‘लव जिहाद’ का कुतर्क और यथार्थ

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  • संपादकीय

ऐसे समय में जब  कोविड-19 ने दुनिया  को हिलाया हुआ है, अर्थव्यवस्थाएं चौपट हैं, बेरोजगार  आत्महत्या पर उतारू हैं लेकिन भाजपा शासित राज्य एक के बाद एक ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने में व्यस्त हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि हिंदू समाज को या तो अपनी बेटियों की समझ पर भरोसा नहीं है या फिर वे पैदा ही विवेकहीन होती हैं? अगर ऐसा नहीं है तो फिर पिछले कई वर्षों से कट्टरतावादी हिंदू इतना अपमानजनक प्रचार क्यों करते आ रहे हैं कि दूसरे धर्म के लोग, विशेषकर मुसलमान, हिंदू लड़कियों को फुसलाकर उनसे विवाह कर लेते हैं? इस अतार्किकता की सीमा यह है कि माना हिंदू लड़कियां अक्ल से पैदल होती हैं तो भी सवाल है कि क्या सौ प्रतिशत लड़कियां बेअक्ल होती हैं? पिछली एक सदी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी हिंदू धर्म की सैकड़ों प्रचार शाखाओं के द्वारा चलाए जाने वाले उद्धार आंदोलनों, हिंदू धर्म की महानता के अखंड कीर्तन तथा इस्लाम की सतत आलोचना के बावजूद इतनी हिंदू लड़कियां क्योंकर मुस्लिम लड़कों के बहकावे में आती चली आ रही हैं कि भाजपा शासित राज्यों को उन्हें बचाने के लिए कानून बनाने पड़ें?

अगर ऐसा है तो हिंदुओं को अपने जीनों की जांच करवानी चाहिए कि उनके लड़के तो ‘समझदारÓ और लड़कियां ‘मूर्ख’ क्यों पैदा होती हैं? यह जानना जरूरी है कि आखिर इतनी जबरदस्त जो जैविक गड़बड़ी है वह क्या और क्यों है? सत्य यह है कि भारतीय समाज की समस्या असल में कुछ और ही है जिसे विशेषकर कट्टर हिंदू या तो समझना ही नहीं चाहते या वे वास्तविकता से मुंह छिपाने में लगे हैं या फिर उनकी मंशा ही कुछ और है? वह समस्या है सामाजिक गत्यात्मकता की। दूसरे शब्दों में उनके समाज और धर्म की सीमाएं।

ऐसे समय में जबकि कोविड-19 ने दुनिया का हिलाया हुआ है, अर्थव्यवस्थाएं चौपट हो गई हैं, बेरोजगार लोग आत्महत्या पर उतारू हैं लेकिन भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य एक के बाद एक ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने में व्यस्त हैं। पर एक मामले में यह अचानक नहीं है। अगर भारतीय मामलों के विशेषज्ञ क्रिस्टोफ जैफरलॉ की मानें तो ‘लव जिहाद’ के जुमले की खोज गुजरात में सन 2007 में हुई थी। (‘हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला’ के अलावा और कहां हो सकती थी?) यह भी याद रखिए कि उस दौरान वहां का मुख्यमंत्री कौन था?

उसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग इसे केरल और फिर कर्नाटक ले गए थे। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ समय बाद आरएसएस के साप्ताहिक पत्र ‘पांचजन्य’ और ‘ऑर्गेनाजर’ ने इस पर आमुख कथा छापी और शीर्षक था : ‘प्यार अंधा या धंधा। पर अब लग रहा है कि यह बात और किसी पर लागू होती हो या न हो, लेकिन भाजपा सरकारों पर अवश्य लागू होती है जो धड़ाधड़ ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए सारे काम छोड़ कर कानून बनाने में जुट गए हैं।

उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार ने 24 नवंबर को ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म-समपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 को स्वीकार कर राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेज दिया है। इसके तहत विवाह के लिए धर्म परिवर्तन करने पर दस साल तक की जेल और 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है।

इससे दस दिन पहले मध्यप्रदेश की सरकार ने बढ़ते ‘लव जिहाद’ के मामलों को रोकने के लिए ‘धर्म स्वातंत्र्य बिल 2020 को विधानसभा के अगले सत्र में पास करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही हरियाणा ने भी ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए कानून बनाने की शुरुआत कर दी है। ये तीनों ही राज्य भाजपा शासित हैं।

आगे बढऩे से पहले हमें कुछ और तथ्यों पर नजर डाल लेनी चाहिए।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सलामत अंसारी की अपील पर फैसला देते हुए 24 नवंबर को जो कहा है वह इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह भारतीय संविधान में में नागरिकों को दिए अधिकारों की एक बार फिर से पुष्टि करता है जो आर्टिकल 21 के तहत नागरिकों को प्रदान किए गए हैं।

न्यायालय ने कहा, ”हम प्रियंका खरवार और सलामत को हिंदू या मुसलमान की तरह नहीं देखते हैं, बल्कि वयस्कों की तरह देखते हैं जो अपनी इच्छा के और चुनाव के मुताबिक पिछले एक वर्ष से शांतिपूर्ण और हंसी-खुशी से रह रहे हैं। न्यायालय और विशेषकर संवैधानिक न्यायालय संविधान की धारा 21 के तहत मिली एक व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने में एक साथ हैं।‘’ न्यायालय ने कहा कि अपने पसंद के पुरुष या महिला के साथ रहने का अधिकार उसी तरह आधारभूत है जिस तरह कि जीने और स्वतंत्रता का अधिकार है। निजी संबंधों में हस्तक्षेप दो व्यक्तियों के चुनने की स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर अतिक्रमण होगा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के आलोक में देखें तो उत्तर प्रदेश सरकार की तथाकथित ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने की कोशिश को क्या कहा जाए? संविधान की उपेक्षा या उल्लंघन? पर याद रखिए, आरएसएस का एजेंडा ही भारतीय संविधान को बदलना है। वह सेक्युलर नहीं, हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य लेकर पिछले सौ वर्ष से चला आ रहा है।

सवाल है क्या कथित ‘लव जिहाद’ को लेकर इन सरकारों द्वारा उठाई जा रही आपत्तियां वाकई सही हैं?

मोदी सरकार के ही दौरान 2015-2016 में 64 हजार परिवारों का एक सर्वे हुआ था जिससे मैरीलैंड विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र की प्रोफेसर सोनालदे देसाई जुड़ी थीं। एनएफएचएस (राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण) के इस सर्वेक्षण के अनुसार, हिंदुओं में अंतर-धार्मिक शादियां सिर्फ 1.6 प्रतिशत और अंतर-जातीय   12.4 प्रतिशत थीं। जबकि मुसलमानों में यह दर क्रमश: 4.7 और 16 तथा ईसाइयों में 15.8 और 10.8 प्रतिशत थी।

अगर ऐसा नहीं है तो फिर भाजपा सरकारों का ‘लव जिहाद’ जैसा अभियान कैसे जारी है? स्पष्ट है कि या तो यह अतार्किकता और समाज की गलत समझ पर आधारित है, अन्यथा इसके कुछ और ही निहितार्थ हैं।

दोनों ही स्थितियों में इसे समझना जरूरी है।

पहली स्थिति यह है कि हिंदू धर्म ऐसा धर्म है जो नए लोगों का अपने धर्म में स्वागत नहीं करता। विशेषकर उच्च जातियों में गैर हिंदू धर्म से आए लोगों को शामिल किया ही नहीं जाता। यही कारण है कि बड़ी संख्या में मध्यवर्गीय जातियां पैदा हुई हैं, विशेषकर उत्तर भारत में। एक तरह से कहा जा सकता है कि उच्च वर्ण ऐसी घेराबंदी है जो अपने विशेषाधिकारों को बचाए रखने के लिए कुछ भी कर सकता है और करता रहा है।

दूसरी ओर जहां तक स्त्रियों की स्थिति है तो उनकी अपनी कोई पहचान नहीं है। वे विवाह होते ही नई पहचान में बदल जाती हैं। यानी पति की जाति/धर्म की हो जाती हैं। इसे जैन और सिख धर्म में होने वाली शादियों से समझा जा सकता है। इस संकट ने भी हिंदुओं में अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाहों को असंभव बनाए रखा है। राजस्थान के राजपूत राजाओं को लीजिए, वे अपनी बेटियों की मुगल राजाओं से शादियां करवाते रहे पर उन्होंने मुगलों की बेटियों से विवाह नहीं किया। स्त्रियों की स्थिति यह रही है कि अगर वे अपने पुरुषों की हार के कारण आक्रांताओं की बंदी भी बन गईं तो वे अस्पृश्य मानी जाती रही हैं और उन्हें छोड़ दिया गया है। पानीपत की तीसरी लड़ाई इसका उदाहरण है।

दूसरे शब्दों में जातियों और गोत्रों में बंधे हिंदू समाज के लिए अपने लिए इन सीमाओं के तहत साथी पाना समस्या हो सकती है, जिससे बचने के लिए इस तरह के आंदोलन चलाए जाते हैं।

स्पष्ट है कि हिंदू धर्म की एक समस्या अपनी जातीय व्यवस्था से मुक्ति पाना है तभी वह वैवाहित समस्या से बच सकते हैं। कुल मिलाकर हिंदू धर्म को बड़े पैमाने पर आधुनिक मूल्यों के अनुसार सुधारों या स्वयं को उदार बनाने की जरूरत है।

पर यहां मसला कुछ और है। वह है हिंदू वोटों का एकीकरण जिसके बगैर भाजपा सत्ता में नहीं आ सकती। इसलिए भी उसका लगातार कोई ऐसा मुद्दा उठाना, जो सारे हिंदुओं को साथ ले ले, जरूरी है। उसी के तहत विभाजित हिंदू समाज को एकत्रित करने की कोशिश में इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ सतत प्रचार का सिलसिला चला आ रहा है और सौ वर्ष बाद ही सही यह सफल होता नजर आ रहा है। मान लीजिए कल को हिंदू लड़कियों की मुसलमान लड़कों से शादी बंद हो जाती है पर हिंदू लड़के मुसलमान लड़कियों से शादी करने लगते हैं तो क्या होगा? क्या तब आरएसएस यह नहीं कहेगा कि मुसलमान लड़कियां हिंदू लड़कों को फंसा रही हैं और इस तरह वे हिंदू जाति को अपवित्र कर रही हैं। वैसे मुसलमानों के एक तबके में यह बात आज कही भी जाती है। इसलिए क्या आरएसएस का यह आह्वान नहीं होना चाहिए कि हिंदू अंतर-जातीय विवाह करें और साथ में भाजपा सरकारों का यह प्रयत्न नहीं होना चाहिए कि वे उन्हें इसके लिए ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहित करें?

विडंबना देखिए, उत्तर प्रदेश के दलित नेताओं का कहना यह है कि राज्य सरकार का यह अध्यादेश मूलत: उनके हितों के खिलाफ है क्योंकि वह उनका विशेषकर बौद्ध धर्म में धर्मांतरण रोकना चाहती है।

स्पष्ट है कि धर्म फिर वह चाहे कोई भी क्यों न हो व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता पर विश्वास नहीं करता। महिलाओं की तो बिल्कुल नहीं। निश्चय ही इसका संबंध पुरुष वर्चस्व से है जो व्यवस्था को नियंत्रित करता रहा है। इसलिए यह नहीं भुलाया जा सकता कि मानवीय गरिमा और उसकी निजी स्वायत्तता की गारंटी केवल आधुनिक मूल्य, मान्यताएं और एक उदार तथा प्रगतिशील समाज व्यवस्था ही प्रदान कर सकती है।

यह फैसला समाज का ही है कि वह कौन सा रास्ता अपनाता है।

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