किसान आंदोलन का आत्म-संघर्ष

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  • ज्ञानेंद्र सिंह

दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसान आंदोलन एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और कृषि मंत्री किसानों से संवाद का दिखावा भी अब बंद कर चुके हैं। 200 से ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी है लेकिन देश की चुनी हुई सरकार के लिए इन जिंदगियों की कोई कीमत नहीं है। किसानों की मांगों पर गौर करने की बजाय वह आईएमएफ, वल्र्ड बैंक और डब्ल्यूटीओ में अपनी प्रतिबद्धताओं और अपने कॉरपोरेट मित्रों के मुनाफे को लेकर ज्यादा संवेदनशील दिखाई दे रही है। सरकार के इशारे पर गोदी मीडिया जहां किसानों को तरह-तरह से बदनाम और कलंकित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं सरकार तथाकथित ‘स्थानीय लोगोंÓ के जरिये शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कायराना हमले करवा रही है और पुलिस-प्रशासन के दम पर उन्हें आतंकित करने और डरा-धमकाकर भगाने की कोशिश कर रही है।

26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली में हुई अफरातफरी के बाद सरकार ने शेषनाग की तरह अपने 101 फनों से किसान आंदोलन पर हमला बोला। जहां गोदी मीडिया ने लाल किले में तिरंगे के तथाकथित ‘अपमानÓ को लेकर राष्ट्रवाद की लहर पैदा करने और किसानों और राष्ट्र में से एक का चुनाव करने की मुहिम चलाई, वहीं पुलिस-प्रशासन और गुंडा-तत्वों के दम पर बलपूर्वक धरनों को उठाने की कोशिश की गई। सबसे जोरदार हमला गाजीपुर बॉर्डर पर किया गया जो कि उस समय तक अपेक्षाकृत कमजोर समझा जा रहा था। 27 जनवरी की रात जब ऐसा लग रहा था कि गाजीपुर का मोर्चा टूट जाएगा, किसान नेता राकेश टिकैत की एक भावुक अपील ने पासा पलट दिया। बिखरी हुई सेनाएं रातों-रात मोर्चे पर वापस लौट आईं। अगले दिन मुजफ्फरनगर में आयोजित महापंचायत ने किसान आंदोलन के एक नए चरण का सूत्रपात किया।

पंजाब की सीमाओं से निकलकर जब किसान आंदोलन ने दिल्ली की तरफ कूच किया था तब तक हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसका कोई खास प्रभाव नहीं था। हरियाणा में विरोध की छिटपुट की घटनाएं हुई थीं, लेकिन व्यापक किसान आबादी आंदोलन के प्रति उदासीन बनी हुई थी। लेकिन जब हरियाणा के भीतर होते हुए

आंदोलनकारी दिल्ली की तरफ बढ़े और दिल्ली बॉर्डरों पर मोर्चे बनाकर डट गए, तो उनके हौसले, जुर्रत और जुझारूपन ने हरियाणा में एक नई जागृति पैदा कर दी। हरियाणा सरकार के अडिय़ल रवैए और पानी के बंटवारे के नाम पर फूट डालने की कोशिशों ने इस आग में घी का काम किया और धीरे-धीरे पूरे हरियाणा में आंदोलन फैल गया, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश अभी भी इस उथल-पुथल से अछूता था। 28 जनवरी की किसान महापंचायत और उसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में हुई महापंचायतों के साथ आंदोलन का न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से फैलाव हुआ है, बल्कि अब यह आंदोलन किसानों की गरिमा और उनके आत्मसम्मान का भी सवाल बन गया है।

खेती-किसानी के पेशे की गरिमा और किसानों के आत्मसम्मान का सवाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिंदू और मुसलमान किसानों और खासकर हिंदू और मुसलमान जाट किसानों को एक मंच पर ले आया है। जब महेंद्र सिंह टिकैत के साथी रहे किसान नेता बाबा गुलाम मोहम्मद जौला ने मुजफ्फरनगर की महापंचायत के मंच पर हिंदू जाटों को 2013 के दंगों में मुसलमानों को मारने की गलती स्वीकार करने के लिए कहा तो उन्होंने हाथ उठाकर अपनी गलती मानी। यह एक बेहद महत्त्वपूर्ण शुरुआत थी जिसके भीतर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा बदलने की संभावनाएं छिपी हुई हैं। इसे भांपकर जहां एक ओर तमाम विपक्षी पार्टियों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं, वहीं दूसरी ओर डरी हुई सत्ताधारी पार्टी अपने स्थानीय एमपी/एमएलए को इलाके में भेजकर अपनी खोई हुई जमीन को फिर से हासिल करने की हताश कोशिश करती नजर आ रही है।

किसान आंदोलन के इस वर्तमान उभार के अगुआ पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के जाट किसान हैं और उनकी खाप-पंचायतें ही इसे आगे बड़ा रही हैं। यह उभार कितना स्थाई होगा, और किसान आंदोलन को दूरगामी तौर पर कितनी ताकत दे पाएगा, अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तो तय है कि इसने किसानों के एक बड़े हिस्से के बीच किसान की उनकी पहचान की जिंदा कर दिया है, जो उनकी जातिगत और धार्मिक पहचान के नीचे कहीं दबती चली गई थी। जाट-समाज के भीतर चल रहे इस आत्मसंघर्ष को समझने के लिए हमें उन आर्थिक-सामाजिक कारकों पर एक नजर डालनी होगी जिन्होंने आज की परिस्थिति की पैदा किया।

जाट कबीले सिंध के रास्ते भारत के उत्तर पश्चिमी हिस्से में आए और पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में फैले। सिंध के ब्राह्मण चाचवंश के शासन में उनकी हैसियत शूद्रों की थी। कालांतर में वे पशुपालक कबीले और चरवाहों के रूप में अपने पशुओं के साथ नदियों के किनारे-किनारे फैलते गए। मध्ययुग के मुगल शासन के दौर में इन इलाकों के गांवों का संगठन हुआ जिनकी अर्थव्यवस्था खेती और पशुपालन पर आधारित थी।

इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार, मुगलकाल में रहट, तांत और दूसरी तकनीकों के इन इलाकों में विस्तार ने जाटों को चरवाहों से एक खेतिहर जाति में बदला और धीरे-धीरे उनकी आर्थिक-सामाजिक हैसियत ऊपर उठने लगी। औरंगजेब के शासन काल में गड़मुक्तेश्वर से जाटों के एक बड़े विद्रोह की शुरुआत हुई जिसकी परिणति जाटों को जमींदारी मिलने और फिर भरतपुर के जाट राज्य के रूप में हुई।

इस तरह 17वीं और 18वीं सदी में ही जाट अपनी शूद्र की पहचान छोड़कर एक क्षत्रिय के रूप में अपनी पहचान पर जोर देने लगे, और इसके लिए उन्होंने विभिन्न पौराणिक आख्यानों के साथ अपने संबंधों के मिथक गडऩे शुरू कर दिए। जाट के रूप में उनकी नई पहचान एक काल्पनिक गौरवशाली अतीत पर आधारित थी- उन्होंने पौराणिक ऋषियों, राजवंशों और देवताओं से जोड़कर खुद को शुद्ध आर्यरक्त और क्षत्रिय मानना आरंभ कर दिया और मुगल शासकों, अंग्रेजों, सवर्ण जातियों के खिलाफ खड़ी एक ताकत के रूप में निचली जातियों के हिंदुओं से ऊपर वर्ण-व्यवस्था में खुद को स्थापित करने की कोशिश की। इस संघर्ष में आर्य समाज ने उनकी मदद की जो धार्मिक रीति-रिवाजों के मामले में कुछ हद तक तर्क की इजाजत देता था। जाटों की इस सामाजिक कुंठा का फायदा मुगलों से लेकर ब्रिटिश शासकों तक सभी ने उठाया और उन्हें एक मार्शल कौम घोषित किया। आज भी जाटों के परिवारों से फौज में जाने वालों की कमी नहीं है।

 

खेतीकिसानी की स्थिति 

जाट पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों की तरह नहीं हैं। उन्हें अपने खेत से प्यार है और पूरा परिवार खेत में मेहनत करने में गर्व महसूस करता है। आजादी के बाद जमींदारी के उन्मूलन, सूदखोरों और पटवारियों के चंगुल से मुक्ति और हरित क्रांति से मिले नए बीजों और खादों का प्रयोग कर जाट किसानों ने अपनी मेहनत के दम पर उत्पादकता के नए कीर्तिमान कायम किए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका आज पूरे उत्तर प्रदेश के आधे खाद्यान्नों का उत्पादन करता है। 1980 के दशक तक आते-आते हरित क्रांति के प्रभाव से पैदा हुई खुशहाली ठहराव की शिकार हो चुकी थी। उत्पादकता में वृद्धि नहीं हो रही थी। परिवारों के टूटने से जोतें छोटी होती जा रही थीं। हरित क्रांति के बाद खेती के मशीनीकरण और खाद-बीज, कीटनाशक आदि के रूप में जहां खेती की लागत बड़ती जा रही थी वहीं जोतों के इस विखंडन से निवेश के लिए पूंजी कम होती जा रही थी। ठीक उसी समय देश में निजीकरण, वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियां अपना ली गईं और किसानों को बाजार के हवाले कर दिया गया। खेती में सब्सिडी की कटौती से लागत बडऩे लगी और सरकारी खरीद न होने के चलते फसल के सही दाम मिलने की कोई गारंटी नहीं रही- इसने इलाके की कृषि अर्थव्यवस्था को संकटग्रस्त कर दिया। खेती मुनाफे का सौदा अब नहीं रह गई और जिनके लिए संभव था वे दूसरे धंधों, शहरों और कस्बों की ओर रुख करने लगे।

उदाहरण के लिए मुजफ्फरनगर जिले को लें जो इस इलाके का एक केंद्रीय प्रतिनिधि जिला है। 1971 में जिले की 86.14 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी जबकि 2011 में यह घटकर 71.25 रह गई। इस दौरान गांव की आबादी जहां औसतन लगभग 20 प्रतिशत की दर से बड़ी है वहीं शहरों की आबादी 80 के दशक में लगभग 100 प्रतिशत और उसके बाद लगभग 36 प्रतिशत की दर से बड़ी है। 1991 में मुजफ्फरनगर में 57.34 प्रतिशत सीमांत किसान और 21.42 प्रतिशत छोटे किसान थे जिनकी जोत का औसतन आकार क्रमश: 0.5 हेक्टेयर और 2.08 हेक्टेयर था। लेकिन 2010-11 तक आते-आते सीमांत किसानों की संख्या 69.63 प्रतिशत और छोटे किसानों 17.54 प्रतिशत हो गई और उनकी जोत का औसत आकार घटकर 0.37 हेक्टेयर और 1.39 हेक्टेयर रह गया। 10 एकड़ से बड़े किसानों की संख्या 1.29 प्रतिशत से घटकर केवल 0.11 प्रतिशत रह गई।

परिवारों के बंटवारे के चलते खेती के लिए परिवार के लोगों की उपलब्धता घट गई और किसानों को बाहर से मजदूर लगाने पडऩे लगे। जहां 1966-69 में मध्यम और खुशहाल किसानों के परिवारों में भी 70 प्रतिशत तक पारिवारिक श्रम का इस्तेमाल होता था और केवल 30 प्रतिशत काम मजदूरों से करवाया जाता था। वहीं अब 5 से 10 हेक्टेयर वाले किसानों में मजदूरों की मांग बड़ी है जिससे मजदूरी और महंगी हो गई है। खेती में मशीनों के प्रयोग ने भी लागत को बड़ाया है। परिणामस्वरूप, मुजफ्फरनगर जिले में खेती से जुड़े लोगों में कृषकों का प्रतिशत जो 1981 में 49.76 प्रतिशत था और 1991-2001 के बीच लगभग 45 प्रतिशत पर स्थिर था तथा 2011 में तेजी से घटकर 37.19 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर, खेत मजदूरों का प्रतिशत 2001 में 23.64 प्रतिशत से बड़कर 28.56 प्रतिशत हो गया। इस बदलाव की बड़ी वजह खेती का अलाभकारी होते जाना और गैर-कृषि व्यवसायों में बड़ी हुई आय है। 2001 में जहां गैर कृषि व्यवसाय से औसत प्रति व्यक्ति आय कृषि से औसत प्रति व्यक्ति आय की 1.64 गुनी थी, वहीं 2011 में यह बड़कर 1.91 गुनी हो गई।

 

सामाजिक ढांचे में बदलाव

गांवों की अर्थव्यवस्था में आ रहे ये बदलाव उसके सामाजिक ढांचे को भी बदल रहे थे। पहले जहां खेती ‘उत्तम पेशा’ मानी जाती थी और खेती के लिए जाट लोग नौकरी को ठुकरा दिया करते थे, वहीं अब अपने अनुभव से उन्होंने देखा कि नौकरी करने वाले या उन किसान परिवारों की, जिनमें से कोई एक भाई नौकरी करता है, स्थिति बेहतर है। यहां तक कि निचली जातियों के लोग जिन्होंने शहरों में लुहार, बड़ई, धोबी या नाई की दुकान खोली ली थी, उनसे बेहतर स्थिति में चले गए हैं। गांव में ‘लगी तो दो पैसे की भी अच्छी’ जैसे मुहावरे इस बदलाव को अभिव्यक्त करते हैं। निजीकरण और वैश्वीकरण की बाजार आधारित जो नई व्यवस्था बन रही थी, उसमें खेती-किसानी से ज्यादा निजी दक्षता, उच्च शिक्षा या पूंजी के आधार पर जगह बनाई जा सकती थी, जो एक आम जाट किसान परिवार के पास नहीं थे। जाटों के ओबीसी कोटे में आरक्षण के लिए गठित कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  2001 में 92 प्रतिशत जाट परिवार जमीन से जुड़े थे और 89 प्रतिशत प्राथमिक उत्पादन के कामों में लगे थे। केवल 1.7 प्रतिशत ग्रेजुएट थे, 0.7 प्रतिशत पोस्ट ग्रेजुएट और 0.3 प्रतिशत पेशेवर प्रशिक्षण प्राप्त थे। उनसे बेहतर तो वे निचली जातियों के लोग साबित हो रहे थे जो कुछ हुनर जानते थे और शहरों और कस्बों में अपना भाग्य आजमा रहे थे। जाटों के इलाके में हाथ की दस्तकारी के अधिकांश काम मुसलमान करते थे और मुजफ्फरनगर और शामली के ग्रामीण इलाके में उनकी आबादी 40 प्रतिशत तक थी।

रीयल इस्टेट या प्रापर्टी के धंधे से भी कुछ जाट परिवारों ने अच्छा पैसा कमाया लेकिन ये  वही लोग थे जो या तो बड़े किसान थे या पहले से नौकरीपेशा थे। इलाके में अधिकांश नए रोजगार कंस्ट्रक्शन से जुड़े दिहाड़ी के कामों में पैदा हो रहे थे जिसे करने में जाटों की ‘क्षत्रिय’ की झूठी पहचान बाधक थी, इसलिए इन रोजगारों का फायदा भी गांव की दलित और दूसरी निचली जातियों ने ही उठाया। इस तरह 80 के दशक से शुरू हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट ने गांव के सामाजिक ढांचे को हिलाकर रख दिया। जाटों की गांव के चौधरी की सामाजिक हैसियत को चुनौती देते हुए निचली जातियों के लोग, जिनमें अधिकांश मुसलमान थे शहरों और कस्बों में जाकर बसने लगे और उनकी आर्थिक हैसियत जाट किसान से बेहतर होने लगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 10 बड़े जिलों, जहां जाटों की 95 प्रतिशत से ज्यादा आबादी रहती है, के 6 बड़े शहरों और 154 में से 103 कस्बों में आज बहुतायत आबादी मुसलमानों की है।

खुद जाटों के भीतर भी वर्ग-भेद बहुत तेजी से बड़ा है। जहां एक ओर छोटे और बड़े किसान की आय की खाई बड़ती गई है, वहीं दूसरी ओर पांचवें वेतन आयोग के आने के बाद नौकरी पेशा लोगों की आर्थिक हैसियत तेजी से बदली है और गांव की संस्कृति में भी पैसे का बोलबाला हो गया है, सादगी और जगह उपभोक्तावादी संस्कृति ने ले ली है। जिन जाट परिवारों में कोई सरकारी नौकरियों में लग गया था, उनकी हैसियत बदल गई है, ऐसे ही परिवारों के लोग शहरों और कस्बों में दुकान खोलकर या भट्टे लगाकर या किराए पर मकान/दुकान उठाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं और शहरों/कस्बों में बस गए हैं।

 

शहरों और कस्बों में पलायन

1980-90 के दशक से बड़े पैमाने पर हुए जाटों और गैर जाट निचली जातियों के लोगों के शहरों और कस्बों में हुए इस पलायन ने इन नए धनाढ्यों को गांव की पहचान से अलग पहचान दी है- वे खुद को शहरी मध्यवर्ग का हिस्सा मानते हैं और शहर की संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं और नए लोगों और समूहों के साथ अंतरक्रिया कर रहे हैं, जो इनके शौक, भाषा, रीति-रिवाज, प्रतीक, नैतिकता और राजनीतिक रुझान सभी कुछ को प्रभावित कर रहे हैं। उनकी पहचान, सपने और आकांक्षाएं बदल रही हैं। शारीरिक श्रम से कटने के बाद वे स्वाभाविक तौर पर योग और ध्यान की हिंदू संस्कृति की ओर खिंचे जा रहे हैं। नई संचार तकनीक और मनोरंजन तकनीक – टीवी, व्हाटसएप, फेसबुक, ट्विटर इत्यादि ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। गांव के लोगों के साथ उनके संबंध अभी भी हैं लेकिन वे पहले जैसे रोजमर्रा के घनिष्ठ संबंध नहीं हैं। शादी-ब्याह और ऐसे ही किसी और मौके पर जब वे गांव जाते हैं तो अपनी इस नई हैसियत का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते जिसे देखकर गांव वालों के दिल पर सांप लोटने लगते हैं। इससे परिवारों, रिश्ते-नातों और जातियों में गैर-बराबरी, ईष्र्या और परस्पर द्वेष और प्रतियोगिता की भावना बड़ी है जिसका परिणाम प्राय: जमीन के लिए झगड़ों, अधिकारों की दावेदारी, झड़पों और तनावों के रूप में सामने आता रहा है लेकिन गांव के सामाजिक ढांचे के विघटन और शहरों की अर्थव्यवस्था के स्वतंत्र होने के कारण गांव की पंचायतें इन विवादों का निपटारा करने की क्षमता और हैसियत खोती चली गई हैं।

पिछले तीन दशकों में अर्थव्यवस्था में कृषि के घटते हुए योगदान के कारण जहां गांवों ने अपनी हैसियत खोई है वही कस्बे और शहरों में चकाचौंध बड़ी है। कृषि से जुड़े त्यौहारों में उत्साह घटा है लेकिन दूसरी ओर हिंदू कर्मकांडों, त्यौहारों, धार्मिक जुलूसों-सभाओं और शहरों के मंदिरों में भीड़ बड़ती जा रही है। मुसलमानों के इज्तिमा और तब्लीगी जमात के कार्यक्रमों में भी भीड़ बड़ रही है। गांव से शहरों में गए लोग इस भीड़ के सबसे सक्रिय तत्व हैं जिन्होंने अपनी नई पहचान के तौर पर इन्हें अपनाया है। जाटों के इलाके में प्रचलित कहावत ‘जाट का क्या हिंदू और मेव का क्या मुसलमान’ एक परंपरागत हिंदू एवं मुसलमान जाट किसान की जिंदगी में हिंदू धार्मिक कर्मकांड की हैसियत स्पष्ट करती है। लेकिन शहरों और कस्बों में बसे ये जाट और मुसलमान इस पहचान को छोड़कर अपने-अपने धर्म के प्रतीकों के झंडे उठाकर चल रहे हैं।

 

जाट राजनीति

आजादी के बाद की पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट राजनीति ने चौधरी चरण सिंह जैसे कद्दावर नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई, जिन्होंने मौजूदा व्यवस्था के भीतर न सिर्फ जाटों बल्कि दूसरी मध्य जातियों के किसानों के भी हितों को आगे बड़ाया। लेकिन जमींदारों, सूदखोरों, पटवारियों और आड़तियों के चंगुल से निकलकर और हरित क्रांति का फायदा उठाकर उभरे गांव के नव-धनाढ्य वर्ग की आकांक्षाएं और सपने जल्द ही शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के साथ गलबहियां करने लगे जिससे किसान की पहचान और उनकी मांगों को लेकर विभ्रम और बिखराव की स्थिति बनने लगी। चरण सिंह और उनकी पार्टी के पास किसानों को जमींदारों और सूदखोरों के चंगुल से निकालने के बारे में तो स्पष्ट कार्य योजना थी लेकिन नवधनाढ्य वर्ग के उदय से कृषक जातियों में लगातार बड़ते जा रहे वर्ग भेद और विभिन्न वर्गों के बीच हितों के टकराव के मामले में उनकी पक्षधरता धनी किसानों और गैर-कृषि पेशों में गए नवधानाढ्य जाट किसानों की ओर थी जो बाद की उनकी पार्टी की नीतियों और उनके व्यवहार में दिखाई देती है। नतीजतन इलाके के छोटे किसानों और खेत मजदूरों की मांगें हाशिये पर आती चली गईं।

कृषि क्षेत्र में आ रहे इन बदलावों और बहुलांश किसानों और खेत मजदूरों के बारे में किसी स्पष्ट समझ के अभाव में चरण सिंह के जाते ही उनके वारिस पहले इलाकों और फिर जातियों के क्षत्रप बनकर रह गए। किसानों की पार्टी के रूप में पार्टी की पहचान खत्म हो गई। किसानों के  भीतर पैदा हुए नेतृत्व के इस संकट को भरने का काम 80 और 90 के दशक में भारतीय किसान यूनियन और उसके नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने किया। भारतीय किसान यूनियन ने खुद को घोषित तौर पर चुनावी राजनीति से अलग रखा, खेती की बड़ती लागत, फसल के उचित मूल्य और समय से भुगतान की किसानों की मांगों को उठाया और नवधनाढ्य वर्ग की मंत्री बनने की इलाकाई महत्त्वाकांक्षाओं से अलग एक किसान की पहचान को और उसके सवालों को फिर से राजनीतिक पटल पर लाने की कोशिश की।

लेकिन यही वह समय था जब गांव का आर्थिक-सामाजिक ढांचा तेजी से दरक रहा था जिसकी कोई गहरी समझ टिकैत और उनके साथियों में नहीं थी। 90 के दशक में कई महत्त्वपूर्ण परिघटनाएं एक साथ सामने आ रही थीं जिनका दबाव झेल पाने में भारतीय किसान यूनियन असमर्थ रही :

एक, जाटों की जोत का आकार घटता जा रहा था और उनकी लागत महंगी होती जा रही थी जबकि कीमतों की कोई गारंटी नहीं रह गई थी।

दो, अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि और उच्च शिक्षा तथा हाथ के हुनर के अभाव में वे आर्थिक उदारीकरण की नीतियों का फायदा उठाने के मामले में पिछड़ते जा रहे थे जबकि उनके कुछ सजातीय भाइयों और गांव की निचली जातियों के हुनरमंद लोगों की आय बड़ती जा रही थी और दिहाड़ी मजदूर के रूप में कंस्ट्रक्शन इत्यादि से जुड़े कामों के जरिये वे बेहतर पैसा कमा रहे थे।

तीन, एक औसत जाट किसान उन लोगों की तुलना में पिछड़ गया था जिनके पास अभी भी बड़ी जोत थी, या जो अपनी जमीनें बेचकर शहरों में बस गए थे और बिजनेस-व्यापार या नौकरियों में लगे थे।

चार, जाट किसानों के नेता जिनमें चौधरी चरण सिंह और भारतीय किसान यूनियन के खापों के नेता भी शामिल थे, वे अपनी राजनीति के लिए जाटों की परंपरागत पहचान और गौरव की विरासत और सामाजिक वर्चस्व का इस्तेमाल करते थे। इसलिए उन्होंने कभी दलितों और निचली जातियों के आर्थिक-सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं उठाया। उनके लिए खेती पर निर्भर भूमिहीन लोग, जो कृषि अर्थव्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा थे, ‘किसानÓ की श्रेणी में नहीं आते थे। लेकिन रिजर्वेशन और शिक्षा के दम पर उनके नौकरशाही और सत्ता के केंद्रों तक पहुंचने और दूसरी ओर कम से कम 70 प्रतिशत जाट किसानों के सामने जमीन खोने का वास्तविक खतरा आ उपस्थित होने (जोत का आकार 0.37 हेक्टेयर से भी कम) से उनके भीतर अपनी आर्थिक-सामाजिक हैसियत खोने का भय पैदा हो रहा था, जिसे इलाके में अन्य ओबीसी जातियों, दलितों और मुसलमान हुनरमंद जातियों की स्थिति बेहतर होने से और बल मिल रहा था। इन जाट किसानों और उनके बेटों के सामने सड़क पर आने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा था।

 

असुरक्षा बोध, दुश्चिंता और हिंदूवादी राजनीति 

यही असुरक्षा बोध और दुश्चिंता थी जिसने जहां एक ओर जाटों को अपने स्वनिर्मित श्रेष्ठताबोध के खोल से निकलकर आरक्षण की मांग करने के लिए विवश किया, वहीं दूसरी ओर उन्हें भारतीय जनता पार्टी की हिंदूवादी राजनीति की गिरफ्त में फंसा दिया जो उन प्रतिद्वंद्वी समूहों का उग्रतापूर्वक दमन करने में उनका साथ देने को तैयार थी जिन्हें वे ईष्र्या भरी नजरों से ऊपर उठता देख रहे थे।

1991 में भारतीय किसान यूनियन ने राम के नाम पर मंदिर निर्माण के लिए भाजपा को वोट देने का आह्वान किया और 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मुसलमानों और मजदूर वर्ग की भारतीय किसान यूनियन से दूरी बड़ती चली गई। 1993 में डंकल प्रस्तावों के खिलाफ प्रदर्शनों में भी भारतीय किसान यूनियन ने हिस्सा लिया। 2008 में महेंद्र सिंह टिकैत ने मायावती के लिए अपमानजनक टिप्पणी की और उनके समर्थक टिकैत की गिरफ्तारी के खिलाफ पुलिस से भिड़ गए। 2012 के चुनावों में मुसलमान उम्मीदवारों की बड़ी संख्या में जीत के बाद 2013 में भाजपा द्वारा जाट महापंचायत की शह पर सुनियोजित दंगे उकसाए गए जिसने इलाके की राजनीति के केंद्र से किसान और भारतीय किसान यूनियन को पूरी तरह बाहर कर दिया। जाट किसानों ने 2014, 2017 और 2019 के चुनावों में भाजपा का खुला समर्थन दिया। सीएसडीएस के अनुमानों के मुताबिक, 2014 में जहां 70 प्रतिशत जाटों ने भाजपा को वोट दिया था, वहीं 2019 में 91 प्रतिशत जाटों ने भाजपा को वोट दिया। अपने सावधानीपूर्वक  चुने हुए राजनीतिक प्रतीकों-गौमाता, योगा, जाट स्वतंत्रता सेनानियों के शहीद दिवस मनाना, और इसके जरिये जाटों के जातिगत गौरव को हिंदू-राष्ट्र के गौरव से एकाकार करने की कोशिशों के जरिये भाजपा उनके भीतर गहरी पैठ बनाने में कामयाब रही। पंजाब और हरियाणा की तुलना में जहां मुसलमान आबादी क्रमश: महज 2 प्रतिशत और 7 प्रतिशत है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान आबादी 26.21 प्रतिशत से भी ज्यादा है और बहुत से शहरों और कस्बों में उनकी आबादी हिंदुओं से ज्यादा है, और जिस इलाके की स्मृतियों में विभाजन की त्रासदी की वैसी पीड़ादायी दास्तानें मौजूद नहीं हैं, जैसी पंजाब और हरियाणा में हैं, ऐसा कर पाना अपेक्षाकृत आसान था।

 

जमीन खो देने का खतरा

लेकिन केंद्र सरकार द्वारा थोपे गए तीन कानूनों ने छोटे और सीमांत जाट किसानों के सामने मौजूदा जमीन खो देने के खतरे को फिर से उभार दिया है। गौरक्षकों के रूप में ‘लिंच मॉब’ बने घूमने वाले गांव के बेरोजगार और बेकार नौजवान छुट्टे सांडों की भूखी फौज के आगे खुद को लाचार पा रहे हैं जो अब उन्हीं के खेतों को चर रहे हैं। इससे हिंदू  और  मुसलमान कसाई, दोनों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। दंगों के बाद गांव से निचली जातियों के मुसलमानों का कस्बों और शहरों में सुरक्षित ठिकाने की तलाश में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है और जिससे जहां मुलसमानों की जिंदगी की मुश्किलें बड़ी हैं, वहीं पहले से ही मजदूरों की कमी और महंगाई की मार झेल रहे जाट किसानों को मजदूर मिलने मुश्किल होते जा रहे हैं, मशीनों की मरम्मत के लिए उन्हें शहर जाना पड़ रहा है और ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे हैं। स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट लागू करने और किसानों की आय दोगुना करने का वादा करने वाली भाजपा सत्ता में आने के बाद अपने वायदे से मुकर गई है और मात्र 6000 रुपए की तथाकथित ‘किसान सम्मान निधि’ को अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनवाती फिर रही है। 14 दिनों में गन्ने के बकाये के भुगतान का भाजपा का वादा झूठा निकला। चीनी मिलों पर किसानों का 11 हजार करोड़ रुपया बकाया है और सरकार वक्त पर समर्थन मूल्य तक तय नहीं कर रही है। यह हाल तब है जबकि चीनी मिलें ऐसा करने के लिए कानून बाध्य हैं। जिंदगी की इन तल्ख हकीकतों ने 2013 के दंगों से पैदा हुई दूरियों को मिटाने में अहम भूमिका अदा की है और भाजपा सरकार पर जाटों को अब यकीन नहीं रह गया है।

 

आगे की चुनौती

खेती-किसानी के पेशे की गरिमा और किसान के आत्मसम्मान को लेकर पैदा हुआ किसान आंदोलन का यह उभार अगर जाट-खाप पंचायतों के जातीय ढांचे और जाट स्वाभिमान के सवाल के रूप में अपनी छवि को नहीं तोड़ पाता तो इसके संघ और भाजपा के वैचारिक हमले के सामने टिक पाने की कोई संभावना नहीं बनती। जैसा कि हमने शुरू में देखा जाट की अपनी गड़ी हुई छवि और स्वाभिमान के मिथक उसे भाजपा और संघ की वर्ण व्यवस्था समर्थक विचारधारा और हिंदू राष्ट्रवाद के दलदल में फंसा देते हैं जहां देश के 80 करोड़ लोगों की जिंदगी से ज्यादा अहम मुद्दा तिरंगे का तथाकथित अपमान है। अगर जाट किसान खुद को इस छवि से मुक्त नहीं करते और अपने शूद्र और मेहनतकश अतीत को अपनी पहचान नहीं बनाते, तमाम पिछड़ी जातियों, भूमिहीन खेत मजदूरों और दलितों के आर्थिक और सामाजिक न्याय के सरोकारों के भागीदार नहीं बनते तो वे उस महान संभावना को खो देंगे जो इस आंदोलन में उनके सामने पेश की है। किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी की इस सुचिंतित अपील में इसी आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति हो रही है- ”किसान अपने घरों में आंबेडकर की तस्वीर लगाएं और मजदूर भाई सर छोटूराम की।‘’

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