किसान आंदोलन और भारतीय समाज का भविष्य

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यह असंगठित किसान आंदोलन इतने लंबे समय तक बिना थके और हताशा के, चलते रहने के कारण दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में प्रतिमान कायम करने जा रहा है।

 

इसकी, पिछली सदी के विरोध के तीन महान जन आंदोलनों -1917 की अक्टूबर क्रांति, जॉन रीड के शब्दों में  ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ या चीन के अक्टूबर 1934 के ‘लॉन्ग मार्च’ या फिर मार्च 1930 के ‘डांडी मार्च’ से तुलना हो सकती है या नहीं, यहां इस पर तर्क की मंशा नहीं है। ये आंदोलन ऐतिहासिक आंदोलन हैं। इन तीनों की अनुगूंजों से दुनिया का कोई कोना नहीं बच पाया था। सत्य तो यह है कि इन आंदोलनों के बाद दुनिया का भौतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक नक्शा भी बदले बिना नहीं रहा। इन घटनाओं की उपलब्धि यह है कि इन्होंने मानवीय इतिहास को बदलने में जो भूमिका निभाई उसका संबंध सत्ताधारियों को, इस दुनिया को, अपनी जागीर बनाने के मंसूबों पर रोक लगाना और किसान मजदूरों को अपने अधिकारों को पाने की राह दिखलाने में था।

ये बड़ी घटनाएं थीं जिन्होंने दुनिया को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पर यह जरूर है कि इन इतिहास बनानेवाली घटनाओं की, आज किसानों के देश भर में चल रहे आंदोलन पर लिखने के दौरान, याद आए बिना नहीं रहती। विशेषकर तब जब आप दिल्ली की उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर अपनी मांगों के लिए पिछले पांच सप्ताह से डेरा डाले किसानों के आंदोलन से तुलना करते हैं। उनकी हिम्मत, जजबा और प्रतिबद्धता चकित करने बिना नहीं छोड़ता।

पर यहां एक बड़ा अंतर भी है।  रूसी क्रांति के ‘दस दिन’ और चीनी क्रांति का ‘लॉन्ग मार्च’ दमनकारी सत्ताओं को बदलने में निर्णायक साबित हुआ था तो ‘दांडी मार्च’ का असर, बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक दुनिया की सबसे बड़ी सम्राज्यवादी और औपनिवेशिक ताकत रही ब्रिटिश सत्ता के पतन में निर्णायक बना। 1930 के तीसरे महीने के ‘दांडी मार्च’ के धक्के से औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार उसके बाद संभल नहीं पाई और जैसा कि माना जाता है कि भारत को आजादी चाहे 16 साल बाद मिली हो पर ”असली मोर्चा तो 1931 में फतह कर लिया गया था…’’ (संदर्भ विंसेंट शीन गांधीजीः एक महात्मा की संक्षिप्त जीवनी ) उसके आगे अगले 16 वर्षों तक उसका क्षरण अंतत: भारतीय आजादी के रूप में और ब्रिटेन का सम्राज्यवादी ताकत के रूप में पतन के तौर पर हुआ था।

पर इन तीन ऐतिहासिक घटनाओं की, जिन में समान्य जनों ने बड़े  पैमाने पर भागीदारी की थी, रणनीतिगत स्तर पर सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इन के पास लेनिन, माओ और गांधी जैसे नेता थे, जो इन्हें दिशा दे रहे थे। जबकि वर्तमान किसान आंदोलन अपने नेतृत्व में व्यक्ति केंद्रित नहीं है। यह अपने चरित्र में ही लोकतांत्रिक है और हर स्तर पर सामुहिकता का निर्वाह करता नजर आता है। इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। आप जिस सत्ता से आज लोहा ले रहे हैं वह कोई सामान्य शक्ति नहीं है। जिस ताकत के सामने किसान डटे हैं वह सत्ता अपने अहंकार और निर्ममता में किसी निरंकुश शासक से कम नहीं है। सरकार यह मान कर चल रही थी कि वह बातों के झांसे में लटकाकर किसानों को थका देगी, पर वह, जैसे कि लक्षण नजर आ रहे हैं, अपनी मंशा में सफल होती नजर नहीं आ रही है। यह असंगठित किसान आंदोलन इतने लंबे समय तक बिना थके और हताशा के, चलते रहने के कारण दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में प्रतिमान कायम करने जा रहा है।

भारत सरकार साम-दाम-दंड की नीति अपना रही है। सरकार ने किसानों के प्रतिनिधियों को तीसरे दौर की बातचीत के लिए 30 दिसंबर को अपरान्ह में बुलाया था। इस बीच वह लगातार इस कोशिश में रही कि किसानों से बात करने, उनकी समस्याएं समझने और राष्ट्रहित में उन्हें सुलझाने की जगह उनकी एकजुटता को किसी तरह तोड़ दे। न तोड़ पाए तो थका कर भ्रमित कर दे। फिर चाहे यह संसाधनों की कमी के चलते हो या कि उत्तर भारत की भयावह सर्दी के । 29 दिसंबर की रात उत्तर भारत में कई जगह तापमान गिर कर दो डिग्री हो गया था। एक दिन पहले कृषिमंत्री कह रहे थे कि हमारे प्रधान मंत्री पीछे नहीं हटते हैं। वह बड़े जिद्दी हैं, जो कहते हैं कर के छोड़ते हैं। अगले दिन वार्ता से पहले रक्षामंत्री कह रहे थे कि मैं किसान मां के पेट से पैदा हुआ हूं। हम जो कर रहे हैं सब किसानों के हित में कर रहे हैं। जब किसान नेता केंद्रीय कृषिमंत्री सहित सरकार के अन्य वर्ताकारों से मिलने पहुंचे तो वह तैयार खाना लेकर पहुंचे थे, जिसे केंद्रीय सरकार के मंत्रियों ने भी खाया। वैसे वे जब भी सरकार के वर्ताकारों से मिले हैं सदा अपना भोजन लेकर गए हैं। किसान नेताओं ने सरकार की मेजबानी कभी नहीं स्वीकारी। न ही सरकारी पक्ष ने इससे पहले उनके साथ भोजन किया पर 30 दिसंबर का यह भोजन अपनी प्रतिकात्मक के कारण महत्वपूर्ण पूर्ण रहा है। पहला, किसान कहना चाहते हैं, हम सरकार का कुछ नहीं खायेंगे, जो सर्वविदित है। दूसरा, जो कई गुना महत्वपूर्ण है कि हमारे पास इतना प्रबंध है कि यह लड़ाई महीनों चल सकती है।

सरकार को यह संकेत समझ लेना चाहिए। किसानों की यह मंशा मात्र प्रतिकात्मक नहीं है। बल्कि यह उनकी निर्णयात्मकता की द्योतक है। यह ऐसा टकराव है, जितना लंबा चलेगा उतना सरकार के लिए, कई तरह से, घातक साबित होगा। पहला यह उसके नेतृत्व के खोखलेपन और अहंकार को नंगा कर देगा दूसरा इससे उसके खिलाफ एकजुटता (मोबिलाइजेशन) बढ़ती जाएगी, जैसा कि हो भी रहा है। अंतत: यह मोबिलाइजेशन मात्र किसानों तक नहीं रहेगा, समाज के उन सब वर्गों तक पहुंचेगा जो विमुद्रीकरण से लेकर कोविड 19 के संदर्भ में हड़बड़ी में किए गए निर्णयों से ध्वस्त हुई अर्थव्यवस्था के कारण पिछले चार वर्षों से रह-रह कर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। बेरोजगारी और मंहगाई झेल रहे हैं।

यह सरकार किस हद तक संवेदनाशून्य है इसका उदाहरण उसकी खरबों की ‘सेंट्रल विस्टा’ योजना है। ऐसे दौर में जब देश अभूतपूर्व आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा है वह इस पूंजी को आधारभूत उद्योगों में लगाने की जगह ऐसे काम में लगा रही है जो उसे मृत पूंजी में बदल देगा। इसके लिए सरकार किस हद तक उतावली है उसका उदाहरण यह है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद रुकने को तैयार नहीं है। बल्कि एक तरह से उसने सर्वोच्च न्यायालय को ही ठिकाने लगा दिया है। (यह राशि 20 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने पांच जनवरी के अपने बहुमत के फैसले में इस परियोजना को हरी झंडी दिखा दी है। देखें इसी अंक में हरीश खरे का लेख।)

महत्वपूर्ण यह समझना है कि जीवन यापन और राजनीतिक स्वतंत्रता से जुड़े जन आंदोलन, संभव है तत्काल अपना असर न दिखलाएं, और सत्ता, विशेषकर निर्द्ंवद्व सत्ताएं, फिर चाहे उसने हमारी सरकार की तरह लोकतंत्र के माध्यम से ही क्यों न सत्ता हासिल की हो, ताकत के दर्प में यथार्थ को स्वीकार न करे, पर सबक यह है कि जीवन यापन और मनुष्य की स्वतंत्रता से जुड़े आंदोलनों का दमन अंतत: सत्ताओं के लिए आत्मघाती साबित होता है।

हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि यह आंदोलन कितना अनुशासित और नियोजित है। एक मामले में यह आंदोलन पिछले कुछ वर्षों में दुनिया में हो रहे उन आंदोलनों की ही कड़ी हैं जिन्होंने सत्ताओं के खिलाफ बिना किसी स्थापित/पेशेवर नेतृत्व के संघर्ष किया। इसकी मिसालें अरब स्प्रिंग से होती हुई संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, हांगकांग, थाईलैंड और अर्जेंटाइना में देख सकते हैं। ये आंदोलन मूलत: प्रगतिशील हैं और नेता पैदा करते हैं। निश्चय ही इसका संबंध इस बात से भी है कि सत्ता प्रतिष्ठानों की, जिनमें सत्ता में आने के लिए दावेदार राजनीतिक पार्टियां भी शामिल हैं, विश्वसनीयता पिछली आधी सदी में लगातार शंकास्पद होती गई है। यह संभवत: इसलिए भी है कि आंदोलनों से स्वस्फूर्त पैदा नेता अपने उद्देश्यों को ही बेहतर नहीं समझते बल्कि उनके प्रति ज्यादा ईमानदार होते हैं। काफी हद तक भारत में किसानों का यह आंदोलन इसी परंपरा की कड़ी है। इसलिए भी कि जिस समझदारी से उन्होंने इस संघर्ष की तैयारी और पचिालन किया है वह उनकी सामूहिकता का प्रतीक है।

यद्यपि इसको समझने के लिए इसकी सामाजिक पृष्ठभूमि को भी समझना जरूरी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि आंदोलन का नेतृत्व पंजाब के किसान कर रहे हैं। उसका सबसे बड़ा कारण पंजाब का सबसे बड़ा कृषि उत्पादक क्षेत्र होना और पंजाबियों को कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे व्यापक कृषि उद्यमी होना भी है। पर उनकी व्यावहारिकता और उदारता के पीछे मात्र कृषि नहीं है, अगर संक्षेप में कहें तो उनका धर्म और सामाजिक बनावट भी है जो समानता पर विश्वास करती है और अपने मूल में जातीयता को अस्वीकार करती है।

यही कारण है कि वर्तमान किसान आंदोलन की परिधि मात्र अपनी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तक ही सीमित नहीं है। बल्कि इसका संबंध देश के उस निम्न मध्य और निम्न वर्ग से भी है जो पूरी तरह  सार्वजनिक वितरण प्रणालि से मिलनेवाले अनाज पर निर्भर है। बाजार को खुला छोड़ देने (डीरेगुलेशन) के बाद, अनाज के दामों का, अंधाधुंध बढऩे से इन वर्गों का जीना मुश्किल हो जाएगा तो दूसरी ओर दामों के घटने से किसानों के लिए आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं रहेगा। यह हो भी रहा है। उदाहरण के लिए पंजाब के एक गांव में ही 52 विधवाएं हैं जिनके पतियों ने उनकी पैदावार का उत्पादन मूल्य तक न मिलने के कारण आत्महत्याएं की हैं।

इस संदर्भ में यह नहीं भुलाया जा सकता कि देश की खेती पर सिर्फ भारतीय पूंजीपतियों की नजर है। असल में भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में जो नियम बनाए हैं उनके सूत्र पश्चिमी देशों के हितों से जाकर जुड़ते हैं। जैसा कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनाक ने इधर प्रकाशित अपने एक लेख में बतलाया है कि बड़े पूंजीवादी देश लगातार यह चाहते हैं कि तीसरे देशों के बाजार उनके लिए खुलें क्योंकि उनके देशों में ऐसे अनाजों की बड़ी मांग है जो गर्म यानी उष्ण कटिबंधी देशों में होते हैं। ये देश लगातार अपने माल को विकासमान एशियाई और अफ्रीकी देशों के बाजारों में लादने में लगे हैं। इसी से जुड़ी बात यह है कि ये देश अपने किसानों को बड़े पैमाने पर सब्सीडी देते हैं जो 50 प्रतिशत तक है। तीसरी दुनिया के देशों से कहते हैं कि वे अपने किसानों को सब्सीडी न दें। बड़ी पूंजी को कृषि में आने देने से होगा यह कि ये कंपनियां अपने उत्पादों को सीधे बेचेंगी, उनका भंडारण करेंगी, बहुत संभव है भारतीय उद्योगपतियों से मिल कर, और जहां उन्हें ऊंची कीमतें मिलेंगी वहां भेजने को स्वतंत्र होंगी। नतीजा यह होगा कि तीसरी दुनिया के देशों में अनाज की उपलब्धि घटेगी। वह मंहगे होंगे। यह हुआ भी है। फिलिपिंस और बोस्टवाना में खाद्यानों के दाम आकाश छू गए थे। अब तक दुनिया के 37 देशों में आयात निर्भरता के कारण दंगे हो चुके हैं और वहां शहरी आबादी कंगाली की ओर चली गई है। इसलिए इस में शंका नहीं है कि नये कृषि कानून किसी भी दशा में न तो किसानों के हित में हैं, न उपभोगताओं के और न ही देश के। इन्हें हर हालत में वापस लिया जाना जरूरी है।

यह लेख 6 जनवरी को अद्यतन किया गया है।

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