरकारी और पूंजीपतियों के प्रतिष्ठानी पुरस्कार नहीं लिए जाने चाहिए।

पर हम सब जानते हैं कि हिंदी समाज, जो भी हो सरकारी पुरस्कारों से तो भरा हुआ है। दस राज्य तो पूरी तरह हिंदी के हैं ही, इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल की सरकारें भी राष्ट्र भाषा हिंदी को साहित्य के लिए पुरस्कार प्रदान करती हैं। अगर आप कहते हैं इन्हें लेना नहीं चाहिए तो बात ही खत्म है, फिर किसी तरह के गुणात्मक अंतर का क्या अर्थ रह जाता है। इसके बाद रोने-पीटने का भी कोई मतलब नहीं है। कोई पुरस्कार किस को मिला है, किसने लिया है, किसने दिया है, इससे क्या फर्क पड़ता है?

सवाल है क्या वास्तव में ऐसा है? क्योंकि पुरस्कार एक सीमा तक ही सही हिंदी पाठक को प्रभावित करते हैं और लेखकों के बारे में जैसा भी हो, एक प्रभा मंडल बनाने में सहायक होते ही हैं।

दूसरा मत, जो ज्यादा व्यावहारिक है, वह है: ”क्या अनामिका को साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेना चाहिए? यह सवाल इसलिए उठाया गया है : असहिष्णुता के उत्तरकाल में साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की कोई नैतिक अपील बची भी है?ÓÓ

मजेदार यह है कि ये दोनों ही पक्ष विरोधाभासों से भरे हैं। अगर कोई मानता है कि ”सत्ता के इन साहित्यिक प्रतिष्ठानों से पुरस्कृत होना ही किसी की प्रगतिशीलता के लिए…लांछन’’ है तो फिर किसी एक या दूसरे को गरियाया ही क्यों जाए। या फिर…? ”…असहिष्णुता के उत्तरकाल में साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की कोई नैतिक अपील बचीÓÓ नहीं है तो चिंता किस बात की?

सवाल यह भी है कि क्या लेखक इतने मूढ़ और असंवेदनशील हैं कि जो आप कह रहे हैं वह उन्हें पता ही न हो? जब हम किसी लेखक को लेकर यह सवाल उठा रहे हों कि उसने इस ”असहिष्णुता के उत्तरकाल में’’ पुरस्कार क्यों लिया तो हमें यह भी तो मालूम होना चाहिए कि उसका पूर्व काल में पुरस्कारों को लेकर क्या दृष्टिकोण था? सरकार और सत्ता को लेकर क्या दृष्टिकोण था/है और वह विचारधारा में कहां खड़ा/खड़ी रहा/रही है? और क्या इससे पहले शुरू के दो एक दशक छोड़ दें तो इस पुरस्कार की कोई नैतिक अपील थी भी?

दूसरी बात यह है कि लेखक वास्तव में अपने लेखन और सामाजिक स्टैंड के लिए ही जाना जाता है। वह कोई अफसर, इंजीनियर-डाक्टर किस्म का एलीट सामाजिक प्राणी, राजनीतिक नेता या व्यापारी तो होता नहीं है, जिस पर हर चीज के लिए नैतिक दबाव डालने की आवश्यकता हो। अगर वह सामाजिक मुद्दों पर ही स्टैंड नहीं लेता तो समझ लीजिए वह यह किसी मासूमियत में नहीं कर रहा है, तब सवाल है ऐसे में हमारे पास लेखक के सामाजिक व्यवहार को मापने का क्या पैमाना बचता है? सीधा सा उत्तर यह हो सकता है कि हम ऐसे में स्वयं को उसके लेखन तक ही सीमित रखें, बशर्ते कि वहां कुछ हो।

यदि साहित्य और बौद्धिक समाज किसी लेखक में ऐसे मूल्य नहीं पैदा कर पाया हो, जो व्यापक सामाजिक संदर्भ में स्वीकार्य हों तो फिर दोष देने का अर्थ रह जाता है? वैसे भी हिंदी का कोई लेखक ऐसा नहीं है जो किसी भी रूप में वृहत्तर हिंदी समाज में किसी तरह का असर रखता हो। उसके पुरस्कार लेने या न लेने से समाज का कुछ घटता- बढ़ता नहीं है। पुरस्कार कुल मिलाकर एक और डिग्री जोडऩा है। फिलहाल तो हालत यह है कि दिल्ली के ही अधिसंख्य अखबार इस वार्षिक अनुष्ठान का समाचार छापने तक की जहमत नहीं उठाते। वृहत्तर समाज का इससे क्या सरोकार हो सकता है, कल्पना की जा सकती है।

वैसे यह अचानक नहीं है कि आज तक एक भी हिंदी लेखक ने, कम से कम साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेने से मना नहीं किया है। बल्कि अक्सर उन लोगों तक पर, जो विचारधारात्मक रूप से वामपंथी दलों और लेखक मंचों से जुड़े रहे हैं तिकड़मबाजी के आरोप लगते रहे हैं। इसके बाद उन्हें बचाने के लिए बाकायदा कंपेन चलाए गए हैं। यद्यपि ऐसा नहीं है कि हर पुरस्कार तिकड़म का ही नतीजा हो पर दुर्भाग्य से हिंदी पुरस्कारों का जो सिलसिला रहा है उसका संबंध किसी सामाजिक आदर्श, वैचारिक प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत गरिमा से तो क्या ही रहा है।

इस संदर्भ में अगर देखा जाए तो पुरस्कार वापसी भी एक तरह से नाटक ही रहा है। वह ‘वापसी’ था, यह तब सच होता जब उन लेखकों ने कम से कम पुरस्कार की राशि को किसी भले काम के लिए या फिर एक वैकल्पिक पुरस्कार के लिए दे दिया होता? अंतराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे कई पुरस्कार हैं। अगर इस तरह के झमेले में नहीं पडऩा था तो भी यह हो सकता था कि यह राशि मानवाधिकारों को समर्पित एमनेस्टी इंटरनेशनल, पीयूडीआर जैसी किसी संस्था को दे दी जाती। ऐसा कहीं कुछ नहीं हुआ। चेक भेजे गए पर अकादेमी ने उन्हें लेना नहीं था, सो नहीं लिया। यानी पैसा लेखकों के ही पास रहा और ‘टोकनिज्म’ पूरा हो गया। और भी भयावह यह हुआ कि इनमें से कुछ लेखकों ने जाति-बिरादरी, क्षेत्रीयता, धार्मिक प्रतिबद्धता और निजी स्वार्थों के दबाव में प्रच्छन्न नहीं परोक्ष रूप से मनपसंद ‘नेताओंÓ का पक्ष लेना शुरू कर दिया। प्रमाण के तौर पर सोशल मीडिया ही तलाशा जा सकता है।

वैसे इस मंच की जीवंतता देखने लायक है। कई बार ऐसा लगता है मानो जो जितना आक्रामक है, जितना अनभिज्ञ है, उतना सफल है।

इसी तरह की एक मनोरंजक पोस्ट एक मोहतरिमा ने पुरस्कारों को लेकर लिखी कि ”मैं तो आपातकाल में पैदा नहीं हुई थी।ÓÓ यह बात आज के जमाने में क्या कम मजेदार है? स्पष्ट है कि इतिहास का हर कोई व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शी नहीं हो सकता। इसलिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन कब पैदा हुआ। बीसवीं सदी तो इतिहास की सबसे ज्यादा रिकॉर्डेड सदी है। फिर मोहन जोदाड़ो पर तो बात हो नहीं रही है कि पूरी बात किसी को पता नहीं हो। इसलिए अगर कोई 20वीं सदी की किसी सार्वजनिक घटना पर बात करते हुए कहता है कि मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं पैदा नहीं हुआ था तो वह या तो बहाना कर रहा है या फिर बेमतलब की पैंतरेबाजी का प्रदर्शन।

खैर, उन्होंने आगे कहा कि ”सन (19)75 से (19)77 के बीच 21 महीने आपातकाल रहा। इस बीच साहित्य अकादेमी ने तीन धुर वामपंथियों, प्रगतिशीलों को सम्मानित किया और उसके बाद भी करते रहे। आसपास के पांच नाम तो ये रहे: 1975 भीष्म साहनी, 1976 यशपाल, 1978 भारतभूषण अग्रवाल, 1979 सुदामा पाण्डेय धूमिल।‘’

पर दिक्कत यह है कि अगर उन्होंने विकिपीडिया ही देख लिया होता, जो हर स्मार्ट फोन में हर समय उपलब्ध है और निश्चित तौर पर उनके पास वह है, तो उन्हें पता चल जाता कि वामपंथियों के कई धड़े हैं। उन्हें हिंदूवादी सांप्रदायिकों की तरह भगवा झंडे के नीचे एक नहीं किया जा सकता है। उनके दो धड़े माओवादी और माकपा आपातकाल का विरोध कर रहे थे और उनके काडर और नेता भाजपा से ज्यादा बड़ी संख्या में जेलों में थे। कम्युनिस्टों का एक धड़ा जो सीपीआइ कहलाता है आपातकाल का समर्थन कर रहा था, ठीक उसी तरह जिस तरह वह मोहतरिमा आज अघोषित आपातकाल का ही नहीं बल्कि घोर सांप्रदायिक और रूढि़वादी दल की भक्त हैं। भीष्म साहनी और शमशेर बहादुर सिंह भी उसी धड़े से थे। जहां तक यशपाल का सवाल है वह इतने बीमार थे कि कोई भी निर्णय स्वयं लेने की स्थिति में नहीं थे। पुरस्कार वितरण से तीन महीने पहले ही उनका देहांत हो गया था। सुदामा पांडेय धूमिल के बारे में बताया जा चुका है कि उन्हें पुरस्कार मरने के दो साल बाद दिया गया। आखिरी बात, आपातकाल 1977 के शुरू में ही समाप्त हो गया था।

इसी तरह का एक सवाल अकादेमी से यह भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर जब 2010 में, सन 1975 के चासनाला की दुर्घटना पर गढ़ी गई कहानी को ‘उपन्यासÓ के रूप में परोसा गया तो अकादेमी के निर्णायक क्या सो रहे थे? क्या वह कहानी और उपन्यास का अंतर भी नहीं जानते थे? जबकि कहानी लोकप्रिय पत्रिका हंस के एक ही अंक में प्रकाशित हुई थी और उस पर वहज-बेवजह चर्चा हुई थी। यहां ध्यान रखने की बात यह है कि तब हिंदी के संयोजक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी थे जो गोरखपुर के थे और कम से कम वामपंथी तो बिल्कुल नहीं थे, न हैं। स्पष्ट है कि पुरस्कार के नाम पर किए गए इस फ्रॉड में साहित्य अकादेमी के साथ लेखक और प्रकाशक भी शामिल थे। इसलिए भीष्म साहनी और यशपाल पर अंगुली उठाने वाले आदर्शवादी (संघी) वीरों को इस बात का जवाब देना चाहिए कि जब इतनी बड़ी धांधली हो रही थी, तब किसी ने क्यों आवाज नहीं उठाई? क्या इसलिए कि हमारे सारे निर्णय, हमारी कथित प्रतिबद्धताएं, हमारे निजी हित, भाई-भतीजावाद, जाति, धर्म, क्षेत्रीय प्रतिबद्धताएं और राजनीतिक दबावों से निर्धारित होते हैं।

वैसे आश्चर्य यह है कि जिस लेखक पर विवाद है, न तो उसके लेखन पर बात की जा रही है और न ही उसकी पक्षधरता पर। यह सही है कि अनामिका का कथित वामपंथी साहित्यिक हल्कों में आना जाना रहा है पर आज भी, हिंदूवाद के इस चरम काल में, हिंदी साहित्य के वामपंथी साहित्यकारों और उनकी रचनाओं से किसी भी लेखक पाठक के लिए बच पाना संभव नहीं है। सच तो यह है कि कम से कम पिछले आठ दशक ऐसे हैं जो वामपंथी रचनाकारों के बिना चरम दरिद्र नजर आएंगे। पर जहां तक अनामिका का सवाल है ऐसा कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रमाण नहीं है जो उन्हें किसी भी रूप में वामपंथ से जोड़ सकता हो। हां, वह घोषित रूप से ‘नारीवादीÓ जरूर हैं पर यह आवश्यक नहीं कि भारतीय नारीवादी अनिवार्यत: एंटी स्टेब्लिशमेंट भी हों ही। और उनका नारीवाद वह नारीवाद भी नहीं है जो भारतीय स्त्रियों के रोजमर्रा के दमन, शोषण और अमानवीयकरण के इर्दगिर्द रचा गया हो।

भाजपा के नेताओं और उसके समर्थकों को जान लेना चाहिए कि भजनिये और कीर्तनिये साहित्य नहीं रच सकते वह सिर्फ सत्यनारायण की कथा  या जय जगदीश हरे… की ही रचना कर सकते हैं। ज्यादा प्रतिभाशाली हुए तो रामकथा-महाभारत ‘रिटोल्ड’ हो जाएगा। इसलिए वास्तविक साहित्यकार उनके लिए सरदर्द बने रहेंगे। चुनौती कहना गलत होगा।

वैसे भी यह 21 वीं सदी है। इसलिए एक क्रांतिकारी सुझाव केंद्रीय अकादमियों को लेकर यह हो सकता है कि इनका भी उसी तरह निजीकरण कर दिया जाए जिस तरह सरकार नागरिक उड्डयन, रेल, टेलीकॉम, शिक्षा वगैरा-वगैरा का कर रही है। सारा झंझट ही मिट जाएगा।

 

अद्यतन 15 अप्रैल 2021

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