युद्ध और विस्थापन की विभीषिका

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  • रामशरण जोशी

पड़ोसी बांग्लादेश अपनी स्वतंत्रता की आधी सदी अगले वर्ष पूरा करेगा। भारतपाक युद्ध का पटाक्षेप 16 दिसंबर,1971 को पाकिस्तानी सेना द्वारा आत्मसमर्पण के साथ हुआ था। इसके साथ ही लंबे मुक्ति संघर्ष के पश्चात बांग्लादेश का जन्म हुआ औरएक मजहबएक राष्ट्र या धार्मिक राष्ट्र का मिथक भंग हुआ। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रामशरण जोशी उन चंद हिंदी पत्रकारों में से हैं जिन्होंने युद्ध क्षेत्र में रहकर सोनारा बांग्लादेश की प्रसव पीड़ा को कवर किया था। प्रस्तुत है उनकी युद्ध क्षेत्र की यादें और अनुभव।

 

आपकी दिलचस्पी युद्ध में भी रहे, लेकिन युद्ध की आप में दिलचस्पी है।“ – लिओन ट्रोट्स्की

 

हाल ही में एक ब्रिटिश मूवी देखी : ‘1917। इसकी कथा 1917 के प्रथम विश्व युद्ध के दो युवा सैनिकों की वास्तविक घटना पर आधारित थी। दो युवा सैनिक मित्र अपने कमांडर का ‘अग्रिम मार्च रोकÓ का संदेश दूसरे युद्ध क्षेत्र में पहुंचाने के लिए निकल पड़ते हैं। मार्ग में बेशुमार संकट थे; शवों के ढेर और बारूदी सुरंगें; चारों तरफ तबाही का मंजर; खंदकों से पटे खेत-मैदान-खंडर; खंडरों के एक कोने में दुबकी-सिसकती फ्रेंच स्त्री और साथ में नवजात बच्चा; शवों से भरे दरिया को पार करना; रास्ते में ही एक साथी की शत्रु पक्ष के घातक हमले से मौत और दूसरा सैनिक अंततोगत्वा मंजिल पर पहुंच कर संदेश पहुंचा देता है क्योंकि आगे के मैदानों को जर्मनों ने बारूदी सुरंगों से पाट रखा था। इस तरह अंग्रेजी सेना के हजारों सैनिक मौत का ग्रास बनने से बच जाते हैं। फौजियों के चेहरे चमक उठते हैं। युद्ध और मृत्यु का तांडव थम जाता है। इस घटना की पटकथा का दिलचस्प पहलू यह है कि इसका निर्माता वास्तविक फौजी का पौत्र है। मूवी बेहद यथार्थवादी है, और साथ में संवेदनशीलता और मार्मिकता ने इसे हृदयस्पर्शी बना दिया है।

इस बार दीपावली की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जैसलमेर क्षेत्र में सैनिकों के बीच देखा और हुंकार भरते- मनोबल बढ़ाते हुए सुना। मोदी प्रतिवर्ष दिवाली सैनिकों के साथ ही मनाते हैं और सैन्य महत्ता पर प्रकाश डालते हैं। सैनिकों में उत्साह-शौर्य-समर्पण-राष्ट्रभक्ति के भावों का संचार होता है। एक नव सैन्यवाद के वातावरण की सृष्टि संचारित होती है और राज्य नियंता अपनी किलेबंदी से आश्वस्त होते दिखाई देते हैं।

 

1971 का मंजर

छोटे पर्दे पर अवतरित ये दो अवसरों की तस्वीरें हठात मुझे पांच दशक पीछे की यादों के प्लावन के हवाले कर देती हैं। साल 1971 का है। महीना मई रहा होगा। मैं अगरतला के अखौड़ा बॉर्डर पर खड़ा हूं। यह बॉर्डर तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से सटा हुआ है। यहां से कुछ किलोमीटर के फासले पर कुम्मिला है। इसके बाद राजधानी ढाका है। मेरे साथ कुछ पत्रकार और भी हैं। मैं जोश से भरा कुछ आगे निकल जाता हूं। सामने ‘भारत-पाक चेकपोस्ट’ है। सरहद के उस पार पाकिस्तानी रेंजर या अद्र्ध सेना पड़ी है। कुतूहल मुझे ढकेलता जाता है। मैं उस पार के खेतों की ओर देखना शुरू कर देता हूं। पलभर में फायरिंग की आवाजें आने लगती हैं। पीछे से ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के संवाददाता चीखते हैं, ”जोशी, बचो…”, इधर भारतीय सीमा दल का अधिकारी चिल्ला रहा है ”पेड़ की ओट लो।” मैं किसी प्रकार भाग कर एक बड़े से पेड़ की ओट से अपनी रक्षा करता हूं। गोलियां दनादन चल रही हैं। किसी भी क्षण मौत अपनी बांहों मुझे छिपा सकती है; तब न कोई दरख्त होगा, न सरहद, न कोई दोस्त- दुश्मन। एहसास खामोश होगा। अपना दम सादे मैं पेड़ से चिपके खड़ा रहा। पांच-सात मिनिट के बाद बंदूकें शांत हुई और मैं लपक कर सुरक्षित स्थान पर पहुंच सका। फिर चारों ओर से मुझ पर हिदायतों के हमले। यहां यह बतलाना ठीक रहेगा कि अगरतला पहुंचने के बाद अधिकारीयों ने हमें कलमा रटा दिया था- ‘ला इलाह इल्लाह, मोहम्मदुर रसूल अल्लाह।’ यदि कभी पकड़े जाएं तो पाक सैनिकों के सामने इसे बोल देना। हो सकता है, बच जाएं!

अब इसी महीने यह सब क्यों याद आ रहा है? वजह है इसकी भी। 16 दिसंबर,1971 को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। एक लंबी प्रसव पीड़ा के बाद वर्तमान बांग्लादेश के जन्म का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। भंग हो जाता है मजहबी राष्ट्र का ख्वाब। इस धारणा पर सवाल खड़ा हो जाता है कि धर्म-मजहब किसी भी राष्ट्र की आधारशिला होते हैं! धार्मिक राष्ट्र या थिओक्रैटिक नेशन का निर्माण ही ‘राम बाण’ है? पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान, दोनों जगह सुन्नी समुदाय का बाहुल्य है। फिर भी बंगभाषी सुन्नियों ने इस्लामाबाद से आजाद होकर एक अलग धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए सशस्त्र मुक्ति संघर्ष किया। अत: पाकिस्तान के विभाजन से हिंदू राष्ट्र के निर्माण के स्वप्नदर्शियों को कुछ तो पाठ सीखना चाहिए। रोचक सच्चाई यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान और बांग्लादेश, दोनों राष्ट्रों के निर्माता ‘सुन्नी समुदाय’ से रहे हैं।

अगले वर्ष बांग्लादेश अपने जन्म के पचास वर्ष पूरे कर लेगा। ऐसे क्षणों में ‘वॉर रिपोर्टिंग’ का याद आना स्वाभाविक है। वापस अपनी रिपोर्टिंग कथा पर लौटता हूं।

मैं त्रिपुरा की राजधानी अगरतला 1972 के अप्रैल-मई महीने में ही पहुंच गया था। एक तरह से नौसिखिया ‘युद्ध संवाददाता’। समाचार भारती (न्यूज एजेंसी) के संवाददाता के रूप में त्रिपुरा से लगी भारत-पाक सीमा पर जाकर रिपोर्टिंग की थी। मैं उन दिनों विधायक गेस्ट हाउस में रुका हुआ था। बाद में यहीं महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाजवादी नेता हमीद दलवई और प्रसिद्ध नाटक ‘थैंक्यू मिस्टर ग्लाड’ के लेखक अनिल बर्वे भी आकर रुके। दिल्ली से प्रकाशित मासिक ‘सेक्युलर डेमोक्रेसी’ के लिए काम कर रहे अनिल चक्रवर्ती भी मेरे साथ आ टिके। यह गेस्ट हाउस दिल्ली और कोलकाता से आने वाले पत्रकारों और पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के लिए संघर्षरत ‘मुक्ति वाहिनी’ के विशिष्ट एक्टिविस्टों का पनाहगाह था। रात-बिरात ‘मुक्ति वाहनी’ के सैनिक घायल अवस्था में कुछ समय के लिए रुका करते थे। फिर उन्हें किसी अज्ञात जगह भेज दिया जाता था। एक रात रोमांचकारी अनुभव हुआ। मध्यरात्रि के आस-पास एक पतले लेकिन तड़ाक सीधे नौजवान आ कर रुके। सैनिक पोशाक में थे। कुछ समय के लिए उन्हें मेरे कमरे में ठहराया गया। फिर उन्हें अलग रूम दे दिया गया। उनका परिचय गोपनीय रखा गया। उक्त युवक के बारे में एक-दो रोज बाद मालूम हुआ। वह शेख कमाल थे। बंगबंधु मुजीबुर्र रहमान के बड़े लड़के। फिर तो उनसे खूब बातें हुईं; पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा अत्याचार और बलात्कार और अनगिनत हत्याएं। रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं। हो सकता है उनके वर्णन में कुछ अतिरंजना रही हो, लेकिन ऐसी परिस्थितियों में यह अस्वाभाविक नहीं है। वैसे आगे चलकर और ढाका पहुंचने के बाद हुए मेरे अनुभवों से कमाल के विवरणों की पुष्टि भी हुई। कमाल बेहद जुझारू इंसान लगे और भारत की राजनीति से परिचित भी थे। दिसंबर के अंतिम दिनों में मेरी फिर से कमाल से ढाका क्लब में मुलाकात होती है। भारतीय नेतृत्व के प्रति वह तहे दिल से उपकृत थे, विशेष रूप से इंदिरा गांधी के प्रति।

विडंबनापूर्ण इत्तफाक देखिए, जब भारत दिल्ली में 1975 के आपातकाल में 15 अगस्त को अपना 28 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, ठीक उसी भोर में ढाका में प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्र रहमान और उनके परिवार के समूल सफाया की साजिश को अंजाम दिया जा रहा था। स्वतंत्र बांग्लादेश की सेना की एक टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया और धानमंडी स्थित प्रधानमंत्री-निवास पर धावा बोल दिया। विद्रोही सैनिकों ने सबसे पहले शेख कमाल को ही गोली मारी जिन्होनें 1971 के स्वतंत्रता संघर्ष में मुक्ति वाहिनी के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह अपने मकान की पहली मंजिल पर थे जहां उन्हें गोलियों से भून डाला गया। फिर विद्रोहियों ने अगली मंजिल में रह रहे देश के प्रथम राष्ट्रपति, और बाद में प्रधानमंत्री मुजीबुर्र रहमान की परिवार सहित नृशंस हत्या कर दी। देश से बाहर रहने के कारण उनकी पुत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना जीवित रह गईं। उन्हें भारत में शरण लेकर सालों रहना पड़ा।

विस्थापितों का सैलाब

वापस अगरतला लौट रहा हूं। त्रिपुरा की सीमांत राजधानी अगरतला में रिपोर्टिंग करते हुए कुछ घटनाएं भुलाई नहीं जा सकतीं। आंखों में आज भी विस्थापितों का सैलाब मौजूद है; रोज हजारों की संख्या में अपनी जमीन, अपनी जड़ों, अपने वतन से उजड़े लोग; अद्र्ध नंग-चीथड़ों से ढकीं संवेदनशील लज्जाएं; बोरियों-गठरियों में समेटे जीने की मोहलतें; बगल में दबाए-कंधों पर लादे बच्चे- बूढ़े; सयाने-सयाने चलते मवेशी और बैल गाडिय़ां-साइकिल रिक्शा ठेलते मर्द और औरतें; कारों-टैक्सियों-ट्रकों में ठुंसे-लदे भद्र जन। मेरी यहीं मुलाकात काबूरी चौधरी से भी हुई। पूर्वी पाकिस्तान में काबूरी को उस दौर की बांग्ला फिल्मों की सबसे चर्चित हीरोइन माना जाता था। वह भी अपने पति के साथ कुछ दिनों के लिए मेरे बगलवाले कमरे रुकी थीं। बिलकुल बिखरी-बिखरी। बेनूर। फिर उन्हें बॉलिवुड में अपनी किस्मत आजमाने के लिए तबकी बंबई भिजवा दिया गया। बाद में उन्होंने आईएस जोहर की एक फिल्म में काम भी किया। लेकिन हिंदी फिल्मों की चमक-दमक में वह अधिक समय तक टिक नई सकीं। उसी गेस्ट हाउस में बंग बंधु के बेहद करीबी कानूनी सलाहकार सिराजुल हक भी टकराए। भारत के विभाजन पर उनकी संक्षिप्त टिप्पणी आज भी अटकी हुई है जेहन में। बंटवारे को लेकर जब भी चर्चा होती, वह कहा करते, ”जोशी जी, इस भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन मानव- भूगोल के साथ बलात्कार है।” (दि पार्टिशन ऑफ इंडियन सब-कॉन्टिनेंट इज अ रेप ऑफ ह्यूमन जियोग्राफी)।

 

जब इंदिरा गांधी त्रिपुरा पहुंची

दूसरा अनुभव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से संबंधित है। हुआ यह कि इंदिरा जी दो दिन की त्रिपुरा यात्रा पर अगरतला पहुंचीं। पहले उन्होंने सर्किट हाउस में प्रेस कांफ्रेंस की। संयोग से मैं पत्रकारों की पहली कतार में कुर्सी पर जम गया। युवा था, जोश से भरपूर। प्रधानमंत्री पर कई सवाल हिंदी में दाग दिए। दो-तीन अंग्रेजी में। इंदिरा जी मुस्कराते हुए हिंदी और इंग्लिश में सहजभाव से उत्तर देती रहीं। चूंकि, अधिकांश पत्रकार गैर-हिंदी भाषी थे। हिंदी में दिए उत्तरों को लेकर वे चिल्लाने लगे। इंदिरा जी ने मेरी तरफ देखा। मैं उनका भाव समझ गया। मैंने तपाक से कहा; मैडम, आप चिंता न करें। मैं इनको इंग्लिश में ब्रीफ कर देता हूं। मैंने नोट ले रखे हैं। वह फिर मुस्कराईं और बोलीं : ओके। डू इट। प्रधानमंत्री उठकर अपने विशिष्ट रूम में चली गईं और मैंने अपने नोट से पत्रकारों को हिंदी-उत्तरों को ब्रीफ कर दिया। मैं उन क्षणों में गर्व और आत्मविश्वास से भरा अनुभव करने लगा। इस घटनाचक्र को याद करते समय देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मीडिया के साथ रवैया भी जाने क्यों याद आ रहा है। 2019 में चुनावों से ठीक पहले पुलवामा-विस्फोट, 2020 में भारत-चीन सीमा झड़पें और जम्मू-कश्मीर में निरंतर आतंकवादी घटनाएं, दोनों पड़ोसी देशों (पाकिस्तान और चीन) के साथ निरंतर अशांत-तनावपूर्ण रिश्तों के बावजूद नरेंद्र मोदी ने एक दफा भी प्रेसवार्ता नहीं की है जबकि अशांत क्षेत्र में इंदिरा जी बेखौफ मीडिया से टकराती रही हैं। क्या वर्तमान प्रधानमंत्री में आत्मविश्वास का अभाव है या मीडिया को हीन भाव से देखते हैं? इसका जवाब तो मोदी जी ही दे सकते हैं। मैं इतना ही कह सकता हूं कि युद्ध के दौर में भी इंदिरा गांधी लगातार प्रेस से वाबस्ता रहीं। इसका जीवंत अनुभव सुना ही चुका हूं। प्रेस कांफ्रेंस की समाप्ति के कुछ देर बाद इंदिरा जी अपने कमरे से बाहर निकलीं और विस्थापितों के शिविरों को देखना चाहती थीं। शिविर अगरतला से बीस-पच्चीस किलोमीटर या इससे अधिक के फासले पर थे। यह रास्ता तनावग्रस्त भारत-पाक सीमा से सट कर जा रहा था। दिन ढलने में अधिक वक्त नहीं था। सुरक्षाकर्मी चाहते थे कि प्रधानमंत्री अगली सुबह शिविरों की यात्रा करें, लेकिन वह अपने इरादे पर अडिग थीं। उनके साथ पश्चिम बंगाल की राज्यपाल पद्मजा नायडू भी थीं। प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी से उठीं और सीधे एम्बेसडर कार में जा बैठीं। यह देख कर सुश्री नायडू भी पीछे-पीछे चलीं। वह काफी भारी भरकम थीं। चलने में कुछ दिक्कत भी थी। फिर हम पत्रकार भी जीपों में लद गए। लेकिन, सभी भयभीत थे। कुछ भी अनहोनी घट सकती थी। प्रधानमंत्री का काफिला चला। रास्ते में पाक सैनिक अपनी सरहद पर तने हुए थे, हाथों में हथियार लिए। सब दिखाई दे रहा था। हमारी सांसे अधर में थीं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मनोदशा का वर्णन करना केवल काल्पनिक रहेगा। इसका सहारा लेना नकलीपन होगा। सर्किट हाउस से उठकर कार में बैठने का फैसला ही उनकी निर्भीकता को दर्शाता है। वह दृश्य भी स्मृति पटल पर चिपका हुआ है। सदैव के लिए।

 

विस्थापितों के शिविर

शिविरों में हजारों विस्थापितों ने इंदिरा गांधी का परम्परागत ढंग से सहज-स्वाभाविक भाव और भावनाओं से स्वागत किया। इंदिरा जी ने हिंदी में कुछ शब्द भी कहे, जिनका बांग्ला में अनुवाद भी होता रहा। शब्दों से विस्थापित गदगद थे, आश्वस्त थे अपनी सुरक्षा को लेकर। मेरे लिए शिविरों की पहली यात्रा नहीं थी। जनवरी (1971) में ही रायपुर के माना शिविर और दंडकारण्य में बसाए गए बंगाली विस्थापितों के क्षेत्रों का दौरा कर चुका था। ‘दिनमान’ पत्रिका में इसकी व्यापक रिपोर्टिंग की थी। लेकिन छत्तीसगढ़ के शिविर पुराने थे। 1947 में विभाजन और बाद के सालों में पाक सेना के अत्याचारों और सांप्रदायिक दंगों से त्रस्त हिंदू बंगाली विस्थापितों की बसाहट थी। लेकिन, उनके दिल-दिमागों में ‘आमार सोनारा बांग्लादेश’ अब तक जिंदा मिला था; ढाका-कुमिल्ला-जैसोर-खुलना के खेत-बाजार-गलियों में वे भटकते हुए मिले। त्रिपुरा के शिविरों में ताजा जख्मों की चीखें सुनाई दीं। लौटते हुए देखा, चारों तरफ दूर-दूर तक अंधेरा पसरा हुआ है। सेना की बीच-बीच में सर्चलाइट जरूर आंखों को चुंधिया जाती हैं। मोटी-खुरदरी मटमैली खादी की साड़ी में ढकी इंदिरा गांधी की कार सीधे अगरतला बैखोफ जा रही है, और पीछे- पीछे हम लोग।

 

तमिल विस्थापित और रामेश्वरम के शिविर

अगरतला के बाद विस्थापितों के दारुण दृश्य 1983 में रामेश्वरम में देखने को मिले। श्रीलंका में चल रहे गृह युद्ध (तमिलों का मुक्ति संघर्ष) के मारे हजारों तमिल विस्थापितों की गाथा भी अलहदा कहां थी; एक तरफ तमिल टाइगर (लिट्टे) और दूसरी तरफ थी सिंहली प्रभुत्ववाली श्रीलंका सेना। तमिल टाइगर तमिलों के लिए अपना स्वतंत्र राष्ट्र (तमिल इलम) चाहते थे जिसकी राजधानी ‘जाफनाÓ रहे। सिंहली बहुसंख्यक वाले राष्ट्र श्रीलंका विभाजन के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। लंबे समय से जातीय संघर्ष (एथनिक कॉनफ्लिक्ट्स) से श्रीलंका घिरा हुआ था। किसी प्रकार हिंदू तमिल विस्थापित रामेश्वरम तट तक पहुंच रहे थे। इनमें तमिल मुस्लिम भी थे। उम्मीद थी कि भारत उनके मुक्ति संघर्ष में मदद करेगा। उनका भी एक आजाद देश होगा, ठीक बांग्लादेश की तरह। संयोग देखिए, 1971 और 1983, दोनों ही शासनकालों में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। 1983 में भी विस्थापितों के शिविर बसाये गए। हालांकि, 1983 में 1971 के समान विस्थापन-समस्या सघन-गहन नहीं थी लेकिन तमिलनाडु की भूमि इसे लेकर काफी संवेदनशील थी। 1985-86 में मैंने जाफना में देखा था कि किस तरह बेचैन थे आजादी के लिए तमिल लोग। लिट्टे के नेता प्रभाकरण आराध्य का दर्जा रखते थे। नई दिल्ली ने लिट्टे की कितनी और कैसे मदद की और प्रभाकरण के साथ क्या किया, यह एक अलग-लंबी कहानी है। यहां इतना ही कहना काफी होगा कि मुख्यधारा का राष्ट्रवाद और सीमांत उपराष्ट्रवाद के मध्य मौजूद अंतर्विरोध कभी निर्णायक रूप से आक्रामक हो जाते हैं, और कभी सुप्त। अंतरराष्ट्रीय शक्तियों पर भी अंतर्विरोधों का निर्णायक समाधान निर्भर करता है।

 

पेशावर में अफगानी विस्थापित

पेशावर में सालों से मौजूद अफगानी विस्थापितों के विशाल शिविरों को देखने के बाद मुझे यही एहसास हुआ। 1990-91 में इन शिविरों की यात्रा की थी। अस्सी के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के प्रवेश के बाद से लोगों का वहां से पलायन शुरू हो गया था। इंसान भूमि के भूगोल से ही नहीं उखड़ता है बल्कि वह अपने ईथोस (संस्कृति, सभ्यता, भाषा, जीवन शैली, मिथक, इतिहास, परिवेश-संवेदनाओं-प्रतीकों-बिम्बों-रूपकों-गाथाओं-नायकों-प्रतिनायकों आदि) से भी विस्थापित हो जाता है। किसी भी देश-काल का शिविर इसकी भरपाई नहीं कर सकता। शिविरों के लोग जड़े-उखड़े- आधे-अधूरे-टूटे-लुटे-पिटे ही मिलेंगे। पेशावर शहर के बाहर काबुल मार्ग के किनारे बसाए गए शिविरों में ऐसी ही मानवता दिखाई दी। जरा सोचें, इन शिविरों में पैदा होने वाले बच्चों का बोध-संसार कैसा बनेगा? 1990 में रूसियों के जाने के बाद तीन-तीन सरकारें आईं (मुजाहिदीन, तालिबान और वर्तमान अलाइन्स सरकार) लेकिन शिविर जस-के-तस हैं। छत्तीसगढ़ के विस्थापित भी कहां लौट सके, न ही श्रीलंका के और न ही जम्मू में अवस्थित श्रीनगर घाटी के विस्थापित पंडित!

 

युद्ध की विभीषिका

मैं वापस भारत-पाक युद्ध की ओर लौटता हूं। 3 दिसंबर, 1971 को भारत-पाक युद्ध शुरू हो गया। मैं 4 दिसंबर की सुबह कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंच गया। अगरतला से मैं अगस्त-सितंबर में दिल्ली लौट चुका था। पूर्वी पाकिस्तान से पलायन पर काफी कुछ लिखा; कैसे छापामार युद्ध लड़ा गया?; विस्थापितों की कारुणिक गाथाएं; विदेशी शक्तियों की परोक्ष भूमिका आदि। अब मुझे सीधा वॉर-जोन में ले जाया जा रहा था। साथ में देसी-विदेशी पत्रकार भी थे। वियतनाम के अनुभवी युद्ध संवाददाता भी हमारे बीच मौजूद थे। प्रेस-काफिले का नेतृत्व जनरल जैकब बाद में जैकब पंजाब के राज्यपाल भी बने) कर रहे थे। प्रेस को हैंडल करने में सिद्धहस्त। रोज शाम को प्रेस ब्रीफिंग और सुबह युद्ध क्षेत्र में ले जाना।

जब हमारा काफिला जैसोर क्षेत्र में दाखिल हुआ तो चारों तरफ छाई आक्रांत खामोशी से सामना हुआ। कुछ जगह झोंपडिय़ां झुलस रहीं थीं। जीवन जड़वत था। दरख्त झुलसे हुए थे। वीरानी-ही-वीरानी। कभी किसी मुंडेर पर बैठा या दुबका हुआ मनुष्य दिखाई दे जाता। जितने आगे बढ़ते गए चीख-पुकारें भी कानों से टकराती गईं। एक जगह दिल दहला देनेवाला मंजर था; शव बिखरे हुए थे; सैनिकों और नागरिकों, दोनों के; स्त्रियों-बच्चों के शव भी मिले। काफिला रुका। हम लोग अपनी जीपों से उतरे। फोटोग्राफर तो शवों के चित्र लेने पर टूट ही पड़े, जैसे गिद्ध शवों पर टूट पड़ते हैं। विभिन्न कोणों से छवियां ले रहे थे। शवों के चित्रों में भी सौंदर्य बोध की पिपासा थी। मुझे वितृष्णा-सी होने लगी। एक विदेशी फोटोग्राफर ने वाक्य कसा, ‘वी आर प्रोफेशनल।’ पहले सेना की गोलियों ने इन मानुषों को शवों में बदला, और अब कैमरे जूम लेंसों से शूट करके शवों को छवि-सौंदर्यता में रूपांतरित किया जा रहा है जिससे कि ये बाजार की ‘कमोडिटी’ बन सकें। हम! रिपोर्टर या रिपोर्ताज लेखक भी सुंदरतम शब्द चित्रों में घटनाओं को उतारने की कोशिश करते हैं। अधिक से अधिक रोचक और पठनीय बनाते हैं। विशुद्ध यथार्थ और सौंदर्यमयी चित्रण के मध्य द्वंद्व के लिए स्पेस हमेशा रहता आया है। खैर! ताजा-ताजा मुक्त हुआ जैसोर-चित्रों में था, पाकिस्तानी फौज के चंगुल से। अगले दिन हमारा पड़ाव खुलना जोन में था।

तो हम खुलना पहुंच चुके हैं। साथ में कुछ और पत्रकार जुड़ चुके हैं। विदेशी पत्रकार भारतीय पत्रकारों से अधिक सक्रिय हैं और युद्ध रिपोर्टिंग में निपुण। शायद वे इसके अभ्यस्त भी हैं। शीत युद्ध (कोल्ड वार) के जख्मों को शब्दों और चित्रों में कैद करते रहे हैं। युद्ध क्षेत्र में पहले चरण में ‘कांटेक्ट पॉइंट’ आरम्भ हो जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आप युद्ध क्षेत्र के गहन क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं। ऐसी जगह पहुंच चुके हैं जहां से दोनों पक्षों के भिड़ंत के प्रभाव महसूस किए जा सकते हैं। लड़ाई कभी भी भड़क सकती है। प्रेस पार्टी से मैं और अन्य दो विदेशी पत्रकार छिटक जाते हैं। अति उत्साह में आगे बढ़ जाते हैं। ‘आंख-से-आंख (आई-टू-आई कांटेक्ट)’ यानी आमने-सामने वाले अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में दाखिल हो जाते हैं। हम पाक सैनिकों को सामने देख सकते हैं। हमारा दुर्भाग्य देखिए, इन्हीं क्षणों में दोनों ओर से फायरिंग शुरू हो जाती है। हम क्रॉस-फायरिंग में फंस जाते हैं। यह देखकर एक भारतीय टैंक दनदनाता हुआ आता है। आदेश होता है कि हम लोग टैंक की ओट में पीछे-पीछे चलते रहें। मौत प्रतीक्षारत है, कुछ पलों के लिए ऐसा ही लगा था। किसी भी पक्ष की गोली हममें से किसी को भी अपने साथ उड़ा कर ले जा सकती थी। लेकिन विदेशी इन क्षणों में भी अपने कैमरों में मौत और जिंदगी के फासले को कैद करने से चूक नहीं रहे थे। मैं अपने दिमाग में इन पलों को दर्ज करता जा रहा था। कुछ देर बाद फायरिंग थमी। सैनिक अफसरों के संरक्षण में डांट झेलते हुए हम सुरक्षित स्थान पर लग सके।

 

1984 के दंगे

दिल्ली के 1984 के दंगों में भी मैं मौत से अखियां लड़ा चुका हूं। तब मैं जंगपुरा में एक सिख के मकान में किराए पर रहता था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी में दंगे भड़क चुके थे। इन्हें मैं अपने दैनिक अखबार ‘नई दुनिया’ के लिए कवर कर रहा था। जंगपुरा से सटे लाजपतनगर का अनुभव है : एक, लाजपतनगर के एक गुरुद्वारे को जलाया जा रहा था; मैं इस अग्निकांड के चित्र-पर-चित्र ले रहा था; अचानक हिंदू बलवाइयों का ध्यान मेरी तरफ गया और वे मेरी ओर दौडऩे लगे; यह देख कर मैं अपने स्कूटर की तरफ लपका, स्टार्ट कर उसे दौड़ाया; पीछे-पीछे दंगाई दौड़े कुछ दूर तक और उनके हाथ में कैमरे का कवर आ गया लेकिन मैं बच गया, कैमरा भी सुरक्षित रहा, इत्तफाक से पीछे दोडऩेवाले जमीन पर गिर पड़े। दो, दूसरे दिन मैं भोगल से लौट रहा था। अचानक सिखों ने किसी मकान की छत से फायरिंग शुरू कर दी। मैं घबराया। पास के एक मकान की दीवार से चिपक कर जान बचाई। ऐसे क्षणों में बांग्लादेश के अनुभव दिमाग पर दस्तक देने लगे थे। 1987 में अफगानिस्तान यात्रा में भी मैं ‘अलविदा’ का सामना कर चूका हूं। काबुल में हम लोग (मैं, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के संवाददाता और इटली का पत्रकार) एक पहाड़ी पर स्थित इंटर कॉन्टिनेंटल होटल में ठहरे हुए थे। एक शाम लाउन्ज में चाय पी रहे थे। कुछ ही देर में हमसे कुछ दूर जोर का धमाका हुआ। हम लोगों को वहां से तुरत-फुरत हटाया गया और सुरक्षित कमरे में ले जाया गया। होटल के बाहर मशीनगनें तैनात कर दी गईं। फिर से आंखों में अगरतला और खुलना तैरने लगे। ऐसे अवसरों को ‘प्रोफेशनल हैजार्डस’ समझ कर युद्ध संवाददाता अपना जी हल्का करते रहते हैं।

 

कुमिल्ला से ढाका तक विध्वंस की तस्वीरें

दिसंबर के अंतिम सप्ताह में मैं भारतीय सेना की एक टुकड़ी के साथ कुमिल्ला होता हुआ ढाका पहुंचा। अगरतला के अखौड़ा बॉर्डर से लेकर ढाका तक विध्वंस के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं दिया; चारों तरफ मानव द्वारा मानव-विनाश का तांडव था; खेत-मकान-इंसान जल रहे थे; नदी-नालों-पोखरों में लाशें सड़ रहीं थीं। आदिकाल से लेकर बीसवीं सदी तक मनुष्य कितना सभ्य-सुसंस्कृत बन सका है, यह प्रश्न मस्तिष्क में रह-रह कर कौंध रहा था। मुझे सर्किट हाउस में ठहराया गया। अगले रोज पूर्बानी होटल में ‘दिनमानÓ के संपादक रघुवीर सहाय टकरा गए। दो रोज साथ रहे। लेखकों-नेताओं से मिले। प्रसिद्ध कवि जसीमुद्दीन के यहां तो दोनों का खूब आना-जाना रहा। वे विचारों से समाजवादी थे और उनके पुत्र वामपंथी थे। उन्होंने ही मुझे कम्युनिस्ट पार्टी के शिखर नेता मोनीसिंह से मिलवाया था। शायरा और कथाकार लैला समद के यहां ले गए। जसीमुद्दीन की छोटी पुत्री आसमां ने मेरे लिए बांस का आचार रघुवीर सहाय जी के साथ भेजा। दिल्ली पहुंच कर मुझे दिया। विध्वंस के बीच भी मधुर स्मृति अंकुरित हो ही जाती है। ऐसे ही मानवीय संबंध मनुष्य के अस्तित्व को सुरक्षित रखते आए हैं। असंख्य युद्धों और हिरोशिमा-नागासाकी परमाणु बम विस्फोटों के बावजूद मानवता इस धरा पर पल्ल्वित है।

जनवरी (1972) के पहले सप्ताह में कलकत्ता के लिए उड़ान भरने के लिए हवाई अड्डा पहुंचा। लाउन्ज में तत्कालीन जनसंघ के नेता प्रो. विष्णुकांत शास्त्री टकरा गए। वह ‘धर्मयुग’ पत्रिका के लिए रिपोर्ताज लिख रहे थे। बहस शुरू हो गई। प्रो. शास्त्री कहने लगे, ‘बांग्लादेश बन गया है। अब हिंदुओं को चाहिए कि वे संगठित होकर अपनी गतिविधियां शुरू कर दें। हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार करें, वरना उन पर इस्लाम हावी हो जाएगा।’ मैंने इस सोच का प्रतिवाद किया और कहा, ‘शास्त्री जी, अभी युद्ध के जख्म तो भरने दें। विनाश से दोनों कौमों को उभरने दें। मरहम लगाएं।’ मेरे विचार शास्त्री जी को रास नहीं आए। बहस इतनी छिड़ गई कि बोर्डिंग टाइम का ध्यान ही नहीं रहा। एयरपोर्ट का अफसर चिल्लाता हुआ आया और हम दोनों को डकोटा विमान में चढ़ाया गया। हमारी वजह से विमान-रवानगी दस-पंद्रह मिनिट लेट हो रही थी। दोनों जैसे-तैसे विमान में धंस गए। मेरी बगल की सीट पर कलकत्ता से प्रकाशित दैनिक ‘स्टेट्समेन’ के रिपोर्टर सान्याल बैठे मिले। अनुभवों का आदान-प्रदान होने लगा। अपने अनुभव-विश्लेषण पर आधारित सान्याल की भविष्यवाणी करीब साढ़े तीन साल बाद सही निकली। सान्याल ने कहा था, ”जोशी जी, स्वतंत्र बांग्लादेश बन जाने के बाद भी ग्रामीण इलाकों में कट्टर इस्लामपंथी जिंदा हैं। अमेरिका की सीआईए भी सक्रिय है। लंबे समय तक बंगबंधु को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। देख लेना।” इस चेतावनी को मैंने हंस कर टाल दिया। लेकिन, इसी चेतावनी ने 15 अगस्त ,1975 की भोर में ‘वास्तविकता’ का रूप ले ही लिया! दमदम हवाई अड्डे पर डकोटा उतर रहा था।

 

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