अध्यात्म की इंजीनियरिंग

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संदेह श्रीधरन एक दक्ष और उत्कृष्ट इंजीनियर हैं, वह अपने व्यवसाय के अच्छे प्रबंधक भी हैं, यह प्रमाणित है। इंजीनियरिंग की दुनिया में तो, वह जाने ही जाते हैं उसके बाहर भी सुपरिचित नाम हैं। बल्कि कहना चाहिए ‘मीडिया पर्सनैलिटीÓ हैं। उन्हें ‘मेट्रो मैन’ भी कहा जाता है, क्यों कहा जाता है, इसका कोई वाजिब जवाब नहीं है। अपनी तकनीकी और प्रबंधकीय उपलब्धियों के लिए कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजे गए हैं। आदमी भी भले ही होंगे। उनका परिवार एक सफल परिवार है। जिस तरह से वह 88 वर्ष की उम्र में फिट हैं, बतलाता है कि निजी रूप से अत्यंत अनुशासित भी होंगे ही।

एक ऐसा व्यक्ति 88 वर्ष की उम्र में एक दिन प्रेस कांफ्रेंस करता है, भाजपा की सदस्यता लेने की घोषणा करता है, खुलेआम नरेंद्र मोदी का गुणगान करता है, भाजपा को राष्ट्रवादी पार्टी कहता है, भाजपा ही केरल का विकास कर सकती है, ऐसा दावा करता है, ‘लव जिहाद’ कानून के पक्ष में खड़ा होता है और केरल का मुख्यमंत्री होने की महत्त्वाकांक्षा प्रकट करने से झिझकता नहीं है। इस पर भी श्रीधरन का यह छाती-ठोक वक्तव्य भौंचक करने वाली बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि ऐसे व्यक्तित्वों का हमारे देश में कभी भी अभाव नहीं रहा है, खासकर कथित ऊंची कही जाने वाली जातियों में। हां, श्रीधरन को प्रतीक मानक कर यह समझने की कोशिश जरूर की जानी चाहिए कि आखिर भारत में आमतौर पर प्राकृतिक विज्ञान और तकनीक के विशेषज्ञों का विश्व दृष्टिकोण इतना अवैज्ञानिक क्यों होता है? वे वैचारिक तौर पर अक्सर दिवालियापन के निकट नजर क्यों आते हैं? आखिर क्या कारण हैं कि वे गहरे स्तर पर अवैज्ञानिक मूल्य-मान्यताओं पर इतनी आस्था कैसे रखते हैं और उसमें इतना डूबे क्यों रहते हैं?

व्यक्ति श्रीधरन के संदर्भ में इसका ठोस जवाब ढूंढने से पहले एक बात पर सरसरी तौर पर ही सही, निगाह डाल लेनी चाहिए, वह है हमारी शिक्षा व्यवस्था। हम समाज विज्ञानों को चाहे जैसे भी पढ़ाते हों, पर प्राकृतिक विज्ञानों और प्रौद्योगिकी को हम अपने जीवन का अंग मान कर आखिर क्यों नहीं चलते? हमारे देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में माहिर लोग जितने अवैज्ञानिक, अविवेकी और अंधविश्वासी हो सकते हैं और हैं, वह परेशान करने वाला है। इसका संबंध हमारी शिक्षा प्रणाली से तो है ही, उससे भी ज्यादा हमारे पारिवारिक-सामाजिक संस्कारों से है, जो हमारी जीवन दृष्टि को तय करती है और ऐसी जीवन-शैली गढ़ती है, पाखंड जिसका बुनियादी अंतर्निहित तत्व है।

भारतीय जनता पार्टी जैसी एक धर्म विशेष को समर्पित राजनीतिक पार्टी के समर्थक और उससे सक्रिय रूप से जुडऩे जा रहे व्यक्ति (श्रीधरन) से यह अपेक्षा करना कि वह हिंदू धर्म के कुछ आधारभूत सिद्धांतों को तो जनता ही होगा, गलत तो नहीं ही होगा। ई.श्रीधरन ‘मेट्रो मैन’ साहब के संदर्भ में हिंदू धर्म की आश्रम व्यवस्था बरबस याद आ जाती है। 75 वर्ष पूरा कर चुके व्यक्ति को सांसारिक-लौकिक प्रलोभनों को त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए, ऐसा हिंदू धर्म ग्रंथों का आदेश है। हमारे जिस प्रधानमंत्री के इंजीनियर साहब मुरीद हैं, आखिर उन्होंने यों ही हिंदूवादी पार्टी में उच्च पदों पर रहने की उम्र की सीमा का नियम लागू नहीं किया होगा। उसका सीधा संबंध आश्रम व्यवस्था से जुड़ा है। अन्यथा जोशी-आडवाणी को भजन-कीर्तिन करने के लिए घर या जंगल (सुविधानुसार) प्रस्थान के लिए यों ही तो मुक्त नहीं किया गया। यह खुला तथ्य है कि चौथी अवस्था की शुरुआत 75 वर्ष में होती है, जिसे श्रीधरन करीब 13 वर्ष पहले पार कर चुके हैं। वैसे यह भी नियम है कि 50 की उम्र में वानप्रस्थ किया जाए। यूं तो प्रधानमंत्री जी चाहते तो, इन नियमों को खुद पर भी लागू कर सकते थे। उन्होंने 25 वर्ष या शायद उससे भी कुछ पहले ही संन्यास (संघ के पूर्णकालिक प्रचारक) शुरू कर दिया था, लेकिन 50 की उम्र तक आते-आते उन्होंने खुद को वापस सांसारिक आश्रम के लिए फिट कर लिया और गुजरात के मुख्यमंत्री बन बैठे। वैसे हिंदू आश्रम व्यवस्था में विश्वास करने वाली भाजपा में ऐसे उदाहरण बहुतेरे हैं। एक भगवाधारी संन्यासी (गोकि वह पहला नहीं है), तो पूरी तरह सांसारिक होकर एक प्रदेश का मुख्यमंत्री ही है। संन्यासी होना उनके मुख्यमंत्री होने के आड़े नहीं आया। हमारे मेट्रो मैन ने तो यह सब नहीं किया। वह तो हाल फिलहाल तक रेलवे लाइनों में पसीना बहाते रहे।

वह आदमी (श्रीधरन) जो आज से 70 वर्ष पहले उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग पढ़ा हो, उससे कोई भी वैज्ञानिक विश्व दृष्टि रखने और यथार्थवादी होने की अपेक्षा कर सकता है और करनी भी चाहिए। खैर इस मामले में उन्होंने बहुतों की तरह, पूरी तरह निराश किया। हम उनके बारे में यह भी मानते रहे कि हमारा साबका ऐसे आदमी से है जो कम से कम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं-क्षमताओं के बारे में तो यथार्थवादी होगा ही। यानी अपने बारे में, अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता की सीमा को लेकर, सजग होगा। पर जिस तरह से श्रीधरन साहब अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं के प्रति आश्वस्त हैं, वह स्तब्ध कर देने वाली है और राष्ट्रीय स्तर पर कम सनसनीखेज खबर नहीं कही जा सकती है।

सवाल जितना उनका 88 वर्ष की अवस्था में खुले आम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में, फिर चाहे ट्रैक के बाहर ही क्यों न हो, शामिल होना है कुछ वैसा ही सवाल उनके ‘मेट्रो मैन’ कहलाने पर भी है। यह छिपा नहीं है कि दिल्ली मेट्रो आविष्कार जैसी कोई चीज नहीं है। बल्कि वह टेक्नोलॉजी के विभिन्न अनुशासनों, जैसे कि मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सिविल इंजीनियरिंग का एक कोलॉज है। योरोप के देशों में मेट्रो पिछले सौ वर्ष से ज्यादा समय से चल रही है। यहां भी हमने जो डिब्बे और इलेक्ट्रॉनिक्स का इस्तेमाल किया है उसका अधिकांश हिस्सा बंबार्डियर, मित्सुबिशी, गोरिलिट्ज, हुंदाई, मोटरोला और सीमेंस जैसी कोरिया, जापान, जर्मनी और स्वीडन आदि देशों की विभिन्न कंपनियों से आया है। इसलिए बहुत हुआ तो, यह एक परियोजना को कार्यरूप में परिर्वतित करना है। इस पर भी यह सिर्फ एक महानगर की परिवहन व्यवस्था से जुड़ा मामला है। यह देश या राज्य चलाना नहीं है। पर श्रीधरन साहब के बड़बोलेपन (केरल का मुख्यमंत्री बनने और केरल में विकास करने) पर कुछ कहने की जरूरत नहीं है, हां उनकी हिम्मत और जज्बे का जवाब नहीं है। वह संभवत: राज्य को किसी कॉरपोरेट कंपनी का पर्याय मानते हैं।

उनका मानना है कि वह ”केरल राज्य को, जहां वह पिछले दस वर्षों से रह रहे हैं, मुख्यमंत्री के तौर पर किसी राजनीतिक नेता से बेहतर तरीके से चला सकते हैं और विकास के शीर्ष पर ले सकते हैं।‘’ तथ्य यह है कि केरल देश का सबसे ज्यादा विकसित और बेहतर तरीके से प्रशासित राज्य है। क्या वास्तव में वह ऐसा कर सकते हैं? बड़ा सवाल यह है कि दो महीने बाद इस राज्य में होने वाले चुनावों में क्या भाजपा बहुमत पा जाएगी, जहां की विधानसभा में फिलहाल भाजपा के सिर्फ दो सदस्य हैं? निश्चय ही न तो श्रीधरन इतने मासूम हैं और न ही भाजपा ही कि उम्मीद करे कि वह वहां बहुमत पा जाएगी। अगर ऐसा होता तो फिर वह सारी ताकत बंगाल में क्यों झोंके होती। फिर भाजपा और श्रीधरन ऐसा क्यों कर रहे हैं?

भाजपा फिलहाल सिर्फ यह उम्मीद कर सकती है कि किसी तरह राज्य में सम्मान-जनक जगह बना ले और अपने कथित राष्ट्रव्यापी दल होने के दावे को मजबूत कर पाए। स्पष्ट है कि श्रीधरन उसकी इसी योजना का हिस्सा हैं। खतरा यह है कि कहीं जनता श्रीधरन को जीवन के इस अंतिम दौर में यह न समझा दे कि उनकी सही जगह राजनीति नहीं, बल्कि ड्राइंग बोर्ड थी और अब वह रिटायर्ड इंजीनियर हैं।

श्रीधरन की इस घोषणा पर कि अगर केरल में भाजपा जीती तो वह मुख्यमंत्री बनेंगे, केरल के मुख्यमंत्री पेनारई विजयन की प्रतिक्रया थी, ”क्या श्रीधरन महान आदमी नहीं हैं… एक बहुत बड़े  टेक्नोक्रेट, ऐसा व्यक्ति जिसे देश ने पद्मश्री से विभूषित किया है। वह हर पद के लिए उपयुक्त हैं। वह जैसा चाहते हैं वैसा हो।‘’

इससे श्रीधरन जी की समझ में कम से कम आ जाना चाहिए कि राजनीतिक व्यक्ति में किस तरह की विनम्रता होनी चाहिए।

पर श्रीधरन का यह ‘थियेटर ऑफ द एब्सर्ड’ अचानक नहीं सज गया है। वह केरल की एक उच्च जाति के हैं। परंपरावादी हैं। जाति आधारित ही नहीं बल्कि वह लैंगिक भेदभाव में भी विश्वास रखते हैं। सबरीमाला में स्त्रियों के बिना किसी जैविक स्थिति विशेष के भेदभाव के प्रवेश के वह घोषित रूप से खिलाफ हैं। वह मोदी के भक्त हैं तो भी ऐसा नहीं है कि वह न जानते हों कि 2002 में गुजरात में क्या हुआ था? किसका कत्लेआम हुआ था? किस तरह के एनकाउंटर हुए थे और तब वहां कौन मुख्यमंत्री था? इसलिए उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह बाबरी मस्जिद के विध्वंस की घटना और उसकी जगह मंदिर बनाए जाने से किसी तरह की कोई असहमति रखते होंगे। ऐसा भी नहीं है कि वह इस सरकार के विमुद्रीकरण (नोटबंदी), बिना तैयारी के जीएसटी और बिना सोचे-विचारे ‘लॉकडाउनÓ से हुई आर्थिक तबाही और जनहानि से परिचित न हों।

महिलाओं का सबरीमाला मंदिर में न जाने देने को उनका समर्थन उनमें बैठी अवैज्ञानिकता ही नहीं है बल्कि अंध धार्मिकता और मर्दवादी मूल्यों के प्रति गहरी आस्था भी है। इससे यह भी स्पष्ट है कि उनमें अगर जातिगत भेदभाव की भावना-विचार न हो, तो यह आश्चर्य की ही बात होगी। अंतर जातीय विवाहों के मामले में उनका क्या दृष्टिकोण है यह तो सार्वजनिक नहीं है पर हां उनका अंतर धार्मिक, विशेषकर हिंदू-मुस्लिम विवाहों को लेकर वही विचार हैं जो कि भाजपा के सबसे आक्रामक लोगों के हैं। पर केरल में तो इस्लाम के अलावा ईसाई धर्म का भी खासा प्रभाव है। वह यह तो कह रहे हैं कि मुसलमान हिंदू और ईसाइयों के खिलाफ ‘लव जिहादÓ चला रहे हैं, पर हिंदू और ईसाइयों के बीच के विवाहों के बारे में उनके क्या विचार हैं, जानना भी रोचक होगा।

देखा जाए तो श्रीधरन इस मामले में अकेले नहीं हैं। उन्हीं की तरह नरेंद्र मोदी के समर्थकों में जो पूर्व नौकरशाह, न्यायाधीश, वैज्ञानिक और डॉक्टर नजर आते हैं, वे मूलत: भाजपा समर्थक भी हैं। उनका समर्थन और समर्पण कुल मिला कर जातीय विशेषाधिकारों को बचाने के स्वार्थ से प्रेरित-संचालित है। यह जातीय विशेषधिकार, जो कमोबेश इस नस्लवादी अवधारणा पर आधारित है कि उच्च जातियां कुशाग्र, सभ्य और शालीन तथा सुंदर भी होती हैं।

इस स्वार्थपरकता और अवैज्ञानिकता के श्रीधरन अकेले प्रतिनिधि नहीं हैं। हाल के दिनों में ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। उनमें कुछ उदाहरण हिंदी साहित्य में भी अभी हाल में दावेदारी के साथ प्रकट हुए हैं। वैसे हिंदी का यह रिकॉर्ड रहा है कि उसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जातिवाद, सांप्रदायिकता, धार्मिक अंधश्रृद्धा का बोलबाला रहा है, प्रेमचंद और यशपाल जैसे लेखकों की उपस्थिति के बावजूद। इस पर भी अब तक घोषित रूप से भाजपा समर्थक लेखक कम ही देखने को मिलते थे। प्रत्यक्ष तौर पर इसका कारण केंद्र में सरकार का असांप्रदायिक और उदार होना तथा वामपंथी लेखकों, संगठनों का मजबूत और सक्रिय होना रहा है। पर फरवरी के शुरू की घटना इस बात का सूचक है कि यह सब बड़े पैमाने पर बदलने की प्रक्रिया में है।

हम नहीं जानते श्रीधरन ने राम मंदिर निर्माण के लिए किसी तरह का चंदा दिया या नहीं, और दिया तो कितना दिया? यह बतलाना भी मुश्किल है कि उनका ‘दान दक्षिणा’ में कितना विश्वास है। पर चूंकि उनके पास पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा अभिव्यक्त करने के दूसरे तरीके थे। उन्होंने वे अपनाए यानी प्रेस कांफ्रेंस की।

इसी तरह का एक किस्सा हिंदी समाज में भी इधर देखने को मिला है, गोकि दूसरे रूप में। हिंदी के एक लेखक ने अपनी वह रसीद (नं. 2228408, दिनांक 4 फरवरी, 2021) जिसके माध्यम से उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए ‘पांच हजार चार सौ रुपए नगदÓ का योगदान किया था, फेसबुक पर लगा दी। साथ में लिख दिया ”आज की दान-दक्षिणा। (अपने विचार अपनी जगह पर सलामत।)’’।

एक अर्से तक जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहने, कई तरह से समय-समय पर स्वयं को वामपंथी घोषित करने वाले किसी तथाकथित लेखक का यह कहना कि ‘अपने विचार अपनी जगह पर सलामतÓ, धूर्तता के अलावा क्या कुछ और हो सकता है? आप के माता-पिता, आपकी जन्मभूमि ‘अपनी जगह’’ हो सकते हैं पर आपके विचार ‘अपनी जगह’ कैसे हो सकते हैं। हमारे विश्वास और हमारी समझ का संबंध हमारे विकास और ज्ञान से होता है, धर्म से नहीं। धर्म और उसके शास्त्र इस समझ को सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि धर्म हमारी सामाजिक भूमिका निर्धारित करने में निर्णायक होता है, हिंदू धर्म विशेष तौर पर। इस संदर्भ में देखें तो यह अचानक नहीं है कि सारा आधुनिक ज्ञान और विज्ञान रंग, नस्ल, जाति और धर्म को खारिज करता है और सब को बराबर मानता है। आज जब दुनिया में लोग समानता की बात कर रहे हैं, भारत जाति और धर्म के नाम पर देश को विभाजित करने वालों को सत्ता में बैठा रहा है। हिंदू धर्म से प्राप्त अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने वाले ही धर्म को कभी छोडऩे को तैयार नहीं होते।

पर यहां मसला कुछ और है। अगर धर्म निजी मामला है तो फिर उसका प्रदर्शन क्यों और वह भी सोशल मीडिया में? सवाल है आप संदेश क्या देना चाहते हैं? क्या यह कि मैं वामपंथी नहीं हूं? या फिर कि मैं, हे हिंदूवादी शासको, आपके साथ हूं? कृपा बनाए रखें। सन 2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली तो, उसके कुछ ही समय बाद इन्हीं लेखक महोदय ने अपनी फेसबुक वाल पर जो लगाया था, वह कुछ ऐसा था, ‘ये लोग योगी जी को रहने नहीं देंगे’।

जानने वाले जानते हैं, एक कहानी पर साहित्य अकादेमी का ‘उपन्यास’ पुरस्कार जुगाडऩे वाले और फिर ‘पुरस्कार वापसी’ का नेतृत्व कर वाहवाही बटोरने वाले उदय प्रकाश की आदित्यनाथ से निकटता पुरानी है।

समयांतर, मार्च 2021

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