सौमित्र चटर्जीः सिनेमा के स्वर्णकाल के महानायक (19 जनवरी, 1935- 15 नवंबर, 2020)

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  • महेंद्र मिश्र

 

सौमित्र चट्टोपाध्याय को भारतीय सिनेमा का महानायक केवल वे सिनेमाप्रेमी ही मानते हैं जो गंभीर, लीक से हटकर, कला और समानांतर सिनेमा के पारखी हैं, और उत्कृष्ट बांग्ला सिनेमा से जिनका परिचय है। बांग्ला सिनेमा में भी मुख्यधारा के लोकप्रिय नायक उत्तम कुमार महानायक माने जाते हैं; और हिंदी सिनेमा में तो अमिताभ बच्चन को सदी के महानायक के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है।

भारतीय सिनेमा के महानायक नहीं रहे।

यह दुखद समाचार मुझे मेरे मित्र हरदेव सिंह दुग्गल ने दिया जो अहमदाबाद में रहते हैं। समझने में देर नहीं लगी कि वह मुझे सौमित्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) (19 जनवरी, 1935-15 नवंबर, 2020) के देहांत की खबर दे रहे हैं। दुग्गल पिछली सदी के पचास और साठ के दशकों में लगभग सात साल पूर्वोत्तर सीमा के क्षेत्र में शिक्षा विभाग में सर्विस करते थे, और उन वर्षों में उन्होंने कई फिल्में देखी थी जिनमें सौमित्र चटर्जी ने अभिनय किया था। बातचीत के दौरान उन्होंने सत्यजित रे की फिल्म अपूर संसार के साथ कई अन्य फिल्मों का जिक्र भी किया। सौमित्र चटर्जी को भारतीय सिनेमा के महानायक के रूप में वे लोग ही पहचान सकते हैं जो बांग्ला सिनेमा, और खासतौर पर सत्यजित रे के कृतित्व से परिचित हैं। सौमित्र चटर्जी ने सत्यजित रे की चौदह फिल्मों में अभिनय किया जिनमें पहली थी ‘अपूर संसारÓ। दुनिया के कई महान फिल्म निर्देशकों के प्रिय अभिनेता रहे हैं जिनके साथ उन्होंने बहुत-सी फिल्में बनाईं। मिसाल के तौर पर जापान के महान निर्देशक अकिरा कुरोसावा के प्रिय अभिनेता थे मिफ्यून। इसी तरह इटली के फ्रेदरिको फेलिनी और स्वीडन के इन्गर बर्गमैन के प्रिय अभिनेता थे जो एक के बाद एक उनकी अनेक फिल्मों में आते रहे। संभवत: केवल मिफ्यून सौमित्र से आगे थे जो कुरोसावा की सोलह फिल्मों में अवतरित हुए।

सत्यजित रे ने विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के दो उपन्यासों, पथेर पांचाली  और अपराजितो पर आधारित तीन फिल्में बनाईं जिनमें अंतिम थी अपूर संसार। इन तीनों फिल्मों के निर्माण पर सत्यजित रे की मशहूर बांग्ला किताब है अपूर पांचाली  जो आनंद पब्लिशर्स ने 1995 में प्रकाशित की थी। इसमें सत्यजित रे ने लिखा है, ”अपराजितो फिल्म की शूटिंग के समय किशोर अपू की भूमिका में अभिनय करने के लिए जब उस उम्र के लड़के की खोज चल रही थी तब प्रोडक्शन में मेरे सहकर्मी निताई दत्त एक तरुण को मेरे पास लेकर आए। उनका नाम था सौमित्र चट्टोपाध्याय। चेहरा देखकर तो सौमित्र ठीक ही दिखाई दिए किंतु उस किशोर के चरित्र की तुलना में इनकी उम्र कुछ अधिक थी, बीस वर्ष। सौमित्र नए-नए कॉलेज से निकलकर आए थे। उस दिन उन्हें लौटा देना पड़ा। इस बार उन्हें दुबारा बुलाकर प्रधान भूमिका में देना चाहता था। उस समय वह रेडियो पर उद्घोषक का काम कर रहे थे, किंतु अभिनय के प्रति उनका विशेष आग्रह था। सुना था कि शिशिर भादुड़ी महाशय के एक नाटक में उन्होंने अभिनय भी किया था।‘’ ( अपूर पांचाली, 145 ) इस तरह सौमित्र अपूर संसार (1959) के नायक बने।

सत्यजित रे के साथ उनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं चारुलता  (1964), अरण्येर दिन रात्रि  (1969), सोनार केल्ल (1974), घरे बाइरे  (1984), शाखा प्रशाखा  (1990) और गणशत्रु  (1989)।

सौमित्र चट्टोपाध्याय को भारतीय सिनेमा का महानायक केवल वे सिनेमाप्रेमी ही मानते हैं जो गंभीर, लीक से हटकर, कला और समानांतर सिनेमा के पारखी हैं, और उत्कृष्ट बांग्ला सिनेमा से जिनका परिचय है। बांग्ला सिनेमा में भी मुख्यधारा के लोकप्रिय नायक उत्तम कुमार महानायक माने जाते हैं; और हिंदी सिनेमा में तो अमिताभ बच्चन को सदी के महानायक के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। सौमित्र ने लोकप्रियता हासिल करने की कोई कोशिश नहीं की, यद्यपि वह कई मशहूर फिल्मों में अन्य निर्देशकों के साथ भी आए, जैसे तपन सिन्हा की क्षुधित पाषाण (1960), अजय कर की परिणीता (1969) और तरुण मजूमदार की गणदेवता (1978)। उनकी एक अत्यंत लोकप्रिय फिल्म थी सात पाके बांधा (1963)। इसके निर्देशक थे अजय कर और सौमित्र के साथ नायिका की भूमिका में आई थीं सुचित्रा सेन।

वरिष्ठ और प्रख्यात अभिनेता तथा चरित्रनायक होने के बावजूद सौमित्र हमेशा निरभिमान रहे। उन्होंने परवर्ती फिल्मकारों गौतम घोष, अपर्णा सेन, अंजन दास और रितुपर्णो घोष की फिल्मों में भी अभिनय किया। 1986 में उन्होंने कोनी फिल्म में तैराकी के प्रशिक्षक की भूमिका में अभिनय किया जो एक ऐसी लड़की के बारे में है जो मलिन बस्ती में रहती है और तैराक बनना चाहती है। फिल्म को अगले वर्ष सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्हें अपनी यह फिल्म बहुत प्यारी थी। 2015 में सौमित्र ने नंदिता रॉय और शिवप्रसाद मुखर्जी की फिल्म बेला शेषे में स्वातिलेखा चटर्जी (सेनगुप्ता) के साथ एक वृद्ध दंपति की भूमिका में अतुलनीय अभिनय किया है। यह फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि मल्टीप्लेक्स सिनेमाहॉलों में ढाई सौ दिन तक लगातार चलती रही। यहां शायद इस संदर्भ का जिक्र जरूरी है कि 1984 में सौमित्र चट्टोपाध्याय रवींद्रनाथ ठाकुर के उपन्यास पर आधारित फिल्म घरे बाइरे में स्वातिलेखा के साथ क्रांतिकारी संदीप की भूमिका में उनके प्रेमी बने थे। कहानी के सनातन त्रिकोण में स्वातिलेखा थीं बिमला और उनके पति निखिलेश (विक्टर बैनर्जी)।

सत्यजित राय ने अपनी फिल्म जलसाघर  (1958) की शूटिंग के समय सौमित्र का परिचय बांग्ला के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता छवि विश्वास से कराया और उन्हें बहुत गर्व से बताया कि सौमित्र उनकी अगली फिल्म अपूर संसार में अपू की भूमिका में उतर रहे हैं। ये वही सौमित्र थे जिन्हें कार्तिक चट्टोपाध्याय ने अपनी फिल्म नीलाचले महाप्रभु (1957) के लिए स्क्रीन टेस्ट में फेल कर दिया था। सत्यजित रे को सौमित्र की प्रतिभा पर इतना विश्वास था कि वह उन्हें विभिन्न चरित्रों में प्रस्तुत करते थे, यह सोचकर कि सौमित्र उस भूमिका के साथ न्याय करेंगे। और ऐसा हुआ भी। यहां तक के 1974 की जासूसी की फिल्म सोनार केल्ला में सौमित्र जब फेलूदा नाम के जासूस बने तो उस चरित्र को प्रस्तुत करने में इतने सफल हुए कि आगे चलकर भी वह जासूस की भूमिका करते रहे।

सौमित्र बांग्ला सिनेमा तक ही सीमित रहे, लेकिन उसके बावजूद उन्हें फिल्मजगत के सर्वश्रेष्ठ सम्मानों से अलंकृत किया गया। 2004 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया और 2012 में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च पुरस्कार दादासाहेब फाल्के पुरस्कार उन्हें जीवनव्यापी उपलब्धि के लिए प्रदान किया गया। फ्रांस ने अपने दो सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार उन्हें दिए। विश्व सिनेमा में उन्हें उन विभूतियों में प्रतिष्ठित किया गया है जिन्होंने केवल भारतीय ही नहीं बल्कि विश्व सिनेमा पर भी व्यापक प्रभाव डाला है। वह साठ वर्ष तक सिनेमा में विभिन्न भूमिकाओं में अभिनय करते रहे। नित्यानंद गायेन ने उनके अवसान पर अपने आलेख में कहा है कि इस दीर्घ अवधि में सौमित्र चटर्जी ने 300 फिल्मों में अभिनय किया।

किंतु सौमित्र केवल रजतपट के अभिनेता ही नहीं थे। वह कवि, नाटककार और सही अर्थ में समाजचिंतक, संवेदनशील और गंभीर साहित्यकार थे। वह रंगमंच पर भी सक्रिय थे। दरअसल 1958 में वह रंगमंच पर उतरे किंतु 1959 में अपूर संसार  के साथ सिनेमा की तरफ मुड़ गए। बीस वर्ष बाद 1978 में सौमित्र दोबारा रंगमंच की तरफ अग्रसर हुए। तब उन्होंने नाम जीवन, राजकुमार, फेरा न्यायमूर्ति और टिकटिकी जैसे उत्कृष्ट नाटकों में अभिनय किया और व्यापक लोकप्रियता हासिल की। उन्होंने कई नाटक लिखे, नाटकों का निर्देशन किया और 2010 से वह बराबर शेक्सपियर के नाटक I के बांग्ला रूपांतरण राजा लियर की प्रधान भूमिका में अभिनय करते रहे। सुमन मुखोपाध्याय द्वारा निर्देशित इस नाटक में अपने अभिनय के लिए उन्हें व्यापक प्रशस्ति और लोकप्रियता मिली। आनंद पब्लिशर्स ने उनके नाटकों के तीन खंड – नाटक समग्र शीर्षक से प्रकाशित किए हैं।

सौमित्र, मूलरूप से कवि थे। उन्होंने अपना साहित्यिक जीवन कविता से ही शुरू किया, और यह सृजन उनकी जीवनव्यापी उपल्ब्धि है जिस पर अधिक चर्चा नहीं हुई है। किंतु इसमें संदेह नहीं है कि वह प्रथम श्रेणी के संवेदनशील कवि थे। उनके संपूर्ण काव्यकर्म को आनंद पब्लिशर्स कोलकाता ने 2014 में कविता समग्र शीर्षक से प्रकाशित किया। उनके तीन अन्य काव्य संग्रह हैं श्रेष्ठ कविता (देज पब्लिकेशन 1993), मध्यरातेर संकेत (सिग्नेट प्रेस, कोलकाता 2012) और शब्दॅरा आमार बागाने (मेरे उपवन में शब्द)।

सौमित्र की छह-सात अन्य गद्य की पुस्तकें भी हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है- मानिकदार संगे जिसका अंग्रेजी अनुवाद अरुणाव सिन्हा ने दि मास्टर एंड आई : सौमित्र विद सत्यजित किया जो 1959-1992 के काल की सत्यजित रे के फिल्म जगत की दीर्घ यात्रा की गाथा है।

कवि सौमित्र से मेरा परिचय 1976 में खड्गपुर में हुआ, जब मैं वहां रेलमंडल में परिचालन का प्रमुख था। यह परिचय उनसे व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक कविता संग्रह के माध्यम से हुआ जो मुझे  रथींद्रनाथ चक्रवर्ती से मिला था। संग्रह का शीर्षक है जलप्रपातेर धारे दांड़ाबो बले  (जल प्रपात के पास खड़ा होऊंगा, सोचता हूं)। प्रकाशक थे अन्नापूर्णा पब्लिशिंग हाउस, लिंडसे स्ट्रीट कोलकाता, प्रकाशन तिथि फरवरी 1975। सौमित्र ने प्रारंभ में लिखा है कि यह संग्रह शक्ति चट्टोपाध्याय के आग्रह से प्रकाशित हुआ और इसका प्रच्छद (आवरण पृष्ठ) बनाया सत्यजित रे ने। यह पुस्तक मेरे पास है और परोक्ष रूप में मेरे लिए सौमित्र का स्मृति चिन्ह है। दुख इस बात का है कि आवरण पृष्ठ कहीं खो गया है। इसमें 54 कविताएं हैं। किंतु इस पुस्तक में कुछ विशिष्ट है। यह वह प्रति है जो सौमित्र ने अपने हाथ से लिखकर सत्यजित् रे को उपहार स्वरूप दी थी। लिखा है,

”मानेकदा, बौदि के पुलू 26/3/75’’

पुलू उनका घर का प्यार से पुकारने का नाम था जिसे बांग्ला में डाकनाम कहते हैं। शायद यह संयोग नहीं है कि अपूर संसार फिल्म में अपू के मित्र का नाम पुलू है। वही अपू को अपने मामा के घर ले जाता है जहां उनकी बेटी अपर्णा का विवाह होने वाला है। दूल्हा पागल है इसलिए पुलू के आग्रह पर अपू उससे विवाह कर लेता है। उनके बीच प्रेम की सृष्टि तो कोलकाता लौटकर अपू के टूटे-फूटे कमरे में होती है।

मेरी मुलाकात सौमित्र चट्टोपाध्याय से एक बार हुई। यह पुस्तक मेरे पास है मैंने उन्हें बताया। किंतु ‘मानेकदा’ (सत्यजित्) को उनकी उपहार स्वरूप दी गई यह प्रति है, ऐसा मैंने उनसे नहीं कहा। मैंने उन्हें इस संग्रह की पहली कविता की पहली चार पंक्तियां भी सुनाई जो मुझे कंठस्थ थी। वह खुश हुए। मैं अपनी पुस्तक सत्यजित रे – पथेर पांचाली और फिल्मजगत (राजकमल 2006) के बांग्ला अनुवाद, पथेर पांचाली एवं… (आनंद पब्लिशर्स 2006) के लोकार्पण के अवसर पर उन्हें प्रधान अतिथि के रूप में निमंत्रित करने उनके निवास पर गया था। वह आने में असमर्थ थे क्योंकि उस दिन उनका कार्यक्रम कहीं और था। ‘नॉस्टेल्जिया’ शीर्षक की छह कविताओं में इस पहली कविता की चार पंक्तियां है –

शब्दहीन गान शोने आजउ जोनाकिर भीड़े महानिम

ग्रामांचले अंधकार दीर्घमाठे पौषेर हिम

आमार शैशव आमि भूलबो ना

मुठिते शुकानो शिशिर आमि तबू मुठि खूलबो ना

(शब्दहीन गान सुनता है आज भी जुगनूओं की भीड़ में विशाल नीम/ ग्रामांचल में अंधकार विस्तृत मैदान में पूस की ओस-/ अपना शैशव मैं भूलूंगा नहीं / मुट्ठी में सूख गया है ओसबिंदु मैं तब भी मुट्ठी खोलूंगा नहीं)

 

सौमित्र चट्टोपाध्याय शीर्षस्थ अभिनेता के साथ एक प्रतिष्ठित कवि, और बहुमुखी प्रतिभावाले साहित्यकार बने, इसका संदर्भ भी शायद अपूर संसार  में है। फिल्म में अपू अपने मित्र पुलू से जब मिलता है तो उसे अपनी कविता सुनाता है, कला के बारे में बात करता है और कहता है कि एक दिन वह महान लेखक बनेगा, तोल्स्तोय और हार्डी की तरह… उसमें मेरे जीवन का भी पुट होगा – मेरी पृष्ठभूमि का भी।

सौमित्र के साहित्यिक जीवन के संबंध में उनके द्वारा स्थापित और प्रकाशित पत्रिका एखॅन (अब) का उल्लेख करना आवश्यक है। उन्होंने 1961 में निर्माल्य आचार्य से मिलकर इस पत्रिका का संपादन और प्रकाशन शुरू किया था। सत्यजित रे ने इसके प्रथम अंक के आवरण पृष्ठ को डिजाइन किया था और परवर्ती अंकों में भी वह मुखपृष्ठ पर विषय के अनुरूप चित्र आदि बनाते रहे। 1976-77 में खड्गपुर में मेरे पास इस पत्रिका के कई अंक थे। दो अंकों में प्रसिद्ध वामपंथी उपन्यासकार माणिक बंद्योपाध्याय के कृतित्व पर विस्तृत आलेख भी छपा था।

सौमित्र के साहित्य के प्रति अनुराग का एक जीवंत प्रमाण है उनका कवितापाठ जिसे बांग्ला में आवृत्ति कहते हैं। बांग्ला के श्रेष्ठ कवियों की श्रेष्ठ और लोकप्रिय कविताओं का वह पाठ करते थे। बंगाल में इस तरह के अनुष्ठान अक्सर होते हैं। उनके कवितापाठ के बहुत-से वीडियो यू-ट्यूब पर उपलब्ध हैं। उनमें मेरी एक प्रिय कविता है ‘विदाय’ जो रवींद्रनाथ ठाकुर के काव्यात्मक लघु उपन्यास शेषेर कविता में है।

सौमित्र के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन पर बात किए बिना उनके व्यक्तित्व को समग्रता में नहीं समझा जा सकेगा। सौमित्र दरअसल कला और साहित्य के प्रति समर्पित थे इसलिए राजनीतिक और सामाजिक धरातल पर उनकी सक्रियता बहुत कम लोगों को मालूम थी। इसलिए यह बताना जरूरी है कि सौमित्र न केवल वामपंथी विचारधारा के समर्थक थे, बल्कि सच्चे अर्थ में एक मार्क्सवादी थे। वह हमेशा जनगण की पक्षधरता में खड़े रहे। बंगाल के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को मालूम है कि अपने जनवादी दर्शन से वह कभी विमुख नहीं हुए। वह किसी पार्टी के सदस्य नहीं थे। किंतु, जैसा नित्यानंद गायेन ने लिखा है, वह अक्सर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र गणशक्ति में लिखा करते थे। पिछले दिनों उन्होंने सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा लिया था।

सौमित्र चटर्जी बांग्ला सिनेमा के स्वर्णकाल के महानायक थे। उनके अवसान से उस काल का अंतिम नक्षत्र भी अस्त हो गया।  

 

नोट: महेंद्र मिश्र की पिछले दिनों फिल्मों के इतिहास पर भारतीय सिनेमा शीर्षक से वृहदाकार पुस्तक प्रकाशित हुई है।

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